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04/12/2024

है तवाफ़-ओ-हज का हंगामा अगर बाकी तो क्या
कुंद हो कर रह गई मोमिन की तेग़-ए-बे-नियाम

तशरीह:
यह शेर अल्लामा इक़बाल की "इब्लीस की मजलिस-ए-शूरा" से लिया गया है। इसमें इक़बाल एक गहरे सवाल को उठाते हैं।

तवाफ़-ओ- हज का हंगामा: इसका मतलब है कि अगर मक्का के चारों ओर तवाफ़ और हज की रस्में आज भी जारी हैं, तो क्या इसका मतलब है कि मुसलमान अपनी असली ताकत पर कायम हैं?

मोमिन की तेग़-ए-बे-नियाम: इसका तात्पर्य है वह तलवार जो निडर और दुनिया से बे-परवाह मोमिन (सच्चे ईमान वाले) के पास होती है। आज यह तलवार कुंद हो गई है, यानी मुसलमानों की वह निडरता और प्रभावशीलता खत्म हो गई है।

इस शेर में इक़बाल यह सवाल कर रहे हैं कि अगर मुसलमान सिर्फ धार्मिक रस्मों को निभाते रहें लेकिन उनके अंदर असली ईमान, ताकत, और उद्देश्य की धार खत्म हो जाए, तो क्या वह सच्चा इस्लाम हो सकता है?
यह शेर हमें रस्मों और असली इस्लामी मूल्यों के बीच फर्क समझने की प्रेरणा देता है।

17/11/2024

यूं तो सैयद भी हो, मिर्ज़ा भी हो, अफ़गान भी हो,
तुम सभी कुछ हो, बताओ तो मुसलमान भी हो?

व्याख्या (तशरीह):
यह पंक्तियाँ अल्लामा इक़बाल की महान रचना "जवाब-ए-शिकवा" से ली गई हैं। इन पंक्तियों में इक़बाल ने मुसलमानों की उस स्थिति पर सवाल उठाया है, जहाँ वे केवल अपनी जातीय और वंशीय पहचान पर गर्व करते हैं, लेकिन अपने असली इस्लामी मूल्यों और पहचान से दूर हो गए हैं।

भावार्थ:
इक़बाल कहते हैं कि तुम अपने आप को सैयद (पैगंबर मुहम्मद ﷺ के वंशज), मिर्ज़ा (एक उच्च वर्गीय खिताब), और अफ़गान (पश्तून वंश) के नामों से पहचानते हो।

लेकिन क्या तुमने अपने आप को यहां परखा है कि तुम इस्लाम के सच्चे अनुयायी हो या नहीं?

इस सवाल के माध्यम से वह मुसलमानों को यह समझाना चाहते हैं कि केवल अपनी नस्ल और इतिहास पर गर्व करना पर्याप्त नहीं है। असली मुसलमान वही है जो इस्लामी उसूलों (सिद्धांतों) पर अमल करता हो।

संदेश:
मुसलमानों को चाहिए कि वे अपने अमल और किरदार में इस्लाम की शिक्षाओं को लागू करें।

जाति, वंश, और वर्ग से ऊपर उठकर वे अपने ईमान और कर्मों का मूल्यांकन करें।

असली पहचान केवल अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के दिए हुए रास्ते पर चलने से है, न कि खिताबों और उपाधियों से।

14/11/2024

मरने वाले मरते हैं लेकिन फना होते नहीं
ये हकीकत में कभी हम से जुदा होते नहीं।
अल्लामा इक़बाल रहमतुल्लाह आलय ✍️✍️

मतलब: गोया इंसान जब फना हो कर हम से बिछड़ता है, तो अमली सतह पर ये आरज़ी जुदाई होती है, इसी जुदाई के ग़म में आँसू बहाए जाते हैं। इस पूरी नज़्म में इक़बाल हयात बाद अलमौत के फ़लसफ़े से मुतास्सिर नज़र आते हैं। इसी बाइस वो आख़िरी बंद के अशआर में वाज़ेह तौर पर अपना नक़्त-ए-नज़र बयान करते हुए कहते हैं कि बसर अमीक तौर पर देखा जाए, तो जो लोग मौत से हम किनारा हो जाते हैं दरहक़ीक़त वो फना नहीं होते और रूहानी सतह पर हम से जुदा नहीं होते।

11/11/2024

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