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15/08/2021

Celebrate 15th August

23/05/2017
10/07/2016

क्या आप जानते हैं?*
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👉 खड़े खड़े पानी पीने वाले का घुटना दुनिया का कोई डॉक्टर ठीक नहीँ कर सकता।
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👉* तेज पंखे के नीचे या A. C. में सोने से मोटापा बढ़ता है।
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👉* 70% दर्द में एक ग्लास गर्म पानी किसी भी पेन किलर से भी तेज काम करता है।
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👉* अल्युमिनम के बर्तनों के प्रयोग से अंग्रेजों नें देशभक्त भारतीय क़ैदियों को रोगी बनाया था।
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👉* शर्बत और नारियल पानी सुबह ग्यारह के पहले अमृत है।
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👉* देशी गाय के शरीर पर हाथ फेरने से 10 दिन में ब्लड प्रेसर नॉर्मल हो जाता है।
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20/10/2015

अपने ही सांस्कृतिक फंदे में फंसी भाजपा
अभय कुमार दुबे
एसोसिएट प्रोफ़ेसर, सीएसडीएस
20 अक्तूबर 2015
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चूँकि भारतीय जनता पार्टी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का वाहक होने का दावा करती है, इसलिए अगर उसकी राजनीति को सांस्कृतिक रूप से परिभाषित किया जाए तो उसके किसी पैरोकार को आपत्ति नहीं होनी चाहिए.
दरअसल, इस समय यह सत्तारूढ़ दल अपने ही बनाये हुए जिस फंदे में फँसा हुआ है, वह उसकी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी राजनीति की ही देन है.
गो-रक्षा इस पार्टी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रमुख आधार है, लेकिन उसके आधार पर हो सकने वाली गोलबंदी को पूरे देश में समान रूप से लागू करने के बजाय वह उसे केवल ग़ैर-भाजपा शासित राज्यों में ही आज़मा रही है.
गाय काटने के शक को लेकर होने वाली भीड़-हिंसा की घटनाएँ या तो उत्तर प्रदेश में हुई हैं या हिमाचल प्रदेश में. जबकि स्वयं भाजपा शासित गोवा के मुख्यमंत्री बाक़ायदा घोषित कर चुके हैं कि वे गोमांस खाने पर प्रतिबंध नहीं लगाएँगे, क्योंकि उनके प्रदेश की आबादी का एक प्रमुख हिस्सा गोमांस खाता है.
चूँकि भाजपा इस विषय में कुछ नहीं बोलती, इसलिए उसकी यह राजनीतिक चतुराई छिपी नहीं रह पाती.
भाजपा उत्तर-पूर्वी राज्यों में खाए जाने वाले गोमांस पर भी नहीं बोलती. इसी चतुराई का दूसरा हिस्सा यह है कि प्रधानमंत्री ने भी इस घटनाक्रम के ग़ैर-भाजपा राज्यों में सीमित होने का लाभ उठाया.
पहले तो दादरी की दर्दनाक घटना पर वे बोले नहीं, और जब उनकी सरकार पर दबाव पड़ा तो उन्होंने इस घटना की निंदा तो नहीं ही की, केंद्र सरकार को इन घटनाओं से अलग करके ज़िम्मेदारी लेने से भी इनकार कर दिया.
संघवादी ढाँचे की राजनीति खेलने की ऐसी मिसाल किसी प्रधानमंत्री ने पहली बार दी. अगर वास्तव में प्रधानमंत्री को दादरी की घटना अफ़सोसनाक लगी थी तो गृह मंत्रालय के ज़रिए उत्तर प्रदेश सरकार से उसकी तफ़सील पूछना और उस पर अधिक प्रभावी कार्रवाई का दबाव डालना पूरी तरह उनके अधिकार-क्षेत्र में है. वैसे भी वे उत्तर प्रदेश से सांसद हैं.
इस सांस्कृतिक फंदे को उसका ख़ास रूप साहित्यकारों की कार्रवाई ने दिया है. भारत के इतिहास में इतनी भाषाओं के मशहूर साहित्यकारों ने इतनी बड़ी संख्या में पहली बार प्रतिरोध-स्वरूप पुरस्कार वापस करके एक नयी मिसाल कायम की है.
इस पर बहस की जा सकती है कि उन्हें ऐसा करना चाहिये था या नहीं, पर इसमें कोई शक नहीं कि उनका प्रतिरोध बेहद असरदार निकला. सरकार हिली हुई लग रही है. उसके और भाजपा के प्रवक्ता हर मंच पर अपना बचाव करते घूम रहे हैं.
मुश्किल यह है कि उनके पास इस सांस्कृतिक आक्रमण का उत्तर देने के लिये न तो सांस्कृतिक भाषा है और न ही तर्कों का सांस्कृतिक ढाँचा है. वे साहित्यकारों के मुक़ाबले राजनीतिक भाषा बोल कर काम चला लेना चाहते हैं.
दरअसल, साहित्यकारों की अंदरूनी राजनीति और उनके हिंदुत्व विरोधी विचारधारात्मक लगावों को सामने ला कर भाजपा उस मुद्दे की धार कुंद नहीं कर पा रही है जिसे पुरस्कार वापसी के क़दम से का़फी तीखापन मिल गया है.
हम सभी जानते हैं कि साहित्यकारों के कहने पर भाजपा के विरोध में कोई वोट देने नहीं जा रहा है. लेकिन, अकादमी पुरस्कारों की वापसी की घटना पूरे विश्व के सांस्कृतिक जगत में गूँज सकती है.
साहित्यकारों और कलाकारों का अपना एक नेटवर्क होता है. वैसे भी पुरस्कार वापिस करने वाले सभी साहित्यकार वामपंथी ख़ेमे के नहीं हैं. इनमें साहित्य की दुनिया में मार्क्सवाद के प्रभाव से जूझने वाले रचनाकार भी हैं.
सलमान रुश्दी के आवाज़ में आवाज़ मिलाने से आगे भी फ़र्क पड़ने वाला है. रुश्दी ने यह भी कहा है कि वैसे तो प्रधानमंत्री बड़े बातूनी (टाकेटिव) हैं, पर ऐसे मसलों पर उनकी चुप्पी गुंडई (ठगरी) को बढ़ावा दे रही है.
भाजपा को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मोदी की आर्थिक नीति का समर्थन करने वाले टिप्पणीकारों ने भी गोमांस पर होने वाली राजनीति पर चिंता जताई है.
अगर भाजपा और उसके समर्थनक संगठनों, जैसे बजरंग दल, गोरक्षा दल और हिंदू जागरण मंच, ने अपने कदम वापस नहीं खींचे तो यह सांस्कृतिक राजनीति दूरगामी दृष्टि से उन्हें मँहगी पड़ने वाली है.
(लेखक विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) में भारतीय भाषा कार्यक्रम का निदेशक और एसोसिएट प्रोफेसर है. ये उनके निजी विचार हैं.)
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14/10/2015

शुभ प्रभात

नेहरु की भांजी ने लौटाया अकादमी पुरस्कार कहा, 'मोदी-राज में देश पीछे जा रहा है'By एबीपी न्यूज/ एजेंसीTuesday, 06 October...
06/10/2015

नेहरु की भांजी ने लौटाया अकादमी पुरस्कार कहा, 'मोदी-राज में देश पीछे जा रहा है'
By एबीपी न्यूज/ एजेंसी
Tuesday, 06 October 2015 08:12 PM
नई दिल्लीः भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की भांजी और प्रसिद्ध साहित्यकार नयनतारा सहगल ने केंद्र की मोदी सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुए उन्हें मिला साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की. 88 वर्षीय नयनतारा को यह पुरस्कार 1986 में उनके अंग्रेजी उपन्यास रिच लाइक अस के लिए दिया गया था. गौरतलब है कि वर्ष 1975-77 के दौरान इंदिरा सरकार द्वारा लगाई गई इमरजेंसी के खिलाफ भी इन्होंने विरोध किया था.
मोदी सरकार पर प्रहार करते हुए नयनतारा ने कहा, ''ये अनमेकिंग ऑफ इंडिया है.'' उन्होंने दादरी में गोमांस की अफवाह के चलते एक मुस्लिम युवक की हत्या का जिक्र करते हुए बताया कि 'इस घटना की निंदा करने के लिए पीएम मोदी ने एक शब्द भी नहीं बोला जबकि पूरा देश चाहता है कि प्रधानमंत्री इस मामले पर अपना बयान दें. '' नयनतारा ने बताया कि मोदी राज में देश पीछे की तरफ जा रहा है और हम हिंदुत्व के दायरे में सिमट रहे हैं, और बहुत से लोग खौफ के साये में जी रहे हैं.
अपनी ममेरी बहन और दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 1975 में आपातकाल लागू किए जाने का कड़ा विरोध करने वाली सहगल ने कहा, ‘‘जिन लोगों की हत्या की गई है उन भारतीयों की याद में, असहमति के अधिकार को बनाए रखने वाले सभी भारतीयों के समर्थन में और असहमति रखने वाले उन लोगों के समर्थन में जो खौफ एवं अनिश्चितता में जी रहे हैं...मैं अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा रही हूं .’’
सहगल ने बताया, ‘‘मोदी ऐसे नेता हैं जो जानते हैं कि कैसे बोलना है . उन्होंने लंबे-लंबे भाषण दिए हैं . ट्विटर और सोशल मीडिया पर वह बहुत ही मुखर हैं . देश में जो कुछ भी हो रहा है, उन्हें इस सबके लिए जिम्मेदार होना चाहिए.’’ ‘‘विचारों, अभिव्यक्ति, आस्था, विश्वास एवं पूजा की स्वतंत्रता’’ के संवैधानिक वादों के बारे में लोगों को याद दिलाने वाले उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी के हालिया भाषणों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, ‘‘उन्हें ऐसा करना जरूरी लगा क्योंकि विविधता एवं वाद-विवाद की भारत की संस्कृति पर तीखे हमले हो रहे हैं .’’ सहगल ने कहा, ‘‘भारत पीछे जा रहा है . यह सांस्कृतिक विविधता और वाद-विवाद के हमारे महान विचार को खारिज कर रही है और इसे हिंदुत्व नाम की एक खोज तक संकीर्ण कर रहा है.’’

04/10/2015

व्यक्ति विशेष: नफरत का नया ‘हथियार’ बना ‘गोमांस’?
By जसीम खान एसोसिएट एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर, एबीपी न्यूज़

Saturday, 03 October 2015 06:32 PM

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अब कभी अखलाक नहीं लौटेगा. दरवाजे पर भी अब उसकी आवाज सुनाई नहीं देगी और एक मां अपने बेटे की मौत की उन खौफनाक यादों के साथ जीने को मजबूर होगी जो एक भयानक सपना बन कर जिंदगी भर उसका पीछा करती रहेगी. अखलाक का जैसा नाम था. वैसा ही उसका मिजाज भी था. सबसे मिल-जुल कर रहने वाले अखलाक के घर पर ईद और बकरीद पर मेहमानों और पड़ोसियों का तांता लगता था. ईद के मौके पर जब दावतों का दौर चलता तो गांव के मुसलमान ही नहीं हिंदू भाई भी उसका लुत्फ उठाते थे लेकिन सोमवार की उस रात को ना जाने क्या हुआ कि अखलाक के वो दोस्त ही उसकी जान के दुश्मन बन गए.

उस रात नोएडा के इस बिसाहड़ा गांव में लाउडस्पीकर से एक आवाज गूंजी जो देखते– ही देखते एक ऐसी वहशी भीड़ में तब्दील हो गई जिसने अखलाक की बरसों की मोहब्बत और भाई-चारे को उसके ही खून से लाल कर दिया. 52 साल के अखलाक को उन्हीं हाथों ने बेरहमी से पीट – पीट कर मार डाला जो हाथ कभी उनसे दोस्ती से मिला करते थे. टूटा हुआ दरवाजा....ये बिखरा हुआ खून आंखों से बहते ये आंसू और घर के कोने – कोने में फैले तबाही के ये निशान उस खौफनाक मंजर के गवाह है जिसे सुन कर किसी की भी रुंह तक कांप जाए. अखलाक के गांव में फैली गौहत्या की अफवाह ने तबाही का एक ऐसा तांडव मचाया है जिसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है.

अखलाक की मां असगरी बेगम ने बताया कि उन्होंने किया क्या सोचकर मेरे बच्चे के साथ उसे मार दिया औऱ मुझे तड़पाने को क्यों छोड़ दिया? मैं इससे ज्यादा क्या बयान करुं जिस बच्चे को मैंने 29 साल से पाला था उसके कान भी न है कनपटी भी न है.

सोमवार की वो रात असगरी बेगम और उनके परिवार पर कयामत की तरह गुजरी है. अपने बेटे अखलाक को अपनी ही आंखों के सामने उन्होंने तड़प – तड़प कर मरते हुए देखा है. उनका पूरा परिवार मदद के लिए चीख रहा था लेकिन पड़ोसी हाथ बांधे खड़े थे और वहशी भीड़ अखलाक के मुर्दा जिस्म पर वार पर वार किए जा रही थी. 68 साल की असगरी बेगम उस घड़ी को याद कर बिलख उठती हैं जिस वक्त कई लोगों ने एक साथ उनके घर पर हमला बोल दिया था.

एक खूनी अफवाह और अखलाक के कत्ल की ये खौफनाक दास्तान उत्तर प्रदेश के शहर ग्रेटर नोएडा के बिसहाड़ा गांव की है. दिल्ली से चंद किलोमीटर के फासले पर बसे बिसाहड़ा गांव में 52 साल के अखलाक अपने भरे – पूरे परिवार के साथ रहते थे. लेकिन सोमवार की रात अखलाक के परिवार पर कहर बन कर टूटी. अखलाक को बेरहमी से पीट – पीट कर मार दिया गया जबकि उनका जवान बेटा अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है. अखलाक की पत्नी, मां और बेटी को भी दरिंदगी से पीटा गया और ये वारदात सिर्फ इसलिए अंजाम दी गई क्योंकि उस रात गांव में ये अफवाह फैला दी गई थी कि अखलाक अपने घर में गाय का मांस पका कर खा रहा है.

अखलाक ने गौहत्या की या नहीं ये बात तो अभी मालूम नहीं है लेकिन गौहत्या के नाम पर उसे जरुर मार दिया गया. अखलाक की हत्या की ये पूरी दर्दनाक और सोचने पर मजबूर कर देने वाली कहानी भी हम सुनाएंगे आपको आगे लेकिन उससे पहले बात गौहत्या और गौमांस के उस मुद्दे की जिसके लिए अखलाक मार दिया गया.

गौहत्या के इल्जाम में अखलाक की हत्या जितनी डरावनी और चौंकाने वाली है उतनी ही परेशान करने वाली वो प्रतिक्रियाएं भी हैं जो उसकी मौत के बाद सामने आई हैं. दरअसल गाय हिंदुओं की आस्था का प्रतीक रही है इसीलिए देश के कई राज्यों में सरकारों ने गौहत्या पर प्रतिबंध लगा रखा है लेकिन आज गौमांस का ये मुद्दा धर्म का एक नया हथियार बन चुका है. हालांकि देश में गौहत्या और गौमांस के मुद्दे को सांप्रादिक रंग देने और उसको एक राजनीतिक मुद्दा बनाने का इतिहास भी पुराना रहा है. गाय के उस इतिहास की भी परते हम खोलेंगे आगे लेकिन उससे पहले ये जान लीजिए की गौमांस का ये मुद्दा कैसे बन गया है धर्म का नया हथियार.

आरएसएस विचारक राकेश सिन्हा बताते हैं कि इस देश की वर्तमान दोनों में जो एक प्रतीक के रुप में जो आस्था से जोड़ती है उसमें एक गाय है और इसी कारण से गाय के संबंध में लंबे समय से विमर्श शुरु हुआ जब कुछ खास लोगों ने गाय के मांस को अपनी फूड हैविट का अनिवार्य अंग बना लिया और गौ हत्या शुरु कर दी. हिन्दू समाज कभी भी गौ हत्या के पक्ष में नहीं रहा है. तो सवाल बीफ खाने पर नहीं है जिनको बीफ खाना है वो बीफ खा सकते हैं हम गाय का कत्ल इस देश में नहीं होने देना चाहते हैं. गाय हमारी आस्था भी है और गाय हमारी संस्कृति की प्रतिक भी है.

गाय किसी की नजर में मां है, तो किसी के लिए भोजन और किसी के लिए सिर्फ एक जानवर है. गाय और गौवंश को लेकर ये अलग - अलग नजरिया हमेशा से विवाद का विषय रहा है. चूंकि इस मुद्दे के साथ धार्मिक भावनाएं जुड़ी है इसीलिए इसको लेकर राजनीति भी खूब होती रही है. चंद महीने पहले ही महाराष्ट्र और हरियाणा की बीजेपी सरकारों ने गौवंश हत्या पर रोक का कानून बना कर इस मुद्दे को एक बार फिर हवा दे दी है. दरअसल गाय को मां और ममतामयी कहा गया है उसके दूध से लेकर उसके गोबर तक को लाभकारी बताया गया है लेकिन वहीं गाय किसी का भोजन भी बन सकती है इसका जिक्र कभी नहीं होता है लेकिन हकीकत यही है कि देश में एक बड़ा वर्ग जहां गाय को मां मान कर उसकी पूजा करता है वहीं देश के कई हिस्सों में वही गाय प्लेटों में परोसी भी जाती रही है.

आमतौर पर गौहत्या और गौमांस के मामले को सांप्रदायिक बनाते हुए हिंदू - मुस्लिम रंग देने की कोशिश की जाती है. लेकिन हिंदुस्तान में बीफ यानी गाय, बैल, सांड़ और भैंस का मांस खाने वाले सिर्फ मुसलमान हों ऐसा भी नहीं है. कई आदिवासी जनजातियों, दलितों और पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए बीफ उनके रोजाना भोजन का हिस्सा है और इसकी बड़ी वजह बीफ का दूसरे मांस की तुलना में सस्ता होना है. जानकारों के मुताबिक बीफ में सब्जियों या किसी अन्य मांस से ज्यादा प्रोटीन होता है और चूंकि बकरे और दूसरे जानवरों के मांस महंगे होते हैं इसलिए जो गरीब या पिछड़े वर्ग के लोग मांसाहारी हैं उनके लिए बीफ खरीदना आसान होता है. इसीलिए गौमांस के मुद्दे पर अक्सर ये सवाल भी उठता रहा है कि क्या लोगों को इस बात की आजादी नहीं होनी चाहिए कि वो क्या खायें और क्या नहीं?

आरएसएस विचारक राकेश सिन्हा बताते हैं कि जिनको जो खाना है वो एक्सपोर्ट करके खा सकते हैं इंपोर्ट करके खा सकते हैं बाहर जाकर खा सकते हैं. किसी को ये निर्देशित नहीं किया जा सकता है आरोपित नहीं किया जा सकता है कि आप मत खाओ हम तो सिर्फ इतनी ही बात कहते हैं कि गौहत्या नहीं होनी चाहिए गाय को लोग माता के रुप में हजारों साल से पूज रहें हैं. मां मानते हैं और सुबह उठ कर पहले गाय को खाना खिलाते हैं तो उस गाय की अगर पड़ोस में कोई हत्या करे तो स्वभाविक है समाज की सद्भावना और समाज की विरासत दोनों ही सवालों के घेरे में आती है.

धार्मिक आस्था और खाने की आजादी के बीच की इस बहस का इतिहास पुराना है. अधिकांश हिंदुओं के लिए गाय और बैल पूज्यनीय है. लेकिन यह सवाल भी उठता रहा है कि क्या हिंदू हमेशा से ही ऐसा मानते थे यानी क्या हिंदुओं में कभी भी गोमांस खाने का रिवाज नहीं था?

हिंदू कृष्ण भगवान की पूजा करते हैं और मान्यताओं के अनुसार कृष्ण गायों को पालते और उनकी सेवा करते थे. वहीं बैल को भगवान शिव का वाहन माना जाता है और उसी बैल के नंदी स्वरूप की पूजा आज भी होती है. इस तरह गाय और बैल हिंदूओं की धार्मिक आस्थाओं से जुड़े हुए हैं. लेकिन The myth of holy cow नाम की किताब लिखने वाले इतिहासकार डी एन झा के मुताबिक यह धारणा बिल्कुल गलत है कि हिंदू कभी भी गोमांस नहीं खाते थे. उनके मुताबिक वैदिक काल में न सिर्फ गाय और बैल की बलि दी जाती थी बल्कि खास मौकों पर गोमांस खाया भी जाता था.

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के विचारक राकेश सिन्हा बताते हैं कि जहां तक वेदों की बात है औऱ जो डी एन झा कहते हैं वो तथ्यों को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत करते हैं वेदों की अनेक श्लोकों का अनेक तरह से व्याख्या की गई है औऱ कुछ मॉर्क्सवादी इतिहासकारों को वही व्याख्या अच्छी लगती है जिसमें भारत की विरासत औऱ भारत की संस्कृति पर धब्बा लगे और वर्तमान में जो आस्था है उसपर चोट पहुंचाई जा सके वस्तुत: ये सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विरोधी है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को डीकंस्ट्रक्ट करना चाहते हैं औऱ डीकंस्ट्रक्ट करने के लिए जितने आयाम हैं उसको पहले डीकंस्ट्रक्ट करना पड़ता है उसमें गाय भी एक आयाम है.

सदियों से गौमांस का मुद्दा विवादों में घिरा रहा है लेकिन ये सिर्फ आस्था से ही जुड़ा मुद्दा नहीं है बल्कि भारत के संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों में गोरक्षा की बात कही गयी है. लेकिन भारत के संविधान के निर्माता कहे जाने वाले डॉक्टर भीम राव आबेंडकर ने अपनी किताब - अछूत कौन थे और वो अछूत क्यों बने में एक निबंध लिखा – क्या हिंदुओं ने कभी गोमांस नहीं खाया ? इस निबंध के मुताबिक वेदों में गाय को पवित्र जरूर कहा गया है लेकिन साथ ही गाय की बलि और गोमांस खाने के प्रमाण भी मौजूद हैं.

हिंदू धर्म को अमेरिकी धर्म संसद तक ले जाने वाले स्वामी विवेकानंद ने साल 1900 में कैलिफोर्निया में दिए एक लेक्चर में भी कुछ ऐसा ही जिक्र किया. विवेकानंद के मुताबिक पुराने रीति रिवाजों के मुताबिक जो बीफ नहीं खाता था वो अच्छा हिंदू नहीं था.

इतिहास के इन दावों पर विवाद आज भी जारी है लेकिन जानकारों के मुताबिक पांचवी और छठी शताब्दी से खेती में गाय और बैलों का महत्व बढ़ने लगा. उसके बाद से ही गोरक्षा का समर्थन भी बढ़ने लगा. गाय को लेकर हिंदुओं की आस्था का सम्मान करते हुए मुगल बादशाह बाबर से लेकर अकबर और जहांगीर तक ने गोहत्या पर पाबंदी लगाई.

ऐसा माना जाता है कि गौहत्या के एक राजनीतिक मुद्दा बनने की शुरूआत भारत में अंग्रेजों के आने के बाद हुई थी. और आज भी गौमांस का मुद्दा एक बेहद संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है. एक ऐसा मुद्दा जिसके नाम पर ना जाने कितने अखलाक मारे जा चुके हैं. कैसे गौहत्या के इल्जाम में बिसहड़ा गांव के अखलाक का भी हुआ था कत्ल?

उत्तर प्रदेश के नोएडा का बिसहड़ा गांव. इस गांव में करीब दो हजार परिवार रहते हैं लेकिन इस इन दिनों गांव की गलियों में हर रोज की तरह चहल - पहल नहीं है. गांव के सिर्फ एक घर के बाहर लोगों का हुजूम लगा है. सरकारी अधिकारियों, पुलिस, मीडिया और नेताओं के जमावड़े के बीच ये अखलाक का घर है जहां पिछले पांच दिनों से मातम का माहौल है. सोमवार को गोहत्या की अफवाह के बाद हुई हिंसा में अखलाक की हत्या कर दी गई थी. सोमवार रात करीब साढे दस बजे जब भीड़ ने अखलाक के घर पर हमला बोला था उस वक्त घर में अखलाक के अलावा उनकी पत्नी, मां, बेटी और बेटा दानिश भी मौजूद था. गुस्साई भीड़ ने किसी को भी नहीं बख्शा. पूरे परिवार को बेरहमी से पीटा गया और अखलाक को पीट – पीट कर मार डाला गया.

अखलाक और उसके परिवार के साथ जिस वारदात को अंजाम दिया गया. उसके पीछे एक खूनी अफवाह थी. दरअसल गोहत्या और गोमांस खाने की ये अफवाह फैलाने के लिए गांव के ही कुछ लड़कों ने इस शिव मंदिर में लगे लाउडस्पीकर का सहारा लिया था.

आरोप है कि मंदिर से लाउडस्पीकर पर ये अफवाह फैलाई गई थी कि गांव में गाय की हत्या कर दी गई है. इसके बाद गांव वालों को एक जगह इकट्ठा होने के लिए कहा गया था. मंदिर के महंत का भी ये कहना है कि दो लड़कों के कहने पर उन्होंने लाउडस्पीकर से अनाउंटमेंट किया था. हांलाकि वो इस बात से इंकार करते हैं कि उन्होंने किसी का नाम लेकर लोगों को भड़काया था.

सोमवार रात लाउडस्पीकर से निकली गोहत्या की अफवाह के बाद गुस्साई भीड़ ने अखलाक के घर पर हमला बोल दिया था. गलियों से होते हुए भीड़ अखलाक के घर तक जा पहुंची और इससे पहले की कोई कुछ समझ पाता, गुस्साई भीड़ ने घर में घुस कर अखलाक और उसके परिवार को मारना पीटना शुरू कर दिया. भीड़ में शामिल युवकों ने महिलाओं और बुजुर्गों को भी नहीं बख्शा. शाइस्ता की माने तो उस भीड़ में ऐसे भी लोग शामिल थे जिन्होंने कुछ दिनों पहले ही ईद पर साथ बैठ कर सेवईयां खाई थीं लेकिन गौहत्या की एक अफवाह ने उन्हें भी उनका दुश्मन बना दिया.

एक अफवाह के बाद टूटे विश्वास से अखलाक के परिवार को हिला कर रख दिया है वो अब इस गांव में नहीं रहना चाहता. इसी गली में रहने वाला इलियास का परिवार भी गांव छोड़ देना चाहता है. जो बिसहड़ा गांव कभी हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल था. आज उस पर अविश्वास का घना साया है. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यहां बरसों से हिंदू और मुसलमान भाई-भाई की तरह रहते आए हैं. डेढ़ सौ साल पुरानी गांव की ये मस्जिद भी इस बात की गवाह है जिसे गांव के हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर बनाया था लेकिन अखलाक की हत्या ने एकता की तहजीब पर ही मानों सीधी चोट कर दी है.

बिसहड़ा गांव में रहने वाले करीब 25 मुसलमान परिवारों का विश्वास हिला हुआ है. लेकिन गोहत्या और गोमांस खाने को लेकर विवाद और वारदात का देश में ये पहला मामला नहीं है. गोहत्या को सांप्रदायिक रंग देने का इतिहास पुराना रहा है. ऐसा माना जाता है कि गोहत्या को राजनीतिक मुद्दा बनने की शुरूआत देश में अंग्रेजों के आने के बाद हुई थी. भारत में ब्रिटिश हुकूमत की शुरूआत करने वाले रॉबर्ट क्लाइव ने 1760 में कोलकाता में पहला बूचड़खाना बनवाया. इसी के साथ शुरूआत हुई उस कारोबार की जिससे आज भी लाखों लोगों की रोजी - रोटी चलती है. इन बूचड़खानों में काम करने के लिए गरीब मुसलमानों को रखा गया. इस तरह से गोहत्या के मुद्दे ने सांप्रदायिक रंग ले लिया.

धार्मिक आस्थाओं को लेकर अंग्रेज सरकार के इसी रवैये का नतीजा 1857 का विद्रोह था तब भारतीय सैनिकों ने जानवरों की चर्बी से लैस कारतूस का इस्तेमाल करने से इंकार कर दिया और इसके बाद से ही गोरक्षा का मुद्दा एक अभियान के तौर पर चलाया जाने लगा. हिंदू संगठनों ने गोरक्षा समितियां बनानी शुरू कीं. स्वामी दयानंद सरस्वती ने देश भर में घूम कर गौहत्या रोकने की अपील की. धीरे -धीरे इस मुद्दे पर हिंदू और मुसलमानों के बीच की दूरियां बढ़ने लगीं और गोरक्षा के मुद्दे पर पहली बार 1893 में आजमगढ़ में सांप्रदायिक दंगा भी हुआ था.

विभाजन के काल में गाय को सांप्रदायिकता से जोड़कर देखा गया और गाय को लेकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने की कोशिश मुस्लीम लीग ने की थी इसलिए दंगा कराने के लिए गौमांस को मंदिरों में फेंकना गाय की हत्या करना ये एक प्रवृत्ति थी वो प्रवृत्ति उपनिवेशवाद के बाद स्वतंत्र भारत में भी कुछ हद तक जारी रही बहुत लोगों को ये रिएलाइज हुआ कि ये सांस्कृतिक प्रतिक है और इसके साथ हम ऐसा व्यवहार करें जो अपने सांस्कृतिक प्रतिकों के साथ पूरी दुनिया में व्यवहार होता है.

अंग्रेज शुरूआत से ही भारत में हिंदू और मुसलमानों के बीच फूट डालने की रणनीति पर चल रहे थे और गौहत्या का मुद्दा उनकी इसी योजना का हिस्सा था. महात्मा गांधी ने हमेशा गोहत्या का विरोध किया था. जब देश आजाद हुआ तो संविधान में भी राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत गोरक्षा की बात कही गयी. जिसके बाद देश के कई राज्यों ने गौहत्या पर रोक लगाने के लिए कानून बनाये. लेकिन हिंदू संगठन पूरे देश में गौहत्या पर रोक की मांग कर रहे थे. इसी के तहत 1966 में देश भर से आये साधु संतों और हिंदू संगठन के लोगों ने संसद का घेराव भी किया था.

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के विचारक राकेश सिन्हा बताते हैं कि संविधानसभा में बहस चल रही थी तो गांधीवादियों नें जिस ढ़ग से गौ हत्या पर पाबंदी की मांग की और महात्मा गांधी जी का जो आग्रह था गौहत्या पर प्रतिबंध का तो संविधानसभा की उस बहस में मुस्लिम लीग के एक सदस्य जेड एस लारी ने हस्तक्षेप किया और जेड एच लारी ने कहा कि गौ हत्या पर प्रतिबंध राज्य की नीति निर्देशक तत्व में नहीं रहकर फंडामेंटल राइट मौलिक अधिकारों में रखना चाहिए. इससे भ्रम दूर होगा और गौ हत्या पर प्रतिबंध इस देश की विरासत और संस्कृति के अऩुकुल लग पाएगा.

हिंदू संगठन आज भी यही मांग कर रहे हैं कि देश में गोवंश हत्या पर पूरी तरह से रोक लगाई जाए. लेकिन इस मांग को पूरा कर पाना सरकार के लिए ना तब आसान था और ना आज आसान है. और इसकी सबसे बड़ी वजह इससे जुड़ा कारोबार है. मांस और चमड़े के इस कारोबार से न सिर्फ लाखों लोगों का रोजगार जुड़ा है बल्कि इसके निर्यात से सरकार को भी विदेशी मुद्रा मिलती है.

भारत आज दुनिया में बीफ का सबसे बड़ा निर्यातक देश है.

बीफ और गौमांस के बीच अहम फर्क क्या है?

अंग्रेजी के शब्द बीफ का मतलब आम तौर पर गाय के मांस से लगा लिया जाता है जबकि ये सही नहीं है. गाय, बैल, सांड, भैंस, भैंसा के मांस को मिले जुले तौर पर बीफ कहा जाता है. यानी अगर को बीफ खाने की बात कह रहा है तो इसका मतलब ये नही है कि वो गाय का ही मांस खा रहा है.

भारत दुनिया में बीफ का सबसे बड़ा निर्यातक जरूर है लेकिन भारत में इसकी खपत सिर्फ 3.8 फीसदी ही है. यानी हमारे यहां कुल बीफ उत्पादन का बड़ा हिस्सा विदेशों में भेजा जाता है और इसीलिए इसने एक बड़े कारोबार की शक्ल ले ली है. लेकिन जिस गोमांस को लेकर सारा विवाद है, क्या उसका इस कारोबार से कोई लेना देना है ?

भारत दुनिया के 65 देशों में मांस का निर्यात करता है. लेकिन यह मांस किसका होता है? भारत में निर्यात पर नजर रखने वाले Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority (APEDA) के मुताबिक भारत से जिन मांस उत्पादों का निर्यात किया जाता है उनमें भैंस और बकरे का मांस ही प्रमुख है. इस सूची में कहीं भी गाय, बैल या सांड़ के मांस का जिक्र नहीं है. यानी बीफ के नाम पर भारत से जो निर्यात होता है वो दरअसल भैंस का मांस है.

2014 में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत में तेजी से बढ़ते बीफ कारोबार पर सवाल उठाए थे. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के एक साल के अंदर ही महाराष्ट्र और हरियाणा की बीजेपी सरकार ने गौवंश हत्या पर रोक का कानून भी बना दिया. महाराष्ट्र में तो 1976 से ही गौमांस पर रोक है लेकिन अब नये कानून के तहत बैल और सांड़ के मांस पर भी रोक लगा दी गई है. लेकिन यहां समझने वाली बात यह है कि हिंदू संगठन जिस गौहत्या पर रोक की मांग करते रहे हैं वो रोक देश के ज्यादातर राज्यों में पहले से ही लागू है.

जम्मू –कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तेलंगान, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु, असम और आंध्रप्रदेश में गोमांस प्रतिबंधित है. हांलाकि इनमें से कुछ राज्यों में बैल और भैंस के मांस पर रोक नहीं है बशर्ते इसकी स्थानीय प्रशासन से इजाजत ली गई हो और जानवर बीमार ना हो. लेकिन देश के कुछ राज्य ऐसे भी है जहां गोमांस पर प्रतिबंध नहीं है. इनमें पश्चिम बंगाल, सिक्किम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश और केरल शामिल हैं. पश्चिम बंगाल में गाय या भैंस के मांस के लिए फिट फॉर सलॉटर होना जरुरी है हांलाकि बाकी राज्यों में इस तरह का सर्टिफिकेट जरुरी नहीं है. भारत में बीफ के निर्यात का सालाना कारोबार 25 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का है. बीफ के इस कारोबार में मुनाफा कमाने वालों में हिंदू और मुसलमान दोनो ही शामिल है यानी यह किसी एक धर्म का मामला नहीं है. महाराष्ट्र, हरियाणा या देश के किसी अन्य राज्य में गोवंश हत्या पर रोक से भारत के बीफ कारोबार पर भी कोई असर नहीं पड़ना चाहिए. यही वजह है कि नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद भी बीफ निर्यात के आंकड़े में कोई कमी नहीं आई. बल्कि इसके निर्यात से होने वाली कमाई में 14 फीसदी की बढ़ोतरी ही हुई है.

भारत में केरल, बंगाल और उत्तर पूर्वी राज्यों को छोड़कर लगभग सभी जगह गोहत्या पर रोक का कोई न कोई कानून मौजूद है लेकिन ये भी सच है कि पिछले कुछ सालों में गायों की संख्या में कमी आई है. 1951 में हुई पशुओं की गणना के मुताबिक भारत में गायों की तादाद कुल मवेशियों की 53.04 फीसदी थी जो 2012 में घटकर 37.28 फीसदी रह गयी. इसलिए बीफ और गोमांस के बीच फर्क और बीफ के कारोबार की तमाम चुनौतियों के बीच ये सवाल भी जिंदा है कि आखिर गायों की संख्या में यह कमी कैसे और क्यों आयी. और इस सवाल का जवाब ढूढ़ना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि भारत में गोहत्या और गोमांस का सेवन एक संवेदनशील मुद्दा है. जिसकी जद में आकर ना जाने कितने अखलाक, मारे जा चुके है.

राजद नेता रघुवंश बोले, BJP को रोकना है तो ओवैसी का साथ जरुरीपटना . राजद नेता रघुवंश प्रसाद ने बिहार चुनाव के मद्देनजर बड...
28/09/2015

राजद नेता रघुवंश बोले, BJP को रोकना है तो ओवैसी का साथ जरुरी
पटना . राजद नेता रघुवंश प्रसाद ने बिहार चुनाव के मद्देनजर बड़ा बयान देते हुए कहा है कि ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को महागठबंधन में लाने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने कहा कि बीजेपी को रोकने के लिए ओवैसी का साथ जरुरी है. राजद के वरिष्ठ नेताओं में आने वाले रघुवंश ने कहा कि ओवैसी के आने से महागठबंधन को फायदा होगा.
इससे पहले हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने ऐलान कर दिया है कि वह बिहार में अपनी पार्टी के साथ लड़ेंगे. उनकी पार्टी बिहार के सीमांचल इलाकों में चुनाव लड़ेगी. ओवैसी के बिहार राजनीति में कूद जाने से बिहार की राजनीति में सियासी भूचाल आ गया है. बीजेपी ने जहां इसको अपने फायदे के रुप में देख रही है वहीं, महागठबंधन को ओवैसी के द्वारा उनके वोट बैंक में सेंध लगाने का डर सता रहा है.

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