Pahadi Army Uttrakhand - पहाड़ी आर्मी उत्तराखंड

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Pahadi Army Uttrakhand - पहाड़ी आर्मी उत्तराखंड पहाड़ी आर्मी उत्तराखंड
पर्वतीय अस्मिता संस्कृति व संसाधनों की रक्षक
जय पहाड़ी- जय पहाड़,जय कुमाऊं-जय गढ़वाल
पहाड़ी हिन्दू जिंदाबाद

04/09/2026
🚩 देवभूमि की महान विरासत पर संकट?रानीबाग बचाओ — जिया रानी की तपोभूमि, पहाड़ी समाज की आस्था और देवस्थलों की पवित्रता बचाओ...
28/08/2026

🚩 देवभूमि की महान विरासत पर संकट?
रानीबाग बचाओ — जिया रानी की तपोभूमि, पहाड़ी समाज की आस्था और देवस्थलों की पवित्रता बचाओ
🚩 29 अगस्त को रानीबाग महापंचायत 🚩
नैनीताल जनपद के काठगोदाम क्षेत्र में स्थित रानीबाग केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं है।यह वह धरती है राजमाता वीरांगना जिया रानी (मौला देवी) की तपोभूमि, कर्मभूमि और इसे वीरगाथाओं की भूमि के रूप में याद किया जाता है।

यहां हर वर्ष जिया रानी की स्मृति में मेला लगता है और परंपरागत जागरों में कत्यूरी राजाओं की वंशावली तथा रानीबाग के युद्ध में जिया रानी के शौर्य की गाथाएं गाई जाती हैं। भारतीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत संबंधी IGNCA के अभिलेख में भी रानीबाग के इस मेले और जिया रानी की वीरगाथा का उल्लेख मिलता है।
🕉️ कौन थीं जिया रानी?
लोकपरंपरा के अनुसार जिया रानी का बचपन का नाम मौला देवी था। उन्हें कत्यूरी राजा प्रीतमदेव/पृथ्वीपाल की रानी और बाद में धामदेव की राजमाता के रूप में याद किया जाता है।
स्थानीय परंपरा के अनुसार उन्होंने रानीबाग की चित्रशिला के निकट लगभग 12 वर्ष तपस्या की और यहां एक विशाल बाग लगवाया। इसी कारण यह क्षेत्र कालांतर में रानीबाग के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
चित्रशिला से जुड़ी लोकमान्यता भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्थानीय परंपरा इसे जिया रानी के स्मृति-चिह्न और उनके घाघरे से जोड़ती है। भगवान् शिव मां जिया के पिता तुल्य हैं और रानीबाग में चित्रेश्वर महादेव के रूप में विराजमान हैं, रानीबाग मंदिर में रंग बिरंगी चित्र शिला आप साक्षात रूप में देख सकते हैं।
यही कारण है कि रानीबाग को केवल सामान्य भूमि मानना इस स्थान की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक गहराई को नजरअंदाज करना होगा।
⚔️ *रानीबाग की धरती पर मां जिया रानी और पहाड़ी समाज की वीरगाथा*
रानीबाग की सबसे महत्वपूर्ण लोकगाथाओं में से एक है—
जिया रानी का आक्रमणकारियों के विरुद्ध संघर्ष।
स्थानीय जागरों और लोककथाओं में वर्णन मिलता है कि जब उत्तर भारत की ओर से तुर्क/रुहेल आक्रमणकारी कुमाऊँ की तराई-भाबर सीमा की ओर बढ़े, तब जिया रानी ने अपने क्षेत्र की रक्षा के लिए सेना संगठित की।
कहा जाता है कि गौला नदी और रानीबाग क्षेत्र में संघर्ष हुआ, जिसमें जिया रानी ने स्वयं मोर्चा संभाला और आक्रमणकारी सेना को पीछे हटने पर मजबूर किया। और पहाड़ी समाज में आज भी हिन्दू संस्कृति आज भी पूर्ण तरीके से सुरक्षित है जो प्लेन्स में उतनी नहीं दिखेगी क्योंकि पहाड़ी समाज ने उनका डटकर मुकाबला किया है और यहां देवी देवता साक्षात विराजमान हैं । इसमें कई योद्धाओं ने अपने बलिदान दिए और जिस कारण पहाड़ की संस्कृति आज भी बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षित है।
कुछ लोकवृत्तांत इस संघर्ष को तैमूर के अभियान से जोड़ते हैं, जबकि अन्य परंपराएं बाद के तुर्क/रुहेला आक्रमणों का उल्लेख करती हैं। इसलिए इन घटनाओं की निश्चित तारीखों को लेकर इतिहासकारों और लोकस्रोतों में मतभेद हैं
📜 1398 की लोकस्मृति
IGNCA के अभिलेख में दर्ज स्थानीय परंपरा के अनुसार कत्यूरी राजा पृथ्वी पाल/प्रीतमदेव ने 1398 में तैमूरलंग की विश्वविजयी सेना को शिवालिक की पहाड़ियों में पराजित किया था, और रानीबाग के जिया रानी मेले के जागरों में उस विजय की स्मृति की छाया मिलती है। मां जियारानी ने पहाड़ की संस्कृति और महान विरासत बचाने को बाहरी आक्रांताओं तुर्को से 3 युद्ध लड़ने का उल्लेख मिलता है।
📜 1418 की दूसरी परंपरा
एक अन्य स्थानीय ऐतिहासिक परंपरा 1418 में दिल्ली के सैयद शासन की सेना के तराई-भाबर तक पहुंचने का उल्लेख करती है। इस कथा में जिया रानी द्वारा हरि सिंह को शरण देने और क्षेत्र में हुए संघर्ष का वर्णन मिलता है।
अर्थात रानीबाग की वीरगाथा को केवल युद्ध तक सीमित नहीं है।
यह क्षेत्र सदियों से चली आ रही सीमा-सुरक्षा, स्थानीय प्रतिरोध और पहाड़ी स्वाभिमान की लोकस्मृति का केंद्र है।
🔥 जिया रानी केवल रानी नहीं—एक योद्धा और राजमाता की स्मृति हैं
लोकगाथाओं में वर्णन मिलता है कि जिया रानी ने रानीबाग में रहते हुए अपनी छोटी सैन्य टुकड़ी संगठित की थी।
जब आक्रमण हुआ तो उन्होंने पीछे हटने के बजाय स्वयं युद्ध का नेतृत्व किया।
रानीबाग की लोकगाथा में यह संदेश आज भी जीवित है—
देवभूमि की रक्षा केवल तलवार से नहीं होती;
अपनी संस्कृति, आस्था और स्वाभिमान की रक्षा भी उसी साहस का हिस्सा है।
इसीलिए आज रानीबाग को बचाने का अर्थ किसी व्यक्ति या समुदाय से संघर्ष करना नहीं है।
इसका अर्थ है—अपनी ऐतिहासिक स्मृति को जीवित रखना।
👑 पृथ्वीपाल → जिया रानी → धामदेव → मालूशाही
रानीबाग की कहानी कत्यूरी इतिहास की उस लंबी परंपरा से जुड़ती है जिसे कुमाऊँ की लोकस्मृति आज भी जीवित रखती है।
लोकपरंपरा में पृथ्वीपाल/प्रीतमदेव और जिया रानी के पुत्र धामदेव को आगे चलकर न्यायकारी देवता के रूप में श्रद्धा मिली।
और कत्यूरी लोकगाथाओं में आगे मालूशाही का नाम आता है—
जिसकी प्रेमगाथा राजुला–मालूशाही आज भी कुमाऊँ की सबसे प्रसिद्ध लोककथाओं में से एक है।
इस प्रकार रानीबाग केवल एक मंदिर या एक मेला नहीं—
यह कत्यूरी इतिहास, राजपरंपरा, लोकदेवता और लोकसाहित्य को जोड़ने वाली जीवित कड़ी है।
🕉️ रानीबाग — सभी आस्थाओं के सम्मान का स्थान
देवभूमि की महानता यही है कि यहां अनेक देवी-देवताओं, लोकदेवताओं और परंपराओं को सम्मान मिला है।
मां जिया, गोल्ज्यू महाराज, गंगनाथ, ऐड़ी देवता, भूमियाल, क्षेत्रपाल और असंख्य ग्राम देवताओं की परंपरा पहाड़ की सांस्कृतिक आत्मा है।
हर श्रद्धालु को पूजा का अधिकार हो।
हर आस्था का सम्मान हो।
लेकिन पवित्र स्थल की पवित्रता भी बनी रहे।
रानीबाग जैसे स्थानों का मूल धार्मिक स्वरूप, शांति, स्वच्छता, ऐतिहासिक संरचना और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहनी चाहिए
⚠️ आज सबसे बड़ा सवाल
स्थानीय समाज में यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि कुछ बाहरी तत्वों द्वारा राजनीतिक या प्रभावशाली लोगों के संभावित संरक्षण में रानीबाग के धार्मिक स्थलों और भूमि पर नजर रखी जा रही है। कभी वहां कब्जा कर मनोरंजन के लिए चौपाटी बना दी गई और अब पूरे मंदिर प्रांगण में कब्जा करने की कोशिश कुछ दुष्टों द्वारा की जा रही हैं।
यदि ऐसी शिकायतें हैं तो उनका जवाब आरोपों से नहीं—
लोकतंत्र का सम्मान करते हुवे हमें न्याय रिकॉर्ड, जांच और कानून से मिलना चाहिए।
इसलिए सवाल पूछना जरूरी है—
🔸 मंदिर की भूमि का वास्तविक राजस्व रिकॉर्ड क्या है?
🔸 मंदिर की मूल सीमा क्या है?
🔸 किसे किस आधार पर निर्माण/उपयोग की अनुमति मिली?
🔸 क्या किसी धार्मिक स्थल की मूल संरचना बदली गई?
🔸 क्या कोई अतिक्रमण हुआ है?
🔸 क्या किसी राजनीतिक या प्रशासनिक प्रभाव का इस्तेमाल हुआ?
🔸 क्या स्थानीय समाज की आपत्तियों की निष्पक्ष सुनवाई हुई?
इन सभी प्रश्नों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
🌄 संस्कृति बदले नहीं — संस्कृति बचे
पहाड़ी समाज ने हमेशा अतिथि का सम्मान किया है।
बाहर से आने वाला हर व्यक्ति सम्मान का अधिकारी है।
लेकिन देवभूमि में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी भी है कि वह यहां के कानून, संस्कृति, देवस्थलों और स्थानीय परंपराओं का सम्मान करे।
हमारा विरोध किसी व्यक्ति के प्रदेश, जाति या पहचान से नहीं है।
हमारा विरोध अवैध अतिक्रमण से है।
अनधिकृत निर्माण से है।
धार्मिक स्थलों के स्वरूप में मनमाने बदलाव से है।
राजनीतिक संरक्षण के संभावित दुरुपयोग से है।
और पहाड़ी सांस्कृतिक विरासत के क्षरण से है।
🚩 29 अगस्त — रानीबाग महापंचायत
आइए, 29 अगस्त को शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से अपनी आवाज उठाएं।
हमारी मांगें स्पष्ट हैं—
🔸 रानीबाग के सभी धार्मिक स्थलों का राजस्व एवं पुरातात्विक सर्वे हो।
🔸 मंदिरों की भूमि और सीमाओं का रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए।
🔸 कथित अतिक्रमण की निष्पक्ष जांच हो।
🔸 मंदिरों की मूल संरचना में हुए बदलावों की जांच हो।
🔸 राजनीतिक संरक्षण या दबाव की शिकायतों की स्वतंत्र जांच हो।
🔸 धार्मिक स्थलों की पवित्रता और मूल स्वरूप सुरक्षित रखा जाए।
🔸 स्थानीय पहाड़ी समाज को संरक्षण व्यवस्था में उचित भागीदारी मिले।
🔸 रानीबाग की ऐतिहासिक पहचान को सरकारी स्तर पर संरक्षित क्षेत्र के रूप में विकसित करने पर विचार हो।
⭐ रानीबाग का महत्व हरिद्वार की ही तरह है, इसलिए यहां हरिद्वार की तर्ज पर गंगा आरती हो, घाटों का सौंदर्यीकरण हो, धर्मशालाओं का निर्माण हो, और देवस्थानम बोर्ड बनाकर सामूहिक स्तर पर श्रद्वालुओं के लिए रहने भोजन भण्डारे की नियमित व्यवस्था हो।
🚩 और एक बात स्पष्ट—
सत्ता में बैठे किसी भी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए।
यदि कोई राजनेता, अधिकारी, प्रभावशाली व्यक्ति या अतिक्रमणकारी कानून तोड़ता है तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
🔥 क्योंकि रानीबाग सिर्फ आज का सवाल नहीं है...
यह सवाल है कि—
क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को बताएंगे कि यहां जिया रानी ने तपस्या की थी?
क्या हम उन्हें बताएंगे कि इसी धरती पर उनकी वीरगाथाएं गाई जाती थीं?
क्या हम उन्हें बताएंगे कि चित्रशिला, गौला और रानीबाग हमारी लोकस्मृति के जीवित प्रतीक थे?
या फिर आने वाली पीढ़ी हमसे पूछेगी—
“आपके पास इतिहास था, देवस्थल थे, लोकगाथाएं थीं… फिर आपने उन्हें बचाया क्यों नहीं?”
आज उसी सवाल का जवाब देने का समय है।
🚩 मंदिर बचेंगे तो इतिहास बचेगा।
🚩 इतिहास बचेगा तो संस्कृति बचेगी।
🚩 संस्कृति बचेगी तो पहाड़ की पहचान बचेगी।
🚩 और पहचान बचेगी तो देवभूमि की आत्मा जीवित रहेगी।
आइए—
मां जिया की तपोभूमि का सम्मान करें।
रानीबाग की पवित्रता बनाए रखें।
गोल्ज्यू महाराज की परंपरा को आगे बढ़ाएं।
गंगनाथ और हमारे लोकदेवताओं की विरासत बचाएं।
और कानून के दायरे में अपनी सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करें।
🚩 जय मां जिया।
🚩 जय गोल्ज्यू महाराज।
🚩 जय देवभूमि।
🚩 जय पहाड़ी समाज।
🔱 हर-हर महादेव। 🙏🚩

आज जिला अधिकारी नैनीताल (DM) श्रीमान ललित मोहन रयाल जी से मुलाकात हुई रानीबाग अतिक्रमण "शनि मंदिर नाम का गुप्ता जी का स्...
20/08/2026

आज जिला अधिकारी नैनीताल (DM) श्रीमान ललित मोहन रयाल जी से मुलाकात हुई रानीबाग अतिक्रमण "शनि मंदिर नाम का गुप्ता जी का स्टार्टअप" पर काफी चर्चा होने के बाद जिला अधिकारी महोदय ने मुझे कत्युरी राजवंश का इतिहास "कार्तिकेयपुर का कत्युरी राजवंश" नाम की किताब भेट की जो शिवप्रसाद डबराल जी द्वारा लिखित है।
जय जिया माता
जय श्री गोल्ज्यू

18/08/2026
29 अगस्त दिन शनिवार समय 11:00 बजे चित्रेश्वर धाम चित्रशिला घाट  रानीबाग में बैठक होगी अधिक संख्या में आने का आह्वान है ज...
18/08/2026

29 अगस्त दिन शनिवार समय 11:00 बजे चित्रेश्वर धाम चित्रशिला घाट रानीबाग में बैठक होगी अधिक संख्या में आने का आह्वान है जरूर पहुंचे अपनी संस्कृति, सनातन धर्म आस्था का केंद्र बचाने के लिए।

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