RSS Kastla Kasmabad - Hapur

RSS Kastla Kasmabad - Hapur राष्ट्र की जय चेतना का गान वंदे मातरम्
राष्ट्रभक्ति प्रेरणा का गान वंदे मातरम् It is not that other constituents of the nation do not have any responsibility.

A swayamsewak, whether young in age or old, is a responsible constituent of the nation. But we have entered the Sangh after taking responsibility with resolve, so our responsibility is more.

04/11/2025

🌼🌿पुनर्जन्म से सम्बंधित चालीस प्रश्नों को उत्तर सहित पढ़े?????🌿🌼

(1) प्रश्न :- पुनर्जन्म किसको कहते हैं ?

उत्तर :- जब जीवात्मा एक शरीर का त्याग करके किसी दूसरे शरीर में जाती है तो इस बार बार जन्म लेने की क्रिया को पुनर्जन्म कहते हैं ।

(2) प्रश्न :- पुनर्जन्म क्यों होता है ?

उत्तर :- जब एक जन्म के अच्छे बुरे कर्मों के फल अधुरे रह जाते हैं तो उनको भोगने के लिए दूसरे जन्म आवश्यक हैं ।

(3) प्रश्न :- अच्छे बुरे कर्मों का फल एक ही जन्म में क्यों नहीं मिल जाता ? एक में ही सब निपट जाये तो कितना अच्छा हो ?

उत्तर :- नहीं जब एक जन्म में कर्मों का फल शेष रह जाए तो उसे भोगने के लिए दूसरे जन्म अपेक्षित होते हैं ।

(4) प्रश्न :- पुनर्जन्म को कैसे समझा जा सकता है ?

उत्तर :- पुनर्जन्म को समझने के लिए जीवन और मृत्यु को समझना आवश्यक है । और जीवन मृत्यु को समझने के लिए शरीर को समझना आवश्यक है ।

(5) प्रश्न :- शरीर के बारे में समझाएँ ?

उत्तर :- हमारे शरीर को निर्माण प्रकृति से हुआ है ।
जिसमें मूल प्रकृति ( सत्व रजस और तमस ) से प्रथम बुद्धि तत्व का निर्माण हुआ है ।
बुद्धि से अहंकार ( बुद्धि का आभामण्डल ) ।
अहंकार से पांच ज्ञानेन्द्रियाँ ( चक्षु, जिह्वा, नासिका, त्वचा, श्रोत्र ), मन ।
पांच कर्मेन्द्रियाँ ( हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक् ) ।

शरीर की रचना को दो भागों में बाँटा जाता है ( सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर ) ।

(6) प्रश्न :- सूक्ष्म शरीर किसको बोलते हैं ?

उत्तर :- सूक्ष्म शरीर में बुद्धि, अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ । ये सूक्ष्म शरीर आत्मा को सृष्टि के आरम्भ में जो मिलता है वही एक ही सूक्ष्म शरीर सृष्टि के अंत तक उस आत्मा के साथ पूरे एक सृष्टि काल ( ४३२००००००० वर्ष ) तक चलता है । और यदि बीच में ही किसी जन्म में कहीं आत्मा का मोक्ष हो जाए तो ये सूक्ष्म शरीर भी प्रकृति में वहीं लीन हो जायेगा ।

(7) प्रश्न :- स्थूल शरीर किसको कहते हैं ?

उत्तर :- पंच कर्मेन्द्रियाँ ( हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक् ) , ये समस्त पंचभौतिक बाहरी शरीर ।

(8) प्रश्न :- जन्म क्या होता है ?

उत्तर :- जीवात्मा का अपने करणों ( सूक्ष्म शरीर ) के साथ किसी पंचभौतिक शरीर में आ जाना ही जन्म कहलाता है ।

(9) प्रश्न :- मृत्यु क्या होती है ?

उत्तर :- जब जीवात्मा का अपने पंचभौतिक स्थूल शरीर से वियोग हो जाता है, तो उसे ही मृत्यु कहा जाता है । परन्तु मृत्यु केवल सथूल शरीर की होती है , सूक्ष्म शरीर की नहीं । सूक्ष्म शरीर भी छूट गया तो वह मोक्ष कहलाएगा मृत्यु नहीं । मृत्यु केवल शरीर बदलने की प्रक्रिया है, जैसे मनुष्य कपड़े बदलता है । वैसे ही आत्मा शरीर भी बदलता है ।

(10) प्रश्न :- मृत्यु होती ही क्यों है ?

उत्तर :- जैसे किसी एक वस्तु का निरन्तर प्रयोग करते रहने से उस वस्तु का सामर्थ्य घट जाता है, और उस वस्तु को बदलना आवश्यक हो जाता है, ठीक वैसे ही एक शरीर का सामर्थ्य भी घट जाता है और इन्द्रियाँ निर्बल हो जाती हैं । जिस कारण उस शरीर को बदलने की प्रक्रिया का नाम ही मृत्यु है ।

(11) प्रश्न :- मृत्यु न होती तो क्या होता ?

उत्तर :- तो बहुत अव्यवस्था होती । पृथ्वी की जनसंख्या बहुत बढ़ जाती । और यहाँ पैर धरने का भी स्थान न होता ।

(12) प्रश्न :- क्या मृत्यु होना बुरी बात है ?

उत्तर :- नहीं, मृत्यु होना कोई बुरी बात नहीं ये तो एक प्रक्रिया है शरीर परिवर्तन की ।

(13) प्रश्न :- यदि मृत्यु होना बुरी बात नहीं है तो लोग इससे इतना डरते क्यों हैं ?

उत्तर :- क्योंकि उनको मृत्यु के वैज्ञानिक स्वरूप की जानकारी नहीं है । वे अज्ञानी हैं । वे समझते हैं कि मृत्यु के समय बहुत कष्ट होता है । उन्होंने वेद, उपनिषद, या दर्शन को कभी पढ़ा नहीं वे ही अंधकार में पड़ते हैं और मृत्यु से पहले कई बार मरते हैं ।

(14) प्रश्न :- तो मृत्यु के समय कैसा लगता है ? थोड़ा सा तो बतायें ?

उत्तर :- जब आप बिस्तर में लेटे लेटे नींद में जाने लगते हैं तो आपको कैसा लगता है ?? ठीक वैसा ही मृत्यु की अवस्था में जाने में लगता है उसके बाद कुछ अनुभव नहीं होता । जब आपकी मृत्यु किसी हादसे से होती है तो उस समय आमको मूर्छा आने लगती है, आप ज्ञान शून्य होने लगते हैं जिससे की आपको कोई पीड़ा न हो । तो यही ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा है कि मृत्यु के समय मनुष्य ज्ञान शून्य होने लगता है और सुषुुप्तावस्था में जाने लगता है ।

(15) प्रश्न :- मृत्यु के डर को दूर करने के लिए क्या करें ?

उत्तर :- जब आप वैदिक आर्ष ग्रन्थ ( उपनिषद, दर्शन आदि ) का गम्भीरता से अध्ययन करके जीवन,मृत्यु, शरीर, आदि के विज्ञान को जानेंगे तो आपके अन्दर का, मृत्यु के प्रति भय मिटता चला जायेगा और दूसरा ये की योग मार्ग पर चलें तो स्वंय ही आपका अज्ञान कमतर होता जायेगा और मृत्यु भय दूर हो जायेगा । आप निडर हो जायेंगे । जैसे हमारे बलिदानियों की गाथायें आपने सुनी होंगी जो राष्ट्र की रक्षा के लिये बलिदान हो गये । तो आपको क्या लगता है कि क्या वो ऐसे ही एक दिन में बलिदान देने को तैय्यार हो गये थे ? नहीं उन्होने भी योगदर्शन, गीता, साँख्य, उपनिषद, वेद आदि पढ़कर ही निर्भयता को प्राप्त किया था । योग मार्ग को जीया था, अज्ञानता का नाश किया था ।

महाभारत के युद्ध में भी जब अर्जुन भीष्म, द्रोणादिकों की मृत्यु के भय से युद्ध की मंशा को त्याग बैठा था तो योगेश्वर कृष्ण ने भी तो अर्जुन को इसी सांख्य, योग, निष्काम कर्मों के सिद्धान्त के माध्यम से जीवन मृत्यु का ही तो रहस्य समझाया था और यह बताया कि शरीर तो मरणधर्मा है ही तो उसी शरीर विज्ञान को जानकर ही अर्जुन भयमुक्त हुआ । तो इसी कारण तो वेदादि ग्रन्थों का स्वाध्याय करने वाल मनुष्य ही राष्ट्र के लिए अपना शीश कटा सकता है, वह मृत्यु से भयभीत नहीं होता , प्रसन्नता पूर्वक मृत्यु को आलिंगन करता है ।

(16) प्रश्न :- किन किन कारणों से पुनर्जन्म होता है ?

उत्तर :- आत्मा का स्वभाव है कर्म करना, किसी भी क्षण आत्मा कर्म किए बिना रह ही नहीं सकता । वे कर्म अच्छे करे या फिर बुरे, ये उसपर निर्भर है, पर कर्म करेगा अवश्य । तो ये कर्मों के कारण ही आत्मा का पुनर्जन्म होता है । पुनर्जन्म के लिए आत्मा सर्वथा ईश्वराधीन है ।

(17) प्रश्न :- पुनर्जन्म कब कब नहीं होता ?

उत्तर :- जब आत्मा का मोक्ष हो जाता है तब पुनर्जन्म नहीं होता है ।

(18) प्रश्न :- मोक्ष होने पर पुनर्जन्म क्यों नहीं होता ?

उत्तर :- क्योंकि मोक्ष होने पर स्थूल शरीर तो पंचतत्वों में लीन हो ही जाता है, पर सूक्ष्म शरीर जो आत्मा के सबसे निकट होता है, वह भी अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाता है ।

(19) प्रश्न :- मोक्ष के बाद क्या कभी भी आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता ?

उत्तर :- मोक्ष की अवधि तक आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता । उसके बाद होता है ।

(20) प्रश्न :- लेकिन मोक्ष तो सदा के लिए होता है, तो फिर मोक्ष की एक निश्चित अवधि कैसे हो सकती है ?

उत्तर :- सीमित कर्मों का कभी असीमित फल नहीं होता । यौगिक दिव्य कर्मों का फल हमें ईश्वरीय आनन्द के रूप में मिलता है, और जब ये मोक्ष की अवधि समाप्त होती है तो दुबारा से ये आत्मा शरीर धारण करती है ।

(21) प्रश्न :- मोक्ष की अवधि कब तक होती है ?

उत्तर :- मोक्ष का समय ३१ नील १० खरब ४० अरब वर्ष है, जब तक आत्मा मुक्त अवस्था में रहती है ।

(22) प्रश्न :- मोक्ष की अवस्था में स्थूल शरीर या सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ रहता है या नहीं ?

उत्तर :- नहीं मोक्ष की अवस्था में आत्मा पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाता रहता है और ईश्वर के आनन्द में रहता है, बिलकुल ठीक वैसे ही जैसे कि मछली पूरे समुद्र में रहती है । और जीव को किसी भी शरीर की आवश्यक्ता ही नहीं होती।

(23) प्रश्न :- मोक्ष के बाद आत्मा को शरीर कैसे प्राप्त होता है ?

उत्तर :- सबसे पहला तो आत्मा को कल्प के आरम्भ ( सृष्टि आरम्भ ) में सूक्ष्म शरीर मिलता है फिर ईश्वरीय मार्ग और औषधियों की सहायता से प्रथम रूप में अमैथुनी जीव शरीर मिलता है, वो शरीर सर्वश्रेष्ठ मनुष्य या विद्वान का होता है जो कि मोक्ष रूपी पुण्य को भोगने के बाद आत्मा को मिला है । जैसे इस वाली सृष्टि के आरम्भ में चारों ऋषि विद्वान ( वायु , आदित्य, अग्नि , अंगिरा ) को मिला जिनको वेद के ज्ञान से ईश्वर ने अलंकारित किया । क्योंकि ये ही वो पुण्य आत्मायें थीं जो मोक्ष की अवधि पूरी करके आई थीं ।

(24) प्रश्न :- मोक्ष की अवधि पूरी करके आत्मा को मनुष्य शरीर ही मिलता है या जानवर का ?

उत्तर :- मनुष्य शरीर ही मिलता है ।

(25) प्रश्न :- क्यों केवल मनुष्य का ही शरीर क्यों मिलता है ? जानवर का क्यों नहीं ?

उत्तर :- क्योंकि मोक्ष को भोगने के बाद पुण्य कर्मों को तो भोग लिया , और इस मोक्ष की अवधि में पाप कोई किया ही नहीं तो फिर जानवर बनना सम्भव ही नहीं , तो रहा केवल मनुष्य जन्म जो कि कर्म शून्य आत्मा को मिल जाता है ।

(26) प्रश्न :- मोक्ष होने से पुनर्जन्म क्यों बन्द हो जाता है ?

उत्तर :- क्योंकि योगाभ्यास आदि साधनों से जितने भी पूर्व कर्म होते हैं ( अच्छे या बुरे ) वे सब कट जाते हैं । तो ये कर्म ही तो पुनर्जन्म का कारण हैं, कर्म ही न रहे तो पुनर्जन्म क्यों होगा ??

(27) प्रश्न :- पुनर्जन्म से छूटने का उपाय क्या है ?

उत्तर :- पुनर्जन्म से छूटने का उपाय है योग मार्ग से मुक्ति या मोक्ष का प्राप्त करना ।

(28) प्रश्न :- पुनर्जन्म में शरीर किस आधार पर मिलता है ?

उत्तर :- जिस प्रकार के कर्म आपने एक जन्म में किए हैं उन कर्मों के आधार पर ही आपको पुनर्जन्म में शरीर मिलेगा ।

(29) प्रश्न :- कर्म कितने प्रकार के होते हैं ?

उत्तर :- मुख्य रूप से कर्मों को तीन भागों में बाँटा गया है :- सात्विक कर्म , राजसिक कर्म , तामसिक कर्म ।

(१) सात्विक कर्म :- सत्यभाषण, विद्याध्ययन, परोपकार, दान, दया, सेवा आदि ।

(२) राजसिक कर्म :- मिथ्याभाषण, क्रीडा, स्वाद लोलुपता, स्त्रीआकर्षण, चलचित्र आदि ।

(३) तामसिक कर्म :- चोरी, जारी, जूआ, ठग्गी, लूट मार, अधिकार हनन आदि ।

और जो कर्म इन तीनों से बाहर हैं वे दिव्य कर्म कलाते हैं, जो कि ऋषियों और योगियों द्वारा किए जाते हैं । इसी कारण उनको हम तीनों गुणों से परे मानते हैं । जो कि ईश्वर के निकट होते हैं और दिव्य कर्म ही करते हैं ।

(30) प्रश्न :- किस प्रकार के कर्म करने से मनुष्य योनि प्राप्त होती है ?

उत्तर :- सात्विक और राजसिक कर्मों के मिलेजुले प्रभाव से मानव देह मिलती है , यदि सात्विक कर्म बहुत कम है और राजसिक अधिक तो मानव शरीर तो प्राप्त होगा परन्तु किसी नीच कुल में , यदि सात्विक गुणों का अनुपात बढ़ता जाएगा तो मानव कुल उच्च ही होता जायेगा । जिसने अत्यधिक सात्विक कर्म किए होंगे वो विद्वान मनुष्य के घर ही जन्म लेगा ।

(31) प्रश्न :- किस प्रकार के कर्म करने से आत्मा जीव जन्तुओं के शरीर को प्राप्त होता है ?

उत्तर :- तामसिक और राजसिक कर्मों के फलरूप जानवर शरीर आत्मा को मिलता है । जितना तामसिक कर्म अधिक किए होंगे उतनी ही नीच योनि उस आत्मा को प्राप्त होती चली जाती है । जैसे लड़ाई स्वभाव वाले , माँस खाने वाले को कुत्ता, गीदड़, सिंह, सियार आदि का शरीर मिल सकता है , और घोर तामसिक कर्म किए हुए को साँप, नेवला, बिच्छू, कीड़ा, काकरोच, छिपकली आदि । तो ऐसे ही कर्मों से नीच शरीर मिलते हैं और ये जानवरों के शरीर आत्मा की भोग योनियाँ हैं ।

(32) प्रश्न :- तो क्या हमें यह पता लग सकता है कि हम पिछले जन्म में क्या थे ? या आगे क्या होंगे ?

उत्तर :- नहीं कभी नहीं, सामान्य मनुष्य को यह पता नहीं लग सकता । क्योंकि यह केवल ईश्वर का ही अधिकार है कि हमें हमारे कर्मों के आधार पर शरीर दे । वही सब जानता है ।

(33) प्रश्न :- तो फिर यह किसको पता चल सकता है ?

उत्तर :- केवल एक सिद्ध योगी ही यह जान सकता है , योगाभ्यास से उसकी बुद्धि । अत्यन्त तीव्र हो चुकी होती है कि वह ब्रह्माण्ड एवं प्रकृति के महत्वपूर्ण रहस्य़ अपनी योगज शक्ति से जान सकता है । उस योगी को बाह्य इन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रहती है
वह अन्तः मन और बुद्धि से सब जान लेता है । उसके सामने भूत और भविष्य दोनों सामने आ खड़े होते हैं ।

(34) प्रश्न :- यह बतायें की योगी यह सब कैसे जान लेता है ?

उत्तर :- अभी यह लेख पुनर्जन्म पर है, यहीं से प्रश्न उत्तर का ये क्रम चला देंगे तो लेख का बहुत ही विस्तार हो जायेगा । इसीलिये हम अगले लेख में यह विषय विस्तार से समझायेंगे कि योगी कैसे अपनी विकसित शक्तियों से सब कुछ जान लेता है ? और वे शक्तियाँ कौन सी हैं ? कैसे प्राप्त होती हैं ? इसके लिए अगले लेख की प्रतीक्षा करें...

(35) प्रश्न :- क्या पुनर्जन्म के कोई प्रमाण हैं ?

उत्तर :- हाँ हैं, जब किसी छोटे बच्चे को देखो तो वह अपनी माता के स्तन से सीधा ही दूध पीने लगता है जो कि उसको बिना सिखाए आ जाता है क्योंकि ये उसका अनुभव पिछले जन्म में दूध पीने का रहा है, वर्ना बिना किसी कारण के ऐसा हो नहीं सकता । दूसरा यह कि कभी आप उसको कमरे में अकेला लेटा दो तो वो कभी कभी हँसता भी है , ये सब पुराने शरीर की बातों को याद करके वो हँसता है पर जैसे जैसे वो बड़ा होने लगता है तो धीरे धीरे सब भूल जाता है...!

(36) प्रश्न :- क्या इस पुनर्जन्म को सिद्ध करने के लिए कोई उदाहरण हैं...?

उत्तर :- हाँ, जैसे अनेकों समाचार पत्रों में, या TV में भी आप सुनते हैं कि एक छोटा सा बालक अपने पिछले जन्म की घटनाओं को याद रखे हुए है, और सारी बातें बताता है जहाँ जिस गाँव में वो पैदा हुआ, जहाँ उसका घर था, जहाँ पर वो मरा था । और इस जन्म में वह अपने उस गाँव में कभी गया तक नहीं था लेकिन फिर भी अपने उस गाँव की सारी बातें याद रखे हुए है , किसी ने उसको कुछ बताया नहीं, सिखाया नहीं, दूर दूर तक उसका उस गाँव से इस जन्म में कोई नाता नहीं है । फिर भी उसकी गुप्त बुद्धि जो कि सूक्ष्म शरीर का भाग है वह घटनाएँ संजोए हुए है जाग्रत हो गई और बालक पुराने जन्म की बातें बताने लग पड़ा...!

(37) प्रश्न :- लेकिन ये सब मनघड़ंत बातें हैं, हम विज्ञान के युग में इसको नहीं मान सकते क्योंकि वैज्ञानिक रूप से ये बातें बेकार सिद्ध होती हैं, क्या कोई तार्किक और वैज्ञानिक आधार है इन बातों को सिद्ध करने का ?

उत्तर :- आपको किसने कहा कि हम विज्ञान के विरुद्ध इस पुनर्जन्म के सिद्धान्त का दावा करेंगे । ये वैज्ञानिक रूप से सत्य है , और आपको ये हम अभी सिद्ध करके दिखाते हैं..!

(38) प्रश्न :- तो सिद्ध कीजीए ?

उत्तर :- जैसा कि आपको पहले बताया गया है कि मृत्यु केवल स्थूल शरीर की होती है, पर सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ वैसे ही आगे चलता है , तो हर जन्म के कर्मों के संस्कार उस बुद्धि में समाहित होते रहते हैं । और कभी किसी जन्म में वो कर्म अपनी वैसी ही परिस्थिती पाने के बाद जाग्रत हो जाते हैं

इसे उदहारण से समझें :- एक बार एक छोटा सा ६ वर्ष का बालक था, यह घटना हरियाणा के सिरसा के एक गाँव की है । जिसमें उसके माता पिता उसे एक स्कूल में घुमाने लेकर गये जिसमें उसका दाखिला करवाना था और वो बच्चा केवल हरियाणवी या हिन्दी भाषा ही जानता था कोई तीसरी भाषा वो समझ तक नहीं सकता था ।

लेकिन हुआ कुछ यूँ था कि उसे स्कूल की Chemistry Lab में ले जाया गया और वहाँ जाते ही उस बच्चे का मूँह लाल हो गया !! चेहरे के हावभाव बदल गये !!

और उसने एकदम फर्राटेदार French भाषा बोलनी शुरू कर दी !! उसके माता पिता बहुत डर गये और घबरा गये , तुरंत ही बच्चे को अस्पताल ले जाया गया । जहाँ पर उसकी बातें सुनकर डाकटर ने एक दुभाषिये का प्रबन्ध किया ।

जो कि French और हिन्दी जानता था , तो उस दुभाषिए ने सारा वृतान्त उस बालक से पूछा तो उस बालक ने बताया कि " मेरा नाम Simon Glaskey है और मैं French Chemist हूँ । मेरी मौत मेरी प्रयोगशाला में एक हादसे के कारण ( Lab. ) में हुई थी । "

तो यहाँ देखने की बात यह है कि इस जन्म में उसे पुरानी घटना के अनुकूल मिलती जुलती परिस्थिति से अपना वह सब याद आया जो कि उसकी गुप्त बुद्धि में दबा हुआ था । यानि की वही पुराने जन्म में उसके साथ जो प्रयोगशाला में हुआ, वैसी ही प्रयोगशाला उस दूसरे जन्म में देखने पर उसे सब याद आया । तो ऐसे ही बहुत सी उदहारणों से आप पुनर्जन्म को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कर सकते हो...!

(39) प्रश्न :- तो ये घटनाएँ भारत में ही क्यों होती हैं ? पूरा विश्व इसको मान्यता क्यों नहीं देता ?

उत्तर :- ये घटनायें पूरे विश्व भर में होती रहती हैं और विश्व इसको मान्यता इसलिए नहीं देता क्योंकि उनको वेदानुसार यौगिक दृष्टि से शरीर का कुछ भी ज्ञान नहीं है । वे केवल माँस और हड्डियों के समूह को ही शरीर समझते हैं , और उनके लिए आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है । तो ऐसे में उनको न जीवन का ज्ञान है, न मृत्यु का ज्ञान है, न आत्मा का ज्ञान है, न कर्मों का ज्ञान है, न ईश्वरीय व्यवस्था का ज्ञान है । और अगर कोई पुनर्जन्म की कोई घटना उनके सामने आती भी है तो वो इसे मानसिक रोग जानकर उसको Multiple Personality Syndrome का नाम देकर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं और उसके कथनानुसार जाँच नहीं करवाते हैं...!

(40) प्रश्न :- क्या पुनर्जन्म केवल पृथिवी पर ही होता है या किसी और ग्रह पर भी ?

उत्तर :- ये पुनर्जन्म पूरे ब्रह्माण्ड में यत्र तत्र होता है, कितने असंख्य सौरमण्डल हैं, कितनी ही पृथीवियाँ हैं । तो एक पृथीवी के जीव मरकर ब्रह्माण्ड में किसी दूसरी पृथीवी के उपर किसी न किसी शरीर में भी जन्म ले सकते हैं । ये ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन है...

परन्तु यह बड़ा ही अजीब लगता है कि मान लो कोई हाथी मरकर मच्छर बनता है तो इतने बड़े हाथी की आत्मा मच्छर के शरीर में कैसे घुसेगी..?

यही तो भ्रम है आपका कि आत्मा जो है वो पूरे शरीर में नहीं फैली होती । वो तो हृदय के पास छोटे अणुरूप में होती है । सब जीवों की आत्मा एक सी है । चाहे वो व्हेल मछली हो, चाहे वो एक चींटी हो।

04/11/2025

हंसते रहो😂😂

30/10/2025

श्री गणेशा ष्टोत्तरशतं अथवा श्री गणेश शतकम्
श्रीमङ्गलाशंसनपद्धतिः
कल्याणं कलयन्तु मे गणपतेः पादारविन्दोद्गताः
पुण्याः पांसुकणाः सुरेन्द्रमकुटीकोटीरकोटीतटे ।
(१)काश्मीरन्ति कठोरपापपटलीकान्तारसम्प्लोषणे
(२)दावीयन्ति च येऽन्तरायशिखरिव्राते (३)पवीयन्ति च ॥ १॥
विघ्नव्रातवनानलो गणपतिर्विघ्नक्षपाभास्करो
विघ्नप्रावृड्(४)उपेन्द्रबोधसमयो विघ्नप्रपाताशनिः ।
विघ्नक्षोणिरुहप्रचण्डपवनो विघ्नग्रहोच्चाटनो
विघ्नव्याधिमहौषधिर्विजयते विघ्नस्मरे(५)शानदृक् ॥ २॥
विघ्नाद्रिव्रजपक्षतक्षणपविं विघ्नाब्धिकालानलं
विघ्ना(६)च्छच्छदवार्षिकाम्बुदततिं विघ्नासुराब्जेक्षणम् ।
विघ्नाभेद्यतमःप्रभातसमयं विघ्नालिमुस्ताकिटिं
विघ्नाहिव्रजवैनतेयमनिशं विघ्नाधिपं संश्रये ॥ ३॥
विघ्नानलतोयवृष्टिरनघो विघ्नेभकण्ठीरवो
विघ्नेन्द्रारिसुदर्शनायितपदो विघ्ने(७)त्वरीचन्द्रमाः ।
(८)विघ्नेर्माल्यमृताक्तवर्ति र(९)नघा विघ्नेक्षुदन्तावलो
विघ्नेन्दिन्दिर(१०)चम्पको भवतु मे विघ्नेश्वरः श्रेयसे ॥ ४॥
वन्दे कल्पकविघ्नराजमनिशं तं देहिनामाश्रयं
यं देवाः शरणं समेत्य सकलं विन्देयुराशंसितम् ।
मन्देहोऽपि यदाश्रयान्मधुझरीसन्देशसन्दायिनीं
सन्देहेन विना लभेत सरसां मन्देतरां साहितीम् ॥ ५॥
पारं संसृतिसागरस्य जगदाधारं च सच्चित्सुखा-
कारी निर्मलयोगिवृन्दहृदयागारं विकारोज्झितम् ।
धीरं वाञ्छितपूरपूरणमहोदारं सदा सज्जनो-
त्तारं वारिज विश्वरादिविनुतं हेरम्बमीडे विभुम् ॥ ६॥
वन्दारुत्रिदशेश्वरप्रभृतिभिर्वृन्दारकैरञ्चितं
मन्दारप्रसुखामरद्रुसुमनोवृन्दावभास्वत्करैः ।
मन्दानां मतिदं गणेशमरिषट्कं दारयन्तं सतां
(११)कन्दात्मेति जगत्तरोरधिगतं विन्दामहे साम्प्रतम् ॥ ७॥
भिन्दानं विशयं महोपनिषदां छिन्दा निन्दादसन्देहतोऽ-
हं दारा वसु नन्दना इति चिरात् सन्धानितं दारुणम् ।
छिन्दानं भवपाशमाश्रितजनानन्दातिसन्धायिनं
विन्दामो गणनाथमद्वयचिदानन्दातितुन्दायितम् ॥ ८॥
चित्ते सर्वमिदं विधातुमनुसन्धत्ते विधत्तेऽथ यत्
धत्ते यत्र जगच्चिरादपि तिरोधत्तेऽपवृत्ते युगे ।
सत्तेयं जगतः स्वतो न हि यदायत्तेति जोघुष्यते
तत्तेजः सततं विभातु हृदि मे मत्तेभवक्त्राभिधम् ॥ ९॥
नाकाधीशसुरेशकेशवशिवाद्याकारभेदाश्रया-
च्छोकाम्भोनिधिमग्नभक्तजनतानौकायमानः स्वयम् ।
राकायामवतीशकोटिघटनानीकाशनेजप्रभः
कोकारातिकलाधरोऽवतु सुरानीकाधिराजाग्रजः ॥ १०॥
॥ इति श्रीमङ्गलाशंसनपद्धतिः ।
(१. काश्मीरपुष्पमिव लसन्ति
२. वनहुताशन इवाचरन्ति ३. वज्रायन्ते
४. उपेन्द्रबोधसमयः-शरत् वर्षान्त भवा
५. ईशानहक्-ईशतृतीयनेलं
६. अच्छच्छदो---हंसः ७. इत्वरी-स्वैरिणी
८. विनेरम्मदशारदाप्तिदिवसो, विने लिविरोपणामृतसिचिः ।
ईमे-व्रणम् । ९. मला १०. इन्दिन्दिरः भ्रमरः)
११. विन्दामो विविधप्रपश्चलवलीकन्दायितं सन्ततम् ।)
श्रीविनयप्रपञ्चनपद्धतिः
कल्याणाद्रिमुदक्षिपत् स्वबलसाफल्याय या पुष्करात्
कुल्यातुल्यतयापिबज्जलधिमावल्या सुराणां नुता ।
तुल्यान्या न यतः श्रितार्थिकृतवात्सल्या कचिद्देवता
कल्या वर्णयितुं कथं वयमिमां शल्यापहां देवताम् ॥ ११॥
मोचागर्वहरा नवामपि सुधां नीचामथातन्वती
वाचा फाणितशर्करेक्षुरसमाध्वीचातुरी निन्नती ।
जाचामत्यखिलं न यस्य चरितं प्राचामनीचापि चेत्
का चात्यल्पमतेर्ममास्य गदितुं धीचापलं केवलम् ॥ १२॥

नायानामधिपोऽपि यस्य गदितुं भोगावलिं नाशकत्
भोगानालिखितुं करैर्दिनमणिः खेगाधिपो वीक्षितुम् ।
को गाहेत परो गणेशचरिताख्यागाधपाथोनिधिं
वागाशात्र ममोदिता यदि तदा सागा भवेयं न किम् ॥ १३॥
मर्यादाग्रथितो विनैव जलधिस्तर्या न सन्तीर्यते
चर्या त्वस्य न तादृशी कलितमौखर्यश्च आदयः ।
पर्याप्ता न गणेशितुर्निङ्गभवैस्वयोऽपि धुर्याः सुराः
पर्यायाद्गदितुं कथं नु विषयीकुर्यामहन्तामहम् ॥ १४॥
मानातीतगणेशमङ्गलगुणाख्यानावधानाहत-
ज्ञानाभासविचेष्टितं किमपि दुर्मानाभिमानाहितम् ।
मेनापत्यतनूजपादकमलध्यानाभिधां निष्कृतिं
भूनाकिप्रवरा विधाय तनुतानेनाशु हीनागसम् ॥ १५॥
स्कन्दाग्रेजनुषोऽभिनन्दितुमिमे कुन्दावनातं यशो
विन्दानाः सनकादयोऽप्यमृतनिष्यन्दायितैम्भिरैः ।
मन्दाक्षप्रतिरुद्धसुन्दरवचःस्पन्दा न शेकुः कथां
मन्दात्मान इमे कथं गणपते विन्दामहे साम्प्रतम् ॥ १६॥
मित्राण्यत्र विचित्रबन्धुनिवहाः पुत्राः कलत्राणि वा
यत्रायास्यति तत्र कोऽपि न पुनः सत्त्रासमायास्यति ।
द्वित्रा ये गदिता गुणा गणपतेरत्रामुना भक्तितो
जित्रास्ते स्युरमुत्र तस्य तु धुरीत्यत्राभियुक्ता वयम् ॥ १७॥
(१)व्यासाद्या अपि यस्य नालमभवन् दासा गुणानामुप-
न्यासायान रता वयं बत परीहासाय भासामहे ।
प्रासाय स्पृहयालुना स्वधिषणायासात् समासादितं
त्रासापेतमिदं महागणपते धीसाहसं क्षम्यताम् ॥ १८॥
पद्यान्यद्यतनानि यद्यपि न सावधानि विद्यावतां
हृद्यानि स्युरथापि चेतसि सतां दद्यान्मुदं मत्कृतिः ।
यद्यायात्युदधिं कदम्बुस्तितिनद्या सहावाप्तवै-
शद्या स्यात् त्रिदिवौकसां परिषदा दद्यादतश्चामृतम् ॥ १९॥
एषा यद्यपि मत्कृतिर्न विदुषां तोषाय दोषाधिका
जोषावस्थितितो वरा हि फणितिर्भाषाविशेषान्विता ।
योषाणां पतिभक्तिरेव हि परा भूषान्यदोषापहा
मोषायाप्यगुणस्य मे गणपतेरेषा मनीषा पदे ॥ २०॥

इति श्रीविनयप्रपञ्चनपद्धतिः ।
(१। मनिशाभ्यासादनायासतो ये साहित्यसमुद्रपारगधियो व्यासादयो मन्वते । ? ?
कियत् कियदुपन्यासान्महासाहसं
कोऽसावस्मि गणाधिनाथचरिते मत्या तु तस्याक्षमः ।)
श्रीमनोनियमनपद्धतिः

मातङ्गाननमार्तरक्षणचणं मातङ्गकन्यासुतम् ।
मातङ्गाहितनन्दनं घनतमोमातङ्गकण्ठीरवम् ।
मातङ्गान्तविभूतिदाननिपुणं मातङ्गविद्विस्थितं
मा तं गाः परिहत्य मामकमनोमातङ्ग मा चापलात् ॥ २१॥
अध्यासीनमधीक्षुसागरसभामध्यान्यसिंहासनम् ।
सिद्ध्या पादविभूषिताङ्कतलया बुद्ध्या च संसेवितम् ।
विष्याचारपरायणानविरतं स्वाध्याननिष्ठान् जनान्
ऋद्ध्या योजयितारमाशु शरणं कृध्याखुवाहं मनः ॥ २२॥
वेद्यं वेदशिरश्शतैस्त्रिजगतामाद्यं तपोभिः समा-
यासं संसृतिघोररोगसुमहावैद्यं सुराद्यश्चितम् ।
आद्यन्तापगतं मुनीन्द्रहृदयास्वाद्यं समालम्बतां
माद्यन्ती विषयैर्मतिर्दिनकराभेद्यं विभेत्तं तमः ॥ २३॥
विम्बोत्सेकहराधरात्मदयिताबिम्बोकबद्धस्पृहं
कम्बोरप्यतिशुभ्रदन्तमखिलालम्बोदयं यं मनाक् ।
सम्बोध्यैव नरः समस्तसुखभाक् सम्बोभवीति क्षणात्
तं बोधैकसुधानिधिं भज मनो लम्बोदरं सादरम् ॥ २४॥
गन्धर्वाधिपति गोरपचितावन्धत्वसम्भावना-
गन्धप्रापितभीमनक्रजनुषाप्तं धर्ममप्याचरन् ।
रुन्धन् यत्पदमस्य सङ्गतिवशात् स्वं धन्यतामानयन्
बन्धच्छेदमवाप तत्पदयुगं सन्धत्स्व चेतः सदा ॥ २५॥
अम्बे द्वे चरणे श्रयाशु धिषणे स्तम्बेरमस्याखिला-
लम्बे नान्यदितीव पुष्करशिखालम्बेन संसूचिते ।
बिम्बे स्वादुतरे नवोष्णमहसो बिम्देन तुल्ये चरन्
लम्बेत् किं बत काकलोककलितालम्बे शुकः पल्लवम् ॥ २६॥

नालीकासनवासवादिदिविषन्मौलीड्यकल्पद्रुपु-
ष्पालीगर्भदलान्तरालविगलद्धूलीमधूलीभृतम् ।
केलीलोलविशालकर्णयुगलीतालीधुतालीव्रजै-
र्वालीढं करटोद्गतैर्भज मनो कालीसुताङ् घ्रिद्वयम् ॥ २७॥ shloka same as 48
कारामन्दिरसन्दिताः किल सुनासीरादिमाः खेचराः
वीराग्रेसरसिन्धुदैत्यहतये साराधिकं यं पुरा ।
आराध्यापुरभीप्सितं विविधस्वसंसारबन्धच्छिदं
मारारातितनूभवं श्रय मते धीरं मयूखाधिपम् ॥ २८॥
कोटीरन्ति महाहयो मणितुलाकोटीभवन्तीतरे
शाटीयन्त्यपरे त्वचा ? धृतजटाजूटीगुणन्त्यल्पकाः ।
पाटीरान्ति रिपोरसृञ्जि विबुधाश्चटीभवन्ति स्वतः
कीटीयन्त्यसुराः स यस्य गणराडाटीकतां चेतसि ॥ २९॥
वारं वारमहर्निशं भुवि नृणामारञ्जनं यत्नतः-
कारं कारमलम्भि किं नु सचमत्कारं फलं जन्मनः ।
सारं यत्सकलागमोपनिषदां दूरं दुरीहावतां
स्वैरं संश्रय मूर्ध्नि दर्शितगजाकारं मनीषे महः ॥ ३०॥
इति श्रीमनोनियमनपद्धतिः ।

श्रीनिर्वेदपद्धतिः
मा गा मानस कर्म कापथमुरोभागावगाढस्तना-
भोगामर्त्यवधूविचित्रतरसम्भोगाख्यसौख्यप्रदम् ।
योगायाभिरताः परे खलु महाभागा वयं नेहशाः
द्रागाशापरिपूरकं गणपतिं नागाननं संश्रय ॥ ३१॥

मातेयं महिलापि तेऽतिजडसङ्घातेऽत्र भूतेन्द्रियैः
पूते मा ममतेति हन्त बहुधाधीतेऽप्यवीतेक्षणः । (बहुधागीते)
नीते निष्फलतां वयस्यसि पराभूतेः पदं द्राग्भवे
शीते नीत इवावृतिर्गिरिसुतापोते कदा स्यान्मतिः ॥ ३२॥
ध्येयं योगिभिरन्तरब्जकुहरे ज्ञेयं त्रयीमस्तकै-
र्गेयं सिद्धसुरासुरैरपगतापायं विधेयं सताम् ।
सायं सागरसम्पतद्रविसमच्छायं विमायं सदा-
ध्यायं ध्यायमुमासुतं गतमलप्रायं कदा स्यान्मनः ॥ ३३॥
नित्यानित्यविचारलेशविकलः सत्यापचित्यान्वितः
कृत्याकुत्यपरिग्रहे तु मनसो वृत्त्या प्रवृत्तः स्वयम् ।
नत्या केवलया गणेश न मनःस्थित्या च भृत्यायितो
मृत्यावन्तिकगे कया पुनरहं मत्या तरेयं भवम् ॥ ३४॥
क्षोणावर्थपरायणानवनिपान् हूणादिमानाश्रयन्
ऋणाभाषणभूषणैवत परिक्षीणायुरप्यन्ततः ।
रेणावप्यमुतः फले नसुलझे हीणाशयोऽद्याप्यनि-
द्राणावाश्रितरक्षणे न चरणौ गाणाधिपावाश्रये ॥ ३५॥
बुद्ध्वा तत्त्वमनेकदेशिकगिरामध्वानुसाराच्चिरा-
दिवानीनभितो विविक्तविषये बवासनं मारुतम् ।
रुद्ध्वा हृत्कमलोत्थरश्मिनिचयेन ध्वान्तरज्ञानं
विद्ध्वा तत्र गणेश्वरानुभवज मध्वापिबेयं कदा ॥ ३६॥
दीनं सर्वगुणैः कदाप्यकलितध्यानं शिवानन्दन-
वीनं मानमदादिभिः प्रचुरिताज्ञानं दधानं सदा ।
एनं केवलमात्मनो विदधतं (वेनं समानं) वेनोपमानं गुणैः
स्वानन्दं गमयेत् कथं गणपतिर्दूनं भवाब्धेःपरम् ॥ ३७॥

दुर्वारस्मयदुर्भरासुरवराखर्वायितौजोशुजा-
गरस्किन्दितसार्वलौकिकविपन्निर्वापणे धूर्वहम् ।
अर्वाचीनवचोविचारविभवान्निर्वाच्यतेजोभरं
शर्वाणीतनयं भजेऽहमनिशं सर्वापदुच्छित्तये ॥ ३८॥

यल्लालेखितमब्जजेन यदतिक्षुल्लात्मकं मे धनं
तल्लाभः स कियानतः करटवन्मल्लाकृतिः साम्प्रतम् ।
बल्लालाभिधया वसन् बलिपुरे फुल्लं चिरप्रोल्लस-
द्धल्लातात्मकलेवरोऽतिविपुलामुल्लासयाशु श्रियम् ॥ ३९॥

स्फाराकारधराधराधरजगद्भाराद्विनिर्गत्वरै-
स्तारान्तर्गतमौक्तिकैरिव नखैरारादुपारञ्जितौ
धीरावाश्रितरक्षणेऽब्जयुगलाकारावरातिष्वति-
क्रूरावत्यरुणौ गणेशचरणावाराधयामो हदि ॥ ४०॥

॥ इति श्रीनिर्वेदपद्धतिः ।
अथ श्रीवैराग्यपद्धतिः ।

यो मानेन मदेन मुग्धहृदयो हेमादिना वा नरो (वा मानवो)
नामाप्यस्य कदापि न स्मर सकृत् क्षेमाय हे मानस ।
सीमापेतगुणाकरं गणपतिं सोमार्धचूडामणिं
कामातीतफलप्रदाननिपुणं भूमानमेवाश्रय ॥ ४१॥

वित्तात् प्राक्तनजन्मपुण्यशकलायत्तादपि क्षुल्लका-
न्मत्ता ये मनुजा न तान् वयममी वृत्तावपेक्षामहे ।
तत्तादृक्करुणाकटाक्षमहिमायत्तोहमिच्छातिगां
वित्ताधीशसखात्मजो मम सदा दत्तामभित्तां श्रियम् ॥ ४२॥ (दत्तामखण्डां)

कालं दैत्यकुलस्य देवपरिषत्पालं दयालुं फणि-
प्रालम्बाच्चललम्बि मञ्जुलमणीमालं सलीलं निजे ।
लोलं गण्डतले नुदन्तमसकृल्लोलम्बजालं जग-
न्मूलं दूरनिवारिताश्रितजनाभीलं गणेशं नुमः ॥ ४३॥

कार्याकार्यविचारणां विजहता नार्यादिषु भ्राम्यता
नार्याचारकृता स्थितेन विबुधाचार्यादृते दुर्मते । (विबुधाचार्याहिते)
धैर्याद् दुश्चरितं मयान्वहमहोऽकार्यात्मने द्रुह्यता
सूर्यापत्यजभीः कथं गणपतेस्तार्या कथामन्तरा ॥ ४४॥

धीहान्यासकृदार्जितं महदघं मोहान्मुहुः शीलितं
देहात्मभ्रमतः पुनर्बहुविधद्रोहादपारीकृतम् ।
स्वाहानाथवदुप्रतापजनकं हा हा कथं तं सहे
देहाति नरकोद्भवं गणपतेरीहा पदाब्जे न चेत् ॥ ४५॥

अन्यायोपगताल्पवित्तमहितम्मन्यानवन्यां मृगा
वन्या मित्रमरीचिकामिव महोदन्याः सदोपासते ।
धन्या एव वयं भवेम यदि नस्तन्यादुमानन्दनो
विन्यासं नयनाञ्चलस्य न ततो मन्यामहेऽन्यां श्रियम् ॥ ४६॥

कादाचित्कसुखावहाल्पविषयास्वादाय गोदारणा- (गोदारणानि - हलानि)
न्यादायात्र रतः फलैर्विरहितः कैदारिके कर्मणि ।
पादावाश्रयतेऽथ चेद्गणपते र्दास्यतः स्वकाममि-
त्यादावेव कुतः श्रयेन्न मतिमान् खेदानपास्येतरान् ॥ ४७॥

नालीकासनवासवादिदिविषन्मौलीड्यकल्पद्रुपु- shloka same as 27
ष्पालीगर्भदलान्तरालविगल द्धूलीमधूलीभृतम् ।
केलीलोलविशालकर्णयुगलीतालीधुतालीव्रजै-
र्वालीढं करटोद्गतैर्भज मनो कालीसुताङ् घ्रिद्वयम् ॥ ४८॥

पञ्चानां वियदाशुगाग्न्युदभुवां सञ्चारिणां सञ्चये (सञ्चारिणीनां चये)
चिञ्चातुल्यकलेवरेऽत्र हृदय त्वं चापलं मा कृथाः ।
मुञ्चाहन्तां च ममतां जडात्मनि किञ्चाद्वयं चिन्मयं
स्वं चामुं च गणाधिनाथमपृथक् किन्त्वात्मना चिन्तय ॥ ४९॥

भूतस्तोममयं शरीरमयि मा चेतः स्थिरं चिन्तय
ख्यातस्तस्य लयो यथा हि बदरीमूतस्य बन्धात्यये ।
भ्रातर्न स्मर नश्वरं दिशति यः प्रीतः पदं शाश्वतं
जातप्रीतिरुपाश्रयाशु गिरिजापोतस्य पादाम्बुजम् ॥ ५०॥
इति श्रीवैराग्यपद्धतिः ।

श्रीस्वरूपपद्धतिः
सव्याङ्कस्थितया स्वया दयितया निर्व्याजकारुण्यया
भव्याम्भोरुहवक्त्रया सरसया सव्याजमालिङ्गितः ।
नव्याशोकदलातिमञ्जुलतनुच्छव्या भवव्याधिहा-
हाशाधिपवन्दितः सपदि मामव्यादुमानन्दनः ॥ ५१॥
नारीमतले दधानमखिलाधारीभवन्ती धृतिं
सूरीन्द्रैः सनकादिभिर्नुतगुणं हारीभवद्भोगिनम् ।
स्फारीभूतकराञ्चलेन दनुजं गौरीगृहं चारु सि-
न्दूरीकृत्य विचर्चिताखिलतनुं नारीगणेशं भजे ॥ ५२॥
शुण्डादण्डगृहीतदन्तमुसलोचण्डाभिघातोद्गतै-
श्चण्डांशुपतितैः सुरालयमणीषण्डार्जितैर्यः कणैः ।
पिण्डालतकमाकलय्य शशिनः खण्डामृतेनात्मन-
श्चण्डातं रमणीमणेरकृत वेतण्डाननः पातु नः ॥ ५३॥ (पातु सः)
वामं भूमितले निधाय भुवनक्षेमं दिशन्तं सदा
श्रीमन्तं परमुन्नमय्य चरणं कामं नटन्तं मुदा ।
सोमं शेखरिताच्छकैतकदलक्षामं दधानं बहु-
व्यामं पन्नगभोगनिर्मलतरक्षौमं वसानं भजे ॥ ५४॥ (गणेशं भजे)
एलागन्धिमदाम्बुचुम्बिमधुलिण्मालापनोदोद्यतं
स्थूलात्मीयकपोलमण्डलचलत्तालानुकारिश्रुतिम् ।
हेलाक्षिप्तगिरीन्द्रजास्तनतटीचेलाञ्चलं चारु शु-
ण्डालापीतपयोधरं गणपतिं बालाकृतिं भावये ॥ ५५॥
फालाक्षस्य शिरस्यमयतटिनीवेलास लीलावशात्
कूलाघातविहारलोलशिरसा कालारिणा वारितः । (विलासलोलशिरसा)
आलापानपरिस्फुटाक्षरपदान खेलावशादुगिरन्
लालामौक्तिकमण्डितोऽवतु गणेट् बालाब्जमौलिः शिशुः ॥ ५६॥
आजानोज्वलपद्मरागनिकरैरोजायमानं जवात्
बीजापूरधिया सुमेरुमहरद्यो जातमात्रः पुरा ।
मा जानाहि फलं त्यजामुमिति तत्याजाद्रिराजात्मजा-
पूजापूर्ववचोभरैरवतु मां राजार्धमौलिर्विभुः ॥ ५७॥
(१)चण्डीशात्मभवो गिरामथितमत्स्यण्डीमदश्चण्डपा
षण्डीयप्रकरापहोऽमृतधुनीडिण्डीरपाण्डुप्रभः ।
भिण्डीपालमुखायुधैररिशिरःखण्डीकृतौ पण्डितो
दुण्डी राजति वारणासिपुरि वेतण्डीयतुण्डः प्रभुः ॥ ५८॥
माता यस्य नगाधिराजतनया ख्याता पिता शङ्करो
भ्राताशेषसुराधिराजपृतनानेता हतारिखजः ।
गीता यस्य कथा निजेन्दुवदनानातानपेतैः सुरै-
र्नीता गेयपदं सदा भवतु सन्त्राता समेतापदः ॥ ५९॥
क्षामात्युज्ज्वलफालमूलकलितश्यामाभिको भास्कर-
स्तोमाहङ्कृतिमोचकामितमहस्थेमाभिरामाकृतिः ।
वामाङ्कस्थितवल्लभाख्यदयितानामाङ्कनामा विभु-
र्मामानन्दयतु स्वभक्तनिहितप्रेमा स सोमात्मजः ॥ ६०॥
इति श्रीस्वरूपपद्धतिः ।

१. चण्डीशप्रथमात्मजं मधुरमत्स्थण्डीय खण्डीभव
झुण्डीति प्रथिताख्ययावपटलीपण्डीकृता दक्षिणम् ।
भिण्डीपालमुखायुधैर्निहतपाषण्डीयषण्ड
स्तण्डीत्यादिमुनीडितं कलितवेतण्डीयवक्त्रं भजे ॥
श्रीगुणानुवर्णनपद्धतिः
पाकारातिमुखामरेड्यचरितं नाकारिवर्गच्छिदं
स्तोकात्मीयजनाभिपूजनविधिस्वीकारतुष्टाशयम् ।
तोकाकारमृषेः सुरेन्द्रललनालोकाभिगीतामित-
श्लोकामेयगुणं भजेम सदयालोकावितार्थिव्रजम् ॥ ६१॥
दोर्भिः स्वैर्दशभिर्धृतायुध विभो गीर्भिर्मुनीन्द्रैः
कृता-
शीभिः सन्नुत दीनरक्षणमहाधूर्भिर्बृहत्कन्धर ।
नौभिन्ला जलधौ यथैवमतगतेभिः परीता दया-
पूर्भिर्दृष्टिभिरेव देव विषयाभिन्धि सिन्धुद्विषन् ॥ ६२॥
दम्यामिन्द्रियसन्ततिं सपदि संयम्यान्तरब्जं समु-
नम्यास्मिन् सनकादियोगिपरिषद्गम्याभिगम्या सताम् ।
कृस्याद्यजभवान्तसर्वजनिमन्नम्यास्तु मे श्रेयसे
शम्या पूजयतामभीष्टवरदा रम्या परा देवता ॥ ६३॥

सत्यं ब्रह्म सनातनं श्रुतिशिरःस्तुत्यं मुनीन्द्रहृदा
नित्यं ध्येयमधीनुवारिधिसभं नृत्यं वितन्वत् सदा ।
चित्यंशे सदृशेऽपि यत् किल परागित्यंशभेदास्पदं
प्रत्यञ्चं विदधातु मां प्रकृतिवैकृत्यंशमुक्तं चिरात् ॥ ६४॥
तातोऽब्धेरुदितं विषं ननु पिबन् ख्यातोरुहालाहलं
गीतोऽभूदखिलैरितीव स यतो जातोऽयमेवाधुना ।
वातोच्चालितवीचिचुम्बितनभाः स्फीतो विषाणां निधिः
पीतो येन तमाश्रये मम सदा नातोऽन्यदैवं क्वचित् ॥ ६५॥
कानीनेन सहारचय्य समयं मौनीश्वरेणाक्षराम् ।
धानीकृत्य रदं निजं कटमदोदानीरयन द्योसदा ।
(२) स्थानीभूतगिरेस्तटेऽलिखत यो मानी महाभारतं
यानीमं शरणं श्रितार्थिजनसन्तानीभवन्तं विभुम् ॥ ६६॥
अन्याशक्यविनिग्रही समितिमूर्धन्याविमौ दानवौ
हन्यादेवनरान्तकाविति सुरैर्मुन्यादिभिर्नाथितः ।
नन्यायाभिमुखौ जघान गदयाशन्या यथेन्द्रो गिरीन्
तन्यादेष महोत्कटः शुभमिहानन्याश्रयस्याशु मे ॥ ६७॥
कृन्तात्तीक्ष्णतरेण सर्वजगदत्यन्तार्तिदान दानवान्
दन्ताग्रेण मृगाधिभूरिव नखैर्दन्तावलान् संहरन् ।
सन्तापं जगतां जहार जनतायन्ता नियन्ता धियां
भिन्तामेष गजाननः सपदि मे चिन्तां दुरन्तामिमाम् ॥ ६८॥
चीटी यस्य पुरन्दरादिदिविषत्कोटीभिरभ्यर्च्यते
खेटीभिचरितं सुरावनिरूहां वाटीषु जेगीयते ।
धाटी यस्य रणेषु दैत्यनिवहोत्पाटी गणेशः स मे
घोटीभावितमूषिकोऽधपटलोच्चाटी भवत्वञ्जसा ॥ ६९॥
पूषा यन्महमा जितोऽनुदिवसं काषायमालम्बते
दोषानायक एष यस्य ममसरतोषाय भूषायते ।
आषाढान्तरमाश्रितं ननु भिया मेषाधिरूढं महः (मेषाधिरूढं महः - वह्निः)
शेषाणां गणनायकानुकरणे केषां परेषां महः ॥ ७०॥
इति श्रीगुणानुवर्णनपद्धतिः समाप्ता ।

श्रीचारित्रपद्धतिः
कन्तावाहितसायके मुनिवधूरन्ताहिहन्ता मुने-
गन्तासीति गिरा सहस्रभगतां चिन्ताकुलोऽभ्येत्य यम् ।
क्षन्तारं स्वजनागसां गुरुगिरा हन्तारमप्यहसां
सन्तापं विजही भजे गणपतिं चिन्तामणिं नाम तम् ॥ ७१॥

बन्धूकस्तबकारुणं रणमहीगं धूलिधूम्रानना-
भं धूम्राक्षविमर्दन शरगणैः सिन्धूत्तमाङ्गच्छिदम् ।
अन्धूकृत्य निपीय पुष्करतटे सिन्धून् क्षिपन्तं श्रिता-
घं धून्वन्तमशेषमाश्रय गणेशं धूमकेतुं मनः ॥ ७२॥
मासे भाद्रपदे जयोत्तरतिथावासेवकेभ्यो निजा-
वासे कल्पितदिव्यमोदकभरपासेन पूर्णोदरः ।
न्यासे प्रस्खलितः पदोः कृतपरीहासे विधौ यः सदा
ह्रासेनामुमयोजयन्मम रिपुत्रासे स सन्नातु ॥ ७३॥
वारीशोदरसम्भृतानि सहसा वारीणि यः पुष्करे-
णोरीकृत्य नभस्थले कणतयोगारीचकार क्षणात् ।
स्फारीभूतमदान् दुरासदमुखान्योऽरीरिषदानवान्
भीरीढारहितानसावुदयतां पारीन्द्रवाहो हृदि ॥ ७४
आपातालविसारितोयभरितं पापाशयं यः पुरा-
कूपाकारकूपारस्थ महासुरं कलितसन्तापातिरेकं नृणाम् ।
कोपादन्तरुदं चिराय गमयन व्यापादयामास यः
सोऽपायानवधूय पातु सततं नीपालयानन्दनः ॥ ७५॥
रुद्राणीभुजमण्डलाहितशिरा निद्रामशेषावनो-
निद्रामाश्रितनैजभोगजनितां मुद्रापयन् यः पुरा ।
छिद्रान्वेषणतत्परं दिवि जवाद्विद्राणमध्याहनत्
सदाश्मं च मयासुरं वितनुताद्भद्राण्यमुद्राणि नः ॥ ७६॥
छायाकारमुपागतं कुहनया कायानुवृत्तं महो-
च्छायादद्रितटात स्वमुन्मुखमपाधायाथ देहं पतन् ।
आयासेन विनावधीद् गिरितटे मायाविनं दानवं
पायादेष गणाधिपोऽतिविषमप्रायादपायात् स माम् ॥ ७७॥

क्षोणीकोणगता यदस्रकणिकाः प्राणीभवन्त्यो धनु-
बाणीतूणधरी यथैव स इति श्रेणीभवन्ति स्म तम् ।
शाणीघृष्टशरक्षतद्विषदसृग्वेणी निपीयाशुग
द्रोणीभिर्व्यजयद्रिपूनवतु शर्वाणीसुतो नश्चिरम् ॥ ७८॥

विप्रश्रेष्ठवरेण्यगीतनिगमानुप्रश्नसम्भावित-
स्वप्रत्युक्तिसुधाव्यमानससरोवप्रक्रियोल्लासिनम् ।
अप्रत्यक्षपरात्मभावविशयाद्यप्रत्ययोद्भावना-
द्यप्रक्षिप्तिविहारिणं गणपतिं क्षिप्रप्रसादं भजे ॥ ७९॥

रक्षार्थं सुधियां दुरीहपरिषच्छिक्षार्थमप्येत्य य-
स्थ्यक्षापत्यतनुं ददाह दनुजान कक्षानिवोषर्बुधः ।
यक्षाधीशजलेश्वरान्तकसुराध्यक्षान् ररक्षार्दितान्
ऋक्षाधीशकलाधरः स भगवान् रक्षापरोक्षोऽस्तु मे ॥ ८०॥
इति श्रीचारित्रपद्धतिः ।

श्रीनतिपद्धतिः
तालाकरकाराञ्चलप्रविलसच्छूलाग्रभिन्न द्विष-
स्फालाय क्षणचूक्षिताखिलमहीचेलाय लीलावशात् ।
कूलाघातविशीर्णमूलविचलद्वेलाचलाय स्वयं
व्यालामयवपुर्धराय गिरिजाबालाय तुभ्यं नमः ॥ ८१॥
वीणातापसगीयमानभुवनत्राणापदानाय स-
च्छ्रेणावर्पितकामनाविषयकल्याणाय भूयो नतिम् ।
एणाङ्कार्भकमौलये वितनुमः शोणारविन्दोज्ज्वले
पाणावाहितमोदकाय सुमनोबाणारिडिम्भाय ते ॥ ८२॥

हाहाद्यैरुपवीणिताद्भुतगुणव्यूहाय वैहायसै-
व्योहारैनिङ्गमान्तगैर्विबुधसन्दोहाभिनन्द्यात्मने ।
बाहापङ्क्तिशिखोद्गलन्मदपरीवाहानुमिश्रश्रवो-
जाहामन्दमरन्दसौरभलसद्देहाय भूयो नमः (?) ॥ ८३॥

रुष्टा या जगदेव भस्म कुरुते तुष्टा तु सिद्धीर्ददा-
त्यष्टावष्यथ यत्पदाब्जयुगलौजुष्टो विरक्त्या यदा ।
हृष्टास्मै वितरत्यनन्यसुलभामिष्टां गतिं शाश्वतीं
कष्टापायकृते भजे श्रुतिशिखोदुष्टां परां देवताम् ॥ ८४॥

धर्माधर्मविवेचनेऽप्यचतुरो दुर्मार्गगामी सदा
कर्मापेक्षफलप्रदाननुसरन् शर्माप्नुयां किं कदा ।
नर्मालोकनमात्रतोऽस्तदुरितं निर्माय सर्वार्थदं
धर्मार्तोऽभ्रमिव व्रजामि शरणं भर्माद्रिचापात्मजम् ॥ ८५॥ (भर्म - हेम)
विन्ध्याद्रिस्मयहारिणा घटभुवा वन्ध्यावलेपाधिना-
यं ध्यात्वाधिगता कला न यदि को रुन्ध्यादतोऽन्यः पुमान् ।
सन्ध्याकारिमहागिरि जलनिधि बन्ध्याद्गणेशेशं
तं ध्यायेम भवाब्धिमद्य भगवन् सन्ध्याशु नागानन ॥ ८६॥
श्रुत्वा दैत्यगणावृतं त्रिभुवनं मत्वा परावध्यतां
गत्वा काश्यपसूनुतां युगबलाद्धत्वा रिपूनञ्जसा ।
हृत्वा भूमिभरं सुरान् स्थिरपदान् कृत्वा प्रथामागम-
त्तत्त्वातीतममुं गणेशमसकृन्नत्वा भवेयं कृती ॥ ८७॥
पूर्वाद्रेः शिखरोदितस्य रुचिरश्रीर्वासराधीशितु-
गौरिण्यमले विभाति तु यथा दूर्वाग्रभागस्थिते ।
गीर्वाणेशखगेशमौक्तिकमणिश्रीर्वाब्जरागद्युतिः
शापित्य तवाकृतिः स्फुरतु धीकार्वाहिता मेऽनिशं (?) ॥ ८८॥
तुच्छात्यल्पसुखावहेषु विषयेविच्छानुरोधाद्धमन्
कच्छापेतभवात्रवान्तरनिशप्रच्छादितात्मा चिरात् ।
इच्छातीतफलप्रदं गणपतिं गच्छामि देवं गतिं
चिच्छायामतिदिश्य सन्दिशतु मे तच्छाश्वतं वैभवम् ॥ ८९॥
स्वं त्रातुं न भवाम्बुधौ निपतितं तन्त्रादिना पारये
गन्त्रा भाव्यमतोऽन्तकस्य च मया सन्त्रासनस्यान्तिके ।
यन्त्रारूढभिवावशं भमति यन्मन्त्राजगत्तं विना
कन्त्रातारमुपैमि को दु भवभीतं त्रातुमीष्टे च माम् ॥ ९०॥

सारासारविचारदूरमनसं घोरार्तिसन्दायिसं-
साराहिक्षतिजातमोहमगदङ्कारान्तरानाश्रितम् ।
तारानाथकलाधराय न चिरादाराच्छरण्यार्थिनं
स्फारापारकृपामृतार्णवरसेऽदरानिमग्न कृथाः ॥ ९१॥
इति श्रीनतिपद्धतिः ।

श्रीसम्प्रार्थनापद्धतिः
काशापस्थिततूलजालचपलान् लेशान् सुखानां भजन्
आशावेशवशाद्गणेश विवशः केशानजलं वहन् ।
ईशापत्य चिरात्त्वदीयचरणाभ्याशावतीगोऽस्म्यहं
पाशानाशु विमुच्य में दिश गतिं या शासिता शाश्वती ॥ १२॥
निर्मायावनिमण्डले जनिमदाः कर्माधिकारं ततो
धर्मादुद्गतिमप्यधोगतिमथाधर्माद्ददन्न्यायतः ।
दुर्मायावशमेत्य दारसुतभूभौदिलुब्धं कृतः
शर्माभासरतं कृथाः कलितनीतिमर्माधिकाराच्च्युतम् ॥ ९३॥

वेधा मामककर्मसङ्क्रमवशादाधाजनिं यां तु तां
त्रेधा पुत्रकलत्रवित्तममताबाधाददभ्रीकृताम् ।
मेधासञ्जननेन भञ्जय जवादेधांसि वह्निर्यथा
स्वे धामन्यभिरखयाद्य विषयेष्वाधावितं मे मनः ॥ ९४॥
बुद्धिप्रेरणतक्षणेन फलदात् सिद्धिप्रवर्ष जना
त्वद्धि प्रापुरबोधसन्तमसजा तद्धि जातद्धी क्षयादञ्जसा ।
यद्धित्वा शरणं न मेऽस्ति भुवने तद्धि त्वदद्धिद्वयं
विद्धि प्राप्तमिमं जनं गणपते सिद्धिप्रदो मे भव ॥ ९५॥
तापं भौतिकमुख्यमेत्य बहुविक्षेपं भजन्मानसं
कोपं दुर्धनिनां मदोद्धतमधिक्षेपं सदा मर्षयन् ।
भो पञ्जास्यसुत त्वमेव गतिरित्यापं भवन्तं परं
रूपं दर्शय मेऽधुना त्वमखिलव्यापन्नरक्षाक्षमम् ॥ ९६॥

द्वेधा कर्मणि चिन्तिते मयि कृपासाधारणी चेन्महो-
त्सेधापारभवाम्बुधेस्सपदि मां बाधाकरादुद्धर ।
क्रोधावेशवशोऽथ चेन्मचि तदा मेधाशिलासन्दितं
बोधागाधमहार्णवे झटिति मामाधाय तुष्टो भव ॥ ९७॥

ईहामात्रतपोभरानविरतं गेहातिसम्पीडिता-
नूहाशेहविचारणास्वकुशलानाहारमात्रार्थिनः ।
माहामान्यदयाशा यदि तु नः स्नेहादुदीक्षेस्तदा
का हानिर्भवतो गणेश भविता नेहायमस्मानव ॥ ९८॥

अत्यन्तार्तिपरम्परोपहितसंसृत्यम्बुधौ चित्तवै-
मत्यं प्राप्य विवेचनैरविदितौचित्यं निमग्नं चिरात् ।
नित्यं मोहशतापविद्धमवशं गत्यन्तरानाश्रितं
भृत्यं मां गणनायकोद्धर तदौन्नत्यं च सत्यं कुरु ॥ ९९॥

अक्तं मोहमहाञ्जनेन विषयासक्तं प्रवृत्तं दिवा-
नक्तं वित्तमुतादिभिर्दृढपरिष्वक्तं च मां मायया ।
सक्तं पुण्यकणेन पापपटलीयुक्तं निषिक्तं मले
भक्तं पादनखप्रभासलिलनिर्गिक्तं गणेश क्रियाः ॥ १००॥

ज्यावल्लीव सरीसरीति धमनी यावत्तनौ चार्मणी
सा वधीव विनिश्वसत्यविकलैमें वश्यभावं गतः ।
तावन्मत्करणैरकुण्ठगतिभिः वे वर्त्मनि स्थीयतां
जीवत्यागभयेऽप्यपैदु न मतिर्भावत्कपादाम्बुजात् ॥ १०१॥
इति श्रीसम्प्रार्थनापद्धतिः ।

श्रीमनस्तृप्तिः
प्रस्तात्मानमपारदुःखनिचयैर्ध्वस्ताखिलाति तु मां
कस्तावद्रचयिष्यतीति न हि मे प्रस्तावना कापि यत् ।
यस्ताक्षभवाब्धिमानजनताहस्तावलम्बप्रदो
(१)बस्तारूढभवाग्रजोऽत्र भवति न्यस्ता समस्तापि धूः ॥ १०२॥

१। बस्तारूढो मेषवाहनोऽग्निः ।
कंसारातिचतुर्मुखेन्दुशकलोत्तंसादयोऽपीश्वरा
ये सामान्यजनैः सहात्मदुरितध्वंसाशयोपासते ।
तं साक्षात्कलयिष्यसे किमिति चेत् संसारिणामप्रणी-
स्तं साधारणमागमा जगुरतः संसाधयामीप्सितम् ॥ १०३॥

मोहाख्याम्बुनिधी विचित्रविषयग्राहाकुले निर्भरो-
त्साहादल्पतरातिनश्वरसुखालेदात्प्रनष्टायुषः ।
ऊहातीतपुराणसत्कृतपरीणाहादिदानीममी
नीहाराचलकन्यकातदुभुवं गाहामहे चेतसा ॥ १०४॥

बालेन क्षणभगुरेऽपि विषये लोलेन यद्यप्यस-
छीलेनाघमुपार्जितं तदुदितामीले समासेदुषि ।
काले पादयुगे मनो व्यरचयं दालेन्दुमौलेर्यदि
प्रालेयानि रविर्यथैव विदहेज्ज्वालेव तूलं शुचेः ॥ १०५॥

सुत्रामप्रमुखैश्च यत्पदयुगं सत्राशनैः सेव्यते
पित्रा पुत्र इव प्रपञ्च इह चामुत्रापि येनेक्ष्यते ।
चित्राकारमिदं विभाति सकलं यत्राहित भित्तिवत्
स त्रायीत गणेश्वरस्त्रिजगदाधित्राणदक्षः स्वयम् ॥ १०६॥

निद्रालस्यवशान्निशादिवसयोभद्राय हीनोद्यमः
क्षुदानित्यसुखाशया धुरि दधन्मुद्रां दरिद्राहिताम् ।
स्वद्राषिष्ठसुखावहं श्रितजनाघद्रावणं हा चिरा-
द्राक्षं गणनाथमद्रितनयारुद्रात्मजातं विभुम् ॥ १०७॥

हूतिर्देवगणस्य साधुषु मखे भूनिर्भवत्वस्य ते-
वीतिनश्यतु षडिधा भुवि यथा स्फीतिर्भवेत् सम्पदाम् ।
जातिः स्वे चरिते युतास्तु न च दुर्नी तिर्नृपाणां न च
ज्ञातातु ते गणेश कृपया भीतिः कचिन्मा स्म भूत् ॥ १०८॥

फलश्रुतिः अष्टप्रासयुतं विशिष्य पठतामिष्टप्रदं देहिनां
कष्टक्लेशविनाशनं बहुविधानिष्टत्रजच्छेदनम् ।
नष्टस्वार्थिसमर्पणं सरसविस्पष्टप्रमेयं गणे-
शाष्टशस्यश्लोकशतं चिरं विजयतां तुष्टः स च स्याद्विभुः ॥ १०९॥

कविनाम प्रातः पद्यशतं पठेद्यदि पुमान् जातस्पृहः प्रत्यहं
ख्यातः पुत्रकलत्रमित्रविभवोपेतश्चिरं मोदते ।
चेतस्येष यदीहते पदमदो यातश्च नातः पते
गीतः सिद्धगणैर्गणाधिपपदं नीतः सुखं विन्दते ॥ ११०॥

शम्भावाहितचेतसो मुनिमणेः कुम्भादुदीताकृतेः
कुम्भादुहतया कवेरसुतथा सम्भावितश्रेयसि ।
कुम्भाधीरपुरे वसन् मधुरवाग्गुम्भातिमान्यः सुधी
जम्भारातिरचीकरच्छतमिदं श्रीयज्ञवेदेश्वरः ॥ १११॥

श्रीमत्कुम्भपुरे सता गणपतेर्धाम स्वयं ध्यायता
प्रेम ख्यापयतां कृतं सुकदिना धीमधुरस्वामिना ।
क्षेमस्थेमकरं गणेशशतकं नाम प्रसिद्धि भज-
त्वामन्वन्तरमाणवं च तदिदं कामप्रदं देहिनाम् ॥ ११२॥
आदौ मङ्गलशंसनं विनयवाग्गुम्भो मनोनिग्रहो
निर्देदो विरतिः स्वरूपगुणचारित्रं नतिः प्रार्थना ।
चैतस्तुष्टिफलाभिधानकविनामानीति भिन्नक्रम
रम्यं पद्यशतं दशाधिकमिदं भूयाद् बुधानां मुदे ॥ ११३॥
इति श्रीविश्वामित्रकुलकलशपारावारराकासुधाकरश्रीमद्रत्नखेट-
श्रीनिवास मखिवरसन्तानपल्लवेन श्रीबालचन्द्रार्यतनूजेन
यज्ञवेदेश्वरेण कृतं गणेशाष्टोत्तरशतं (गणेशशतकं) सम्पूर्णम् ॥.

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