04/08/2026
गालियाँ देने से इतिहास नहीं बदलता ― Gen Z
अपनी Knowledge बढ़ाइए, तथ्यों को पढ़िए, स्रोतों को समझिए और किसी के बहकावे में मत आइए ।
भावनाओं से नहीं, तथ्यों से अपनी राय बनाइए ।
वरना हो सकता है कि अपने स्वार्थ के लिए आपको इस्तेमाल करने वाले लोग, आपके भविष्य को ही नुकसान पहुँचा दें।
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जारी किए गए ऑयल बॉन्ड (मूलधन) लगभग ₹1.48 लाख करोड़ थे। बाकी राशि कई वर्षों में चुकाए गए ब्याज की है। कुय देय राशि 3.23 लाख करोड़ ।
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अगर उस समय UPA सरकार ऑयल बॉन्ड जारी न करती, तो उसके सामने मुख्यतः दो विकल्प थे—
1. पेट्रोल, डीज़ल, LPG और केरोसीन की कीमतें बढ़ाकर वास्तविक लागत जनता तक पहुँचाती।
2. या फिर उसी समय टैक्स बढ़ाकर या अन्य सरकारी खर्चों में कटौती करके सब्सिडी का बोझ उठाती।
लेकिन हुआ क्या?
सरकार ने तत्काल राजनीतिक और आर्थिक दबाव से बचने के लिए ऑयल बॉन्ड जारी किए। इससे उस समय जनता पर पूरा बोझ दिखाई नहीं दिया, लेकिन उसका भुगतान भविष्य के करदाताओं और आने वाली सरकारों के हिस्से में चला गया।
इसे एक उदाहरण से समझिए—
मान लीजिए एक पिता पूरी ज़िंदगी परिवार को महँगा देशी घी खिलाता रहा। परिवार को लगा कि सब कुछ आराम से चल रहा है। लेकिन पिता के जाने के बाद बेटे को पता चला कि उस घी का ₹5 लाख का कर्ज़ उसके नाम है, जिस पर ब्याज भी देना है।
सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में सस्ता घी था? या सिर्फ़ उसका बिल अगली पीढ़ी के नाम कर दिया गया था?
यही कारण है कि ऑयल बॉन्ड को लेकर आलोचना होती है। आलोचकों का कहना है कि उस समय की राहत का आर्थिक बोझ भविष्य पर डाल दिया गया, ताकि तत्काल जनता को पूरी कीमत का एहसास न हो और सरकार पर दबाव कम रहे।
विचार कीजिए—
क्या किसी सरकार को आज लोकप्रिय दिखने के लिए कल की पीढ़ियों पर कर्ज़ छोड़ना चाहिए? या फिर जनता को उसी समय वास्तविक लागत बताकर पारदर्शी निर्णय लेना चाहिए?
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पंडित रवि मैंदोला
प्रदेश संगठन मंत्री उत्तराखंड
श्री परशुराम सर्व ब्राह्मण संघ, मध्य प्रदेश