Uday Pundhir

Uday Pundhir एक लक्ष्य एक उद्देश्य, विकसित सिकन्दराराऊ - समृद्ध समाज..!
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Uday Pundhir well known social worker for rural girls empowerment and social reforms activist through Sashakt Beti Sundar Samaj SBSS

09/10/2025

कभी-कभी इतिहास दर्पण नहीं होता - वह एक घाव होता है। ऐसा घाव जो दिखता नहीं, पर पीढ़ियों के अवचेतन में हरा रहता है। ऐसा ही एक घाव है - “दलित” और “अगड़ा” - दो शब्द, जो हमारे समाज के मन में एक सूक्ष्म रूप से स्थायी पहचान बन चुके हैं। ‘दलित’ शब्द जिसका अर्थ है टूटा हुआ, कुचला हुआ, पीड़ित। पर यह शब्द कभी किसी जाति, समुदाय अथवा वर्ग के लिए था ही नहीं। यह कोई जाति नहीं, एक मनःस्थिति थी - जब कोई अन्याय, अत्याचार या उपेक्षा के नीचे दबा हो, और उसका अस्तित्व कुचल दिया गया हो।
19वीं शताब्दी में ब्रिटिश अधिकारी J.J. Molesworth ने अपनी Marathi–English Dictionary (1831) में लिखा - “Dalit = crushed, broken” यह केवल उस शब्द का अर्थ था, कोई जाति, समुदाय, वर्ग नहीं। परन्तु भारत पर सत्ता बनाए रखना चाहने वाली अंग्रेज़ी ताक़तों ने “दलित” शब्द को सामाजिक अर्थ दे दिया। मुग़लकाल में परिस्थितियों के कारण धर्मांतरण (conversion) से बने समूहों के बीच उन्होंने नया विभाजन रचा - एक ओर हिंदू से इस्लाम में गए मुसलमान और दूसरी ओर हिन्दू - और तीसरी तरफ़ हिन्दू समाज को भीतर से तोड़ने के लिए “दलित” और “सवर्ण” के नाम से बाँटने का बीज बोया। उन्होंने समाज के व्यवसायों को जातियों के नाम से बाँट दिया - ताकि सहयोग की जगह वैमनस्य और सम्मान की जगह संशय जन्म ले। धीरे - धीरे उन्होंने हमें हमारे कर्म से नहीं, जन्म से परिभाषित करना शुरू किया। और इस वर्गीकरण को सरकारी रिपोर्टों, जनगणनाओं और कानूनों के माध्यम से स्थायी बना दिया।
यहीं से एक शब्द, जो केवल पीड़ा का प्रतीक था, एक पहचान बन गया - ‘दलित पहचान’। जब किसी की पहचान को हीन शब्द से परिभाषित किया जाता है, तब वह समाज उस पहचान को धीरे-धीरे अवचेतन में स्वीकार कर लेता है। ठीक वैसे ही जैसे वे मुसलमान - जो कभी हिन्दू सनातनी थे - दबाव और कठोर यातनाओं के कारण इस्लाम अपनाने को मजबूर हुए; आज उनके वंशज उसी इस्लाम को पूरी तरह अपनाकर अपने ही पूर्वजों और अपनी जड़ों से जुड़ी मान्यताओं को अपन शत्रु मानने लगे हैं।
यह मनोवैज्ञानिक परिणाम है - जब किसी को उसकी जड़ों से काट दो, तो वह उस कटाव को ही अपनी पहचान मान लेता है। “दलित” कहे जाने वाला व्यक्ति टूटता नहीं, वह टूटे हुए समाज का दर्पण बन जाता है। उसके भीतर की पीड़ा केवल व्यक्तिगत नहीं रहती - वह उसे अपने पूर्वजों पर हुए अन्याय की स्मृति मानकर जीने लगता है। वहाँ तर्क नहीं, विश्वास प्रमुख हो जाता है। वह भूल जाता है - इतना बड़ा समाज अगर सदियों से कुचला गया होता, तो क्या उसकी संख्या इतनी विशाल रहती? क्या जो महापुरुष हुए, वे हो सकते थे?
पर अंग्रेज़ बहुत चालाक थे। उन्होंने केवल “दलित” कहकर समाज को मानसिक रूप से नहीं तोड़ा, बल्कि भारतीय अस्मिता के संवाहक वर्गों की छवि को विकृत किया - ब्राह्मण को धूर्त बताया, क्षत्रिय को शोषक कहा, वैश्य को लोभी ठहराया। और इस तरह सेवा, साहस और समर्पण - तीनों को कलंकित कर दिया। वहीं, बँटवारा करते हुए सवर्ण अथवा अगड़े का नाम देकर उन्हें - अहंकार का पर्याय बना दिया। उन्हें बताया गया - “तुम तो महान हो,” ऊँची जाति से हो - मनोविज्ञानिक रूप से यह एक नशे की तरह ऐसा चढ़ने लगा कि वे यह भूलने लगे कि श्रेष्ठता सेवा में है, त्याग, बलिदान और बड़े हृदय में हैं, स्वयं को बड़ा समझने के अहंकार में नहीं।
राजनीति ने एक वर्ग को हीन भावना में झोंक दिया, दूसरे को श्रेष्ठता के अहंकार में। एक हीन भावना से भरा, दूसरा अहंकार से। ताकि वे कभी एक न हो सकें। यह ऐसी व्यवस्था बनी जो मानवीय स्वभाव की कमजोरी से सदैव पोषित होती रही, और राष्ट्र के जनमानस में स्थायी बँटवारा कर गई।
अंग्रेजो की नीति थी - Divide and Rule. परंतु स्वतंत्र भारत में यह नीति एक नए रूप में जीवित रही - Divide and Rule through Words. (पहचान को शब्दों से गढ़ो - बाँटों और राज करो) मनुष्य को जातियों के नाम पर अल्प संख्यक, बहु-संख्यक, दलित - अगडा - पिछड़ा - अति पिछड़ा जैसे शब्दों से पहचानें बनीं, पहचान से वोट-बैंक बने, वोटबैंक से सत्ता बनी, और सत्ता चुनाव में उस घाव को बार-बार कुरेदने पर आसानी से मिलती है, पूरी व्यवस्था सामान्य नहि हो सकती क्योंकि राजनीति होने नहि देगी और सामान्य जन - सामान्य जानता है परन्तु ये नशा ऐसा है कि उतरेगा नहीं और कोई प्रयास करेगा तब दूसरा वर्ग - झुंड बनाकर दूसरे को डरना शुरू करेगा और वर्चस्व को बनाए रखने के लिए यह व्यवस्था राजनीति संगठन हटाने नहि देंगे।
विडंबना यह है कि कोई सच में समझना नहीं चाहता - और जो समझता है, उसे दूसरा समझने नहीं देता। यह ऐसी गाँठ है, जो सुलझाने के प्रयास में और भी उलझती जाती है। क्योंकि यह विभाजन बाहरी नहीं - अवचेतन में है। हममें से हर कोई कहीं न कहीं इस षड्यंत्र और शब्दों का शिकार हुआ है। कोई गर्व से कहता है - “मैं अगड़ा हूँ।” कोई पीड़ा से कहता है - “मैं दलित हूँ।” पर सच्चाई यह है कि दोनों ही बड़े षड्यंत्र के शिकार हैं, दोनों का दोहन हो रहा है होता रहेगा।
यह एक मानसिक यान्त्रिकी (Psychological Engineering) है। भारतीय समाज का सनातन सत्य यह है - यहाँ कोई जन्म से ‘हीन’ नहीं, कोई जन्म से ‘श्रेष्ठ’ नहीं। यही प्रकृति का नियम है, यही सनातन का धर्म। जो प्रकृति का नियम है, वही भारतीय संस्कृति है - जिसे कोई व्यक्ति नहीं, स्वयं प्रकृति परिभाषित करती है और करती रहेगी। हमारा समाज जन्म से नहीं, कर्म से चलता आया है। व्यवहार से परिभाषित हुआ है। श्री राम ने शबरी के बेर खाए - क्योंकि उन्हें उसकी जाति नहीं, उसकी भक्ति दिखी। वाल्मीकि ने रामायण लिखी - क्योंकि ज्ञान किसी कुल का नहीं, साधना का फल होता है। संत रविदास, कबीर, नामदेव - इन सबने दिखाया कि चेतना और ज्ञान जन्म से नहीं, साधना से मिलता है; समाज ने उन्हें पूजा और अपना आदर्श माना। जिन्हें आज राजनीति “दलित” कहकर अलग दिखाती है, वह वर्ग भारत के महानतम इतिहास का अभिन्न अंग है, भारतीय संस्कृति का पूरक है। महापुरुष कोई भी हों भारत की आत्मा हैं - उनका नाम सभी श्रद्धा से लेते है।
मनोविज्ञान कहता है - “जब किसी समूह को बार-बार किसी विशेष नाम से पुकारा जाए, तो वह वही बन जाता है।”यह पहचान का प्रभाव है - Identity Conditioning. जब किसी व्यक्ति को बार-बार “दलित” कहा गया, तो उसने खुद को पीड़ित मान लिया। जब किसी को बार-बार “अगड़ा” कहा गया, तो उसने खुद को श्रेष्ठ मान लिया। दोनों ही अपने मूल सनातन धर्म से दूर हो गए - एक अपनी क्षमता भूल बैठा, दूसरा अपना कर्तव्य। और यही सबसे बड़ा नुकसान है - क्योंकि जब करुणा मर जाती है, तब समाज केवल यांत्रिक भीड़ रह जाता है। शायद यह कठिन है - पर असंभव नहीं। हमें अपने मूल सिद्धांतों को बाहरी शोर के बिना समझना होगा। सोचना होगा - “दलित” शब्द क्या है? स्वयं को पीड़ित क्यों मानना है? क्यों किसी राजनेता या संगठन को यह अधिकार दें कि वह हमारे स्वाभिमान को हीन नाम से पुकारे ओर हम सहमति दे? स्वाभिमान से जीना है - पहचान की आत्मा का अपमान नहीं करना।
“अगड़ा” शब्द सत्ता नहीं, सेवा की जिम्मेदारी है। इसे श्रीराम के आदर्शों से सजाना है - अपने आचरण, व्यवहार और कर्तव्यों से। रजपूत समाज को ‘रज’ और ‘राज’ के भेद को समझना होगा। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य समाज को अपने अहंकार से स्वाभिमान की ओर लौटना होगा। उन्हें समझना होगा - षड्यंत्र का शिकार वे भी हैं। क्योंकि महानता कर्म से होती है, जन्म से नहीं। मनोविज्ञान और सूक्ष्म मनोयोग से यह सिद्ध होता है - सभी के प्रति सम्मान और कर्तव्य-बोध व्यक्ति की चेतना को ऊँचा बनाता है। स्वयं को ऊँचा या नीचा मानने से केवल विकार पैदा होता है, सद्भाव नहीं।
हमें शब्दों की सफ़ाई करनी होगी - जैसे गंगा अपनी धारा से गंदगी को धोती है, वैसे ही हमें अपनी चेतना से इन शब्दों की धूल झाड़नी होगी। क्योंकि यदि शब्द मैल से भर जाएँ, अर्थ खो दे, या अनर्थ देने लगें, तो समाज के रिश्ते कभी निर्मल नहीं रह सकते। जिस देश का दर्शन सेवा को परम धर्म कहता है, जो “वसुधैव कुटुम्बकम्” को जीवन का मंत्र मानता है, जो संस्कृति श्रीराम को धर्म का विग्रह मानती है, जहाँ ज्ञान, तप और त्याग बिना कोई आदर्श नहीं बनता - वहाँ कोई “दलित” पिछड़ा, अति पिछड़ा क़ैसे होगा ? क्या कुछ पैसे कम होने या संसाधनों की कमी व्यक्ति के स्वाभिमान को खा सकती है, दुर्भाग्य से आज हर लगभग समाज पिछड़ा घोषित होने के लिए आतुर है, ये कैसी बिडंबना है - जिस देश के मिट्टी में राजा स्वयं को “रज-पूत” - अर्थात मिट्टी का पुत्र - कहकर गौरव महसूस करते थे, वहाँ जनसामान्य स्वयं को “अगड़ा” मानकर क़ैसे इतरा सकता है?
जिस चेतना ने विश्व को शून्य दिया - जो न प्लस है न माइनस - उस राष्ट्र की चेतना में ऊँच-नीच का ज़हर नहीं होना चाहिए, और मुझे अभी भी लगता है कि हाँ, यह षड्यंत्र हो सकता है, यह मानसिक यान्त्रिकी हो सकती है - जो शब्दों के रूप में हमारी आत्मा पर जमी धूल की तरह है। हमें इस धूल को झाड़ना है, इसके साथ जीना नहीं है। अगर “शब्द मनुष्य को तोड़ सकते हैं, तो शब्द उसे जोड़ भी सकते हैं।” आज भारत को जोड़ने के लिए हमें कानून नहीं - सद्भाव चाहिए। हमें नारे नहीं - नैतिकता चाहिए। “ना दलित, ना अगड़ा” - बस एक भारतीय - जहाँ हर व्यक्ति स्वाभिमान और गरिमा से जिए, और अपने कर्तव्य-बोध से इस राष्ट्र की महानता में योगदान दे - एक-दूसरे के पूरक बनकर, रही बात रीति-रिवाज, त्योहार खान -पान की, तो भारत की पहचान ही विविधता है। सबसे पहले भारत एक और उस एकता में विविधता, भारत को भव्य, विराट और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनता है। जय हिन्द

किसी भी परिवार की समृद्धि, समाज की प्रगति और राष्ट्र की महानता -  की चाबी  युवाओं के भविष्य से  है। अगर इस ऊर्जा को उचित...
04/10/2025

किसी भी परिवार की समृद्धि, समाज की प्रगति और राष्ट्र की महानता - की चाबी युवाओं के भविष्य से है। अगर इस ऊर्जा को उचित अवसर, सही दिशा और प्रतिभा को प्रोत्साहन मिले, तो यही युवा राष्ट्र के भाग्य विधाता बन सकते हैं। लेकिन जब इनकी ऊर्जा अवसर के अभाव में कुण्ठित हो जाती है, जब सभी दरवाज़े बंद हो जाते हैं और दिशा धुंधली हो जाती है - तब वही शक्ति अपराध, भटकाव और विध्वंस का कारण भी बन सकती है।

आज के परिवेश में ग्रामीण युवाओं की प्रतिभा के लिए अवसर का घोर अभाव है, इनकी किसी को नहीं पड़ी, समाज हीनता राजनीति सब इनका दोहन कर रहें हैं जबकि इनको अवसर और सही दिशा देना कोई विकल्प नहीं, बल्कि हम सबकी जिम्मेदारी है। चाहे हम सामान्य नागरिक हों, समाज के प्रतिष्ठित लोग, सरकार या राजनीति की इच्छाशक्ति - सबकी जवाबदेही है कि हम युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक रास्ता दिखाएँ।

सोचिए- प्रतिभाओं को अवसर न देकर क्या हम भविष्य के भारत के साथ अन्याय नहीं कर रहे? क्या युवा दोषी हैं या अवसरहीन व्यवस्था?

थोड़ा गौर कीजिए - अमेरिका की ग्रेटा थनबर्ग जैसी बच्ची विश्व मंच पर खड़ी होकर अपनी बात कह सकती है। बड़े-बड़े घरानों के बच्चे अपनी प्रतिभा दिखा पाते हैं। क्या हमारी बेटियों और बच्चों में हुनर की कमी है?
फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है- उन्हें मौक़ा मिला, और हमारे युवाओं को नहीं।

अब सवाल सिर्फ़ युवाओं का नहीं है, सवाल भारत के भविष्य का है। युवा ऊर्जा को रोकना नहीं, दिशा देना है। कुण्ठा नहीं, उम्मीद पैदा करनी है।

हम सब की सामूहिक जबाबदेही है कि युवा ऊर्जा को अवसर दें , प्रोत्साहन दें, उनके लिए अवसर के लिए संघर्ष करें ताकि उचित अवसर सही मंच मिलेगा, तभी भारत का कल उज्ज्वल होगा।

#जवाबदेहकौन

SBSS – 2025In the quiet strength of simplicity lies the beauty of SBSS.This is not merely a program; it is a path - wher...
02/09/2025

SBSS – 2025

In the quiet strength of simplicity lies the beauty of SBSS.
This is not merely a program; it is a path - where society remembers its soul and daughters find their wings with dignity.

365 participants joined this year, not for reward, but for awakening. Every step, every choice, every transparent process reminded us that:

- When society stands together in purity, self-interest has no place, only collective strength shines.

SBSS is about responsibility turned into culture. It is about making our daughters, our sisters, and our future secure through awareness, honesty, and unity.

Gratitude to all participants, to the selfless team, and to society itself - because SBSS belongs to everyone.

Simplicity is our strength. Transparency is our promise. Responsibility is our identity.

सशक्त बेटी सुन्दर समाज केवल एक आयोजन नहीं यह घर - घर में स्त्री शक्ति के माध्यम से सुन्दर समाज की एक परिकल्पना है , एक स...
28/08/2025

सशक्त बेटी सुन्दर समाज केवल एक आयोजन नहीं यह घर - घर में स्त्री शक्ति के माध्यम से सुन्दर समाज की एक परिकल्पना है , एक संकल्प है, यह आयोजन व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, जन -जन को निःश्वार्थ कर्तव्य से स्वयं सहित संपूर्ण समाज की समृद्धि तक ले जाने का मंत्र है ।

26/06/2025

सशक्त बेटी – सुन्दर समाजसशक्त बेटी – सुन्दर समाजमैं सशक्त हूँ, मैं शिक्षित हूँ,नैतिक जागरूक, कर्तव्यों से युक्त हूँ।मेरा आचरण ही मेरी पहचान है,मेरा व्यक्तित्व — मेरा स्वाभिमान है।चिन्तन, मनन और आचरण से,जागे चेतना — उजाले जैसे।मेरा होना तभी सार्थक है,जब सबके जीवन में दीप जले।ज्योति बनकर बहें विचार,हर घर-आँगन में हों संस्कार।बीज बोध का मन में उपजे,सशक्त बेटियों से — सुंदर समाज!सशक्त बेटी – सुन्दर समाजसशक्त बेटी – सुन्दर समाज

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