08/09/2024
बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम पर 'बेग़मपुरा' के कारिंदों का प्रभाव...!
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भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास क्रम में पंजाब का बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। शिवालिक पहाड़ियों से सटे पंजाब के रोपड़ (रूपनगर) जिले में मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ों की विकसित 'सिंधु घाटी सभ्यता' के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं की अविभाजित पंजाब की धरती ही सिंधु घाटी सभ्यता की जननी रही है। अविभाजित पंजाब की धरती ही दस सिख गुरु साहिबान से लेकर बाबा बंदा सिंह बहादुर, बाबा जीवन सिंह, महाराजा रणजीत सिंह, ज्ञानी दित्त सिंह आदि महान क्रांतिकारियों तथा समाज सुधारकों की कर्मस्थली बनी।
दशवें पातशाह गुरु गोबिंद सिंह जी ने 13 अप्रैल, 1699 को बैसाखी के दिन एक राष्ट्र स्तरीय सभा का आयोजन कर अपने लाखों अनुयायियों के बीच में से 'पंज प्यारों' का चुनाव कर *'मानवता की आजादी'* तथा *'सच्चाई का राज'* स्थापित करने के लिए *'ख़ालसा पंथ'* की स्थापना भी पंजाब स्थित रोपड़ जिले के नजदीक आनंदपुर साहिब में ही की थी। यदपि, गुरु गोबिंद सिंह जी के आह्वान पर स्वेच्छा से अपना सर बलिदान करने के लिए आगे आने वाले 'पंज प्यारे' अलग-अलग जातियों और अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्र से थे। इनमें से भाई दया सिंह लाहौर (पंजाब) से, भाई धरम सिंह मेरठ (उत्तर प्रदेश) से, भाई मोहकम सिंह द्वारका (गुजरात) से, भाई साहिब सिंह बीदर (कर्नाटक) से और भाई हिम्मत सिंह पुरी (उड़ीसा) से थे। इन 'पंज प्यारों' में से चार प्यारे अत्याचार पीड़ित निम्न जातियों से संबंधित थे। गुरु गोबिंद सिंह जी ने इन सभी को इनकी जातीय पहचान से मुक्त करते हुए कहा था, *"इन गरीब सिखन को देऊं पातशाही। याद करें हमरी गुरुआई।। "* उन्होंने ब्राह्मणों द्वारा रोंपी गई जाति नामक पूंछ काटकर पुरुषों को 'सिंह' और महिलाओं को 'कौर' उपनाम से नवाजते हुए आह्वान किया था, *"मानस की जात सबै एकै पहिचानबो।"*
पंजाब के इसी रोपड़ जिले में आनंदपुर साहिब से मात्र 12 किलोमीटर दूर स्थित पिरथीपुर बुंगा (बुंगासाहिब) में 15 मार्च, 1934 को माता बिशन कौर की कोख से एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया 'कांशीराम'। कांशीराम के पिता सरदार हरि सिंह जी रविदासिया सिख थे। उनका पैतृक घर ख़्वासपुर गांव में था, जो रोपड़ से महज 3 किलोमीटर की दूरी में अवस्थित है। उन दिनों की स्थानीय परंपरा के अनुसार पहले बच्चे का जन्म ननिहाल में होता था, इसलिए पहले बच्चे के जन्म के समय माता बिशन कौर को उनके मायके पिरथीपुर बुंगा (बुंगासाहिब) भेज दिया गया। इस प्रकार, ननिहाल (बुंगासाहिब) में ही कांशीराम का जन्म हुआ।
रविदासिया सिख परिवार में जन्मे कांशीराम जी का बचपन रोपड़ में मौजूद सिंधु घाटी सभ्यता के खंडहरों के बीच हंसते-खेलते हुए बीता और समतावादी सिख सिद्धांतों तथा मानवता की रक्षा हेतु सिख गुरुओं की शहादत के इतिहास का अध्ययन-मनन करते हुए वह जवान हुए। शायद यही कारण था कि 'उनकी चेतना में अतीत की बगावतें बचपन से ही मौजूद थीं।'
'बहुजन नायक कांशीराम' पुस्तक के लेखक सतनाम सिंह लिखते हैं, "पंजाब में 'ख़ालसा पंथ' के प्रभाव की वजह से तथाकथित सनातनी ब्राह्मणवाद का विषैला पौधा पनप नहीं पाया। वहां ब्राह्मण समुदाय की स्थिति कोई ख़ास अच्छी नहीं थी। यही वज़ह थी कि बचपन में कांशीराम जी को ब्राह्मणवादी जातिवाद का दंश नहीं झेलना पड़ा।" स्वयं कांशीराम जी भी अपने एक भाषण में कह चुके हैं कि, "जब मैं छोटी उम्र में था तब अपने पंजाब में ब्राह्मण के लड़कों का डील-डौल तथा रहन-सहन देखकर मैं सोचता था कि ब्राह्मण बड़ी ही गरीब तथा पिछड़ी कौम होती है। लेकिन जब मैं शिक्षित हुआ और भारतीय समाज का खुली आँखों से अध्ययन किया तब मैंने इतिहास के पन्नों में पाया कि ब्राह्मण कौम गरीब नहीं है, बल्कि ये तो 85% शोषित-पीड़ित समाज के सिर पर सवार है।"
वर्ष 1956 में रोपड़ के पब्लिक कॉलेज से बी.एस.सी. पास करने के बाद प्रतिभाशाली युवक कांशीराम ने 1957 में 'सर्वे ऑफ इंडिया' की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। प्रशिक्षण (Training) के लिए उन्हें देहरादून बुलाया गया। प्रशिक्षण के दौरान सभी प्रशिक्षणार्थियों को एक बॉण्ड भरने के लिए कहा गया। इस बॉण्ड में एक निश्चित समय सीमा तक 'सर्वे ऑफ इंडिया' की नौकरी करना अनिवार्य था। सभी प्रशिक्षणार्थियों ने उस पर हस्ताक्षर किए, लेकिन जन्मजात 'आजाद' कांशीराम ने हस्ताक्षर करने से इनकार करते हुए कहा, "मैं सरकार का बंधुआ मजदूर बनने से बेहतर समझता हूं कि इस नौकरी को छोड़ दूं।" इस प्रकार, 'सर्वे ऑफ इंडिया' का कार्यभार संभालने से पहले प्रशिक्षण काल में ही उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी।....कुछ ही दिनों बाद पूना, महाराष्ट्र में उनकी नौकरी लग गई। पूना में कांशीराम जी 'किर्की एक्सप्लोसिव रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेट्री' (ई.आर.डी.एल.) में अनुसंधान सहायक पद पर नियुक्त हुए।
मूलनिवासी संतों, गुरुओं ने पहले दमनकारी मुगल-ब्राह्मण गठजोड़ के खिलाफ संघर्ष किया। उसके बाद आधुनिक युग में जन्मे महापुरुषों ने षड्यंत्रकारी ब्रिटिश-ब्राह्मण गठजोड़ से मूलनिवासियों की आजादी का कारवाँ आगे बढ़ाया। इन अनवरत संघर्षों के बाद 15 अगस्त, 1947 को ब्रिटिश हुक्मरान भारत छोड़ने को राजी हुए, लेकिन ब्रिटिश हुकूमत द्वारा तथाकथित स्वतंत्रता के नाम पर जो सत्ता हस्तान्तरित की गई वह मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ों के हाथों में न आकर ब्रिटिशों के अनन्य सहयोगी रहे आर्य ब्राह्मणों के हाथों में ही केंद्रित हो गई। परिणामस्वरूप, इस 'ब्राह्मण राज' (स्वराज) में एक बार फिर से देश के सभी संस्थानों का तेजी से ब्राह्मणीकरण किया जाना शुरू हो गया और मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ों के ऊपर ब्राह्मणवाद द्वारा थोपी गई सदियों पुरानी श्रेणीबद्ध निम्नता और ज़लालत यथावत बनी रही। ऐसे समय में जरूरत थी एक ऐसे अगुआ (नेता) की जो दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी की तरह विशाल हृदय के साथ अत्याचार पीड़ित लोगों को राष्ट्रीय स्तर पर लामबंद करने के लिए आगे आए और उनका हौसला बुलंद कर दमनकारी 'ब्राह्मण राज' के विरुद्ध आजादी का बिगुल फूंक सके।
*घटना जो चिंगारी बनी* : महाराष्ट्र में दलित जागरण को देखते हुए ई.आर.डी.एल. में बुद्ध और अम्बेडकर जयंती पर छुट्टी होती थी, लेकिन कुछ ब्राह्मणवादी अधिकारियों ने सन 1963 में इन दोनों छुट्टियों को समाप्त कर इन्हें क्रमशः दीपावली और तिलक जयंती में परिवर्तित कर दिया। ई.आर.डी.एल. में पदस्थ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी दिनाभाना ने जब इस घटना का लिखित रूप में विरोध किया, तो ब्राह्मणवादी अधिकारियों ने उनसे उनकी नौकरी छीन ली।...जब यह बात कांशीराम जी को पता चली तो उन्होंने दिनाभाना को पास बुलाकर उनसे सारे घटनाक्रम की जानकारी ली।...दिनाभाना के अंदर अपने अधिकारों तथा मूलनिवासी महापुरुषों के प्रति दृढ़ इच्छाशक्ति और बहादुरी देखकर मान्यवर कांशीराम जी उनसे प्रभावित हुए। फिर उन्होंने कहा, जो अपने अधिकारों के लिए बहादुरी से लड़ते हैं, वे सभी हमारे अपने हैं। अब यह लड़ाई तुम अकेले की नहीं, मेरी भी है, बल्कि हम सबकी है।
सतनाम सिंह आगे लिखते हैं, "उस रात कांशीराम जी सो नहीं पाए। बार-बार एक ही सवाल मन में गूंजता रहा, इस ब्राह्मण राज में क्या हम आज भी आजाद हैं? इसी उधेड़बुन में सारी रात बीत गई। वे इस विवाद को रक्षा मंत्रालय तक लेकर गए। रक्षा मंत्रालय ने इंसाफ किया। दोषी अधिकारियों की खिंचाई की गई। बुद्ध और अम्बेडकर की जयंतियां फिर से घोषित की गईं। दिनाभाना की नौकरी भी बहाल की गई।"...इस घटना के बाद से कांशीराम जी उखड़े-उखड़े रहने लगे। दिन-रात उनके भीतर यही सवाल गूंजते कि, हमारा इस देश में क्या वजूद है? हमारे अधिकारों और गरिमा की रक्षा करने की किसे चिंता है? हमारी मांगों की सुनवाई कहाँ हो सकती है? न जज हमारे, न अधिकारी हमारे और न मंत्री हमारे! अपने दुखी मन की शांति और अपने अंदर उठ रहे सवालों के जवाब के लिए वे डॉ. अम्बेडकर का साहित्य पढ़ने लगे। निरंतर अध्ययन के बाद अम्बेडकर साहित्य में उन्हें अपने सवालों का जवाब मिला....."तुम्हें वही रुख अपनाना चाहिए जो बुद्ध ने अपनाया था। तुम्हें वही रुख अपनाना चाहिए जो गुरु नानक ने अपनाया था। तुम्हें न सिर्फ शास्त्रों को त्यागना चाहिए, बल्कि उनके प्राधिकार को भी नकार देना चाहिए, जैसा कि बुद्ध और गुरु नानक ने किया था। तुम्हारे अंदर हिन्दुओं को यह कहने का साहस होना चाहिए कि उनमें कुछ गलत है तो वह है उनका धर्म – वह धर्म जिसने उनमें जातीय पवित्रता की धारणा पैदा की है।"....इस घटना के बाद कांशीराम जी के अंदर जो चिंगारी पैदा हुई थी, दिन प्रति दिन वह आग का विकराल रूप धारण करती चली गई।"
मान्यवर कांशीराम जी पंजाब में 'निम्नों में भी निम्नतम लोगों की आजादी' और 'मानव गरिमा' की रक्षा हेतु की गई 'सिख क्रांति' से तो पहले ही अवगत थे। इसलिए पूना में रहते हुए उन्होंने महाराष्ट्र में फुले, शाहू, अम्बेडकर द्वारा किए गए 108 वर्ष लंबे संघर्षों का गहन अध्ययन करना शुरू कर दिया। इसके बाद उन्होंने देश के दूसरे राज्यों में बहुजन महापुरुषों द्वारा अत्याचार पीड़ित लोगों की मुक्ति हेतु किए गए संघर्षों का अध्ययन किया। अंततः उन्हें यह बात समझ में आई कि, "इस देश में ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना (जाति व्यवस्था) के आधार पर मूलनिवासी लोगों को 6000 से ज्यादा जातियों में तोड़ा गया है। जातियों में तोड़कर इन्हें लंबे समय तक देश की शासन-सत्ता से दूर रखा गया है। इसलिए यह लोग अभी तक घोर सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक असमानता का शिकार हो ब्राह्मणवादी अन्याय, अत्याचार सहने को मजबूर हैं।"
तत्पश्चात उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़कर ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने की योजना बनानी शुरू कर दी। अपनी सरकारी नौकरी के बारे में बताते हुए कांशीराम जी ने एक बार कहा था, "1964 में जैसे ही मैंने समाज के लिए काम करने का निश्चय किया उस दिन के बाद मैं कभी अपनी नौकरी पर, कार्यालय में नहीं गया। मैंने इस्तीफा तो नहीं दिया था, मगर नौकरी पर भी नहीं गया। मुझे मेरे कार्यालय से कुछ रकम भी हासिल करनी थी, मगर मैं वह रकम लेने के लिए भी उस कार्यालय में नहीं गया।" एक बार कांशीराम जी ने बताया था कि, "जब मैंने नौकरी छोड़ी उस समय महाराष्ट्र में अम्बेडकरवादी आंदोलन का केंद्र 'रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया' थी। इसलिए शुरुआती दिनों में मैं अपने अम्बेडकरवादी मित्रों के साथ 'आरपीआई' से जुड़ गया। लेकिन बाबा-बाबा करने वाले अम्बेडकरवादी नेता 1971 में जब बापू-बापू करते गांधीवादी कांग्रेस के चरणों में लेट गए तो एक बार फिर मुझे नए सिरे से सोचना पड़ा।" अम्बेडकरवादियों से निराशा हाथ लगने के बाद उन्होंने 'The Chamcha Age : An Era of the Stooge' नामक किताब लिखकर 24 सितंबर, 1982 को पूना पैक्ट की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रकाशित की थी। इस ऐतिहासिक पुस्तक में उन्होंने बहुजन द्रविड़ समाज में चार प्रकार के चमचों की बड़ी यथार्थ व्याख्या की थी।
मान्यवर कांशीराम जी से पहले अत्याचार पीड़ित लोगों का संघर्ष ब्राह्मणवादी सत्ताधीशों से *'सामाजिक न्याय'* की मांग तक सीमित होकर रह गया था। इसलिए मान्यवर कांशीराम जी को एक ऐसे सूत्र की तलाश थी जो इन अत्याचार पीड़ित लोगों को एक निश्चित सामाधान की ओर लेकर जाए। अंततः उन्हें वह सूत्र *'गुरुग्रन्थ साहिब'* में *'बेग़मपुरा'* की शक्ल में मिला। मान्यवर कांशीराम जी के शब्दों में *"मेरा घोषणा पत्र गुरुग्रन्थ साहिब में दर्ज है।"* गुरु रविदास की दृष्टि में एक ऐसा देश *"जहां कोई दुख न हो। कोई कष्ट और चिंता न हो। कोई संकट और टैक्स न हो। कोई धार्मिक आतंक, कोई कलंक और पतन न हो। जहां सबको गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पौष्टिक आहार मिले। जहां हमेशा शांति और सुरक्षा बनी रहे। जहां इंसानों का कोई दूसरा या तीसरा दर्जा न हो। जहां सब धनवान और संतुष्ट हों। जहां सब अपनी मर्जी और मुक्त-भाव से विचरण कर सकें। "* गुरु रविदास की यही 'बेग़मपुरा दृष्टि' बाद में सिख गुरुओं का मिशन बनी।
जैसा कि, गुरु नानक ने सिख पंथ के संस्थानीकरण के दौरान "निम्नों में भी निम्नतम" घोषित किए गए अत्याचार पीड़ित लोगों की मुक्ति को ध्यान में रखते हुए कहा था, *"नीचा अंदरि नीच जाति नीची हू अति नीचु ॥ नानकु तिन कै संगि साथि वडिआ सिउ किआ रीस ॥ जिथै नीच समालीअनि तिथै नदरि तेरी बखसीस।।"* दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी ने भी अपने पूर्वगामी गुरुओं का अनुकरण करते हुए तहिया किया था कि, *"जिनकी जाति और कुल माहीं, सरदारी नहीं भई कदाहीं। इनहीं को सरदार बनाऊँ, तबै गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ।।"* इस प्रकार, उन्होंने सन 1699 में 'निम्नों में भी निम्नतम' घोषित किए गए अत्याचार पीड़ित लोगों को जाति मुक्त कर उन्हें पातशाही सौंपने का ऐतिहासिक काम किया था। ठीक उसी प्रकार, मान्यवर कांशीराम जी ने भी ब्राह्मणवादी व्यवस्था में 'निम्न से निम्नतम' घोषित किए गए अत्याचार पीड़ित लोगों की मुक्ति हेतु उन्हें *'हुक्मरान कौम'* बनाना अपना लक्ष्य निर्धारित किया।
सदियों से अत्याचार पीड़ित लोगों को शासक कौम बनाना बिल्कुल भी आसान काम नहीं होता। तभी तो गुरु गोबिंद सिंह जी कहते थे, *"कोई किसी को राज न देहै। जो लेहै निज बल से लेहै।।"* इन अत्याचार पीड़ित लोगों का हौसला बुलंद कर इन्हें शक्तिशाली फ़ौज में परिवर्तित करने के लिए गुरु गोबिंद सिंह जी कहते थे कि, *"चिड़ियां नाल मैं बाज तुड़ावां, गीदडां नू मैं शेर बनावां। सवा लाख से एक लड़ावां, ता गोबिंद सिंह नाम धरावां।।"* संतों, गुरुओं की इन्हीं बातों को अपना वैचारिक आधार बनाकर मान्यवर कांशीराम जी 'ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना' के आधार पर तोड़े गए मूलनिवासी लोगों में भाईचारा बनाकर उन्हें बहुजन समाज बनाने और उनमें एकता बल (Strength) पैदा कर अंततः उन्हें *'हुक्मरान कौम'* बनाने के अपने मिशन में जुट गए।
इस प्रक्रिया में, जिस प्रकार पांचवें पातशाह गुरु अर्जुन ने फरीद, नामदेव, कबीर, रविदास आदि 36 संतों, गुरुओं के शबदों को एकत्र कर समानता का हिमायती *"गुरुग्रन्थ साहिब"* का संकलन किया था। ठीक उसी प्रकार, मान्यवर कांशीराम जी ने भारत के अलग-अलग हिस्सों में ब्राह्मणवाद के विरुद्ध सामाजिक क्रांति का उद्घोष करने वाले बुद्ध, कबीर, रविदास, फुले, शाहू, अम्बेडकर, बिरसा, पेरियार, अयंकाली, नारायण गुरु, हरिचंद ठाकुर, गुरुचंद ठाकुर, स्वामी अच्छूतानंद, सर छोटू राम आदि संतों, गुरुओं, महापुरुषों के संघर्षों को भी अपने मिशन में शामिल किया।
इस तरह, सन 1977 तक मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ समाज के अधिकारी-कर्मचारियों को जागरूक कर उन्होंने डॉ. अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस 6 दिसंबर, 1978 को सर्वप्रथम 'The All India Backward (Sc/St, Obc) & Minority Communities Employee Federation' (बामसेफ़) नामक एक संस्था की स्थापना की। यह गैर-राजनीतिक, गैर-संघर्षनात्मक और गैर-धार्मिक संस्था थी। इसका मुख्य काम मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ समाज को बौद्धिक रूप से जाग्रत करना था। सामुदायिक उन्नति हेतु सिखों के *'दसवंध'* (कमाई का दसवां भाग) दान करने की अनिवार्य परंपरा की तर्ज पर मान्यवर कांशीराम जी ने *'बामसेफ'* के सदस्यों के लिए *'Pay Back To Society'* का सिद्धांत प्रतिपादित कर समाजोन्नति के लिए उन्हें 3T = Time (समय), Talent (हुनर), Treasury (कोष) का दान करने को प्रेरित किया।
तत्पश्चात बामसेफ की स्थापना के तीसरे वर्ष 6 दिसंबर, 1981 को उन्होंने *'दलित शोषित समाज संघर्ष समिति'* (Ds-4) की स्थापना की। यह कोई राजनीतिक पार्टी नहीं, अपितु संघर्ष और विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा बहुजन द्रविड़ समाज में जागृति पैदा करने के लिए बनाया गया एक सामाजिक संगठन था। इसमें छात्र, महिलाएं, नौजवान और भूमिहीन मजदूरों को जोड़कर बड़े पैमाने पर उन्हें मूलनिवासी संतों, गुरुओं, महापुरुषों के समतावादी दर्शन और संघर्षों से अवगत कराया गया।
Ds-4 का प्रथम मुख्य कार्यक्रम 'साईकिल मार्च' था। इसके जरिये बहुजन द्रविड़ समाज में *"छोटे-छोटे साधनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल"* करने की अवधारणा विकसित की गई। सर्वप्रथम 40 दिन (15-3-1983 से 24-4-1983) तक चलने वाले इस कार्यक्रम में लगभग तीन लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया। यह कार्यक्रम मान्यवर कांशीराम जी के जन्म दिन 15 मार्च, 1983 को नई दिल्ली से प्रभावशाली साईकिल रैली के रूप में "छोटे-छोटे साधनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल" करने के नारे के साथ शुरू हुआ था। इस साईकिल मार्च के दौरान मान्यवर कांशीराम जी ने नारा दिया था, *"दो पहिया दो पैरों का, साथ नहीं है गैरों का।"* मान्यवर कांशीराम जी के कठिन परिश्रम तथा बामसेफ और डीएस-4 द्वारा संचालित किए गए जागृति कार्यक्रमों के कारण देश भर के बहुजन द्रविड़ समाज में अपने अधिकारों और स्वाभिमान को प्राप्त करने के प्रति बड़े पैमाने पर जागृति पैदा हुई। परिणामस्वरूप, अब बहुजन द्रविड़ समाज की प्रभावी राजनीति के लिए समाज की ओर से एक राजनीतिक दल के गठन की मांग उठनी तेज हो गई थी।
गुरु गोबिंद सिंह द्वारा आनंदपुर साहिब में 13 अप्रैल, 1699 को देशभर के अनुयायियों को आमंत्रित कर 'खालसा राज' (सच्चाई का राज) हेतु *'ख़ालसा पंथ'* की स्थापना के बाद, आधुनिक भारत में यह पहला अवसर था जब किसी व्यक्ति ने राष्ट्रीय स्तर पर अत्याचार पीड़ित लोगों की मुक्ति के लिए उन्हें इतने बड़े पैमाने पर आंदोलित और लामबंद कर केंद्र में 'बहुजन राज' की स्थापना हेतु हुंकार भरी थी।
छठे पातशाह गुरु हरगोबिंद जी कहते थे, *"राज बिना नहीं धरम चले है। धरम बिना सब दले मले हैं।।"* उन्होंने ज़ालिम के खिलाफ सिख साम्राज्य की नींव रखते हुए *'मीरी-पीरी'* सिद्धांत की शुरुआत की थी। मीरी यानी राजकीय प्राधिकार और पीरी यानी आध्यत्मिक प्राधिकार। ठीक इसी प्रकार, मान्यवर कांशीराम जी का भी मानना था कि, *"जिनका राजपाठ नहीं होता उनके साथ हमेशा अन्याय, अत्याचार होता है। अगर इन अन्याय, अत्याचारों से मुक्ति चाहिए तो हमें इस देश का शासक बनना होगा।"*
इस प्रक्रिया में, बहुजन द्रविड़ समाज की चाहत को देखते हुए मान्यवर कांशीराम जी ने डॉ. अम्बेडकर के जन्मदिन 14 अप्रैल, 1984 को दिल्ली में *'बहुजन समाज पार्टी'* के गठन की घोषणा कर दी। 22 से 24 जून, 1984 तक दिल्ली के लाल किले के सामने वाले मैदान में पार्टी का प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ। जिसमें देशभर के कार्यकर्ता, अनुयायी उपस्थित हुए। इसके बाद भारतीय चुनाव आयोग से पार्टी का विधिवत पंजीकरण भी करवा लिया गया। मान्यवर कांशीराम जी द्वारा स्थापित वही बहुजन समाज पार्टी बाद में देश की तीसरी राष्ट्रीय पार्टी बनी।"
"बीएसपी के गठन के बाद एक आदर्श सामाजिक परिवर्तन हेतु जनजागृति करने के लिए मान्यवर कांशीराम जी ने धरना प्रदर्शन, महापुरुषों की जयंतियों पर मेले और साईकिल मार्च जैसे कार्यक्रम तैयार किये। 15 अगस्त, 1988 से 15 अगस्त, 1989 तक उन्होंने निम्नलिखित 5 सूत्री कार्यक्रम शुरू किए :- 1) आत्मसम्मान के लिए संघर्ष, 2) स्वधीनता के लिए संघर्ष, 3) समानता के लिए संघर्ष, 4) विखरे समाज में भाईचारा स्थापित कर जातिवाद के उच्छेद के लिए संघर्ष, 5) अस्पृश्यता, अन्याय, अत्याचार और धार्मिक आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष।
इस 5 सूत्रीय कार्यक्रम के तहत पेरियार के जन्मदिन 17 सितंबर, 1988 से भारत की पांच दिशाओं से 5 साईकिल मार्च की शुरुआत की गई। यथा, 1) कन्याकुमारी (तमिलनाडु) से नई दिल्ली के लिए, 2) कोहिमा (नागालैंड) से नई दिल्ली के लिए, 3) कारगिल (कश्मीर) से नई दिल्ली के लिए, 4) पुरी (उड़ीसा) से नई दिल्ली के लिए, और 5) पोरबंदर (गुजरात) से नई दिल्ली के लिए। उक्त सभी साईकिल यात्राएं 27 मार्च, 1889 को एक विशाल रैली के रूप में दिल्ली में एकत्रित हुईं। दिल्ली में लाखों लोगों ने इस रैली का हार्दिक स्वागत किया था।"
'बहुजन नायक' अख़बार के पत्रकार तथा बहुजन आंदोलन के सहयोगी रहे आनंद रहाटे जी मान्यवर कांशीराम जी के बारे में बताते हुए लिखते हैं, "डॉ. अम्बेडकर के परिनिर्वाण के बाद आंदोलन को एक सक्षम नेता मिला था। वह एक पल के लिए भी आराम नहीं करते और बिना थके लगातार काम करते रहते थे। कोलकाता की रैली में मैं उनके साथ था और मैंने देखा कि रैली होने से पहले शाम को ही वह रैली स्थल पर चले गए और काफी देर रात तक वहां सारी व्यवस्था देखते रहे। रैली स्थल से कमरे पर लौटने पर उन्होंने एक कंबल लिया और जूता उतारे बिना ही सो गए। सोने से पहले उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे पांच बजे जगा देना। कांशीराम जी ऐसे नेता थे, जो एक आम कार्यकर्ता की तरह काम करते थे।" मान्यवर कांशीराम जी का मानना था कि, "हमें सामूहिक रूप से समाजसेवा कार्य में जुट जाना चाहिए। पैसे की आज कोई कमी नहीं है। कमी है तो सच्ची तमन्ना की। अगर दिल में तमन्ना सच्ची है तो हर समस्या अपने आप सुलझती चली जाती है। बिना तमन्ना के सफलता मिलना बहुत मुश्किल है।....आगे चलकर उनकी यही बातें कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत बनीं।
मान्यवर कांशीराम जी ने मूलनिवासी संतों, गुरुओं, महापुरुषों से प्रेरणा लेते हुए अपनी कुशल रणनीतियों के बल पर ब्राह्मणवादी सामाजिक संरचना को तोड़ने और गुलाम बनाये गए अत्याचार पीड़ित लोगों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक मुक्ति हेतु आजीवन संघर्ष किया। उन्होंने अपनी कुशल रणनीतियों से समाज की *'होऊ सकत नाही' मानसिकता में परिवर्तन लाकर 'होऊ सकत है'* की भावना विकसित की। उनके इन संघर्षों की बदौलत करोड़ों लोगों के जीवन में अमूलचूल बदलाव आया। फलस्वरूप, अत्याचार पीड़ित बहुजन द्रविड़ समाज लामबंद हुआ और ब्राह्मणवाद का गढ़ कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश (आर्यावर्त) में बहुजन समाज पार्टी की चार बार सरकारे बनीं। वह चाहते तो स्वयं मुख्यमंत्री बन सकते थे, लेकिन उन्होंने ब्राह्मणवादी व्यवस्था में "निम्नों में भी निम्नतम" घोषित की गई महिला वर्ग में से एक दलित महिला मायावती को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनाकर समानता की मिसाल पेश की। उत्तर प्रदेश के अलावा 13 राज्यों की विधान सभाओं और कई लोकसभा क्षेत्रों में भी बहुजन समाज पार्टी का खाता खुला।
इस प्रकार, देश की केंद्रीय सत्ता में अत्याचार पीड़ित मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ों का 'राज' स्थापित करने हेतु संघर्ष पथ पर आगे बढ़ते हुए 8 अक्टूबर, 2006 की मध्य रात्रि में मान्यवर कांशीराम जी का विवादित देहांत हो गया।
भारतीय राजनीति में मान्यवर कांशीराम जी का पदार्पण एक युगान्तकारी घटना थी। मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ों की मुक्ति के लिए उन्होंने जो प्रयास किए वह अद्वितीय हैं, लेकिन हमें इस बात का भी एहसास है कि मूलनिवासी संतों, गुरुओं, महापुरुषों की विचारधारा को दरकिनार करने वाली मायावती की अगुआई में मान्यवर कांशीराम जी की 'बहुजन समाज पार्टी' आज विप्रो की रीति में फंसकर ब्राह्मणवाद के खारे समुद्र में गर्क हो चुकी है।
मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ों की आजादी का कारवां अभी अधूरा है, क्योंकि तथाकथित स्वतंत्रता के 77 वर्षों बाद भी बहुजन द्रविड समाज घोर सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक असमानता का शिकार बना जानवरों से भी बदतर जीवन जीने को मजबूर है। लेकिन फिर भी, इस बात पर संतोष किया जा सकता है कि हमारे संतों, गुरुओं, महापुरुषों ने मूलनिवासियों की आजादी की जो मशाल जलाई थी वह अभी बुझी नहीं है, बल्कि सुदूर उत्तर से लेकर नीचे दक्षिण तक, और पूर्व से लेकर पश्चिम तक अभी भी उसकी ज्योत प्रज्वलित है। संग्राम अभी जारी है। कई लोगों ने भट्टी जला रखी है; फिर भी, यह आग अभी तक वह भट्टी नहीं बना पाई जो ब्राह्मणवाद रूपी कूड़े-करकट को जलाकर भारत को सोने जैसा शुद्ध कर सके। इसलिए बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम जी की अनुपस्थिति में संतों, गुरुओं, महापुरुषों के 'बेग़मपुरा मिशन' को मंजिले मकसूद तक ले जाने की जिम्मेदारी अब ऊर्जावान, मिशनरी बहुजन द्रविड़ युवाओं के कंधों पर है। आज हम बहुजन द्रविड पार्टी के माध्यम से मूलनिवासी संतों, गुरुओं, महापुरुषों के *'बेग़मपुरा मिशन'* को आगे बढ़ा रहे हैं। हम ऊर्जावान, मिशनरी बहुजन द्रविड़ युवाओं से उम्मीद करते हैं कि वे भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को समझते हुए मूलनिवासी बहुजन द्रविड़ों की आजादी के इस महासंग्राम में स्वेच्छा से भागीदारी निभाने के लिए आगे आएंगे। धन्यवाद!
संतों, गुरुओं के बेग़मपुरा मिशन में...
एडवोकेट अशोक सिंह
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
बहुजन द्रविड पार्टी, नई दिल्ली
+91 9717366805