16/07/2023
अपने इतिहास और संस्कृति पर गर्व करिए। हम वामपंथियो के लिखे इतिहास पर भरोसा करते हैं, अपने संस्कृति को हीन समझते हैं।
ईसा से 600 साल पहले आचार्य कणाद ने परमाणु संरचना का आधार रखा, अणु की खोज की। डाल्टन ने परमाणु सिद्धांत प्रस्तुत किया और कहा कि मैंने भारतीय ग्रंथों को पढ़कर इसे बनाया।
आइंस्टीन, न्यूटन, रदरफोर्ड, ग्राहम बेल, टेस्ला, डाल्टन, गैलीलियो, नील्स बोर, एडिसन, डार्विन, एनरिको फर्मी समेत तमाम वैज्ञानिकों की सारी खोज 17 वीं शताब्दी से शुरू हुई ।
15वीं शताब्दी तक आक्रांताओं की तरह अंग्रेज भी जाहिलो की तरह दुनिया में मारकाट करते थे। 16 वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में प्रवेश किया।
भारतीय ग्रंथो पुस्तकों को अंग्रेजों ने पढ़ना शुरू किया। मैकाले एक तरफ गुरुकुल शिक्षा और शोध संस्थानों को उन्नति के रास्ते पर बाधक बोल बंद कराता रहा, दूसरी तरफ गोरों को संस्कृत पढ़ाया गया ।
गीता से लेकर उपनिषद तक का अनुवाद अंग्रेजो, फ्रेंच, जर्मनी द्वारा करवाया गया। पश्चिम देशों के विश्व विद्यालयों में संस्कृत केंद्र खोले गए।
वहीं से वैज्ञानिक खोज की भरमार हो गई। हर वैज्ञानिक ने किसी न किसी भारतीय पुस्तक या ऋषि के खोज का अनुसरण किया।
भारतीय अंग्रेजी में मस्त होकर अपनी भाषा और ऋषियों का मजाक बनाते रहे और पश्चिमी देशों ने भारतीय शास्त्रों से बहुमूल्य रत्न निकाले और हमने शास्त्रों को पढ़ने वालों को जाहिल गंवार घोषित किया।
बोधायन, आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य, कणाद, वहारमिहिर, नागार्जुन, सुश्रुत, चरक, पतंजलि के शोध को अपना आधार बनाकर अंग्रेज वैज्ञानिक, डॉक्टर, सर्जन बन गए।
हमने से कितने लोगों को अपने वैज्ञानिकों के बारे में जानकारी हैं ?