28/02/2026
आज डिजिटल फ्रॉड महामारी की तरह फैल चुका है। हर दिन कोई न कोई आम आदमी अपनी मेहनत की कमाई खो रहा है—खासकर वरिष्ठ नागरिक, गरीब और कम शिक्षित लोग।
ऐसे समय में कुछ पुलिस अधिकारी कॉलेजों और चुने हुए संस्थानों में जाकर जागरूकता कार्यक्रम करते दिखाई देते हैं। मंच सजते हैं, फोटो खिंचती हैं, सम्मान मिलते हैं और सोशल मीडिया पर सराहना भी होती है।
लेकिन असली सवाल यहीं खड़ा होता है—
क्या जागरूकता वहीं दी जा रही है जहाँ जोखिम सबसे कम है?
क्या उन लोगों तक कोई पहुँच रहा है जो डिजिटल जानकारी के अभाव में सबसे आसान शिकार बनते हैं?
क्या उन बस्तियों, गाँवों और वरिष्ठ नागरिक समूहों तक ऐसे अभियान पहुँचते हैं जहाँ सच में इसकी सबसे ज़्यादा जरूरत है?
यदि अपराध रोकना ही उद्देश्य है, तो प्राथमिकता उन तक क्यों नहीं जो सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं?
या फिर यह सब सीमित, सुरक्षित और दिखाई देने वाले मंचों पर किया जाने वाला एक ऐसा उपक्रम है, जो वास्तविक समाधान से अधिक छवि निर्माण पर केंद्रित है?
जागरूकता का असली मूल्य तालियों से नहीं, बल्कि उस गरीब और बुजुर्ग व्यक्ति की बची हुई जमा-पूंजी से आँका जाना चाहिए—जिसका पैसा अब तक ठगों के हाथ में जा चुका है।