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17/09/2020

एक अच्छी और बहुत खुबसूरत कहानी "

30/01/2017

श्रीराम ने सरयू नदी में स्वयं की इच्छा से समाधि ली थी

यह रहस्य बहुत कम लोगों को मालूम है कि श्रीराम का अवसान कैसे हुआ। दरअसल यह एक रहस्य है जिसका उल्लेख सिर्फ पौराणिक धर्म ग्रंथों में ही मिलता है।
पद्म पुराण के अनुसार भगवान श्रीराम ने सरयू नदी में स्वयं की इच्छा से समाधि ली थी। इस बारे में विभिन्न धर्मग्रंथों में विस्तार से वर्ण मिलता है। श्रीराम द्वारा सरयू में समाधि लेने से पहले माता सीता धरती माता में समा गईं थी और इसके बाद ही उन्होंने पवित्र नदी सरयू में समाधि ली। पद्म पुराण में दर्ज एक कथा के अनुसार, एक दिन एक वृद्ध संत भगवान राम के दरबार में पहुंचे और उनसे अकेले में चर्चा करने के लिए निवेदन किया। उस संत की पुकार सुनते हुए प्रभु राम उन्हें एक कक्ष में ले गए और द्वार पर अपने छोटे भाई लक्ष्मण को खड़ा किया और कहा कि यदि उनके और उस संत की चर्चा को किसी ने भंग करने की कोशिश की तो उसे मृत्युदंड प्राप्त होगा।
लक्ष्मण ने अपने ज्येष्ठ भ्राता की आज्ञा का पालन करते हुए दोनों को उस कमरे में एकांत में छोड़ दिया और खुद बाहर पहरा देने लगे। वह वृद्ध संत कोई और नहीं बल्कि विष्णु लोक से भेजे गए काल देव थे जिन्हें प्रभु राम को यह बताने भेजा गया था कि उनका धरती पर जीवन पूरा हो चुका है और अब उन्हें अपने लोक वापस लौटना होगा।
अभी उस संत और श्रीराम के बीच चर्चा चल ही रही थी कि अचानक द्वार पर ऋषि दुर्वासा आ गए। उन्होंने लक्ष्मण से भगवान राम से बात करने के लिए कक्ष के भीतर जाने के लिए निवेदन किया लेकिन श्रीराम की आज्ञा का पालन करते हुए लक्ष्मण ने उन्हें ऐसा करने से मना किया। ऋषि दुर्वासा हमेशा से ही अपने अत्यंत क्रोध के लिए जाने जाते हैं, जिसका खामियाजा हर किसी को भुगतना पड़ता है, यहां तक कि स्वयं श्रीराम को भी।
लक्ष्मण के बार-बार मना करने पर भी ऋषि दुर्वासा अपनी बात से पीछे ना हटे और अंत में लक्ष्मण को श्री राम को श्राप देने की चेतावनी दे दी। अब लक्ष्मण की चिंता और भी बढ़ गई। वे समझ नहीं पा रहे थे कि आखिरकार अपने भाई की आज्ञा का पालन करें या फिर उन्हें श्राप मिलने से बचाएं।
लक्ष्मण हमेशा से अपने ज्येष्ठ भाई श्री राम की आज्ञा का पालन करते आए थे। पूरे रामायण काल में वे एक क्षण भी श्रीराम से दूर नहीं रहे। यहां तक कि वनवास के समय भी वे अपने भाई और सीता के साथ ही रहे थे और अंत में उन्हें साथ लेकर ही अयोध्या वापस लौटे थे। ऋषि दुर्वासा द्वारा भगवान राम को श्राप देने जैसी चेतावनी सुनकर लक्ष्मण काफी भयभीत हो गए और फिर उन्होंने एक कठोर फैसला लिया।
लक्ष्मण कभी नहीं चाहते थे कि उनके कारण उनके भाई को कोई किसी भी प्रकार की हानि पहुंचा सके। इसलिए उन्होंने अपनी बलि देने का फैसला किया। उन्होंने सोचा यदि वे ऋषि दुर्वासा को भीतर नहीं जाने देंगे तो उनके भाई को श्राप का सामना करना पड़ेगा, लेकिन यदि वे श्रीराम की आज्ञा के विरुद्ध जाएंगे तो उन्हें मृत्यु दंड भुगतना होगा, यही लक्ष्मण ने सही समझा।
वे आगे बढ़े और कमरे के भीतर चले गए। लक्ष्मण को चर्चा में बाधा डालते देख श्रीराम ही धर्म संकट में पड़ गए। अब एक तरफ अपने फैसले से मजबूर थे और दूसरी तरफ भाई के प्यार से निस्सहाय थे। उस समय श्रीराम ने अपने भाई को मृत्यु दंड देने के स्थान पर राज्य एवं देश से बाहर निकल जाने को कहा। उस युग में देश निकाला मिलना मृत्यु दंड के बराबर ही माना जाता था।
लेकिन लक्ष्मण जो कभी अपने भाई राम के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकते थे उन्होंने इस दुनिया को ही छोड़ने का निर्णय लिया। वे सरयू नदी के पास गए और संसार से मुक्ति पाने की इच्छा रखते हुए वे नदी के भीतर चले गए। इस तरह लक्ष्मण के जीवन का अंत हो गया और वे पृथ्वी लोक से दूसरे लोक में चले गए। लक्ष्मण के सरयू नदी के अंदर जाते ही वह अनंत शेष के अवतार में बदल गए और विष्णु लोक चले गए।
अपने भाई के चले जाने से श्री राम काफी उदास हो गए। जिस तरह राम के बिना लक्ष्मण नहीं, ठीक उसी तरह लक्ष्मण के बिना राम का जीना भी प्रभु राम को उचित ना लगा। उन्होंने भी इस लोक से चले जाने का विचार बनाया। तब प्रभु राम ने अपना राज-पाट और पद अपने पुत्रों के साथ अपने भाई के पुत्रों को सौंप दिया और सरयू नदी की ओर चल दिए।
वहां पहुंचकर श्री राम सरयू नदी के बिलकुल आंतरिक भूभाग तक चले गए और अचानक गायब हो गए। फिर कुछ देर बाद नदी के भीतर से भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने अपने भक्तों को दर्शन दिए। इस प्रकार से श्री राम ने भी अपना मानवीय रूप त्याग कर अपने वास्तविक स्वरूप विष्णु का रूप धारण किया और वैकुंठ धाम की ओर प्रस्थान किया।

29/01/2017
08/01/2017

🎄🎄जय श्री सीताराम जी 🎄🎄
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कह लंकेस कवन तैं कीसा।
केहि कें बल घालेहि बन खीसा।।
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही।
देखेउँ अति असंक सठ तोही।।
मारे निसिचर कहेि अपराधा।
कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया।
पाइ जासु बल बिरचति माया।।
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा।
पालत सृजत हरत दससीसा।।
जा बल सीस धरत सहसानन।
अंडकोस समेत गिरि कानन।।
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता।
तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता।।
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा।
तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली।
बधे सकल अतुलित बलसाली।।
जाके बल लवलेस तें
जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि
हरि आनेहु प्रिय नारि।।

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🍀🌺🍀🌺लंकापति रावण ने कहा -- अरे वानर ! तू है कौन ? किसके बल पर तूने मेरे वन को उजाड़ कर नष्ट कर दिया? क्या तूने कभी मेरा नाम और यश नहीं सुना? अरे दुष्ट ! मैं देख रहा हूँ कि तू बड़ी हिम्मत से अकड़कर खड़ा है ।तूने कौन से अपराध पर राक्षसों को मारा? अरे मूर्ख ! क्या तुझे अपने प्राणों का भय नहीं है?
हनुमानजी ने कहा -- हे रावण ! सुन ।जिनका बल पाकर माया सभी ब्रह्माण्डों की रचना करती है ।जिनके बल से ब्रह्मा, विष्णु, महेश क्रमशः सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करते हैं; जिनके बल से सहस्त्र मुख वाले शेष जी पर्वत और वनों सहित समस्त ब्रह्माण्ड को सिर पर उठाये रहते हैं; जो देवताओं की रक्षा के लिए अनेक प्रकार के अवतार लेते हैं और जो तुम्हारे जैसे मूर्खों को सही सीख देते हैं; जिन्होंने शिव जी के कठोर धनुष को सहज ही तोड़ डाला और उसी के साथ सम्पूर्ण राजाओं के घमंड को चकनाचूर कर दिया; जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि को मार डाला, जो सभी अतुलनीय बलशाली थे; जिनके लेशमात्र बल से तुमने समस्त चराचर जगत को जीत लिया और जिनकी प्रिय पत्नी श्री जानकी जी को तुम चोरी से हर लाये हो, मैं उन्हीं का दूत हूँ ।

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03/07/2015

संत ज्ञानेश्वर
संत ज्ञानेश्वर महाराष्ट्र के एक महान संत थे जिन्होने ज्ञानेश्वरी की रचना की। संत ज्ञानेश्वर की गणना भारत के महान संतों एवं मराठी कवियों में होती है। इनका जन्म 1275 ई. में महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले में पैठण के पास आपेगाँव में भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। इनके पिता का नाम विट्ठल पंत तथा माता का नाम रुक्मिणी बाई था। संत ज्ञानेश्वर ने भी 21 वर्ष की आयु में ही संसार का त्यागकर समाधि ग्रहण कर ली।

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Indore
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