01/06/2026
ब्राह्मण का पथ
मस्तक पर तिलक, सात्विकता का विस्तार है,
शीश पर चोटी, परंपरा का आधार है।
ज्ञान के सागर में जो गोता लगाता है,
वही 'ब्राह्मण' के पथ पर चल पाता है।
न कामनाओं की बेड़ियाँ, न राग का बंधन,
लोक-कल्याण में ही अर्पित, जिसका हर क्षण।
वाणी में वेद-मंत्रों की पवित्र गूँज है,
जिसकी साधना का जग में ही पूज है।
क्रोध को पिघलाकर, जिसने करुणा बनाई है,
त्याग की आग में, बुद्धि अपनी तपाई है।
स्वार्थ से ऊपर उठकर, जो धर्म निभाता है,
वही जीवन्मुक्त होकर, ब्रह्म को पाता है।
शून्य से शिखर तक का, यह कठिन सफर है,
जहाँ ज्ञान का ही, निर्मल-सा अवतरण है।
जो आत्म-अनुशासन को ही, अपना धर्म मानता,
वही 'ब्राह्मण' पद की, गरिमा को जानता।
लेखक - अश्विनी कुमार मिश्रा
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