08/06/2024
क्या मुसलमान सच में राजनीतिक तौर पर घाघ हैं?
कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारी राजनीतिक समझ परिपक्व है भी या नहीं!
अब खुद सोचिए ना कि बिहार में मुसलमानों की एक पार्टी AIMIM की तरफ से किशनगंज से अख्तरूल ईमान चुनाव लड़ते हैं मगर हार जाते हैं क्योंकि मुसलमान में इस चुनाव में रिस्क नहीं लेना चाहता था।
वहीं दूसरी तरफ पूर्णिया से पप्पू यादव जीत जाते हैं। वहां पर मुसलमान राजद को वोट नहीं दें कर एक निर्दलीय को वोट देने का रिस्क उठा लेता है।
ऐसे ही सिवान में हिना शहाब के मामले में भी रिस्क लेने से कतरा जाता है। वहीं धुबरी में तो मौलाना बदरुद्दीन अजमल को इतनी बुरी तरीके से हरवा देता है कि किसी को यकीन ही नहीं हो रहा है।
ऐसे ही महाराष्ट्र में इम्तियाज जलील औरंगाबाद से चुनाव हार जाते हैं क्योंकि मुसलमान को वहां पर रिस्क नहीं लेना है मगर इसके उल्ट नगीना से चंद्रशेखर आजाद चुनाव जीत जाते हैं। वहां पर मुसलमान समाजवादी पार्टी के खिलाफ जाकर वोट करता है।
इस पूरी राजनीतिक उथल पुथल की पूरी कहानी क्या है वो मेरी समझ से बाहर है।
एक तरफ तो मुसलमान इस डर के साए में है कि भाजपा का ज्यादा ताकतवर होना उनके वजूद के लिए खतरा है इसलिए उनको एक तरफा तौर पर केवल सेकुलर पार्टियों को वोट करना है।
मगर दूसरी तरफ कुछ ऐसे नेता भी हैं जो मुसलमानों के ही एक तरफ वोट से निर्दलीय चुनाव जीत जाते हैं मगर वहीं पर मुस्लिम पार्टियों की तरफ से और निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले मुस्लिम नेता चुनाव हार जाते हैं।
अब मुसलमानों के दिमाग में राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर क्या बात चल रही है यह बात मुझे समझ में नहीं आ रही है।
आप लोग बताये आखिर क्यों मुसलमान अभी भी अपने नेताओं पर यकीन करने को बिलकुल भी तैयार नहीं है !!!
Ansar Imran SR