12/03/2024
"चैनपुर की दास्तान"
नाट्य समीक्षा - विवेक श्रीवास्तव।
रविवार 10 मार्च की शाम रंगाभरण, जबलपुर की प्रस्तुति ‘चैनपुर की दास्तान’ देखने का मौक़ा था. शहीद स्मारक प्रेक्षागृह में गुज़री ये शाम सुखद थी. रंगमंच से अपने लगाव के बरक्स उसे और कुछ तो मैं खैर कुछ देने लायक हूँ नहीं पर एक प्रेक्षक के रूप में बीते कुछ दिनों की मेरी सक्रियता मुझे ही कुछ सुकून देती है. तमाम उबड़-खाबड़ सी व्यस्तताओं के बीच भी मुझे अच्छा लग रहा है कि इस बीच बहुत नियमित न भी सही, कुछ अंतराल पर भी कुछ अच्छे नाटक देखने को मिल जा रहे हैं. इस के लिए शहर की रंग-संस्थाओं का भी मुझे आभारी होना ठीक लगता है कि उनके द्वारा समय-समय पर आयोजित नाट्योसवों का फ़ायदा मेरे जैसे दर्शकों को हो पा रहा है. इस शाम के लिए आभार Abhishek Tripathi का भी कि मेरे कहे पर उन्होंने मेरा भार मेरे घर से प्रेक्षागृह तक उठाया और हम साथ में उन्मुक्त खिलखिलाए.
पिछले दिनों में विवेचना के नाट्य समारोह के बाद अभी रविवार की शाम ‘नाट्य लोक’ के राष्ट्रीय नाट्य समारोह की अंतिम प्रस्तुति देखी. निर्देशक अक्षय सिंह ठाकुर Akshay Singh Thakur के नाटक से अभी ताज़ा-ताज़ा परिचय विवेचना के नाट्य समारोह में ‘न्याय का घेरा’ से हुआ ही था कि अभी फिर एक मौक़ा मिला बतौर निर्देशक उनकी एक और रचना ‘चैनपुर की दास्तान’ देखने का.
नाट्य रूपान्तर रंजीत कपूर का है तो बिलकुल उम्मीद के मुताबिक़ ही कसा हुआ, सधा हुआ है. व्यंग्य की धार के साथ तीखे संवाद और निर्देशक अक्षय सिंह ठाकुर की अपनी समझ ने नाटक को खूबसूरत अनुभव बना दिया. उस पर भी कलाकारों ने डूब कर किये अपने अभिनय से नाटक के साथ दर्शकों को बिलकुल शुरू से आखीर तक बाँध रखा. दर्शकों को बाँध रखने के सिलसिले में एक और ज़रूरी बात, नाटक का संगीत. संगीत पक्ष संयत, संतुलित और आकर्षक था.
नाटक के सभी तत्व पूरी ज़िम्मेदारी से अपनी भूमिका में थे, किसी की सीमा का कोई अतिक्रमण किये बिना. न संगीत संवादों पर हावी होता लग रहा था न संवादों का व्यंग्यार्थ अभिनय के ऊपर था. सब मिल कर एक लय में चल रहे थे और इस एक लय में सबके साथ चलने ने नाटक को नाटक बनने में मदद की. वरना कई बार नाटकों में यह भी होता है कि संगीत, संवाद और अभिनय की पीठ पर चढ़ा होता है या अभिनय, संवादों और संगीत के पीछे हांफता हुआ दौड़ता-भागता रह जाता है. इस नाटक की ख़ूबसूरती उसके संतुलन और सधाव में थी. निश्चय ही निर्देशक का काम नाटक के अलग-अलग अंगों में समन्वय और संतुलन बनाना है. यह एक ऐसी भूमिका है जो सीधे तौर पर कभी दिखती तो नहीं है पर नाटक को सबसे ज़्यादा नाटक बनाने में अपनी भूमिका ज़रूर निभाती है. निर्देशक का काम नाटक को एक लय में बांधना और साधना ही होता है और वो यहाँ इस नाटक में बखूबी दिखता है.
इस संबंध में एक रोचक बात! नाटक के अंत में यूँ ही बात-चीत के दौरान हमारा ध्यान गया कि दृश्य परवर्तन के लिए लाइट बंद करने की जगह बहुत हल्की डिम भर हुई, पार्श्व संगीत चलता रहा. ऐसा क्यों? अक्सरहा, सेट बदलने के लिए नाटक के बीच लाइट बंद कर देना सामान्य चलन है. इसका रोचक जवाब हमें अक्षय सिंह ने दिया. वे नहीं चाहते थे कि जिस लय में दर्शक नाटक के साथ बंध गया है उस में कोई गैप आये और लोग 10-20 सेकेंड्स के लिए भी नाटक के अलावा कहीं और दिमाग दौड़ायें या मोबाइल में मैसेज देखने लग जायें.
नाटक की शुरुआत ही एक रोचक धुन के साथ सूत्रधार द्वारा पात्रों के परिचय से होती है. पूरा मंच भरा हुआ है और सभी चरित्र जो बाद में मंच पर यथास्थान आयेंगे और जायेंगे पर मंच की तकनीक की दृष्टि से यह अच्छा लग रहा था कि मंच पर शुरू में ही सब आयें और नाटक की सांगीतिक शुरुआत हो. ध्यान देने पर यह भी ख्याल आता है कि नाटक में शुरू में एक सूत्रधार आता है, पात्रों का मज़े-मज़े का व्यंग्य भरा परिचय कराता है और फिर एक बार जाता है तो दुबारा मंच पर नहीं आता. वैसे तो यह साधारण सी बात है, सूत्रधार का आना और कथा सूत्र को आगे बढ़ाना, बहुत से नाटकों में इस्तेमाल होने वाली यह प्राविधि बहुत सामान्य है पर यहाँ सूत्रधार का काम बस एक रोचक शैली में नाटक की शुरुआत करवा कर नेपथ्य में चले जाना है. यहाँ सूत्रधार कथा को समझाने की किसी ‘बड़ी जिम्मेदारी’ के तहत मंच पर नहीं है बल्कि बस मंच को एक रोचक शुरुआत देने के लिए आता है. नाटककार को अपने कथा तत्व और प्रस्तुति-संवादों पर और निर्देशक को अपने अभिनेताओं के अभिनय पर अगर ज्यादा भरोसा न हो और कहानी को आगे बढाने की मजबूरी आन पड़े तो अक्सर ही यह युक्ति आड़े वक्त की चीज़ है. ऐसा नहीं है कि यह हर स्थिति में सटीक टिप्पणी हो, कई अवसरों पर यह ज़रूरी युक्ति हो सकती है पर आजकल कई नाटकों में इस सहायक युक्ति को मुख्य युक्ति मान कर उसी के भरोसे पर नाटक खड़ा करने की कोशिश भी की जाने लगी है. अब अगर 90-100 मिनट के नाटक में आधे घंटे सूत्रधार ही दर्शकों से जद्दो-ज़हद करता रहे तो फिर निर्देशक और अभिनेता की नाट्य क्षमता पर ज़रूर एक बार सोचना चाहिए. ‘चैनपुर की दास्तान’ में अक्षय सिंह और उनकी टीम ने बहुत स्वाभाविक ढंग से मंच से सब के लिए सम्मोहन रचा है. अभिनय के लिहाज़ से लगभग सभी चरित्र सधे हुए दिखते हैं. सभी अपनी-अपनी भूमिकाओं में डूबे हुए हैं और इन सब के भरोसे नाटक सब के मन-मस्तिष्क में उतरता जाता है.
वैसे नाटक की सफलता के पीछे इसका कथानक भी बड़ा कारण है. आपको ऐसा ही 'चैनपुर' आपको हर शहर और हर कस्बे में बिना खोजे यूँ ही अपने आस-पास मिल जाएगा जहां डॉक्टर खुद नशे में धुत्त है, दवा की बोतल की जगह शराब की बोतल पर उसका ज्यादा भरोसा है. थानेदार रामनामी ओढ़े मटकता हुआ डाकू का चरणोदक ले रहा है, हर बात में पौराणिक चरित्रों के नाम पर कुछ भी बकबका कर अपनी निर्धारित भूमिका के अलावा सब कुछ कर रहा है. क़ानून व्यवस्था ‘कानी’ है, क्योंकि अंधे होने की अपनी समस्याएं हैं, और काना होने के अपने फायदे तो हैं ही. कम से कम एक पक्ष को करीब से देखते सुनते उससे तो नैन-मटक्का करने का मौका होता है. सत्ता और व्यवस्था में सब एक-दूसरे के मौसेरे भाई हैं और इन मौसेरे भाइयों की बीच सामान्य जनता है. ‘भेड़िया पीड़ित भेड़ संघ’, जो रोज ‘भेड़ियों’ की चालाकी की भेंट चढ़ रहा है. तिहाड़ से भागे ‘दो चोर’ इस पूरे तंत्र के ऊपर, हरेक धूर्त के ‘भीतर के डर’ पर राज करते हैं. बात आगे बढ़ती है और इन दो चोरों की पोल खुल भी जाती है तो भी क्या! अब तो वो दो भी व्यवस्था के अंग बन चुके हैं और रोटी-बोटी से आगे बढ़ते हुए रोटी-बेटी के संबंधी बन कर फिर व्यवस्था को और जिम्मेवारी से बेवकूफ बनाने की मिली-जुली कोशिश में लग जाते है. इस पूरे परिदृश्य से नाटक बहुत जल्दी अपने दर्शकों से कनेक्ट बना लेता है. सब को यह अपने ही आस-पास की, रोज की बात लगती है. व्यंग्य में रचे-पचे संवाद और सधी हुई प्रस्तुति सीधे लोगों को चुभती-गुदगुदाती भीतर उतरती जाती है.
कुल मिला कर इस नाटक से गुज़रना रविवार की शाम का एक सुखद अहसास था.
- विवेक श्रीवास्तव।
🌼"विवेक श्रीवास्तव" जी
"नाट्य समीक्षा" के लिए "रंगाभरण सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था" की ओर से आपका बहुत बहुत "धन्यवाद", आशा करते हैं की आगे भी हम कला के माध्यम से निरंतर आपसे जुड़े रहेंगे। 🌼