29/02/2020
स्व. विद्यासागर सिंह जी के याद में एक संस्मरण :
2016 छात्रसंघ चुनाव से पूर्व अगस्त महीने का एक अनुभव आज भी ताज़ा है । प्रदेश सरकार के कुछ नीतियों के विरोध में प्रदेश स्तर का छात्र आंदोलन रायपुर में हुआ था , जिसमें बस्तर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के लगभग 160 छात्र भी गए हुए थे । वापसी के समय ये सभी छात्र 3 बसो में सवार थे , दिनभर के आंदोलन और भागदौड़ के बीच किसी भी छात्र को भोजन उपलब्ध नहीं हो पाया था , जिसके वजह से वापसी में सभी छात्र भूख से व्याकुल थे । तत्कालीन बस्तर अभाविप के संगठन मंत्री अजय कंवर इससे परिचित होते हुए भी कुछ करने में असमर्थ थे । जिला संयोजक अनिल विश्वकर्मा जी स्तिथि को देखते हुए बहुत परेशान हो चुके थे ,
वरिष्ठ कार्यकर्ताओं में पुशांट राय -नगर मंत्री , अजय साहू अनुपलब्ध थे ।
बस में सामने की सीट पर बैठ कर मै ( स्वप्निल तिवारी ) व अनुज आदित्य दीक्षित और अर्पित मिश्रा कुछ वार्तालाप में मग्न थे कि तभी अनिल विश्वकर्मा जी व राम प्रसाद मौर्य चिंतित दिखाई दिए और पूछने पर सारी स्थिति का पता चला । बहुत प्रयत्न के बाद भी 150 छात्रों को मार्ग में भोजन कैसे कराया जाए इसका कोई रास्ता नही दिख रहा था । हम सब के पास भी कुल मिलाकर 1000-1500 ₹ ही थे जिसमे 3 बस में भरे छात्र कार्यकर्ताओं को भोजन उपलब्ध करवाना नामुमकिन था। अनिल विश्वकर्मा जी धीरे से कान में बोले - स्वप्निल भाई कुछ तो सुझाव दो पूर्व अनुभव से ।
कहते हैं कि संकट की घड़ी में व्यक्ति अपने सबसे करीबी और सबसे योग्य व्यक्ति को याद करता है । मेरी नजर में बस्तर में अभाविप का मतलब थे इसके बस्तर अभाविप के पितामह कहे जाने वाले - विद्या सागर सिंह जी । एक शिक्षक कार्यकर्ता जो विकट से विकट परिस्थिति में भी अभाविप को अपने सही सुझाव से मार्गदर्शन देते रहते थे ।
एक प्रकार से हमारे लिए अभाविप में पितामह के साथ साथ संकटमोचन का किरदार भी विद्यासागर सिंह , जयराम दास - लक्ष्मण झा ही निभाते थे ।
रात्रि के करीब 12 बज रहे थे - बस रायपुर से काफी दूर निकल चुकी थी । मैंने अनिल विश्वकर्मा जी को कहा एक बार विद्या सागर भैया से फोन पर सुझाव लेकर देखो ।
वो जरूर कुछ ना कुछ रास्ता जरूर दिखाएंगे ।
आधीरात में भी विद्यासागर सिंह जी ने फोन उठाया और पूरी बात इत्मीनान से सुनी। बस आगे बढ़ रही थी रफ्तार में
लगभग 30 किलोमीटर दूर होगी धमतरी से ।
विद्यासागर सिंह जी से फोन पर बात हुए लगभग आधा घंटा बीत चुका था ।
तभी धमतरी से कुछ पहले एक ढाबे के पास 4/5 व्यक्ति बस को रुकवाते है , अपना परिचय देते हुए कहते हैं कि हमें विद्यासागर सिंह जी ने बताया की छात्रों के भोजन हेतु सहयोग की आवश्यकता है - तो हम विद्यासागर सिंह जी के बात नहीं टाल सकते ।
सभी 150 छात्रों के भोजन की व्यवस्था ढाबे में करवाते हैं । आप सब कुछ देर यही प्रतीक्षा करें ।
24 घंटे से भूखे युवा छात्र - भोजन की व्यवस्था पर किस तरह प्रसन्न हुए - वो खुशी आज भी याद है ।
कहने को तो ये एक छोटा सा वाकया है । पर एक साधारण शिक्षक के वृहद व्यक्तित्व को बताने के लिए अपने आप में काफी है । किस तरह एक शिक्षक के फोन पर आधी रात में किसी दूसरे जिले में थोड़े से समय के भीतर 150 की संख्या में छात्रों के लिए भोजन उपलब्ध करवाता है - यह अपने आप में बताता है कि वो व्यक्ति जरूर हर एक छात्र को अपने स्वयं के छोटे भाई के रूप में देखता और प्रेम करता था ।
ऐसे अनेक ही उदाहरण है जो दिखाते हैं कि कैसे 15 वर्षों तक मुश्किल स्थिति में भी बस्तर में अभाविप को सींच कर एक विशाल वृक्ष का रूप दिया था विद्या सागर सिंह जी ने । अपनें फैसलों में छात्र हित के मूल्यों व अनुशासन को आगे रखने वाले विद्यासागर सिंह जी के नेतृत्व में अभाविप बस्तर में कभी भी गुटबाजी नहीं थी ।
शायद यही कारण है कि आज भी बस्तर अभाविप का हर कार्यकर्ता उनको " विद्या भैया " - ' सियान ' ( अनुभवी व्यक्ति ) के रूप में याद करता है और बस्तर अभाविप को आने वाले समय में उनकी कमी हमेशा खलती रहेगी ।
बस्तर अभाविप हमेशा उन्हें अपने भीष्म पितामह के रूप में ही याद रखेगा ।
- स्वप्निल तिवारी
( पूर्व अभाविप कार्यकर्ता )