27/02/2022
सामयिक प्रसङ्गों में फिर एक बार इस बात पर जोर दिया जा रहा हैं की चर्चाओं के सत्र चलें, विचारों का आदान-प्रदान चलता रहें, हो भले ही मतभेद। पर चर्चा के दरवाजे बन्द हो, कोई इस ओर उद्यत ही न हो और तो और जो यह उपदेश दें वहीं चर्चा से पराङ्मुख हो, फिर चर्चा हो कैसे?
संसद हो या राज्य विधानसभा/परिषद् यहाँ तक की अब जिला परिषद्/नगरपालिका के भी बजट केवल बहुमत के दम पर आश्रित हो चलें हैं, लोकतन्त्र हो या अन्य कोई भी जनोन्मुखी प्रणाली सबका निहित उद्देश्य अधिकतम लोगों से राय-रायशुमारी उसका तरीका कोई भी हो सकता हैं और फिर उन जनाकांक्षाओं को अधिकतम पाना।
दो दशक पहले एक ऐसे उपक्रम की परिकल्पना फिर उस दिशा की ओर बढ़ते-बढ़ते आज तक का मीडिया फाउंडेशन-भारतीय युवा संसद का सफर एक ऐसे ही मञ्च को बनाने की लिए सामने आया, कोई भी विचार हो, विरोध हो, तर्क हो सबको सुनने-सुनाने का माध्यम और वाद-विवाद में संवाद के अंश ढूढ़ना, उन सहमति से देश-दुनिया, समाज, संस्थाओं को गति देना ऐसा ही कुछ आयोजन आगामी सत्रों में होगा।
इस साल के भारतीय युवा संसद की गतिविधियाँ वैक्रमाब्द नववर्ष, २०७९ (तदनुसार दिनांक 02-03 अप्रैल 2022) को उज्जैन से आरम्भ होगा तदोपरान्त 30 अप्रैल-01 मई, 2022 को उदयपुर और फिर 15-17 सितम्बर, 2022 को विश्व लोकतन्त्र दिवस के उपलक्ष्य पर इस साल के राष्ट्रीय अधिवेशन प्रस्तावित हैं।
उज्जैन में आयोजित इस राष्ट्रिय अधिवेशन में संवाद के साथ-साथ क्षिप्रा नदी के किनारे अवस्थित भारत की अर्वाचीन राजधानी, राजा विक्रमादित्य की नगरी-अवन्तिका आने का मौका, ज्योतिर्लिङ्ग महाकाल के दर्शन, प्रसाद, नगर भ्रमण के साथ ही आमने-सामने ग्रामसभा को देखने का अद्भुत मौका होगा। समीपस्थ नर्मदा की पुण्यसलिला, आदि शंकराचार्य के जीवन-प्रसङ्ग से जुड़ा ओंकारेश्वर, महेश्वर। एक समग्र यात्रा जिसमें अध्यात्म, समाज, राजनीति और शिक्षा के साथ प्रकृति का सामीप्य भी तो।
"लोकतन्त्र में युवाओं की प्रत्यक्ष भागेदारी" विषयक इस दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन में विचारधारों का संगम होगा, शिक्षा संवाद होंगे और साथ ही भारत की मूल्यपरक परम्पराओं पर जिज्ञासा सत्र भी।
खुला आमन्त्रण हैं तो भी मर्यादा हैं,रजिस्ट्रेशन वेबसाइट के माध्यम से भी हैं संस्थागत स्तर पर भी। चयन की प्रक्रिया से गुजरना होगा, सबको मौका देना होगा तो प्रतिनिधित्व का ध्यान भी, यथासम्भव इन सबमें पूर्व में सहभागिता कर चुके साथियों हेतु अवसर कम होंगे।
जो वैचारिक संघटनों से जुड़े हैं, यह मञ्च उनके लिए अधिक उपयोगी नहीं हैं क्यों की वे पहले से ही एडवांस प्रशिक्षण ले चुकें हैं।
सत्र नए लोगों के लिए हैं और एक तरह से प्राथमिकी/प्रारम्भिकी हैं उनके लिए जो समाज-राजनीति को समझना चाहते हैं उसमें बिना किसी पूर्वाग्रहों के योगदान को उद्यत होना चाहते हैं।
भवितव्य का द्वार हमको आह्वाहन कर रहा हैं हम नहीं तो कौन?
कौन देगा नेतृत्व?
भारत की भूमिका बढ़ने वाली हैं,
पर! हम इसके लिए हैं तैयार?
नए युग का करें स्वागत
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