17/03/2026
विवाह कभी कुटुंब, रिश्तेदारी और आत्मीयता तक सीमित रहने वाला पवित्र संस्कार हुआ करता था। अब वह एक ऐसा सार्वजनिक प्रोजेक्ट बन चुका है, जिसमें प्रेम कम और प्रबंधन अधिक दिखाई देता है। पहले दो परिवार जुड़ते थे, अब दो इवेंट मैनेजमेंट कंपनियाँ, तीन कैटरर्स, चार डिज़ाइनर और पाँच कैमरा टीमों का गठबंधन होता है।
जिस विवाह को सादगी और संस्कार का उत्सव होना था, उसे ग्लैमर, दिखावा और रस्मों के कॉकटेल में डुबो दिया गया है। कन्यादान और पाणिग्रहण तो अब बस औपचारिकताएँ रह गई हैं, असली कार्यक्रम धनदान, स्टेटस-प्रदर्शन और देह-दर्शन का हो गया है। वर-वधू से अधिक सजावट, लाइटिंग और एंट्री सॉन्ग पर ध्यान दिया जाता है, मानो विवाह नहीं, किसी पुरस्कार समारोह का लाइव प्रसारण हो रहा हो।
पहले पाकशाला की महक मेहमाननवाज़ी का संदेश देती थी, अब मधुशाला की बोतलों की खनक से संस्कारों का स्तर मापा जाता है। आतिथ्य अब इस बात से तय नहीं होता कि आपने प्रेम से क्या परोसा, बल्कि इस बात से तय होता है कि बार में कितने ब्रांड थे और डांस फ्लोर पर कितनी देर तक लोगों ने अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा हिलाई।
कभी दुल्हन का सहज, लजाया हुआ, चाँद-सा चेहरा आकर्षण का केंद्र होता था, अब प्री-वेडिंग फोटोशूट की फोटोशॉप-परक कलाकारी ही मुख्य दर्शन बन गई है। विवाह से पहले ही जोड़े इतने कोणों से मुस्कुरा चुके होते हैं कि असली फेरे के समय तक चेहरे पर भाव कम और थकान अधिक बचती है।
शुभ मुहूर्त निकलवाने के लिए पंडित जी को विशेष मान-सम्मान, दक्षिणा और कभी-कभी ‘प्रोत्साहन राशि’ भी दी जाती है, लेकिन विडंबना देखिए—बारात की एंट्री, डांस परफॉर्मेंस, स्टेज सेरेमनी, वीडियो शूट और वीआईपी स्वागत में इतना समय निकल जाता है कि सात फेरे पूरे होते-होते तिथि ही बदल जाती है। मुहूर्त बेचारा कोने में बैठा सोचता रह जाता है कि मुझे बुलाया क्यों था?
कुल मिलाकर, विवाह अब संस्कार कम, सामाजिक प्रदर्शनी अधिक हो गया है; जहाँ संबंध बाद में बनते हैं, रील्स पहले बन जाती हैं।
÷परिवर्तन ÷