Kako کاکو काको

Kako کاکو काको Team Kako 😎
IG||
Kako is a Developing Town In Jehanabad Bihar AbOuT KAKO
The Village of Legends.

KaKo situated 07 km from Jehanabad Railway station. The village has a tomb of Hazrat Bibi Kamal Sahiba First Women Sufi Saint of India
●Team Kako●

31/08/2026
30/08/2026

अब काको में बेहतर स्वास्थ्य सेवा — एक ही छत के नीचे!

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डॉ. श्रीकान्त, M.B.B.S., M.S.
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काको सूफी महोत्सव में सूफिज्म की तलाश… अबकी बार काको की रूहानी विरासत को मिले उसका हक़(24–25 सितम्बर 2026 को होने वाला स...
29/08/2026

काको सूफी महोत्सव में सूफिज्म की तलाश… अबकी बार काको की रूहानी विरासत को मिले उसका हक़
(24–25 सितम्बर 2026 को होने वाला सूफी महोत्सव केवल एक सरकारी आयोजन नहीं, काको की सदियों पुरानी रूहानी विरासत का आईना बने)
सैयद आसिफ़ इमाम काकवी
कभी-कभी कोई जगह सिर्फ़ नक्शे पर दर्ज एक नाम नहीं होती, बल्कि वह अपने भीतर सदियों की दास्तान, दुआओं की खुशबू, बुज़ुर्गों की रूहानी विरासत और इंसानियत का पैग़ाम समेटे होती है। काको शरीफ़ ऐसी ही सरज़मीन है—एक ऐसी पाक और ऐतिहासिक धरती, जिसे औलिया-ए-किराम की रूहानी विरासत ने पहचान दी और जिसे अहल-ए-ज़बान कमालाबाद के नाम से भी याद करते हैं। इसी काको की धरती पर जब सूफी महोत्सव का आयोजन होता है तो उम्मीद सिर्फ़ एक रंगारंग कार्यक्रम की नहीं होती। उम्मीद होती है कि यहां सूफिज्म बोलेगा, सूफी परंपरा दिखाई देगी, इतिहास सांस लेगा और हज़रत मख़दुमा बीबी कमाल रहमतुल्लाह अलैहा का पैग़ाम-ए-मोहब्बत, अमन, इंसानियत और भाईचारा दुनिया तक पहुंचेगा। वर्ष 2011 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में सूफी महोत्सव की शुरुआत इसी सोच और मकसद के साथ हुई थी कि बिहार की महान सूफी विरासत को देश-दुनिया के सामने लाया जाए। तब से काको में लगातार इस आयोजन की परंपरा चली आ रही है। इस वर्ष भी 24 और 25 सितम्बर 2026 को बिहार सरकार के पर्यटन विभाग और जहानाबाद जिला प्रशासन की ओर से सूफी महोत्सव आयोजित किया जा रहा है। लेकिन आज काको की सरज़मीन से एक सवाल उठ रहा है क्या काको सूफी महोत्सव में अब सूफिज्म ही पीछे छूटता जा रहा है? यह सवाल किसी विरोध की भावना से नहीं, बल्कि काको की मिट्टी से मोहब्बत करने वाले एक शख्स के दिल से निकल रहा है। सूफी महोत्सव का मकसद महज़ मंच सजाना, कार्यक्रम कराना और दो दिन की भीड़ जुटाना नहीं था। इसका असल उद्देश्य था सूफी संस्कृति, सूफी विचारधारा और काको की रूहानी विरासत को देश और दुनिया तक पहुंचाना।
काको को सूफी सर्किट से जोड़ने के पीछे भी यही व्यापक सोच थी कि यहां सूफिज्म पर शोध हो, नई पीढ़ी सूफी परंपरा को जाने और देश-विदेश से आने वाले शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन का केंद्र विकसित हो। जब 2011 में इस महोत्सव का खाका तैयार हुआ था, तब दरगाह परिसर में सूफी रिसर्च सेंटर और लाइब्रेरी जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं की भी चर्चा थी। कल्पना कीजिए अगर काको में एक ऐसा केंद्र बनता जहां हज़रत मख़दुमा बीबी कमाल और बिहार की सूफी परंपरा पर शोध होता, पुरानी पांडुलिपियां संरक्षित होतीं, किताबें उपलब्ध होतीं और देश-दुनिया के विद्वान यहां आते, तो काको की पहचान आज कितनी बड़ी होती!
अफसोस… वह सपना आज भी अधूरा है। काको सिर्फ़ एक पर्यटन स्थल नहीं है काको शरीफ़ की पहचान किसी सरकारी फाइल से नहीं बनी। यह पहचान सदियों की रूहानी मेहनत से बनी है।
हज़रत मख़दुमा बीबी कमाल रहमतुल्लाह अलैहा की जिंदगी हमें प्रेम, त्याग, इंसानियत, अमन और भाईचारे का संदेश देती है। स्थानीय परंपरा और श्रद्धा में उन्हें हिंद की राबिया बसरी जैसी महान वलिया के रूप में याद किया जाता है। कहा जाता है कि जिस क्षेत्र में कभी दीन और ज्ञान की रोशनी कम थी, वहां उन्होंने अपनी कोशिशों से ऐसी रूहानी रोशनी फैलाई कि काको एक इल्म, इबादत और इंसानियत के चमन में बदल गया। यही वजह है कि आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों से अकीदतमंद यहां हाज़िरी देने आते हैं। यहां की गंगा-जमुनी तहज़ीब किसी भाषण की मोहताज नहीं। काको की गलियों, दरगाह, मेलों और लोगों के बीच यह तहज़ीब आज भी ज़िंदा दिखाई देती है। फिर सूफी महोत्सव में सूफिज्म क्यों कम दिखाई देता है? यह सवाल जहानाबाद जिला प्रशासन और बिहार पर्यटन विभाग से पूछना ज़रूरी है। महोत्सव में ऐसे कार्यक्रम होने चाहिए जिनसे लोग सूफिज्म को समझें, सिर्फ़ मनोरंजन लेकर वापस न लौटें।
काको में आयोजित होने वाला कार्यक्रम ऐसा क्यों न हो जिसमें
सूफी विचारधारा पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी हो,
हज़रत मख़दुमा बीबी कमाल की जिंदगी और शिक्षाओं पर शोधपत्र प्रस्तुत किए जाएं, सूफी रिसर्च सेंटर की आधारशिला रखी जाए, एक समृद्ध सूफी लाइब्रेरी की शुरुआत हो, बिहार के सूफी संतों पर प्रदर्शनी लगे, कव्वाली और सूफियाना कलाम के साथ सूफी दर्शन पर गंभीर चर्चा हो, युवाओं के लिए सूफिज्म और गंगा-जमुनी तहज़ीब पर विशेष सत्र हों, देश-विदेश के शोधकर्ताओं और इतिहासकारों को आमंत्रित किया जाए, काको की ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने की ठोस योजना बने।
यही होता असली सूफी महोत्सव। सिर्फ़ मंच और रोशनी से महोत्सव यादगार नहीं बनता। महोत्सव तब यादगार बनता है जब उसके बाद कोई स्थायी निशानी बची रहे। काको की आवाज़ अब जहानाबाद के डीएम और बिहार पर्यटन विभाग तक पहुंच चुकी है
मैंने अपनी कलम से काको की इस पीड़ा को उठाया है। मेरी आवाज़ जहानाबाद के जिलाधिकारी तक पहुंची है, बिहार पर्यटन विभाग तक पहुंची है। अब उम्मीद है कि इस आवाज़ को सिर्फ़ शिकायत नहीं, बल्कि एक सकारात्मक सुझाव के रूप में देखा जाएगा। काको किसी एक समुदाय की विरासत नहीं है। यह बिहार की साझा सांस्कृतिक विरासत है। यह उस भारत की तस्वीर है जहां सूफी संतों ने तलवार से नहीं, मोहब्बत से दिल जीते।
आज जब समाज को नफ़रत की आवाज़ों से ज्यादा मोहब्बत की आवाज़ की जरूरत है, तब काको जैसी जगहों की अहमियत और बढ़ जाती है। अबकी बार सिर्फ़ कार्यक्रम नहीं, इतिहास रचा जाए
24 और 25 सितम्बर 2026 को जब काको की धरती पर सूफी महोत्सव का मंच सजे तो मेरी दिली ख्वाहिश है कि इस बार काको की रूह भी उस मंच पर दिखाई दे। काको को सिर्फ़ दो दिनों के महोत्सव तक सीमित मत रखिए। इसे ऐसा केंद्र बनाइए जहां साल के बारह महीने सूफिज्म पर शोध हो, किताबें पढ़ी जाएं, इतिहास संरक्षित हो, युवाओं को अपनी विरासत से जोड़ा जाए और दुनिया को यह बताया जाए कि बिहार की मिट्टी ने भी ऐसे सूफी पैदा किए जिन्होंने इंसानियत को अपना मज़हब और मोहब्बत को अपना पैग़ाम बनाया। जिला प्रशासन अगर इस दिशा में गंभीर पहल करता है तो काको के लोगों का उत्साह फिर लौटेगा। मेरी उम्मीद है कि सूफी महोत्सव 2026 सिर्फ़ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि काको की रूहानी विरासत के पुनर्जागरण का वर्ष बनेगा।
इस बार कार्यक्रम ऐसा हो कि लोग लौटते हुए सिर्फ़ यह न कहें कि “महोत्सव अच्छा था।” बल्कि वे कहें हमने काको में सूफिज्म को महसूस किया।” और शायद यही हज़रत मख़दुमा बीबी कमाल रहमतुल्लाह अलैहा की धरती के लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।
काको पुकार रहा है अपनी विरासत के लिए, अपने सूफिज्म के लिए, अपने रिसर्च सेंटर के लिए, अपनी लाइब्रेरी के लिए और उस अधूरे ख्वाब की तकमील के लिए, जिसे 2011 में देखा गया था।
अब फैसला हुकूमत और प्रशासन को करना है काको को सिर्फ़ मंच देना है या उसकी रूह को आवाज़ भी देनी है? मेरी कलम को उम्मीद है…इस बार काको निराश नहीं होगा। इस बार काको सूफी महोत्सव सचमुच यादगार होगा।

کاکو میں  صوفی ریسرچ سینٹر اور لائبریری کا ادھورا خواب کب ہوگا پورا؟سید آصف امام کاکویکاکو شریف کی روحانی و تاریخی سرزمی...
28/08/2026

کاکو میں صوفی ریسرچ سینٹر اور لائبریری کا ادھورا خواب کب ہوگا پورا؟

سید آصف امام کاکوی

کاکو شریف کی روحانی و تاریخی سرزمین ایک بار پھر صوفیانہ رنگ میں ڈوبنے جا رہی ہے۔ 24 اور 25 ستمبر 2026 کو صوفی مہوتسو کا انعقاد ہوگا۔ یہ صرف ایک پروگرام نہیں، بلکہ حضرت مخدومہ بی بی کمال رحمۃ اللہ علیہا کی عظیم روحانی میراث، محبت، امن، انسانیت، بھائی چارے اور گنگا جمنی تہذیب کا جشن ہے۔ آئیے! کاکو کی اس مقدس سرزمین پر محبت کے چراغ روشن کریں، نفرتوں کو شکست دیں اور دنیا کو یہ پیغام دیں کہ صوفیاء کی سرزمین کا اصل پیغام محبت ہے، انسانیت ہے اور امن ہے۔ کاکو شریف آپ کا منتظر ہے بی بی کمال کی بارگاہ آپ کو پکار رہی ہے۔ کاکو صرف ایک قصبہ نہیں، یہ ایک احساس ہے، ایک تہذیبی شناخت ہے، ایک روحانی ورثہ ہے۔ یہ وہ سرزمین ہے جہاں صدیوں سے محبت نے نفرت کو شکست دی، جہاں صوفیاء نے انسانیت کو مذہب کی سرحدوں سے بلند کرکے دیکھا، اور جہاں گنگا جمنی تہذیب آج بھی زندہ و تابندہ نظر آتی ہے۔ کاکو شریف کی مٹی میں ایک عجیب سی کشش ہے۔ یہاں قدم رکھتے ہی محسوس ہوتا ہے کہ یہ زمین صرف تاریخ نہیں سناتی، بلکہ تاریخ کو جیتی ہے۔ یہاں درگاہ شریف ہے، یہاں عقیدت ہے، یہاں محبت ہے اور یہاں وہ تہذیبی رنگ ہے جس میں مختلف مذاہب اور طبقات کے لوگ ایک دوسرے کے دکھ درد میں شریک نظر آتے ہیں۔ اسی سرزمین کی سب سے روشن روحانی شناخت حضرت مخدومہ بی بی کمال رحمۃ اللہ علیہا کی بارگاہ ہے۔ آپ کی نسبت نے کاکو کو صرف بہار ہی نہیں بلکہ ہندوستان کے اہم صوفی مراکز میں ایک منفرد مقام عطا کیا۔ آپ کی تعلیمات کا بنیادی پیغام محبت، امن، بھائی چارہ، خدمتِ خلق اور انسانیت تھا۔ کہا جاتا ہے کہ جس زمانے میں کاکو ایک نسبتاً ویران علاقہ تھا، اس وقت بی بی کمال رحمۃ اللہ علیہا نے اپنی روحانی جدوجہد، عبادت، ریاضت اور خدمت کے ذریعے اس خطے میں دین و روحانیت کی ایسی روشنی پھیلائی کہ یہ سرزمین عقیدت مندوں کا مرکز بن گئی۔ آج بھی ملک کے مختلف حصوں سے لوگ آپ کی بارگاہ میں حاضری دینے آتے ہیں۔ بی بی کمال کی عظمت صرف ان کے عقیدت مندوں کے دلوں تک محدود نہیں رہی۔ ان سے وابستہ روایات، تذکرے اور تاریخی حوالوں نے ان کی شخصیت کو ایک وسیع روحانی پس منظر عطا کیا۔ اسی لیے انہیں برصغیر کی عظیم صوفی خواتین میں شمار کیا جاتا ہے اور عقیدت کی زبان میں ’’ہند کی رابعہ بصری‘‘ بھی کہا جاتا ہے۔ کاکو میں صوفی مہوتسو محض ایک سرکاری یا تفریحی پروگرام نہیں ہونا چاہیے۔ اس کے پیچھے ایک بڑا تہذیبی، روحانی اور علمی تصور تھا۔ جب 2011 کے آس پاس صوفی مہوتسو کا خاکہ تیار کیا گیا تھا تو تصور یہ تھا کہ کاکو کو صوفی سرکٹ سے جوڑا جائے، درگاہ کے احاطے میں صوفی ریسرچ سینٹر اور ایک لائبریری قائم ہو، جہاں ملک و بیرونِ ملک سے آنے والے محققین صوفی روایت، بی بی کمال کی زندگی، کاکو کی تاریخ اور گنگا جمنی تہذیب پر تحقیق کرسکیں۔ یہی وہ خواب تھا جو کاکو کو صرف ایک سالانہ میلے کی جگہ ایک بین الاقوامی صوفی مطالعاتی مرکز بنا سکتا تھا۔ افسوس کہ وقت گزرنے کے ساتھ صوفی سرکٹ کا وہ وژن سرکاری فائلوں اور دستاویزات کے درمیان کہیں دھندلا سا گیا۔ سوال یہ ہے کہ اگر کاکو کو صوفی سرکٹ میں شامل کرنے کا مقصد صرف چند روزہ تقریب، اسٹیج، روشنی اور انتظامی سرگرمیاں تھیں تو پھر ریسرچ سینٹر اور لائبریری کا خواب کیوں دیکھا گیا تھا؟ کاکو کو صرف سجانے کی نہیں، سمجھنے اور سنوارنے کی ضرورت ہے۔ یہاں آنے والے زائرین کو صرف تفریح نہیں، تاریخ ملنی چاہیے؛ محققین کو صرف دروازے نہیں، کتابیں ملنی چاہئیں؛ نوجوانوں کو صرف میلہ نہیں، اپنی تہذیبی شناخت سے جڑنے کا موقع ملنا چاہیے۔ آج پھر کاکو میں صوفی مہوتسو کی تیاریاں زوروں پر ہیں۔ ضلع انتظامیہ کی جانب سے کاکو پنی ہاس، بی بی کمال درگاہ اور پروگرام کے مقام کا جائزہ لیا گیا ہے۔ صفائی، پینے کے پانی، روشنی، عارضی بیت الخلاء، فود اسٹال، قیام و طعام اور دیگر انتظامات کو بہتر بنانے کی ہدایات دی گئی ہیں۔ یہ اچھی بات ہے کہ انتظامیہ تیاری کر رہی ہے، لیکن اصل سوال انتظامات سے کہیں بڑا ہے۔ کیا کاکو کا صوفی مہوتسو صرف ایک تقریب ہے یا ایک تہذیبی مشن؟ اگر یہ صرف ایک تقریب ہے تو چند گھنٹوں کی رونق کے بعد سب کچھ ختم ہوجائے گا۔ لیکن اگر اسے بی بی کمال کی روحانی میراث، صوفی فکر اور گنگا جمنی تہذیب کے فروغ کا ذریعہ بنایا جائے تو یہ آنے والی نسلوں کے لیے ایک عظیم ورثہ بن سکتا ہے۔ بدقسمتی سے بعض اوقات ایسے پروگرام بھی شامل کر دیے جاتے ہیں جن کا صوفی فکر، روحانیت یا کاکو کی تہذیبی شناخت سے براہِ راست کوئی تعلق نہیں ہوتا۔ نتیجہ یہ نکلتا ہے کہ اصل مقصد پس منظر میں چلا جاتا ہے اور لوگوں کی دلچسپی بھی کم ہونے لگتی ہے۔ صوفی مہوتسو کی روح صوفیانہ ہونی چاہیے، محض نمائشی نہیں۔ کاکو کے لیے سب سے بڑا تحفہ کوئی عارضی اسٹیج نہیں بلکہ ایک مستقل صوفی ریسرچ سینٹر ہوسکتا ہے۔
ایک ایسی لائبریری جہاں بی بی کمال، صوفیاء، کاکو کی تاریخ، قدیم مخطوطات، فارسی و اردو ادب، گنگا جمنی تہذیب اور ہندوستانی صوفی روایت پر کتابیں دستیاب ہوں۔ ایک ایسا مرکز جہاں ملک و بیرون ملک کے اسکالرز تحقیق کرسکیں۔ ایک ایسا میوزیم جہاں کاکو کی تاریخ محفوظ ہو۔ ایک ایسا ثقافتی مرکز جہاں نوجوانوں کو بتایا جائے کہ صوفی روایت صرف ماضی کی داستان نہیں بلکہ آج کے نفرت بھرے ماحول میں محبت، برداشت اور انسانیت کا عملی پیغام بھی ہے۔ یہی کاکو کا اصل صوفی سرکٹ ہونا چاہیے۔ آج جب معاشرہ نفرت، تعصب اور تقسیم کے مختلف خطرات سے دوچار ہے، ایسے وقت میں بی بی کمال کی بارگاہ پہلے سے کہیں زیادہ اہم ہوجاتی ہے۔ یہ بارگاہ ہمیں یاد دلاتی ہے کہ انسان کو انسان سمجھنا ہی سب سے بڑی انسانیت ہے۔ یہ ہمیں بتاتی ہے کہ عبادت صرف سجدے کا نام نہیں، بلکہ کسی بھوکے کو کھانا کھلانا، کسی مجبور کی مدد کرنا، کسی غم زدہ کے آنسو پونچھنا اور کسی انسان کے دل کو تکلیف نہ پہنچانا بھی روحانیت کا حصہ ہے۔ کاکو شریف کی اصل طاقت اس کی عمارتوں میں نہیں، اس کی روایت میں ہے۔ یہاں کی اصل پہچان اس کی روشنیوں میں نہیں، اس محبت میں ہے جو نسلوں سے دلوں کو جوڑتی آئی ہے۔ اس لیے صوفی مہوتسو کو بھی اسی روح کے ساتھ منایا جانا چاہیے۔ نہ سیاست کے لیے، نہ نمائش کے لیے، نہ صرف سرکاری خانہ پُری کے لیے؛ بلکہ محبت، امن، تحقیق، علم اور انسانیت کے فروغ کے لیے۔ کاکو شریف کی گلیاں آج بھی صدیوں پرانی کہانی سناتی ہیں۔ بی بی کمال کی بارگاہ آج بھی خاموش زبان میں انسان کو انسان سے محبت کرنے کا درس دیتی ہے۔ وقت آگیا ہے کہ ہم اس پیغام کو صرف سالانہ مہوتسو تک محدود نہ رکھیں۔ کاکو کو اس کا جائز مقام دیا جائے۔صوفی سرکٹ کا خواب دوبارہ زندہ کیا جائے۔ صوفی ریسرچ سینٹر قائم کیا جائے۔ لائبریری بنائی جائے۔ کاکو کی تاریخ کو محفوظ کیا جائے۔ اور بی بی کمال کی روحانی میراث کو دنیا تک پہنچایا جائے۔ کیونکہ کاکو شریف صرف جہان آباد کا ایک تاریخی قصبہ نہیں، یہ ہندوستان کی گنگا جمنی تہذیب کا زندہ باب ہے۔ اور بی بی کمال صرف ایک مزار کا نام نہیں، وہ اس روایت کی علامت ہیں جس میں انسانیت، محبت، امن اور بھائی چارہ سب سے بلند ہے۔ کاکو کی مٹی آج بھی پکار رہی ہے صوفی مہوتسو کو میلہ نہیں، مشن بنائیے؛ کاکو کو مقام نہیں، شناخت دیجیے اور بی بی کمال کی میراث کو صرف یاد نہیں، آنے والی نسلوں کے لیے محفوظ کیجیے۔ یہی کاکو کے ساتھ انصاف ہوگا۔ یہی بی بی کمال کی روحانی میراث کا احترام ہوگا۔ اور یہی ہندوستان کی گنگا جمنی تہذیب کو حقیقی خراجِ عقیدت ہوگا۔سید آصف امام کاکوی کا کہنا ہے کہ کاکو شریف کا صوفی مہوتسو محض ایک دو روزہ سرکاری تقریب بن کر نہ رہ جائے، بلکہ اسے حضرت مخدومہ بی بی کمال رحمۃ اللہ علیہا کی عظیم روحانی میراث، صوفی فکر، گنگا جمنی تہذیب اور انسانیت کے پیغام کو دنیا تک پہنچانے کا مؤثر ذریعہ بنایا جائے۔ بہار حکومت اور جہان آباد ضلع انتظامیہ سے ہمارا پُرزور مطالبہ ہے کہ کاکو شریف کو حقیقی معنوں میں صوفی سرکٹ سے جوڑنے کے لیے عملی اقدامات کیے جائیں۔ 2011 میں جس صوفی ریسرچ سینٹر اور لائبریری کا تصور پیش کیا گیا تھا، اسے دوبارہ زندہ کیا جائے، تاکہ ملک و بیرونِ ملک کے محققین بی بی کمال، کاکو کی تاریخ اور ہندوستان کی صوفی روایت پر تحقیق کرسکیں۔صوفی مہوتسو میں ایسے پروگرام شامل کیے جائیں جو صوفی ادب، تحقیق،موسیقی، تہذیب، امن، محبت اور بھائی چارے کو فروغ دیں، نہ کہ ایسے غیر متعلقہ پروگرام جو اس عظیم روحانی میلے کی اصل روح کو متاثر کریں۔ کاکو شریف صرف ایک مقام نہیں، بہار کی گنگا جمنی تہذیب کی زندہ پہچان ہے۔ اس کی روحانی عظمت کو سرکاری کاغذوں تک محدود نہ رکھا جائے، بلکہ اسے عالمی سطح پر متعارف کرانے کے لیے مستقل اور سنجیدہ منصوبہ بندی کی جائے۔ ہماری مانگ واضح ہے صوفی مہوتسو کو میلہ نہیں، مشن بنایا جائے کاکو کو صرف سیاحتی مقام نہیں، صوفی تحقیق و تہذیب کا عالمی مرکز بنایا جائے۔ fans CMO Bihar Syed Yasoob Raza Ashrafi T M Zeyaul Haque Raju Khan Inqalabi Sadique Akhtar Shahzeb Kakvi Shakil Kakvi Syed Tabish Warsi Syed Wasif Mohammad Hasnain Asif Neshat Malack Ajaz Sultan Iqbal Ahmed Ki Awaz Syed Humayun Akhtar Afsar Imam Syed Faisal Ali Dr Sultan Ahmad Akhtar Imam Anjum Syed Farhaan Wasti Syed Wakil Ashrafi Ehsan Tabish Ehsaan Uddin Kako Shahid Mallick Kakvi Kainat International School Rituraj Kumar Faizan Nasree

24-25 सितंबर को काको में सूफ़ी महोत्सव
26/08/2026

24-25 सितंबर को काको में सूफ़ी महोत्सव

काको में सूफ़ी महोत्सव की तैयारियों का डीएम ने लिया जायजाजहानाबाद की जिला पदाधिकारी श्रीमती छिरिङ वाई भूटिया ने आगामी 24...
25/08/2026

काको में सूफ़ी महोत्सव की तैयारियों का डीएम ने लिया जायजा

जहानाबाद की जिला पदाधिकारी श्रीमती छिरिङ वाई भूटिया ने आगामी 24 एवं 25 सितम्बर 2026 को आयोजित होने वाले सूफ़ी महोत्सव की तैयारियों को लेकर काको का निरीक्षण किया। उन्होंने कार्यक्रम स्थल, काको पनिहास एवं ऐतिहासिक बीबी कमाल दरगाह का जायजा लेकर संबंधित अधिकारियों को समयबद्ध तरीके से सभी व्यवस्थाएं दुरुस्त करने के निर्देश दिए।

डीएम ने उच्च विद्यालय, काको के खेल मैदान में साफ-सफाई, पेयजल, अस्थायी शौचालय, प्रकाश व्यवस्था एवं अन्य आवश्यक सुविधाएं सुनिश्चित करने पर जोर दिया। वहीं जीविका दीदियों के माध्यम से फूड स्टॉल की व्यवस्था करने का निर्देश दिया गया।

काको पनिहास की उड़ाही, साफ-सफाई, सौंदर्यीकरण एवं जीर्णोद्धार के लिए प्राक्कलन तैयार करने तथा बीबी कमाल दरगाह में श्रद्धालुओं के लिए आवासन, पेयजल, शौचालय, स्वच्छता और नियमित कचरा उठाव की व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहा गया।

सूफ़ी महोत्सव को लेकर काको में तैयारियां तेज हैं और जिला प्रशासन आयोजन को भव्य एवं व्यवस्थित बनाने में जुटा है।

KakoNews TeamJehanabad

25/08/2026

पटना के विज्ञान और आर्यभट्ट विश्वविद्यालय में बवाल! पुलिस से भिड़े छात्र

24/08/2026

🕊️ نمازِ جنازہ کا اعلان

إِنَّا لِلّٰهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ

🕌 نمازِ جنازہ

کل بروز منگل، نمازِ ظہر کے بعد
📍 آبائی گاؤں کاکو، ضلع جہان آباد

تمام عزیز و اقارب، دوست احباب اور اہلِ کاکو سے نہایت درد مندانہ گزارش ہے کہ اس غم کی گھڑی میں ضرور تشریف لائیں، نمازِ جنازہ میں شرکت فرمائیں اور مرحوم سید جمال مظہری صاحب کے لیے دل کی گہرائیوں سے دعائے مغفرت کریں۔

آپ کی شرکت اہلِ خانہ کے لیے تسلی اور مرحوم کے لیے بہترین ایصالِ ثواب ہوگی۔

اللہ تعالیٰ مرحوم کی کامل مغفرت فرمائے، درجات بلند فرمائے اور جنت الفردوس میں اعلیٰ مقام عطا فرمائے۔

آمین یا رب العالمین۔

24/08/2026

निशांत कुमार ने बीती रात सदर अस्पताल का औचक निरीक्षण कर स्वास्थ्य सुविधाओं और व्यवस्थाओं का जायजा लिया। इस दौरान साफ-सफाई, बेडशीट बदलने समेत कई कमियां सामने आईं। उन्होंने अधिकारियों से जरूरी दवाओं, उपकरणों और मैनपावर की जानकारी मांगी और व्यवस्था में सुधार के निर्देश दिए।

انتہائی افسوسناک خبر: جناب سید جمال مظہری صاحب کا انتقالإِنَّا لِلّٰهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَنہایت رنج و غم اور دل...
24/08/2026

انتہائی افسوسناک خبر: جناب سید جمال مظہری صاحب کا انتقال

إِنَّا لِلّٰهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ

نہایت رنج و غم اور دل گرفتگی کے ساتھ یہ افسوسناک خبر موصول ہوئی ہے کہ کاکو، ضلع جہان آباد سے گہرا تعلق رکھنے والے، مرحوم اظہار مظہری صاحب کے چوتھے فرزند، جناب سید جمال مظہری صاحب (ریٹائرڈ انجینئر) آج صبح بنگلور میں اس دارِ فانی سے رخصت ہو گئے۔

ان کے انتقال کی خبر نے اہلِ خانہ، عزیز و اقارب، دوست احباب اور کاکو سے وابستہ تمام لوگوں کو غمزدہ کر دیا ہے۔ ایک مخلص، شریف، ملنسار اور قابلِ احترام شخصیت کا یوں اچانک ہم سے جدا ہو جانا یقیناً انتہائی تکلیف دہ سانحہ ہے۔

اطلاع کے مطابق مرحوم کی تدفین ان کے آبائی گاؤں کاکو، ضلع جہان آباد میں کل بروز منگل ہونے کا امکان ہے۔

آئیے، ہم سب مل کر اس غم کی گھڑی میں مرحوم کے لیے دل کی گہرائیوں سے دعائے مغفرت کریں۔

یا اللہ! جناب سید جمال مظہری صاحب کی کامل مغفرت فرما۔
ان کے درجات بلند فرما۔
ان کی قبر کو نور سے منور فرما اور اسے جنت کا باغ بنا دے۔
انہیں جنت الفردوس میں اعلیٰ مقام عطا فرما۔
حضور نبی اکرم ﷺ کی شفاعت نصیب فرما۔
تمام لغزشوں اور خطاؤں کو معاف فرما۔
اور ان کے تمام اہلِ خانہ، عزیز و اقارب اور سوگواران کو صبرِ جمیل عطا فرما۔

آمین یا رب العالمین۔

اللہ تعالیٰ مرحوم کو اپنی رحمتِ خاص میں جگہ عطا فرمائے اور پسماندگان کو یہ عظیم صدمہ برداشت کرنے کی توفیق دے۔

إِنَّا لِلّٰهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ

Wasit Mazhari Syed Asif Imam

Address

Kako Jehanabad
Kako
804418

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