29/08/2026
काको सूफी महोत्सव में सूफिज्म की तलाश… अबकी बार काको की रूहानी विरासत को मिले उसका हक़
(24–25 सितम्बर 2026 को होने वाला सूफी महोत्सव केवल एक सरकारी आयोजन नहीं, काको की सदियों पुरानी रूहानी विरासत का आईना बने)
सैयद आसिफ़ इमाम काकवी
कभी-कभी कोई जगह सिर्फ़ नक्शे पर दर्ज एक नाम नहीं होती, बल्कि वह अपने भीतर सदियों की दास्तान, दुआओं की खुशबू, बुज़ुर्गों की रूहानी विरासत और इंसानियत का पैग़ाम समेटे होती है। काको शरीफ़ ऐसी ही सरज़मीन है—एक ऐसी पाक और ऐतिहासिक धरती, जिसे औलिया-ए-किराम की रूहानी विरासत ने पहचान दी और जिसे अहल-ए-ज़बान कमालाबाद के नाम से भी याद करते हैं। इसी काको की धरती पर जब सूफी महोत्सव का आयोजन होता है तो उम्मीद सिर्फ़ एक रंगारंग कार्यक्रम की नहीं होती। उम्मीद होती है कि यहां सूफिज्म बोलेगा, सूफी परंपरा दिखाई देगी, इतिहास सांस लेगा और हज़रत मख़दुमा बीबी कमाल रहमतुल्लाह अलैहा का पैग़ाम-ए-मोहब्बत, अमन, इंसानियत और भाईचारा दुनिया तक पहुंचेगा। वर्ष 2011 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में सूफी महोत्सव की शुरुआत इसी सोच और मकसद के साथ हुई थी कि बिहार की महान सूफी विरासत को देश-दुनिया के सामने लाया जाए। तब से काको में लगातार इस आयोजन की परंपरा चली आ रही है। इस वर्ष भी 24 और 25 सितम्बर 2026 को बिहार सरकार के पर्यटन विभाग और जहानाबाद जिला प्रशासन की ओर से सूफी महोत्सव आयोजित किया जा रहा है। लेकिन आज काको की सरज़मीन से एक सवाल उठ रहा है क्या काको सूफी महोत्सव में अब सूफिज्म ही पीछे छूटता जा रहा है? यह सवाल किसी विरोध की भावना से नहीं, बल्कि काको की मिट्टी से मोहब्बत करने वाले एक शख्स के दिल से निकल रहा है। सूफी महोत्सव का मकसद महज़ मंच सजाना, कार्यक्रम कराना और दो दिन की भीड़ जुटाना नहीं था। इसका असल उद्देश्य था सूफी संस्कृति, सूफी विचारधारा और काको की रूहानी विरासत को देश और दुनिया तक पहुंचाना।
काको को सूफी सर्किट से जोड़ने के पीछे भी यही व्यापक सोच थी कि यहां सूफिज्म पर शोध हो, नई पीढ़ी सूफी परंपरा को जाने और देश-विदेश से आने वाले शोधकर्ताओं के लिए अध्ययन का केंद्र विकसित हो। जब 2011 में इस महोत्सव का खाका तैयार हुआ था, तब दरगाह परिसर में सूफी रिसर्च सेंटर और लाइब्रेरी जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं की भी चर्चा थी। कल्पना कीजिए अगर काको में एक ऐसा केंद्र बनता जहां हज़रत मख़दुमा बीबी कमाल और बिहार की सूफी परंपरा पर शोध होता, पुरानी पांडुलिपियां संरक्षित होतीं, किताबें उपलब्ध होतीं और देश-दुनिया के विद्वान यहां आते, तो काको की पहचान आज कितनी बड़ी होती!
अफसोस… वह सपना आज भी अधूरा है। काको सिर्फ़ एक पर्यटन स्थल नहीं है काको शरीफ़ की पहचान किसी सरकारी फाइल से नहीं बनी। यह पहचान सदियों की रूहानी मेहनत से बनी है।
हज़रत मख़दुमा बीबी कमाल रहमतुल्लाह अलैहा की जिंदगी हमें प्रेम, त्याग, इंसानियत, अमन और भाईचारे का संदेश देती है। स्थानीय परंपरा और श्रद्धा में उन्हें हिंद की राबिया बसरी जैसी महान वलिया के रूप में याद किया जाता है। कहा जाता है कि जिस क्षेत्र में कभी दीन और ज्ञान की रोशनी कम थी, वहां उन्होंने अपनी कोशिशों से ऐसी रूहानी रोशनी फैलाई कि काको एक इल्म, इबादत और इंसानियत के चमन में बदल गया। यही वजह है कि आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों से अकीदतमंद यहां हाज़िरी देने आते हैं। यहां की गंगा-जमुनी तहज़ीब किसी भाषण की मोहताज नहीं। काको की गलियों, दरगाह, मेलों और लोगों के बीच यह तहज़ीब आज भी ज़िंदा दिखाई देती है। फिर सूफी महोत्सव में सूफिज्म क्यों कम दिखाई देता है? यह सवाल जहानाबाद जिला प्रशासन और बिहार पर्यटन विभाग से पूछना ज़रूरी है। महोत्सव में ऐसे कार्यक्रम होने चाहिए जिनसे लोग सूफिज्म को समझें, सिर्फ़ मनोरंजन लेकर वापस न लौटें।
काको में आयोजित होने वाला कार्यक्रम ऐसा क्यों न हो जिसमें
सूफी विचारधारा पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी हो,
हज़रत मख़दुमा बीबी कमाल की जिंदगी और शिक्षाओं पर शोधपत्र प्रस्तुत किए जाएं, सूफी रिसर्च सेंटर की आधारशिला रखी जाए, एक समृद्ध सूफी लाइब्रेरी की शुरुआत हो, बिहार के सूफी संतों पर प्रदर्शनी लगे, कव्वाली और सूफियाना कलाम के साथ सूफी दर्शन पर गंभीर चर्चा हो, युवाओं के लिए सूफिज्म और गंगा-जमुनी तहज़ीब पर विशेष सत्र हों, देश-विदेश के शोधकर्ताओं और इतिहासकारों को आमंत्रित किया जाए, काको की ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने की ठोस योजना बने।
यही होता असली सूफी महोत्सव। सिर्फ़ मंच और रोशनी से महोत्सव यादगार नहीं बनता। महोत्सव तब यादगार बनता है जब उसके बाद कोई स्थायी निशानी बची रहे। काको की आवाज़ अब जहानाबाद के डीएम और बिहार पर्यटन विभाग तक पहुंच चुकी है
मैंने अपनी कलम से काको की इस पीड़ा को उठाया है। मेरी आवाज़ जहानाबाद के जिलाधिकारी तक पहुंची है, बिहार पर्यटन विभाग तक पहुंची है। अब उम्मीद है कि इस आवाज़ को सिर्फ़ शिकायत नहीं, बल्कि एक सकारात्मक सुझाव के रूप में देखा जाएगा। काको किसी एक समुदाय की विरासत नहीं है। यह बिहार की साझा सांस्कृतिक विरासत है। यह उस भारत की तस्वीर है जहां सूफी संतों ने तलवार से नहीं, मोहब्बत से दिल जीते।
आज जब समाज को नफ़रत की आवाज़ों से ज्यादा मोहब्बत की आवाज़ की जरूरत है, तब काको जैसी जगहों की अहमियत और बढ़ जाती है। अबकी बार सिर्फ़ कार्यक्रम नहीं, इतिहास रचा जाए
24 और 25 सितम्बर 2026 को जब काको की धरती पर सूफी महोत्सव का मंच सजे तो मेरी दिली ख्वाहिश है कि इस बार काको की रूह भी उस मंच पर दिखाई दे। काको को सिर्फ़ दो दिनों के महोत्सव तक सीमित मत रखिए। इसे ऐसा केंद्र बनाइए जहां साल के बारह महीने सूफिज्म पर शोध हो, किताबें पढ़ी जाएं, इतिहास संरक्षित हो, युवाओं को अपनी विरासत से जोड़ा जाए और दुनिया को यह बताया जाए कि बिहार की मिट्टी ने भी ऐसे सूफी पैदा किए जिन्होंने इंसानियत को अपना मज़हब और मोहब्बत को अपना पैग़ाम बनाया। जिला प्रशासन अगर इस दिशा में गंभीर पहल करता है तो काको के लोगों का उत्साह फिर लौटेगा। मेरी उम्मीद है कि सूफी महोत्सव 2026 सिर्फ़ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि काको की रूहानी विरासत के पुनर्जागरण का वर्ष बनेगा।
इस बार कार्यक्रम ऐसा हो कि लोग लौटते हुए सिर्फ़ यह न कहें कि “महोत्सव अच्छा था।” बल्कि वे कहें हमने काको में सूफिज्म को महसूस किया।” और शायद यही हज़रत मख़दुमा बीबी कमाल रहमतुल्लाह अलैहा की धरती के लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।
काको पुकार रहा है अपनी विरासत के लिए, अपने सूफिज्म के लिए, अपने रिसर्च सेंटर के लिए, अपनी लाइब्रेरी के लिए और उस अधूरे ख्वाब की तकमील के लिए, जिसे 2011 में देखा गया था।
अब फैसला हुकूमत और प्रशासन को करना है काको को सिर्फ़ मंच देना है या उसकी रूह को आवाज़ भी देनी है? मेरी कलम को उम्मीद है…इस बार काको निराश नहीं होगा। इस बार काको सूफी महोत्सव सचमुच यादगार होगा।