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गीता से ज्ञान की प्राप्ति हुई, रामायण से भगवान राम के आदर्श मिले, भाग्य से हिंदू धर्म का सानिध्य मिला, किस्मत से हिंदुस्...
26/01/2026

गीता से ज्ञान की प्राप्ति हुई, रामायण से भगवान राम के आदर्श मिले, भाग्य से हिंदू धर्म का सानिध्य मिला, किस्मत से हिंदुस्तान की नागरिकता प्राप्त हुई, युवा भारत का उत्थान होता भारत..

🇮🇳 નવું નેતૃત્વ, નવી ઊર્જા, સશક્ત ભારત!​ભારતીય જનતા પાર્ટીના રાષ્ટ્રીય અધ્યક્ષ તરીકે યુવા અને ઓજસ્વી નેતા શ્રી  જીનું સુ...
21/01/2026

🇮🇳 નવું નેતૃત્વ, નવી ઊર્જા, સશક્ત ભારત!

​ભારતીય જનતા પાર્ટીના રાષ્ટ્રીય અધ્યક્ષ તરીકે યુવા અને ઓજસ્વી નેતા શ્રી જીનું સુકાન સંભાળવું એ 'Young India Grow India' ના સંકલ્પનું સૌથી મોટું ઉદાહરણ છે.

​45 વર્ષની વયે આટલી મોટી જવાબદારી સંભાળીને તેમણે સાબિત કર્યું છે કે નવા ભારતનું ભવિષ્ય યુવાનોના હાથમાં સુરક્ષિત છે. તેમની સંગઠનાત્મક કુશળતા અને નવી દ્રષ્ટિ દેશના વિકાસને નવી ગતિ આપશે.

​જ્યારે નેતૃત્વ યુવાન હોય, ત્યારે દેશનો જોશ પણ બમણો થઈ જાય છે. ચાલો, તેમના નેતૃત્વમાં આપણે સૌ સાથે મળીને 'વિકસિત ભારત'ના સ્વપ્નને સાકાર કરીએ.

​ખૂબ ખૂબ અભિનંદન, અધ્યક્ષજી! 💐

"वो ज्योति थी सावित्री की"​पत्थर खाए, कीचड़ झेला, पर हिम्मत कभी न हारी थी,सदियों की सोई नारी को, जिसने पहली बार पुकारी थ...
03/01/2026

"वो ज्योति थी सावित्री की"

​पत्थर खाए, कीचड़ झेला, पर हिम्मत कभी न हारी थी,
सदियों की सोई नारी को, जिसने पहली बार पुकारी थी।
​समाज की बेड़ियों को तोड़कर, शिक्षा का दीप जलाया था,
नारी के बंद नसीबों का, उसने ही द्वार खुलाया था।
​वो मात्र एक शिक्षिका नहीं, क्रांति की एक मशाल थी,
अंधियारे से लड़ जाने वाली, वो एक बेमिसाल ढाल थी।
​आज नमन है उस जननी को, जिसने हमें पहचान दी,
सावित्री की उस हिम्मत ने ही, नारी को नई उड़ान दी।

राष्ट्रीय किसान दिवस 🌾23 दिसंबर​"मिट्टी से जो सोना उगाए,वही सच्चा किसान कहलाए।"​सभी अन्नदाताओं कोकोटि-कोटि नमन! 🙏​🚜 जय ज...
23/12/2025

राष्ट्रीय किसान दिवस 🌾
23 दिसंबर
​"मिट्टी से जो सोना उगाए,
वही सच्चा किसान कहलाए।"
​सभी अन्नदाताओं को
कोटि-कोटि नमन! 🙏
​🚜 जय जवान, जय किसान! 🇮🇳

"किताबी प्रतिज्ञा बनाम कड़वा सच"​(दृश्य: बच्चा अपनी स्कूल की किताब का पहला पन्ना खोलकर बैठा है और कुछ सोच रहा है। वह फिर...
18/12/2025

"किताबी प्रतिज्ञा बनाम कड़वा सच"

​(दृश्य: बच्चा अपनी स्कूल की किताब का पहला पन्ना खोलकर बैठा है और कुछ सोच रहा है। वह फिर अपनी माँ के पास जाता है।)

​बेटा: माँ, एक बात और समझ नहीं आई।

​माँ: अब क्या हुआ बेटा?

​बेटा: (किताब दिखाते हुए) माँ, देखो यहाँ पहले पन्ने पर यह 'प्रतिज्ञा' लिखी है। हम रोज सुबह स्कूल में इसे बोलते हैं - "भारत मेरा देश है। समस्त भारतीय मेरे भाई-बहन हैं।"

​माँ: हाँ बेटा, यह तो बहुत अच्छी बात है। इसमें क्या समझ नहीं आया?

​बेटा: माँ, अगर "समस्त भारतीय मेरे भाई-बहन हैं," तो फिर मेरे उन भाई-बहनों को सरकार सुविधा देती है और मुझे नहीं? क्या एक घर में माँ-बाप अपने एक बच्चे को तो सब कुछ देते हैं और दूसरे को भूखा रखते हैं? क्या यही भाई-चारा है?

​माँ: (आँखों में नमी के साथ) बेटा, यह भाई-चारा सिर्फ किताबों के पन्नों तक सिमट कर रह गया है। जब संविधान बना था, तो सपना 'समानता' का था, लेकिन अब हकीकत 'बँटवारे' की है।

​बेटा: तो माँ, क्या मुझे स्कूल में यह प्रतिज्ञा बोलनी छोड़ देनी चाहिए? क्योंकि जब सर क्लास में पूछते हैं कि कौन SC/ST है और कौन General, तो हम 'भाई-बहन' नहीं रहते, हम सिर्फ 'कैटेगिरी' बन जाते हैं।

​माँ: बेटा, गलती तुम्हारी या उस प्रतिज्ञा की नहीं है। गलती उस व्यवस्था की है जिसने "गरीबी" का आधार "जाति" को बना दिया है, न कि "हालात" को। जो अमीर है, उसे जाति के नाम पर मदद मिल रही है, और जो तुम जैसा गरीब है, उसे 'सवर्ण' होने की सजा मिल रही है।

​बेटा: तो इसका मतलब माँ, यह प्रतिज्ञा झूठ है?

​माँ: झूठ नहीं बेटा, यह एक अधूरा सपना है। आज देश को ऐसे नेताओं की जरूरत है जो तुम्हें "वोट बैंक" नहीं, बल्कि "भारत का भविष्य" समझें। जब तक सुविधाओं का आधार 'जाति' रहेगी, तब तक यह प्रतिज्ञा अधूरी ही रहेगी।

​बेटा: (मासूमियत से) काश! कोई ऐसा नियम होता कि जो गरीब है, बस वही मदद का हकदार होता। तब शायद क्लास में हम सब सच में भाई-बहन होते।

"शतक पूर्ण, संकल्प नया"​सौ वर्ष की अविरल धारा, बहती निश-दिन अविकारी,केशव ने जो जलाई मशाल, बनी आज वह सूर्य भारी।​कदम-कदम ...
18/12/2025

"शतक पूर्ण, संकल्प नया"

​सौ वर्ष की अविरल धारा, बहती निश-दिन अविकारी,
केशव ने जो जलाई मशाल, बनी आज वह सूर्य भारी।
​कदम-कदम पर तपा है जो, वही तो सच्चा कुंदन है,
मातृभूमि के चरणों में, सौ वर्षों का यह वंदन है।
​शाखाओं के खेल-खेल में, हमने सीखा राष्ट्र-प्रेम,
व्यक्ति नहीं, विचार बड़ा है, यही हमारा नित्य नेम।
​आओ शताब्दी वर्ष पर हम, फिर से यह हुंकार भरें,
परम वैभव प्राप्त किए बिन, पल भर न विश्राम करें।
​तन समर्पित, मन समर्पित, और यह जीवन समर्पित,
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

​भारत माता की जय!

18/12/2025

आज के समय में कई युवाओं के मन की बात है। उस 'प्रतिज्ञा पत्र' (Pledge) और आज की सामाजिक वास्तविकता के द्वंद्व (Conflict) को जोड़ते हुए कहानी को एक नया और गहरा रूप देते हैं।

​कहानी : प्रतिज्ञा और पहचान

​गाँव "कालावड" के उसी पुराने स्कूल में सुबह की प्रार्थना (Prayer) का समय था। सभी बच्चे कतार में खड़े थे। प्रार्थना के बाद, हमेशा की तरह 'प्रतिज्ञा' (Pledge) लेने की बारी आई।
​सभी बच्चों ने अपना दायाँ हाथ आगे बढ़ाया और एक सुर में बोलना शुरू किया:
"भारत मेरा देश है। समस्त भारतीय मेरे भाई-बहन हैं..."
​तभी अचानक, ग्यारहवीं कक्षा का एक होनहार छात्र, आर्यन, बीच में ही चुप हो गया। उसने अपना हाथ नीचे कर लिया।

​मास्टर दीनानाथ जी ने यह देख लिया। सभा खत्म होने के बाद उन्होंने आर्यन को रोका और पूछा, "बेटा, आज तुमने प्रतिज्ञा पूरी क्यों नहीं की? क्या तुम अपने देश को अपना नहीं मानते?"

​आर्यन की आँखों में एक अजीब सी पीड़ा थी। उसने भारी मन से कहा, "मास्टर जी, मैं इस प्रतिज्ञा का अपमान नहीं करना चाहता, लेकिन सच तो यह है कि अब मुझे यह लाइनें झूठी लगती हैं। हम कहते हैं 'समस्त भारतीय मेरे भाई-बहन हैं', लेकिन क्या सच में ऐसा है?"

​मास्टर जी ने हैरानी से पूछा, "तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?"

​आर्यन ने भावुक होकर कहा, "मास्टर जी, किताब के पहले पन्ने पर लिखी यह प्रतिज्ञा कहती है कि हम सब एक हैं। लेकिन जैसे ही हम स्कूल के बाहर की दुनिया में कदम रखते हैं या किसी सरकारी फॉर्म को भरते हैं, तो हमारी पहचान 'भारतीय' नहीं रह जाती। हमें जातियों और वर्गों (Categories) में बाँट दिया जाता है। आरक्षण (Reservation) की लकीरों ने हमें 'भाई-बहन' नहीं, बल्कि 'कोटे' और 'प्रतिशत' में बदल दिया है। अगर भारत माता के लिए हम सब बच्चे एक समान हैं, तो यह भेदभाव क्यों? किसी को कम नंबर पर भी सब कुछ, और किसी को मेहनत के बाद भी निराशा... क्या यही समानता है?"

​आर्यन की बात सुनकर रमन, आसिफ और बाकी बच्चे भी पास आ गए। सबके मन में यही सवाल था। माहौल गंभीर हो गया। बिरजू, जो गरीब था, वह भी आर्यन की बात को समझ रहा था कि गरीबी जाति देखकर नहीं आती।
​मास्टर दीनानाथ जी ने एक गहरी साँस ली। उन्होंने आर्यन के कंधे पर हाथ रखा और पूरी कक्षा की ओर मुड़े।

​उन्होंने कहा, "आर्यन, तुम्हारा दर्द जायज है। जब एक माँ के बच्चों को अलग-अलग नजर से देखा जाए या बाँटा जाए, तो बच्चों को असमानता महसूस होती ही है। समाज और राजनीति ने नियमों के नाम पर दीवारें खड़ी कर दी हैं, जहाँ 'योग्यता' (Merit) कई बार 'पहचान' के नीचे दब जाती है।"

​मास्टर जी ने फिर उस 'प्रतिज्ञा पत्र' की ओर इशारा किया और कहा, "लेकिन बेटा, याद रखना... यह प्रतिज्ञा वह नहीं है जो 'आज' हकीकत है, बल्कि यह प्रतिज्ञा वह 'सपना' है जिसे हमें सच करना है। सिस्टम ने हमें बाँटा है, भारत माता ने नहीं। जब तुम सरहद पर खड़े फौजी को देखोगे, तो उसे आरक्षण या जाति से नहीं, 'भारतीय' होने से जाना जाता है। जब तुम ओलिंपिक में मेडल लाते हो, तो वह किसी वर्ग का नहीं, भारत का होता है।"

​मास्टर जी ने फिर बिरजू की लाई हुई मिट्टी उठाई और कहा, "देखो, इस मिट्टी में खाद भी है, कंकड़ भी और रेत भी। लेकिन जब यह मिलती है, तो सिर्फ 'ज़मीन' कहलाती है। आज समाज में जो असमानता की लकीरें हैं, उन्हें मिटाने की जिम्मेदारी तुम बच्चों पर है। जिस दिन तुम सब अपने दोस्तों को उनकी 'जाति' या 'कोटे' से नहीं, बल्कि उनकी 'मेहनत' और 'इंसानियत' से पहचानोगे, उस दिन यह प्रतिज्ञा सच हो जाएगी।"
​आर्यन ने मास्टर जी की बात सुनी। उसकी आँखों से गुस्सा कम हुआ और एक संकल्प जागा।

​उसने फिर से अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा, "मास्टर जी, मैं समझ गया। दुनिया हमें चाहे जितने खानों में बाँटे, लेकिन हम अपने मन में यह बँटवारा नहीं होने देंगे। हम ऐसा भारत बनाएंगे जहाँ सच में हर बच्चा भारत माता के लिए एक समान हो।"

​उस दिन स्कूल के आँगन में बच्चों ने फिर से प्रतिज्ञा दोहराई, लेकिन इस बार उनके शब्दों में एक अलग ही ज़ोर था। वे समझ चुके थे कि 'समस्त भारतीय मेरे भाई-बहन हैं' सिर्फ एक लाइन नहीं, बल्कि एक चुनौती है जिसे उन्हें अपनी एकता से सच साबित करना है।

​कहानी का नया सार:

​किताबों में लिखी प्रतिज्ञा तब तक अधूरी है, जब तक हम उसे अपने आचरण में नहीं उतारते। आरक्षण या सामाजिक ढाँचे चाहे हमें कागजों पर बाँट दें, लेकिन एक सच्चे नागरिक के रूप में हमें एक-दूसरे को समान नज़र से ही देखना चाहिए। भारत माता की असली ख़ुशी अपने बच्चों की 'समानता' में ही है।

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