18/12/2025
आज के समय में कई युवाओं के मन की बात है। उस 'प्रतिज्ञा पत्र' (Pledge) और आज की सामाजिक वास्तविकता के द्वंद्व (Conflict) को जोड़ते हुए कहानी को एक नया और गहरा रूप देते हैं।
कहानी : प्रतिज्ञा और पहचान
गाँव "कालावड" के उसी पुराने स्कूल में सुबह की प्रार्थना (Prayer) का समय था। सभी बच्चे कतार में खड़े थे। प्रार्थना के बाद, हमेशा की तरह 'प्रतिज्ञा' (Pledge) लेने की बारी आई।
सभी बच्चों ने अपना दायाँ हाथ आगे बढ़ाया और एक सुर में बोलना शुरू किया:
"भारत मेरा देश है। समस्त भारतीय मेरे भाई-बहन हैं..."
तभी अचानक, ग्यारहवीं कक्षा का एक होनहार छात्र, आर्यन, बीच में ही चुप हो गया। उसने अपना हाथ नीचे कर लिया।
मास्टर दीनानाथ जी ने यह देख लिया। सभा खत्म होने के बाद उन्होंने आर्यन को रोका और पूछा, "बेटा, आज तुमने प्रतिज्ञा पूरी क्यों नहीं की? क्या तुम अपने देश को अपना नहीं मानते?"
आर्यन की आँखों में एक अजीब सी पीड़ा थी। उसने भारी मन से कहा, "मास्टर जी, मैं इस प्रतिज्ञा का अपमान नहीं करना चाहता, लेकिन सच तो यह है कि अब मुझे यह लाइनें झूठी लगती हैं। हम कहते हैं 'समस्त भारतीय मेरे भाई-बहन हैं', लेकिन क्या सच में ऐसा है?"
मास्टर जी ने हैरानी से पूछा, "तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?"
आर्यन ने भावुक होकर कहा, "मास्टर जी, किताब के पहले पन्ने पर लिखी यह प्रतिज्ञा कहती है कि हम सब एक हैं। लेकिन जैसे ही हम स्कूल के बाहर की दुनिया में कदम रखते हैं या किसी सरकारी फॉर्म को भरते हैं, तो हमारी पहचान 'भारतीय' नहीं रह जाती। हमें जातियों और वर्गों (Categories) में बाँट दिया जाता है। आरक्षण (Reservation) की लकीरों ने हमें 'भाई-बहन' नहीं, बल्कि 'कोटे' और 'प्रतिशत' में बदल दिया है। अगर भारत माता के लिए हम सब बच्चे एक समान हैं, तो यह भेदभाव क्यों? किसी को कम नंबर पर भी सब कुछ, और किसी को मेहनत के बाद भी निराशा... क्या यही समानता है?"
आर्यन की बात सुनकर रमन, आसिफ और बाकी बच्चे भी पास आ गए। सबके मन में यही सवाल था। माहौल गंभीर हो गया। बिरजू, जो गरीब था, वह भी आर्यन की बात को समझ रहा था कि गरीबी जाति देखकर नहीं आती।
मास्टर दीनानाथ जी ने एक गहरी साँस ली। उन्होंने आर्यन के कंधे पर हाथ रखा और पूरी कक्षा की ओर मुड़े।
उन्होंने कहा, "आर्यन, तुम्हारा दर्द जायज है। जब एक माँ के बच्चों को अलग-अलग नजर से देखा जाए या बाँटा जाए, तो बच्चों को असमानता महसूस होती ही है। समाज और राजनीति ने नियमों के नाम पर दीवारें खड़ी कर दी हैं, जहाँ 'योग्यता' (Merit) कई बार 'पहचान' के नीचे दब जाती है।"
मास्टर जी ने फिर उस 'प्रतिज्ञा पत्र' की ओर इशारा किया और कहा, "लेकिन बेटा, याद रखना... यह प्रतिज्ञा वह नहीं है जो 'आज' हकीकत है, बल्कि यह प्रतिज्ञा वह 'सपना' है जिसे हमें सच करना है। सिस्टम ने हमें बाँटा है, भारत माता ने नहीं। जब तुम सरहद पर खड़े फौजी को देखोगे, तो उसे आरक्षण या जाति से नहीं, 'भारतीय' होने से जाना जाता है। जब तुम ओलिंपिक में मेडल लाते हो, तो वह किसी वर्ग का नहीं, भारत का होता है।"
मास्टर जी ने फिर बिरजू की लाई हुई मिट्टी उठाई और कहा, "देखो, इस मिट्टी में खाद भी है, कंकड़ भी और रेत भी। लेकिन जब यह मिलती है, तो सिर्फ 'ज़मीन' कहलाती है। आज समाज में जो असमानता की लकीरें हैं, उन्हें मिटाने की जिम्मेदारी तुम बच्चों पर है। जिस दिन तुम सब अपने दोस्तों को उनकी 'जाति' या 'कोटे' से नहीं, बल्कि उनकी 'मेहनत' और 'इंसानियत' से पहचानोगे, उस दिन यह प्रतिज्ञा सच हो जाएगी।"
आर्यन ने मास्टर जी की बात सुनी। उसकी आँखों से गुस्सा कम हुआ और एक संकल्प जागा।
उसने फिर से अपना हाथ आगे बढ़ाया और कहा, "मास्टर जी, मैं समझ गया। दुनिया हमें चाहे जितने खानों में बाँटे, लेकिन हम अपने मन में यह बँटवारा नहीं होने देंगे। हम ऐसा भारत बनाएंगे जहाँ सच में हर बच्चा भारत माता के लिए एक समान हो।"
उस दिन स्कूल के आँगन में बच्चों ने फिर से प्रतिज्ञा दोहराई, लेकिन इस बार उनके शब्दों में एक अलग ही ज़ोर था। वे समझ चुके थे कि 'समस्त भारतीय मेरे भाई-बहन हैं' सिर्फ एक लाइन नहीं, बल्कि एक चुनौती है जिसे उन्हें अपनी एकता से सच साबित करना है।
कहानी का नया सार:
किताबों में लिखी प्रतिज्ञा तब तक अधूरी है, जब तक हम उसे अपने आचरण में नहीं उतारते। आरक्षण या सामाजिक ढाँचे चाहे हमें कागजों पर बाँट दें, लेकिन एक सच्चे नागरिक के रूप में हमें एक-दूसरे को समान नज़र से ही देखना चाहिए। भारत माता की असली ख़ुशी अपने बच्चों की 'समानता' में ही है।