16/05/2026
जीवन की इस अंजान सी दौड़ में
ठहरा जब भी मैं सुकून की सांस लेने को..
एक धक्का मार भोलेनाथ ने जगाया और कहा..
रुकता क्यूं है रे योद्धा... बढ़ता रह सदा... चलता रह सदा
मैं लड़ा.. फिर लड़ा..
हर नई चुनौती से लड़ा..
संघर्ष था... बड़े से बड़ा..
और.. कड़े से कड़ा..
पर निराश होने का विकल्प
महादेव ने मुझे देकर
भेजा ही नहीं था...
तो लड़ना ही एक मात्र
मार्ग शेष था..
जब उलझनें
एक सीमा के पार गईं..
तो थामा
हाथ भी उन्होंने ही थामा..
दिए..
अप्रत्याशित रास्ते भी दिए
और कहा..
तुझे तालाब बनने को
भेजा भी नहीं है..
कि एक आरामदायक घाट पर
तू जीवन बिता दे...
बन..
तू कल कल बहती..
नदी की इक धारा बन..
लड़...
तू रोज अंजान मोड़ों से लड़..
टकरा...
तू रोज नई चट्टानों से टकरा..
बना...
जो कोई उस रास्ते पे न चला.. तू 'वो' रास्ते बना..
खोज..
तू हर संकट से निकलने का मार्ग.. खुद खोज
बन..
नदी से यूं बढ़ते बढ़ते.. तू एक दिन समंदर बन
हाँ, तू समंदर बन..
इसलिए..
रुकना नहीं है पुत्र... बढ़ता रह सदा... चलता रह सदा
ये अंधेरा
जो घेर लेता है कभी कभी तुझे
और रास्ते दिखना ही..
हो जाते हैं बंद..
ये कुछ नहीं..
बस तुझे
समंदर बनाने की तईय्यारी है मेरी..
परीक्षाओं से..
कंधे मजबूत करने की योजना है मेरी..
इतना आसान तो न होगा..
इक विराट अनन्त सागर सा बन जाना
लड़ना तो होगा..
और बहुत लड़ना होगा..
तो...
न रुकना है..
न थमना है..
न पलटना है..
न विलपना है..
आने दे...
हर मोड़ पे इक नए..
संकट को आने दे..
जन्मने दे..
हर सुकून में भी..
इक नए संग्राम को जन्मने दे..
तू तो लड़..
जो कभी हार न माने
उस योद्धा के भांति लड़..
तू तो सीख..
हर युद्ध से कुछ नए पाठ तू सीख
फिर हर अगले युद्ध में
तू तो चमक..
अनन्त संकटों के बीच भी..
धरती पर तू सूर्य के भांति चमक..
हाँ, तू धरती पर सूर्य के भांति चमक..
इसलिए..
रुकना नहीं है शिव... बढ़ता रह सदा... चलता रह सदा
.. हर हर महादेव...
-ओमेन्द्र 'भारत'
16 मई, 2026.