Omendra 'Bharat': भावाभिव्यक्ति - ओमेन्द्र 'भारत'

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Omendra 'Bharat': भावाभिव्यक्ति - ओमेन्द्र 'भारत' बस...

यूं ही..

जो दिल में आ गया... वो लिख दिया

जीवन की इस अंजान सी दौड़ मेंठहरा जब भी मैं सुकून की सांस लेने को..एक धक्का मार भोलेनाथ ने जगाया और कहा..रुकता क्यूं है रे...
16/05/2026

जीवन की इस अंजान सी दौड़ में
ठहरा जब भी मैं सुकून की सांस लेने को..
एक धक्का मार भोलेनाथ ने जगाया और कहा..
रुकता क्यूं है रे योद्धा... बढ़ता रह सदा... चलता रह सदा

मैं लड़ा.. फिर लड़ा..
हर नई चुनौती से लड़ा..
संघर्ष था... बड़े से बड़ा..
और.. कड़े से कड़ा..
पर निराश होने का विकल्प
महादेव ने मुझे देकर
भेजा ही नहीं था...
तो लड़ना ही एक मात्र
मार्ग शेष था..
जब उलझनें
एक सीमा के पार गईं..
तो थामा
हाथ भी उन्होंने ही थामा..
दिए..
अप्रत्याशित रास्ते भी दिए
और कहा..
तुझे तालाब बनने को
भेजा भी नहीं है..
कि एक आरामदायक घाट पर
तू जीवन बिता दे...
बन..
तू कल कल बहती..
नदी की इक धारा बन..
लड़...
तू रोज अंजान मोड़ों से लड़..
टकरा...
तू रोज नई चट्टानों से टकरा..
बना...
जो कोई उस रास्ते पे न चला.. तू 'वो' रास्ते बना..
खोज..
तू हर संकट से निकलने का मार्ग.. खुद खोज
बन..
नदी से यूं बढ़ते बढ़ते.. तू एक दिन समंदर बन
हाँ, तू समंदर बन..

इसलिए..
रुकना नहीं है पुत्र... बढ़ता रह सदा... चलता रह सदा

ये अंधेरा
जो घेर लेता है कभी कभी तुझे
और रास्ते दिखना ही..
हो जाते हैं बंद..
ये कुछ नहीं..
बस तुझे
समंदर बनाने की तईय्यारी है मेरी..
परीक्षाओं से..
कंधे मजबूत करने की योजना है मेरी..
इतना आसान तो न होगा..
इक विराट अनन्त सागर सा बन जाना
लड़ना तो होगा..
और बहुत लड़ना होगा..
तो...
न रुकना है..
न थमना है..
न पलटना है..
न विलपना है..
आने दे...
हर मोड़ पे इक नए..
संकट को आने दे..
जन्मने दे..
हर सुकून में भी..
इक नए संग्राम को जन्मने दे..
तू तो लड़..
जो कभी हार न माने
उस योद्धा के भांति लड़..
तू तो सीख..
हर युद्ध से कुछ नए पाठ तू सीख
फिर हर अगले युद्ध में
तू तो चमक..
अनन्त संकटों के बीच भी..
धरती पर तू सूर्य के भांति चमक..
हाँ, तू धरती पर सूर्य के भांति चमक..

इसलिए..
रुकना नहीं है शिव... बढ़ता रह सदा... चलता रह सदा
.. हर हर महादेव...

-ओमेन्द्र 'भारत'
16 मई, 2026.

 #आदर्श... किसे होना चाहिए समाज का... और कौन बनता जा रहा..?! कुछ विचित्र सा घटित हो रहा है समाज में...हम लोग छोटे थे तो ...
16/03/2024

#आदर्श... किसे होना चाहिए समाज का... और कौन बनता जा रहा..?!

कुछ विचित्र सा घटित हो रहा है समाज में...

हम लोग छोटे थे तो टीन ऐजर्स के सपने होते थे कि यार IIT निकल जाये... मेडिकल निकल जाये... किसी अच्छे कॉलेज में पढ़ने को मिले... फिर एक बढ़िया जॉब हो... कोई रॉकेट साइंटिस्ट का सपना देखता था... कोई प्रोफ़ेसर बनने का... कोई अच्छे व्यापार का सपना रखता था... और उसी हिसाब से आगे बढ़ता था...

आज एक नया टर्म coin हो गया है... "सोशल मीडिया इन्फ़्लुएन्सर"

और कौन कितना बड़ा इन्फ़्लुएन्सर है इसका आधार सिर्फ ये है कि किसके कितने अधिक follower हैं... 1M, 10M या और अधिक... फिर ये follower चाहे कैसे भी video बनाकर बढ़ें... उसके लिए कुछ भी अंटशंट बकवास करके मिलते हों... करते रहो... फिर उससे मिले धन से महंगी महंगी गाड़ी खरीदो... उल्टे-पुल्टे शौक पालो... फिर उसके video बनाकर डालो...

अब समस्या ये है कि इसका दुष्प्रभाव समाज पर पड़ रहा है... बच्चे के कोमल मन पर ये गलत छाप छोड़ रहे हैं... बच्चे इन्हें ही अपना आदर्श समझने लगे हैं... इन्हीं की बातें करने लगे हैं... इन्हीं की तरह पैसा कमाना चाहते हैं..!!

भई हमारे आदर्श होते थे... नेताजी सुभाषचंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद, सरदार पटेल, वीर सावरकार, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज, गुरु गोविन्द सिंह साहेब... और उन सबकी जीवनियाँ... उनके संघर्ष को पढ़ पढ़ कर हम लोग बड़े हुए

आज की स्थिति ये है कि अधिकांश बच्चों को इन लोगों के नाम भी नहीं पता होंगे... नाम पता होगा तो उनकी जीवन यात्रा से अपरिचित होंगे... और इसीलिए इनके आदर्श वो नहीं बन रहे

अब है क्या कि समाज की नई पीढ़ी के आदर्श जैसे होंगे... समाज रुपी नदी के बहने की दिशा भी वही बन जाएगी... यदि अच्छे आदर्श होंगे तो समाज उत्थान की तरफ जाएगा... और यदि निरर्थक आदर्श होंगे... तो समाज ही निरर्थक हो जायेगा

अब ये जो नंगपने वाले, गाली-गलौच वाले video बना बना कर फेमस हो रहे... उसी से पैसा कमा रहे.. ये निरर्थक ही है... ये तो ये सन्देश स्थापित करना चाह रहे कि... पढ़ने लिखने की... IIT आदि कि... क्या जरुरत है... वो सब करके भी तो पैसा ही कमाना होता है... उससे अच्छा ये सब करो... बिना मेहनत नंगपने से पैसा कमाओ..!!

अब किसे क्या ही समझाया जाये... कि पढाई सिर्फ पैसे के लिए नहीं की जाती है... बल्कि सामाजिक, मानसिक व आध्यात्मिक विकास के लिए की जाती है... मनुष्य जाति लगातार विकास कर रही है और उसके पीछे कारण है कि बहुत से अध्ययनशील लोग लगातार शोधकार्यों में लगे रहते हैं... न कि इसलिए कि कुछ लोग नंगपना फैलाते रहते हैं..

पूरे समाज को चिन्तन करना होगा और कोर्स-करेक्शन करना होगा... अन्यथा अभी तो कुछ ख़ास नहीं बिगड़ा है... पर आने वाला समय और अधिक नैतिक व चारित्रिक पतन का दिखाई पड़ रहा है हमें...

सबसे पहले तो सरकार को ये प्लेटफोर्म पर या तो कोई सेंसर बैठाना चाहिए... या इसे बंद कर दीजिये... बहुत अधिक गंध फैला रहे हैं ये... इसके बाद समाज में सार्थक आदर्शों के स्थापना पर चिन्तन व क्रियान्वयन किया जाये...
..जय माँ भारती...

-ओमेन्द्र 'भारत'

...योद्धा...नहीं उलझे... जो काँटों से.. वो नई राहें.. नहीं गढ़तेजो मखमल की.. डगर चुनते.. वो पन्नों में.. कहाँ चढ़तेयदी दशर...
06/03/2024

...योद्धा...

नहीं उलझे... जो काँटों से.. वो नई राहें.. नहीं गढ़ते
जो मखमल की.. डगर चुनते.. वो पन्नों में.. कहाँ चढ़ते
यदी दशरथ.. के सुत भी कुछ.. महल तजने.. से यूं डरते
तो सिरों पर रख.. उन्हें फिर सब.. प्रभु श्रीराम.. कहाँ कहते..??

ये जीवन है... अजब सा ही
बड़ी बारीक.. कुछ बातें
जो जीते जी.. सुकूं ढूंढें
नए प्रयोग... से भागे
जो मुश्किल देख.. सहम जावे
चुनौती को.. जो ना कह दे
कि गिरने के.. हि डर से जो
पहाड़ों पर.. नहीं चढ़ते
रहें फिर वो.. भले राजा.. स्मृति वो... नहीं चढ़ते
तो नहीं उलझे... जो काँटों से.. वो नई राहें.. नहीं गढ़ते

महापुरुषों.. से सीखो कुछ
ये जीवन को... बनावो कुछ
झुके होंगे.. बहुत से पर
वो राणा थे... नहीं झुकते
वो जंगल हो.. या रोटी-घास
जो लड़ते हैं.. वही दिखते
बरस बीतें... हजारों पर
वो मरकर भी.. नहीं मरते
जो गिरने से.. सदा डरते.. वो गिरकर फिर.. नहीं उठते
भरो हुंकार... दिखे जब रण... कि योद्धा यूं... नहीं थमते

कि नहीं उलझे... जो काँटों से.. वो नई राहें.. नहीं गढ़ते
जो मखमल की.. डगर चुनते.. वो पन्नों में.. कहाँ चढ़ते
यदी दशरथ.. के सुत भी कुछ.. महल तजने.. से यूं डरते
तो सिरों पर रख.. उन्हें फिर सब.. प्रभु श्रीराम.. कहाँ कहते..??
सिरों पर रख.. उन्हें फिर सब.. प्रभु श्रीराम.. कहाँ कहते..??
..हर हर महादेव...

-ओमेन्द्र 'भारत'

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