09/05/2026
चित्त प्रकर्ति के तीनों गुणों सत्त्व, रज और तम से मेल रखता है। इस प्रकार से चित्त रूपी अंतःकरण की पाँच अवस्था है। 1. मूढ़ अवस्था,” इसमें तमो गुण प्रधान होता है और रजों, सतों गुण गौण रहता है। इसमें निद्रा, तंद्रा, मोह, भय, आलस्य, दीनता, भ्रम आदि रहता है। यह नीच मनुष्यों की स्थिति व गति है। इसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह ही निमित्त धर्म होता है। इनकी प्रवर्ति अज्ञान, अधर्म, राग में रहती है, इनके पास एसवर्य नहीं होता है “। गीता अ। 14/8-, 9-, 10-, 13-, 15-, 16-, 17-, 18,” सब शरीर मे अभिमान रखने वालों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद, आलसी और निद्रा के द्वारा बांधता है,8,”। तमोगुण तो ज्ञान को ढक कर प्रमाद में लगातहाई,9”। सत्त्वगुण और रजोगुण को दबा कर तमोगुण बढ़ता है,10”। तमोगुण के बढ़ने पर अंतःकरण और इंदिरीयों में अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मों में अप्रवृति और प्रमाद अर्थात व्यर्थ चेस्टहा और निद्रा आदि अंतःकरण की मोहिनी वृतियाँ —ये सब ही उत्पन्न होती है।,15,”। तामस कर्मों का फल अज्ञान कहा है,16”। तमोगुण से प्रमाद और मोह उत्पन्न होते है और अज्ञान भी होता है,17”। तमोगुण में स्थितः पुरुष की अधोगति होती है, अर्थात कीट ,पशु, आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते है,18,”। गीता। अ.17/10,-11,-19,-22,” जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गंधयुक्त, बासी और झूठा हैं तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुषों को प्रिय होता है,10”। शास्त्र विधि से हीन, अन्न दान से रहित, बिना मंत्रों के बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के कीये जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते है.11”। जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन-वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दुसरें का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है,19”। जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य स्थान समय में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है,22”। गीता अ.18/22,- 25,- 28,- 32,- 35,- 39,” जो ज्ञान एक कार्य रूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदर्श आसक्त है तथा जो बिना युक्ति वाला, तात्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है,-- वह तामस ज्ञान कहा गया है,22”। जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और समर्थ को न विचार कर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह तामस कर्म कहा जाता है,25”। जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित, घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दिरघसूत्री है—वह तामस मनुष्य है,28”। जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी ,”यह धर्म है,”— ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य सम्पूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है,32”। दुष्ट बुद्धि वाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता और दुख को तथा उन्मता को भी नहीं छोड़ता अर्थात धारण कीये रहता है—वह धारण शक्ति तामसी है,35”। जो सुख भोग काल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा , आलसी और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है,39,”। गीता। अ.9/11-, 12,” ये मूढ़ लोग परमात्मा को जानने की कोशिश नहीं करते,11”। ये व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्त चित्त अज्ञानी जन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकर्ति को ही धारण कीये रहते है,12”। गीता। अ.16/4,- 7,- 8,- 9,-10,-11,- 12,- 13,- 14,” दंभ, धमण्ड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी—ये सब आसुरी संपदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण है,4”। आसूर स्वभाव वाले मनुष्य प्रवर्ति और निवृति—इन दोनों को ही नहीं जानते। इसलिए उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न क्षरेसठ आचरण है और न सत्य भाषण ही है..7”। वे आसुरी प्रकर्ति वाले मनुष्य कहा करते है की जगत आश्रय रहित है, सर्वथा असत्य है और बिना परमात्मा के, अपने आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है, इसके सिवा और गया है?,8”। इस मिथ्या ज्ञान को अवलंबन करके—जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि मंद है, वे सबका उपकार करने वाले करूर कर्मी मनुष्य केवल जगत के नाश के लिए ही समर्थ होते है,9”। वे दंभ, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होने वाली कामनाओ का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण करके और भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसार मे विचरते है,10”। तथा वे मृत्यु पर्यंत रहने वाली असंख्य चिंताओ का आश्रय लेने वाले, विषय भोगों के भोगने में तत्पर रहने वाले और,” इतना ही सुख है,” इस प्रकार मानने वाले होते है।,11”। वे आशा की सेकड़ों फँसियों से बंधे हुए मनुष्य काम-क्रोध के परायण होकर विषय भोगों के लिए अन्याय पूर्वक धन आदि पदार्थों का संग्रह करने की चेष्टा करते है,12”। वे सोचा करते है की मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूगा। मेरे पास यह इतना धन और फिर यह हो जायगा,13”। वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओ को भी मैं मार डालुगा। मैं ईश्वर हूँ, एसवर्य को भोगने वाले हूँ। मैं सब सिद्धियों से युक्त हूँ और बलवान तथा सुखी हूँ,14”