19/07/2026
*आर्यसमाज का प्रथम नियम—व्याख्या एवं कार्यान्वयन (चर्चा आधारित)*
*1. सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदिमूल परमेश्वर है।*
*व्याख्या—* आर्यसमाज की वैदिक दृष्टि में परमेश्वर सृष्टि का निमित्त कारण है। वही प्रकृति के तत्त्वों को नियमबद्ध क्रम में संयोजित करके विविध रूप प्रदान करता है। मनुष्य अपनी ज्ञानेन्द्रियों, बुद्धि, तर्क, निरीक्षण और प्रयोग द्वारा प्रकृति तथा उसके पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करता है। यही व्यवस्थित एवं सत्यापित ज्ञान, विद्या या विज्ञान कहलाता है। अतः सत्य ज्ञान और उसके द्वारा जानी जाने वाली सृष्टि-व्यवस्था का आदिमूल परमेश्वर है। परमेश्वर की व्यवस्था को समझने के लिए प्रकृति के नियमों का अध्ययन भी आवश्यक है।
हमारे ऋषियों ने साधना और आत्मसाक्षात्कार से प्राप्त ज्ञान को अनेक ग्रन्थों के माध्यम से हम तक पहुँचाया। इस ज्ञान को केवल शब्दों से पूर्णतः नहीं समझा जा सकता; इसके लिए अध्ययन, मनन, साधना और आचरण आवश्यक है।
*कार्यान्वयन—* आज वैज्ञानिकों ने अपने तप, परिश्रम और अनुसंधान से ऐसे अनेक उपकरण बनाए हैं, जिनसे प्रकृति को समझना सरल हुआ है। अतः आर्यसमाज और हमें चाहिए कि विज्ञान एवं अध्यात्म के समन्वित अध्ययन हेतु प्रयोगशालाएँ और विज्ञान-केंद्र स्थापित करें। इनमें निम्न व्यवस्थाएँ हो सकती हैं—
1. खगोलीय अध्ययन के लिए टेलिस्कोप।
2. सूक्ष्म जगत् के अध्ययन के लिए माइक्रोस्कोप।
3. विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों से समन्वय।
4. बड़े प्रोजेक्टरों द्वारा सृष्टि की सूक्ष्म, विराट और सुंदर संरचना का प्रदर्शन।
5. बच्चों के लिए चलित विज्ञान-प्रयोगशालाएँ और प्रयोग-आधारित शिविर।
6. वैज्ञानिकों, वैदिक विद्वानों और दार्शनिकों के संवाद एवं व्याख्यान।
अतः परमात्मा को जानने की जिज्ञासा हमें प्रकृति से विमुख नहीं करती, बल्कि उसके नियमों का अधिक गंभीरता, विनम्रता और सत्यनिष्ठा से अध्ययन करने की प्रेरणा देती है। प्रयोगशाला और साधनास्थली, दोनों सत्य की खोज के पूरक माध्यम बन सकते हैं। हम जितना प्रकृति को समझेंगे, उतना ही प्रकृति से विमुख और परमात्मा में आसक्त होते जाएंगे।
-- राकेश विद्यालंकार
चर्चा के लिए विशेष धन्यवाद-
श्री दिनेश आर्य (अध्यक्ष)
सार्वदेशिक आर्य वीर दल सेवा समिति