09/08/2026
उमर सेंट जोसेफ़ में पढ़े, इलाहाबाद के टॉपर रहे। उसके बाद एमिटी यूनिवर्सिटी में भी उनका ज़िक्र हुआ तो प्रोफ़ेसरों तक ने उनकी क़ाबिलियत और ज़ेहन की तारीफ़ की। क्या मुसलमान, क्या हिंदू—हर कोई उनकी सलाहियत का क़ायल था।
फिर ज़िंदगी ने एक ऐसा मोड़ लिया कि काल-कोठरी का सफ़र शुरू हुआ। चारों तरफ़ महदूद चारदीवारी और सलाखें थीं, मगर उन्होंने किताबों से अपना रिश्ता नहीं तोड़ा। अबान हों या कोई और—जब भी दोनों भाइयों से मिलने जेल जाते, एक-दो किताबें ज़रूर साथ होतीं। हर मुलाक़ात में किताबें कार में जातीं और भाई तक पहुँचतीं।
अबान की इस आख़िरी मुलाक़ात और उनके जनाज़े में उमर की मौजूदगी ने उन तमाम लोगों के लिए एक ख़ामोश पैग़ाम छोड़ दिया, जो अपनी-अपनी सहूलियत के मुताबिक़ नए-नए नैरेटिव गढ़ रहे थे। फ़िराक़ में बैठे लोगों के लिए यह किसी तमाचे से कम नहीं था।
और फिर… नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाना।
उफ़्फ़… किसी अपने को कंधा देकर रुख़्सत करना और फिर भी अपने आँसुओं को समेटकर लोगों के सामने मज़बूत खड़े रहना—इसके लिए कितना बड़ा कलेजा चाहिए।
अपने भाई को विदा करने के बाद क़ब्र पर खड़े होकर दोनों भाइयों को गले लगाया, उन्हें हौसला दिया। अपने चचेरे भाई के मासूम बच्चे को गोद में उठाया, चूमा और सीने से लगा लिया। उस लम्हे उमर ने सिर्फ़ भाई होने का नहीं, बल्कि बड़ा होने का फ़र्ज़ भी अदा किया।
भीड़ को समझाते रहे, लोगों को सँभालते रहे और आख़िरकार उसी ख़ामोशी के साथ वापस लौट गए—सलाखों के पीछे।
उन्हें देखकर महसूस हुआ कि ये बच्चे उम्र से कहीं ज़्यादा सब्र, हौसले और समझदारी लेकर चल रहे हैं। शायद यही रिश्तों की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी होती है—जब बाप मौजूद न हो, तो बड़ा बेटा घर के लिए बाप का फ़र्ज़ निभाता है।
अल्लाह उमर और अली को सलामत रखे, उन्हें सब्र-ए-जमील अता फ़रमाए और अबान की मग़फ़िरत फ़रमाकर उन्हें जन्नतुल फ़िरदौस में आला मक़ाम अता फ़रमाए। आमीन।