12/06/2026
भारत के युवाओं को नशे से ज्यादा किसने बर्बाद किया?
मेरी बात बहुत लोगों को कड़वी लग सकती है, लेकिन मैं जो कहने जा रहा हूँ उस पर गंभीरता से सोचिए।
मेरा मानना है कि भारत के लाखों युवाओं को जितना नुकसान नशे और ड्रग्स ने नहीं पहुँचाया है, उससे कहीं अधिक नुकसान एक खतरनाक सामाजिक भ्रम ने पहुँचाया है — “सरकारी नौकरी ही सफलता है”।
आज देश में करोड़ों युवा विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। उनमें से अधिकांश को कभी नौकरी नहीं मिलेगी। यह कड़वा है, लेकिन सच है।
हर साल लाखों छात्र कोचिंग संस्थानों में प्रवेश लेते हैं।
फीस जमा करते हैं।
कमरे किराए पर लेते हैं।
वर्षों तक तैयारी करते हैं।
कोचिंग संस्थानों के नए भवन बनते हैं।
उनका कारोबार बढ़ता है।
उनकी फीस बढ़ती है।
लेकिन लाखों युवाओं का समय, ऊर्जा और आत्मविश्वास धीरे-धीरे खत्म होता जाता है।
सबसे दुखद बात यह है कि इस पूरे मॉडल में असफल होने वाले युवा के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।
यदि किसी युवक ने 8 या 10 साल तैयारी की और चयन नहीं हुआ, तो उसके पास क्या बचता है?
न अनुभव।
न कोई व्यावहारिक कौशल।
न कोई पेशेवर पहचान।
न कोई वैकल्पिक करियर।
उसके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष केवल एक संभावना के पीछे खर्च हो चुके होते हैं।
यही इस व्यवस्था की सबसे बड़ी त्रासदी है।
कोचिंग संस्थान अपना काम कर रहे हैं।
वे व्यवसाय चला रहे हैं।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम युवाओं को पूरी सच्चाई बता रहे हैं?
क्या हम उन्हें बता रहे हैं कि चयन की संभावना कितनी कम है?
क्या हम उन्हें बता रहे हैं कि साथ में कोई कौशल भी सीखो?
क्या हम उन्हें बता रहे हैं कि यदि नौकरी न मिले तो भी जीवन समाप्त नहीं होता?
दुर्भाग्य से अधिकांश मामलों में उत्तर “नहीं” है।
युवाओं को केवल एक सपना दिखाया जाता है।
लेकिन वैकल्पिक रास्ते नहीं दिखाए जाते।
यही कारण है कि लाखों युवा एक परीक्षा में असफल होने के बाद स्वयं को जीवन में असफल समझने लगते हैं।
जबकि वास्तविकता बिल्कुल अलग है।
यदि कोई युवा 5 वर्ष किसी कौशल को सीखने में लगाता है — चाहे वह तकनीक हो, मशीनरी हो, डिजिटल कार्य हो, आधुनिक कृषि हो, डिजाइन हो, प्रोग्रामिंग हो या कोई अन्य व्यावहारिक कौशल — तो उसके सफल होने की संभावना शून्य नहीं होती।
वह नौकरी कर सकता है।
फ्रीलांसिंग कर सकता है।
व्यवसाय कर सकता है।
स्वरोजगार कर सकता है।
कुछ नया बना सकता है।
उसकी आय कम या ज्यादा हो सकती है, लेकिन उसके पास आगे बढ़ने का रास्ता हमेशा मौजूद रहता है।
दूसरी तरफ, केवल परीक्षा-आधारित तैयारी करने वाला असफल युवा अक्सर शून्य पर खड़ा मिलता है।
यही सबसे बड़ा अंतर है।
इसलिए समस्या सरकारी नौकरी नहीं है।
समस्या कोचिंग नहीं है।
समस्या यह है कि हमने करोड़ों युवाओं को यह विश्वास दिला दिया है कि जीवन में सफल होने का केवल एक ही रास्ता है।
जबकि वास्तविकता में दुनिया अवसरों से भरी हुई है।
भारत को ऐसी शिक्षा और ऐसी कोचिंग की जरूरत है जो युवाओं को केवल प्रश्नपत्र हल करना न सिखाए, बल्कि उन्हें जीवन जीने योग्य कौशल भी सिखाए।
ऐसी कोचिंग जो कहे:
“नौकरी की तैयारी करो, लेकिन साथ में एक कौशल भी सीखो।”
“परीक्षा दो, लेकिन अपने भविष्य को केवल एक परिणाम पर मत टिको।”
“यदि चयन हो जाए तो बहुत अच्छा, और यदि न हो तो भी तुम्हारे पास आगे बढ़ने के दर्जनों रास्ते हों।”
क्योंकि किसी परीक्षा में असफल होना जीवन में असफल होना नहीं है।
और किसी युवा के जीवन के दस बहुमूल्य वर्ष केवल इसलिए समाप्त नहीं हो जाने चाहिए कि उसने एक ऐसी दौड़ में हिस्सा लिया था जिसमें लाखों लोग थे और सीटें कुछ हजार।
भारत को ऐसे युवाओं की जरूरत है जो केवल नौकरी खोजने वाले नहीं, बल्कि कौशलयुक्त, आत्मनिर्भर और अवसर बनाने वाले हों।
यही देश के भविष्य का सबसे बड़ा प्रश्न है।