Kunwar Sajwan

Kunwar Sajwan ॥ पुर्व अध्यक्ष जिला काँग्रेस कमेटी जनपद रुद्रप्रयाग ॥

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27/08/2026

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अगस्त्यमुनि मैदान:राजनीति के बीच पिसती एक ऐतिहासिक पहचानअगस्त्यमुनि का मैदान केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं है, यह अगस्त्यम...
26/08/2026

अगस्त्यमुनि मैदान:
राजनीति के बीच पिसती एक ऐतिहासिक पहचान
अगस्त्यमुनि का मैदान केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं है, यह अगस्त्यमुनि की पहचान, आस्था, परंपरा, खेल और सामाजिक जीवन का हिस्सा है।
अगस्त्यमुनि में प्रस्तावित स्पोर्ट्स स्टेडियम को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अगस्त्यमुनि की जनता को मिला क्या?
एक तरफ क्षेत्र के युवा और खेल प्रेमी वर्षों से बेहतर खेल सुविधाओं और आधुनिक स्टेडियम की उम्मीद लगाए बैठे थे। दूसरी तरफ पंचकोटी क्षेत्र और आसपास के अनेक गांवों के लोगों ने इस मैदान को महर्षि अगस्त्य से जुड़ी धार्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहर बताते हुए निर्माण का विरोध किया। दिसंबर 2025 में विरोध इतना बढ़ा कि निर्माण कार्य रोकने के लिए लोग मैदान में उतर आए।
लेकिन आज पीछे मुड़कर देखें तो सबसे पीड़ादायक स्थिति यही है कि न तो स्टेडियम समर्थकों का सपना पूरा हुआ और न ही उन लोगों की मांग पूरी हुई, जो अगस्त्यमुनि मैदान को उसके पुराने स्वरूप में देखना चाहते थे।
आज सवाल किसी व्यक्ति, दल या राजनीतिक विचारधारा का नहीं है। सवाल अगस्त्यमुनि के भविष्य का है।
अगर सरकार ने स्टेडियम का निर्माण वास्तव में रोक दिया है, तो सरकार और प्रशासन को जनता के सामने स्पष्ट करना चाहिए कि निर्माण पूरी तरह निरस्त हुआ है या केवल अस्थायी रूप से रोका गया है। मैदान में खड़े लोहे के सरिए, कंक्रीट के पिलर, मिट्टी के ढेर और निर्माण से बदला हुआ भू-भाग आखिर कब हटाया जाएगा? क्या अगस्त्यमुनि का मैदान फिर अपने पुराने स्वरूप में लौटेगा या यह आधा-अधूरा निर्माण आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्थायी निशानी बनकर रह जाएगा?
यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जनवरी 2026 में महर्षि अगस्त्य की देवरा यात्रा के दौरान मैदान के गेट को लेकर ऐसा विवाद पैदा हुआ कि श्रद्धालुओं और प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बनी और अंततः गेट तोड़कर डोली को गद्दीस्थल तक ले जाया गया। यह घटना अपने आप में बताती है कि मैदान का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व स्थानीय समाज के लिए कितना गहरा है।
अगस्त्यमुनि मैदान की बात केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। इस मैदान ने दशकों से यहां के बच्चों को खेलते देखा है, युवाओं को अपनी प्रतिभा निखारते देखा है, बुजुर्गों को शाम की सैर करते देखा है और महिलाओं-बच्चों को सामाजिक जीवन का हिस्सा बनते देखा है। अगस्त्यमुनि की शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापारिक गतिविधियों के बीच यह मैदान शहर के सामुदायिक जीवन का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
और यही कारण है कि इस विवाद को केवल “स्टेडियम बनाम मैदान” के रूप में देखना भी उचित नहीं होगा।
हमें ऐसा रास्ता तलाशना होगा जिसमें अगस्त्यमुनि की खेल प्रतिभाओं का भविष्य भी सुरक्षित हो और अगस्त्य ऋषि से जुड़ी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान भी बना रहे।
आज आवश्यकता राजनीति करने की नहीं, समाधान खोजने की है।
जिन लोगों ने इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया, उन्हें भी यह सोचना चाहिए कि राजनीति आती-जाती रहती है, लेकिन किसी शहर की सांस्कृतिक पहचान और आने वाली पीढ़ियों की विरासत हमेशा के लिए होती है। अगर किसी विवाद से राजनीतिक लाभ किसी को मिला भी हो, तो उससे अगस्त्यमुनि की जनता को क्या मिला—यह सबसे बड़ा सवाल है।
न स्टेडियम मिला, न पुराना मैदान मिला।
यह स्थिति किसी भी जनप्रतिनिधि, सरकार या राजनीतिक दल के लिए आत्ममंथन का विषय होनी चाहिए।
अगस्त्यमुनि के लोग अब स्पष्ट जवाब चाहते हैं—
स्टेडियम का क्या होगा?
मैदान का क्या होगा?
निर्माण का मलबा और अधूरा ढांचा कब हटेगा?
मैदान का पुराना स्वरूप कब लौटेगा?
और सबसे महत्वपूर्ण—अगस्त्य ऋषि की परंपरा और अगस्त्यमुनि की खेल प्रतिभा, दोनों के सम्मान के लिए सरकार की ठोस योजना क्या है?
मैं स्वयं अगस्त्यमुनि का स्थानीय निवासी होने के नाते इस मैदान से भावनात्मक रूप से जुड़ा हूं। इसी मैदान में बचपन बीता है। इसलिए आज इसे बदले और उजड़े स्वरूप में देखना केवल एक मैदान को खराब होते देखना नहीं, बल्कि अपने बचपन और अपनी स्मृतियों का एक हिस्सा बिखरता हुआ देखना है।
अगस्त्यमुनि के तमाम नागरिकों को एक बार फिर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज बुलंद करनी होगी।
हमारा उद्देश्य किसी के विरोध में खड़ा होना नहीं, बल्कि अगस्त्यमुनि की पहचान को बचाना होना चाहिए।
ऐसा समाधान निकले जिसमें खेल भी बचे, आस्था भी बचे, परंपरा भी बचे और मैदान भी बचे।
क्योंकि अगस्त्यमुनि का मैदान केवल मैदान नहीं है—यह अगस्त्यमुनि की आत्मा है।
और इस आत्मा को राजनीति की भेंट चढ़ने से बचाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है
***जय मुनिमहाराज ***
***जय अगस्तऋषि ***
कुंवर सिंह सजवाण.
पूर्वअध्यक्षजिलाकांग्रेसरुद्रप्रयाग.
सचिव प्रदेश कांग्रेस कमेटी
उत्तराखंड

राजनीतिक असहमति अपनी जगह, लेकिन अभद्र भाषा स्वीकार नहींश्रीनगर मे भाजपा के एक कार्यक्रम में कांग्रेस के माननीय प्रदेश अध...
25/08/2026

राजनीतिक असहमति अपनी जगह, लेकिन अभद्र भाषा स्वीकार नहीं
श्रीनगर मे भाजपा के एक कार्यक्रम में कांग्रेस के माननीय प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल जी पर भाजपा नेतृत्व की ओर से की गई कथित अभद्र और व्यक्तिगत टिप्पणी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। राजनीति में वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति का जवाब गाली-गलौज, व्यक्तिगत कटाक्ष या चरित्र पर टिप्पणी से देना किसी भी राजनीतिक दल की गरिमा के अनुरूप नहीं हो सकता।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल एक-दूसरे के नेताओं के व्यक्तिगत सम्मान को बनाए रखते हुए जनता के वास्तविक मुद्दों पर बहस करें।
माननीय गणेश गोदियाल जी ने श्रीनगर और उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय भूमिका निभाई है और वर्तमान में प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व में भी सरकार और व्यवस्था से जुड़े विभिन्न जनहित के मुद्दे उठा रहे हैं। हाल के दिनों में वे बद्रीनाथ धाम के चढ़ावे में कथित अनियमितताओं, केदारनाथ में सोना चोरी मुद्दा हो , पेपर लीक की जांच जैसे विषयों पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं।
एक कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में मेरा स्पष्ट मत है कि माननीय गणेश गोदियाल जी की आलोचना करनी है तो उनके राजनीतिक फैसलों, नीतियों और बयानों पर तथ्यों के साथ सवाल उठाइए; लेकिन व्यक्तिगत और अभद्र भाषा का इस्तेमाल लोकतांत्रिक मर्यादाओं का अपमान है।
श्रीनगर की जनता राजनीतिक परिपक्वता और संस्कारों के लिए जानी जाती है। यहां की राजनीति को व्यक्तिगत छींटाकशी का अखाड़ा बनाने के बजाय बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पर्यटन, चारधाम यात्रा और स्थानीय युवाओं तथा व्यापारियों की समस्याओं पर चर्चा होनी चाहिए।
यह भी उल्लेखनीय है कि हाल के राजनीतिक विवादों में गणेश गोदियाल ने सार्वजनिक रूप से अपने ऊपर लगाए गए आरोपों का जवाब देने और जांच की मांग करने का रुख अपनाया है।
यानी सवालों का जवाब सवालों और तथ्यों से दिया जाना चाहिए, न कि अपमानजनक शब्दों से।
मैं कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में स्पष्ट कहना चाहता हूं— माननीय गणेश गोदियाल जी पर राजनीतिक हमला करना भाजपा का अधिकार हो सकता है, लेकिन उन्हें अपमानित करना ये किसी को अधिकार नहीं देता। लोकतंत्र में नेता बदल सकते हैं, सरकारें बदल सकती हैं और विचारधाराओं के बीच संघर्ष भी चलता रहेगा, लेकिन राजनीतिक संस्कार और व्यक्तिगत सम्मान की सीमा नहीं टूटनी चाहिए।
अक्सर देश और उत्तराखंड की राजनीति में देखा गया है कि भाजपा के कथित बड़े नेता विपक्ष के नेताओं पर व्यक्तिगत।
और अभद्र टिप्पणियाँ करते रहे हैं। देश और उत्तराखण्ड की जनता को चाहिए।
लोकतांत्रिक मूल्यों, जनसम्मान और उत्तराखंड के हितों की लड़ाई लड़ने वाले।नेताओं का सम्मान हो। ताकि हम अपने आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों का संरक्षण कर पाए और उत्तराखंड को एक नए विकास की ऊँचाइयों तक ले जा सकें

गणेश गोदियाल जी के सम्मान के साथ खिलवाड़ कांग्रेस का कार्यकर्ता बर्दाश्त नहीं करेगा—जनता के मुद्दों पर संघर्ष जारी रहेगा।
जय कांग्रेस, जय उत्तराखंड।

कुँवर सिंह सजवाण
पूर्व अध्यक्ष जिला कांग्रेस कमेटी रुद्रप्रयाग
सचिव प्रदेश कांग्रेस कमेटी उत्तराखंड

बड़े भाई Herender Singh Gusain ji जन्मदिन की बहुत बहुत वधाई एवं शुभकामनांए।
25/08/2026

बड़े भाई Herender Singh Gusain ji जन्मदिन की बहुत बहुत वधाई एवं शुभकामनांए।

केदारनाथ जी से राम मंदिर तक—आस्था के चढ़ावे का हिसाब कौन देगा?मंदिर करोड़ों भारतीयों की आस्था के केंद्र हैं। श्रद्धालु अ...
24/08/2026

केदारनाथ जी से राम मंदिर तक—
आस्था के चढ़ावे का हिसाब कौन देगा?
मंदिर करोड़ों भारतीयों की आस्था के केंद्र हैं। श्रद्धालु अपनी मेहनत की कमाई से भगवान के चरणों में सोना, चांदी, नकदी और अन्य चढ़ावा अर्पित करता है। इसलिए मंदिर के धन में एक रुपये की भी अनियमितता केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं की आस्था के साथ विश्वासघात है।
सबसे पहले बात केदारनाथ धाम की।
केदारनाथ मंदिर के गर्भगृह में स्वर्ण-परत चढ़ाने के काम को लेकर करोड़ों रुपये की कथित अनियमितता और घोटाले के आरोप सामने आए थे। सरकार को जांच समिति तक गठित करनी पड़ी। सवाल आज भी यही है कि मंदिर में चढ़े सोने की वास्तविक मात्रा कितनी थी, कितना सोना लगाया गया, उसका हिसाब किसके पास है और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता कितनी थी? इसके लिए प्रदेश कांग्रेस कमेटी के तत्कालीन सम्मानित अध्यक्ष करन महारा के नेतृत्व में हरिद्वार से केदारनातक पैदल यात्रा की गई।
2026 में केदारनाथ में VIP मेहमानों पर मंदिर कोष से किए गए खर्च में भी वित्तीय अनियमितताओं को लेकर सरकारी स्तर पर कार्रवाई के निर्देश दिए गए। परंतु आज तक उस जांच का कोई अता-पता नहीं है।
हमारा स्पष्ट सवाल है—
बाबा केदार के नाम पर आने वाले धन और सोने का पूरा हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?
यदि सब कुछ पाक-साफ है तो स्वतंत्र जांच, सार्वजनिक ऑडिट और दस्तावेज सामने रखने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
अब अयोध्या के श्रीराम मंदिर की बात करें।
जिस राम मंदिर को भाजपा ने अपनी राजनीति का सबसे बड़ा प्रतीक बनाया, और देश की भोली भाली जनता ने राम।मंदिर के नाम पर भाजपा को हमारे देश को सत्ता सौंपी उसी मंदिर के चढ़ावे की कथित चोरी के मामले में भाजपा तथा आरएसएस के कई प्रमुख चेहरे। संलिप्त पाए गए ।SIT जांच में 45 दिनों के भीतर 70 कथित चोरी/गबन की घटनाओं और CCTV, सुरक्षा तथा नकदी गिनने की व्यवस्था में गंभीर कमियां सामने आईं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कर्मचारियों द्वारा नकदी छिपाने के दृश्य CCTV में मिले।
यह केवल मंदिर की व्यवस्था का सवाल नहीं है। यह उन करोड़ों रामभक्तों के विश्वास का सवाल है जिन्होंने राम मंदिर के निर्माण के लिए अपना योगदान दिया। और भाजपा आरएसएस जैसी पार्टियों के छलावे।का शिकार हुए।
भाजपा से हमारा सीधा सवाल है —जब मंदिर के चढ़ावे में इतनी बड़ी अनियमितताएं सामने आईं, तब जवाबदेही किसकी है? और जिनके नाम इस चोरी में सार्वजनिक हो रहे हैं। उन पर भाजपा कार्यवाही क्यों नहीं कर रही है? और आरएसएस अब क्यों मौन है

और अब बद्रीनाथ धाम।
बद्रीनाथ मंदिर के चढ़ावे में कथित हेराफेरी के मामले में FIR दर्ज हुई, आरोपी कर्मचारी को निलंबित किया गया और मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए गए। बाद में मंदिर अधिकारी की गिरफ्तारी की खबर भी सामने आई। परन्तु उन लोगों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए जिन नेताओं और बड़े अधिकारियों के कहने पर यह कर्मचारी उक्त कार्य कर रहा था। क्यों की बिना संरक्षण के यह कार्य संभव ही नहीं था?
यह स्थिति बताती है कि समस्या किसी एक व्यक्ति तक सीमित मानकर समाप्त नहीं की जा सकती। सवाल पूरी सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही का है।
हमारा पक्ष बिल्कुल स्पष्ट है:
मंदिर किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं हैं। मंदिरों में आने वाला चढ़ावा भक्तों का है और उसका इस्तेमाल पूरी पारदर्शिता के साथ होना चाहिए।
हम यह मांग करते है कि—
• केदारनाथ के स्वर्ण-परत प्रकरण की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो।
• मंदिर में आए सोने, चांदी और नकदी का वार्षिक सार्वजनिक ऑडिट हो।
• राम मंदिर चढ़ावा प्रकरण की पूरी जांच और जिम्मेदारी तय की जाए।
• बद्रीनाथ चढ़ावा मामले की जांच को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखा जाए।
• सभी बड़े मंदिरों में डिजिटल रिकॉर्डिंग, CCTV और स्वतंत्र ऑडिट की व्यवस्था हो।
• दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
भाजपा ने वर्षों से धर्म और आस्था के नाम पर भोलीभाली जनता को बार्गलाया आपस में फूट डलवाने के बाद सत्ता पर काबिज हुए।
आज पूरा देश भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। पूरे देश में युवा सड़कों पर है पेपर लीग, भ्रष्टाचार, चंदा चोरी , महंगाई जैसे गंभीर आरोप सरकार पर लग रहे हैं सरकार के नुमाइंदे प्रधानमंत्री हों या गृह मंत्री सदन से नदारद हैं।
अब समय आ गया है कि जनता को युवाओं के साथ खड़ा होकर इसे मोदी सरकार से बारह सालों का हिसाब मांगना चाहिए और जिन झूठे वादों से ये सरकार में आए थे उन वादों का हिसाब जनता को मांगना चाहिए और इस भ्रष्टाचारी सरकार जड़ से उखाड़ फेंकना चाहिए। ताकि हमारे देश के युवाओं का भविष्य संरक्षित हो भ्रष्टाचार मुक्त हो चंदा चौरी से मुक्त हो महंगाई से मुक्त हो पेपर लीक से मुक्त हों।और हमारी देश की अर्थव्यवस्था, मठ मंदिरों की शान एवं परंपरा सही सलामत रहे। इन्हीं शब्दों के साथ
जय बाबा केदार की। कुंवर सिंह सजवाण
जय बदरी विशाल की। पूर्व अध्यक्ष
जय सिया राम ।।।। जिला कांग्रेस कमेटी रुद्रप्रयाग
सचिव उत्तराखण्ड कांग्रेस

वंदे मातरम् : इतिहास, सम्मान और स्वतंत्रता संग्राम की अमर गाथावंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग...
22/08/2026

वंदे मातरम् : इतिहास, सम्मान और स्वतंत्रता संग्राम की अमर गाथा
वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की वह अमर पुकार है जिसने करोड़ों भारतीयों में मातृभूमि के प्रति प्रेम, स्वाभिमान और बलिदान की भावना जगाई। इसके रचयिता महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय थे। बाद में इसे उनके उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया।
1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने वंदे मातरम् का गायन किया। इसके बाद यह राष्ट्रीय आंदोलन का महत्वपूर्ण स्वर बन गया। 1905 के बंग-भंग विरोधी और स्वदेशी आंदोलन में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, अरविंद घोष और हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने वंदे मातरम् को संघर्ष और स्वदेशी की हुंकार बनाया।
विदेश की धरती पर भी इसकी गूंज पहुंची। मैडम भीकाजी कामा ने 1907 में स्टुटगार्ट में भारत का ध्वज फहराते समय उस पर “वंदे मातरम्” अंकित कराया। क्रांतिकारी मदनलाल धींगरा सहित अनेक क्रांतिकारियों के लिए यह मातृभूमि के प्रति समर्पण और बलिदान का प्रतीक था।
महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सरोजिनी नायडू, आचार्य नरेंद्र देव और उस दौर के अनेक राष्ट्रीय नेताओं के राजनीतिक जीवन में वंदे मातरम् की ऐतिहासिक भूमिका रही।
1937 में वंदे मातरम् के कुछ बाद के अंतरों में धार्मिक प्रतीकों के उल्लेख को लेकर चर्चा हुई। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना आजाद और अन्य नेताओं के समय राष्ट्रीय आयोजनों के लिए इसके पहले दो अंतरों को स्वीकार्य माना गया, ताकि देश के सभी समुदाय स्वयं को इससे जोड़ सकें। यह निर्णय गीत के ऐतिहासिक सम्मान को समाप्त करने के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सर्वस्वीकार्यता को ध्यान में रखकर लिया गया था।
इसके बाद स्वतंत्र भारत में 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि “जन गण मन” राष्ट्रगान होगा और “वंदे मातरम्”, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, उसे समान सम्मान और दर्जा दिया जाएगा।
इसलिए आज वंदे मातरम् पर बहस करते समय हमें इतिहास को आधा नहीं, पूरा देखना चाहिए। यह बंकिमचंद्र की रचना से लेकर रवीन्द्रनाथ ठाकुर के स्वर, बंग-भंग आंदोलन की हुंकार, गांधी और नेहरू के राष्ट्रीय आंदोलन, सुभाष बोस और क्रांतिकारियों के संघर्ष तथा संविधान सभा के निर्णय तक भारत की स्वतंत्रता यात्रा का अभिन्न हिस्सा रहा है।
वंदे मातरम् का सम्मान किसी एक दल, विचारधारा या व्यक्ति का विषय नहीं है। यह उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत है जिन्होंने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया। इतिहास का सम्मान यही है कि वंदे मातरम् की गौरवशाली भूमिका को स्वीकार करते हुए उसके साथ जुड़े ऐतिहासिक निर्णयों और मतभेदों को भी उसी संदर्भ में समझा जाए।
वंदे मातरम् — भारत की स्वतंत्रता, स्वाभिमान और राष्ट्रीय चेतना की अमर गूंज।

आज दिल्ली में छात्र के पक्ष में राहुल गांधी का धरना केवल एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि युवाओं की आवाज़ और न्याय के अध...
21/08/2026

आज दिल्ली में छात्र के पक्ष में राहुल गांधी का धरना केवल एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि युवाओं की आवाज़ और न्याय के अधिकार की लड़ाई है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान छात्र साहिल लोचाब को कथित तौर पर पैलेट गन से चोट लगने के मामले में राहुल गांधी ने FIR दर्ज करने और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।
छात्रों की आवाज़ दबाई नहीं जा सकती।
आज राहुल गांधी जी का छात्र के साथ खड़े होकर न्याय की मांग करना लोकतंत्र की उस भावना को मजबूत करता है, जिसमें सत्ता से सवाल पूछना हर नागरिक का अधिकार है।
एक युवा घायल हो और उसकी शिकायत तक दर्ज न हो—यह बेहद गंभीर सवाल है। न्याय तभी होगा जब पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, FIR दर्ज हो और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो।
छात्रों की आवाज़, देश की आवाज़ है।
अन्याय के खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा।
न्याय की इस लड़ाई में हम छात्रों के साथ हैं।

केदारनाथ रोपवे: विकास के साथ स्थानीय रोजगार और आजीविका की चिंताकेदारनाथ धाम तक रोपवे का निर्माण निश्चित रूप से यात्रा को...
21/08/2026

केदारनाथ रोपवे: विकास के साथ स्थानीय रोजगार और आजीविका की चिंता
केदारनाथ धाम तक रोपवे का निर्माण निश्चित रूप से यात्रा को सुगम, सुरक्षित और समयबद्ध बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है। इससे श्रद्धालुओं को कम समय में यात्रा पूरी करने की सुविधा मिलेगी और कठिन पैदल मार्ग पर दबाव भी कम हो सकता है। लेकिन इस विकास परियोजना के साथ सोनप्रयाग, गौरीकुंड, लिंचोली और छोटी लिंचोली में वर्षों से यात्रा व्यवस्था से जुड़े स्थानीय लोगों की आजीविका पर पड़ने वाले प्रभाव को गंभीरता से समझना भी आवश्यक है।
आज इन क्षेत्रों में हजारों परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से घोड़ा-खच्चर व्यवसाय, टेंट, लॉज, छोटी दुकानें, चाय-नाश्ते की दुकानें, भोजनालय, स्थानीय परिवहन और यात्रा से जुड़ी अन्य सेवाओं पर निर्भर हैं। खासकर गौरीकुंड से आगे लिंचोली और छोटी लिंचोली तक काम करने वाले छोटे व्यापारी और सेवा प्रदाता अपनी सीमित पूंजी और मेहनत से तीर्थयात्रियों की जरूरतें पूरी करते हैं।
रोपवे शुरू होने के बाद यदि बड़ी संख्या में यात्री पैदल मार्ग और इन पड़ावों से सीधे आगे निकल जाते हैं, तो लिंचोली और छोटी लिंचोली के टेंट संचालकों, दुकानदारों और छोटे व्यापारियों की आय में भारी कमी आने की आशंका है। इसी प्रकार घोड़ा-खच्चर व्यवसाय से जुड़े परिवारों के सामने रोजगार का गंभीर संकट पैदा हो सकता है। इन लोगों ने वर्षों से केदारनाथ यात्रा को सुचारु बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है; इसलिए विकास की कीमत उनकी आजीविका समाप्त करके नहीं चुकाई जानी चाहिए।
यह भी ध्यान रखना होगा कि ये केवल व्यवसाय नहीं हैं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था की पूरी श्रृंखला हैं। एक घोड़ा व्यवसायी की आय से उसके परिवार, पशुओं की देखभाल करने वाले श्रमिक, चारा उपलब्ध कराने वाले लोग, स्थानीय दुकानदार और अन्य छोटे व्यवसाय जुड़े होते हैं। इसी तरह एक टेंट या दुकान के पीछे कई परिवारों की रोजी-रोटी चलती है। इसलिए रोपवे के प्रभाव का आकलन केवल एक व्यक्ति की दुकान या एक घोड़े तक सीमित करके नहीं किया जाना चाहिए।
सरकार को चाहिए कि रोपवे निर्माण से पहले सोनप्रयाग, गौरीकुंड, लिंचोली और छोटी लिंचोली के प्रभावित व्यापारियों तथा घोड़ा-खच्चर व्यवसायियों का विस्तृत सामाजिक एवं आर्थिक सर्वेक्षण कराया जाए। जिन लोगों की आय प्रभावित होने की संभावना है, उनके लिए उचित मुआवजा, वैकल्पिक रोजगार, पुनर्वास और व्यवसायिक अवसरों की ठोस व्यवस्था की जाए। स्थानीय लोगों को रोपवे से जुड़ी सेवाओं, परिवहन, रखरखाव, पर्यटन, होम-स्टे, सुरक्षा और अन्य रोजगारों में प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
रोपवे को स्थानीय रोजगार के विरोध में नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की भागीदारी वाले विकास मॉडल के रूप में आगे बढ़ाया जाना चाहिए। यदि यात्री रोपवे से ऊपर जाएं, तब भी स्थानीय बाजारों, धार्मिक पर्यटन, होम-स्टे, भोजन, स्थानीय उत्पाद और अन्य सेवाओं को बढ़ावा देकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
केदारनाथ का विकास जरूरी है, लेकिन विकास का अर्थ स्थानीय लोगों की आजीविका समाप्त करना नहीं हो सकता। सरकार की जिम्मेदारी है कि आधुनिक सुविधाओं के साथ उन परिवारों के भविष्य की भी सुरक्षा करे, जिन्होंने वर्षों से केदारनाथ यात्रा और तीर्थयात्रियों की सेवा में अपना जीवन लगाया है।
रोपवे बने, विकास हो, यात्रा सुगम हो—लेकिन स्थानीय व्यापारी, घोड़ा व्यवसायी और पहाड़ के मेहनतकश परिवार भी इस विकास के बराबर भागीदार बनें। यही न्यायपूर्ण और टिकाऊ विकास की सही पहचान होगी।

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