05/06/2026
2011 से 2026 तक का सफ़र....
टाइम मैग्ज़ीन का ये कवर 2011 का है। इसे ध्यान से देखिए।
कवर में इंडिया वर्सेस चीन लिखा है, चीन वर्सेस भारत नहीं।
भारत को एक हाथी के तौर पर दिखाया गया है, जो आकार में बड़ा है। ड्रेगन छोटा है।
सन् 2011 में दुनिया भारत को इसी रूप में देख रही थी। हालाँकि चीनी अर्थव्यवस्था तब भी हमसे चार गुना बड़ी थी। मगर दुनिया हमें डेमोक्रेटिक पॉवर हाऊस के रूप में देख रही थी और हमारे डेमोग्रेफिक डिविडेंड पर भी नज़र थी। वह मान रही थी कि भारत चूँकि लोकतांत्रिक देश है और उसके पास युवाओं की तादाद ज़्यादा रहेगी इसलिए वह बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभरेगा और चीन से भी आगे निकल सकता है।
यानी दुनिया उम्मीद के साथ भारत को देख रही थी। मैं ये नहीं कहता कि तब का भारत स्वर्ग था। तमाम ख़ामियाँ थीं, ग़ैर बराबरी बढ़ रही थी, किसान आत्महत्याएं कर रहे थे, करप्शन बढ़ रहा था और कार्पोरेट सत्ता पर हावी होने को बेक़रार था।
लेकिन तभी घोटालों के आरोपों की बाढ़ आ गई। अन्ना का आंदोलन हुआ। मीडिया बढ़-चढ़कर हमले करने लगा और पूरे संघ परिवार ने इसे एक सुनहरे अवसर के रूप में देखा और भुनाने लगा।
फिर हुआ ये कि तरक्की का सिलसिला टूट गया। तीन-चार साल की अफ़रा-तफ़री और फिर एक ऐसे व्यक्ति और पार्टी का सत्ता पर कब्ज़ा हुआ जिसे न डेमोक्रेसी से मतलब था, न डेमोग्रेफिक डेविडेंड की समझ थी।
अर्थव्यवस्था का साथ खेल शुरू हो गया। नोटबंदी, जीएसटी, क्रोनी कैपिटलिज्म, राजनीतिक हिंसा और नफ़रत, संवैधानिक संस्थाओं का पतन, चुनाव चोरी।
आज हम आर्थिक सुनामी के कगार पर खड़े हैं। बरबादी साफ़ दिख रही है। पंद्रह साल में हम कहाँ से कहाँ पहुँच गए हैं।