राष्ट्रीय विचार मँच

राष्ट्रीय विचार मँच 'राष्ट्रीय विचार मंच' एक अराजनैतिक संगठन है जिसका उद्देश्य समाज को जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद,

04/09/2026

आप सभी को योगीराज श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!
श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन से पता चलता है कि भगवान श्री कृष्ण महाभारत के पात्र अर्जुन के माध्यम से मन, वचन, कर्म तथा ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग के द्वारा मनुष्य को जीवन की जीने की प्रेरणा देते हैं। वह गुण कर्म स्वभाव के आधार पर व्यक्ति के व्यक्तित्व का वर्गीकरण करते हैं। वह सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण के आधार पर मनुष्य की कार्य शैली का वर्गीकरण करते हैं। उनके जीवन में इन सभी गुणों का समावेश देखने को मिलता है। उनकी बाल लीलाओं से पता चलता है कि वह बचपन से ही असाधारण व्यक्तित्व थे। कहा जाता है कि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं।
वास्तव में देखा जाए तो भगवान कृष्ण के उपदेशों को अक्षरशः पालन किया जाए तो वह व्यक्ति भी दुनिया में भगवान की उपाधि प्राप्त करेगा लेकिन हम लोभ, लालच, काम, क्रोध, मोह के वशीभूत होकर अंशभर भी वहाँ तक नहीं पहुँच पाते हैं।
आज हम श्री कृष्ण का जन्म दिन मना रहे हैं तो उनके कुछ आदर्श तो जीवन में उतार ही सकते हैं।

आज स्थिति यह है कि श्री कृष्ण के आदर्श तो दूर दूर तक नहीं हैं बल्कि धर्म के नाम पर उनकी तथाकथित बाल लीलाओं का भद्दा मज़ाक़ बनाकर रख दिया है। कृष्ण राधा गोपिकाओं के बहाने भिन्न तरह के भद्दे भक्ति गीत और नृत्य किए जाते हैं। कृष्ण के बाल रूप की तो लड्डू गोपाल के नाम पर धज्जियाँ ही उड़ा रखी हैं। कुछ महिलायें लड्डू गोपाल के नाम की मानसिक बीमारी से ग्रसित हो चुकी हैं। धर्म के नाम पर पाखंड का बोलबाला हिंदू धर्म के आदर्शों को बदनाम कर रहा है। ऐसे मानसिक दिवालिया हिंदुत्व के लिए खतरा बनकर खड़े हो गए हैं।

31/08/2026

कुछ लोग कहते हैं राजा गृहस्थ जीवन वाला ही होना चाहिए फिर गृहस्थहीन को ही बार बार क्यों चुनते हैं?
एक्चुअली लोगों की सोच निजी हितों तक सिमट कर रह गई है जब कुछ जातीयों को लगा कि मोदी जी उनके हित की बातें करते हैं तो मोदी जी से बड़ा राष्ट्रवादी और सनातनी कोई नहीं लगा और यहाँ तक भगवान का दर्जा तक दे डाला लेकिन आज यह कहावत चरितार्थ हो गई, “काक पढ़ाये पिंजड़ा पढ़ गए चारों वेद, जब सुद आयी वतन की तो रहे…. के ….
आज वही तथाकथित राष्ट्रवादी लोग मोदी जी को जातिसूचक शब्द बोलने से नहीं कतराते हैं। भारत की गुलामी का कारण भी व्यक्तिवादी सोच रही है। यहाँ के सबल समुदायों को सल्तनत काल मुग़ल काल में कोई दिक्कत नहीं रही और अंग्रेजों से भी सौ साल तक कोई दिक्कत नहीं हुई लेकिन जैसे ही उन्होंने यहाँ की सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था को छेड़ा तो वे देश के दुश्मन हो गए। मुसलमानों से किसी ने नहीं कहा कि “मुसलमानों भारत छोड़ो” क्यों?

24/08/2026

आरक्षण का विरोध या आरक्षण की माँग कोई भला आदमी अर्थात् कर्मशील और साहसी तो करेगा नहीं। इन दोनों मांगों को निकम्मा और आलसी व्यक्ति ही करेगा। तथाकथित सवर्ण समाज के पूर्वज दबंग और साहसी रहे होंगे इसीलिए उनका ९०% भूसंपत्ति पर कब्जा रहा है जो समय बदलने के साथ साथ उद्योग और व्यापार तक पहुंच गया है। ऐसा होने के फलस्वरूप यह वर्ग सामाजिक और शैक्षणिक रूप से भी समृद्ध रहा है लेकिन तथाकथित दलित और पिछड़ा वर्ग के पूर्वज को ऐसे दबंग लोगों ने भूसंपत्ति से वंचित कर दिया फलस्वरूप ऐसा वर्ग मेहनत मजदूरी तक सीमित रह गया। निर्धनता के कारण यह वर्ग सामाजिक और शैक्षणिक रूप से कमजोर होता चला गया।

आज भी सामाजिक स्तर पर दलित और पिछड़े वर्ग की जातियाँ सामाजिक स्तर पर अपमान का शिकार होती हैं। ज्यादातर हिंसक और बलात्कार की घटनाओं का शिकार दलित और पिछड़ी जातियों के लोग ही होते हैं।

दलित और पिछड़ा वर्ग सामाजिक स्तर पर सवर्ण वर्ग को आज भी बेहद सम्मान देता है फिर भी तथाकथित उच्च जातियों के लोग उन्हें अपमानजनक नज़र से ही देखते हैं।
आज भी दलित मज़दूर वर्ग का साहस कुर्सी या चारपाई पर बैठने का नहीं होता है।
आज भी इस वर्ग के लोगों को घर के बरतनों में चाय या खाना नहीं दिया जाता है।
आज भी बलात्कार की शिकार ज्यादातर दलित महिलायें ही होती हैं।

सरकारी और निजी क्षेत्र के कार्यालयों में भी ये उपेक्षा का शिकार होते हैं। दलित अधिकारी तक के साथ उसके अधीनस्थ कर्मचारी/अधिकारी भेदभाव करते हैं। बल्कि अति पिछड़ा वर्ग के लोग तो जाति को खुलासा करने से भी बचते हैं।

आज भी स्थानीय प्रॉपर्टी डीलर प्लाटिंग करते समय कहते हैं कि यहाँ केवल उच्च जाति के लोगों को ही प्लॉट मिलेगा।
दलित को उसकी जाति पूछकर मकान किराए पर भी ऐसी स्थिति में ही दिया जाता है कि वह आवास पारिवारिक वातावरण से अलग है।
दलित यदि कोई मकान आबादी में खरीदना चाहता है तो उसे मकान भी कोई सवर्ण खरीदने नहीं देता है।
ब्राह्मण बाहुल्य लोक सभा या विधान सभा या नगरपालिका की सामान्य शीट पर किसी ग़ैर ब्राह्मण जाति वाले को कोई राजनैतिक पार्टी टिकिट तक नहीं देती है। यही स्थिति ठाकुर बाहुल्य, जाट बाहुल्य, बनिया बाहुल्य क्षेत्र में भी होती है जहाँ इन जातियों से इतर अन्य किसी जाति वाले को वोट तो दूर टिकट तक नहीं मिलेगा।
बात करते हैं आर्थिक आधार पर आरक्षण की!
एससी, एसटी की तरह ओबीसी को भी राज्य विधान मंडल और संसदीय शीटों पर आरक्षण होना चाहिए।

आरक्षण शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों को दिया गया था न कि आर्थिक आधार पर। आर्थिक आधार पर भी देखा जाए तो तथाकथित उच्च जातियों की जनसंख्या लगभग १६% ही है जबकि पिछड़ा वर्ग ५६% अनुसूचित जाति १५% और अनुसूचित जनजाति २.५% है। आबादी के अनुपात में इन जातियों को कुल आरक्षण ७८.५०% मिलना चाहिए। लेकिन क्योंकि आरक्षण ५०% से ज़्यादा नहीं होना चाहिए इसीलिए माननीय उच्चतम न्यायालय ने पिछड़े वर्ग को क्रीमीलेयर की शर्त के अनुसार मात्र २७% ही दिया। हालाँकि वर्तमान सरकार ने सामान्य वर्ग को नियम से अलग हटकर १०% आरक्षण का लाभ आर्थिक आधार पर दे दिया।
आरक्षण हटाना है तो उपनाम और प्रमाणपत्रों से जाति आधारित नाम हटाने होंगे।

23/08/2026

आज विभिन्न जातियां अपने अपने चर्चित लोगों की मूर्ति स्थापित करने की योजना बना रहे हैं ताकि समाज में अपना वर्चस्व क़ायम कर सकें यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देश में गृह युद्ध शुरू हो जाएगा।

21/08/2026

श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेय:
यह श्रीमद्भगत गीता के तृतीय अध्याय के पैंतीस वाँ श्लोक है। इसे श्री कृष्ण अर्जुन से स्वधर्म को श्रेष्ठ मानते हैं अर्थात अपने धर्म को दोष युक्त सम्पन्न करना किसी अन्य के धर्म को समुचित ढंग से सम्पन्न करने से कहीं अधिक श्रेष्ठ होता है। वास्तव में अपने कर्तव्य का पालन करते हुए मर जाना दूसरों के कर्तव्य का अनुसरण करने से श्रेयस्कर होता है। दूसरे के धर्म का पालन भययुक्त है।
आमतौर पर लोग इस श्लोक का आशय हिन्दू, मुस्लिम, बौद्ध इत्यादि धर्म समझ बैठते हैं जबकि स्वधर्म से आशय है कि आपका कर्तव्य ही आपका धर्म है दूसरे का कर्तव्य दूसरे का धर्म है। कभी कभी हम अपने कर्तव्य को दोषयुक्त मानने लगते हैं और दूसरे के धर्म (कर्तव्य) को गुणयुक्त मानते हैं जो हमारे विनाश का कारण बन सकता है। भगवान कृष्ण कहते हैं स्वधर्म में मृत्यु कष्टदायक भी होती है तो भी श्रेष्ठ है दूसरे धर्म में सुखद जीवन भी कष्टदायक होता है अर्थात दूसरे की रुचि के कार्य को स्वयं करना आनंददायक नहीं हो सकता है।

20/08/2026

प्राकृतिक उत्पाद को समाज के प्रयोगार्थ तैयार करना ही धर्म है।
प्रकृति हमें भौतिक संशाधन मूल स्वरूप में उपलब्ध कराती है। अर्थात् प्रकृति हमें विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक संसाधन मूल अथवा प्राकृतिक रूप में उपलब्ध कराती है, जिन्हें मनुष्य अपने ज्ञान, श्रम और तकनीक से समाजोपयोगी वस्तुओं में परिवर्तित करता है।” ये दो स्वरूप हैं-धात्विक और अधात्विक जैसे- मिट्टी,लकड़ी,लोहा, सोना, चाँदी, ताँबा इत्यादि धातुओं का रूप परिवर्तन कर मनुष्य ने जीवन में उपयोगी वस्तुओं में परिवर्तित किया है और तरल पदार्थों जैसे जल दूध तेल इत्यादि से नए उत्पाद तैयार होते हैं इसी प्रकार मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति को धर्म के साँचे में ढालकर समाजोपयोगी बनाया जाता है। मनुष्य की प्रवृति अन्य जीवों से भिन्न नहीं होती है। अंतर इतना है कि मनुष्य धर्म के साँचे में ढलकर सामाजिक मान्यताओं का पालन करता है जबकि अन्य जीव प्रकृति के अनुसार ही चलते हैं। मनुष्य प्रकृति के अनुकूल रहकर सामाजिक जीवन में संतुलन बनाकर नहीं रह सकता है। तभी तो अरस्तू ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है यदि वह समाज में नहीं रह सकता तो वह देवता है या दानव।
धर्म के सृजन का उद्देश्य मानव जीवन को एक व्यवस्था का स्वरूप प्रदान करना है। धर्म सामाजिक ताने बाने का दर्शन है जो मनुष्य को जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

12/08/2026

दुनिया का कोई धर्म नफ़रत नहीं सिखाता और ना ही शोषण का पाठ पढ़ाता है।

यह एक प्रसिद्ध संस्कृत प्रार्थना का आरंभिक भाग है, जिसका पूरा श्लोक है:
"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।।" इसका अर्थ है कि सभी लोग सुखी हों, सभी रोगमुक्त रहें, सभी का कल्याण हो और किसी भी व्यक्ति को कभी भी दुःख का सामना न करना पड़े।

 मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,
हिंदू है हम वतन है हिन्दुस्ताँ हमारा।
धर्म राष्ट्रवाद का संदेश देता है, धर्म सामाजिक व्यवस्था में ऑयलिंग का काम करता है, धर्म संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करता है, धर्म समाज को विखंडन से बचाता है, धर्म जीवन जीने की राह बताता है, धर्म राष्ट्र रक्षक है, धर्म प्रकृति रक्षक है, धर्म दुनिया का सरंक्षक है लेकिन धर्म नीले, पीले, हरे, सफेद वस्त्र का प्रतीक नहीं है।

यह प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक मनुस्मृति से लिया गया है, जिसका पूरा पद है:
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥
इसका अर्थ है कि बड़ों को प्रणाम करने और उनकी सेवा करने से आयु, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं

धर्म धर्म रक्षा की आढ़ में हिंसा का समर्थन नहीं करता है हालांकि यदि धर्म को कोई खतरा हो तो हिंसा भी आवश्यक है।
राष्ट्र, धर्म से बड़ा है। धार्मिक समूह की रक्षा के लिए राष्ट्र खत्म हो जाते हैं। अफ़ग़ानिस्तान पाकिस्तान बंगला देश इज़राइल इराक़ इत्यादि देशों को तथाकथित धर्म की रक्षा हेतु अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
लोग धर्म से आशय एक समूह से समझते हैं जबकि धर्म के मूलभूत सिद्धांतों को नकार देते हैं।
जब राष्ट्रहित की बात आती है तो धार्मिक सिद्धांत असाइड कर दिए जाते हैं। किसी भी धर्म का उद्देश्य राष्ट्र और लोकहित में होता है लेकिन जब कोई व्यक्ति या समूह धर्म को त्यागकर निजीहित में लिप्त हो जाता है तो उसका अंत करने के लिए भी धर्म को त्यागकर राष्ट्रहित में लेना पड़ता है।
उदाहरण स्वरूप हिरण्ड्यकश्यप राष्ट्र द्रोही था क्योंकि वह धर्म विरोधी था इसलिए प्रहलाद जो उसका पुत्र था, ने पिता का वध कराया जबकि धर्म, पुत्र को पिता की हत्या की इजाज़त नहीं देता है।
विभीषण रावण का भाई था और धर्म के अनुसार विभीषण को भाई का साथ देना चाहिए था लेकिन राष्ट्र रक्षा हेतु उसने रावण के शत्रु राम का साथ दिया।
धर्म के अनुसार निहत्थे कर्ण को मारना उचित नहीं था लेकिन कृष्ण ने राष्ट्रहित में अर्जुन को निहत्थे कर्ण का वध करने को प्रेरित किया क्योंकि हथियारबंद कर्ण का वध करना संभव नहीं था।
दुनियाँ में अनेक महान लोग जैसे सुकरात, बुद्ध, गांधी, कबीर इत्यादि हुए जिन्होंने धार्मिक उन्माद को प्राथमिकता न देकर राष्ट्र धर्म को प्राथमिकता दी क्योंकि धर्म के उन्मादी लोग केवल एक धार्मिक समूह की वकालत तो करते हैं लेकिन धर्म के एक भी नियम का पालन नहीं करते हैं इसलिए ऐसे तथाकथित धार्मिक लोग या धार्मिक संगठन राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए खतरा बने रहते हैं। धार्मिक लिबास धार्मिक कर्मकांड यदि धर्म के सिद्धांतों से भटककर केवल धर्म का डिंढोरा पीटते हैं तो वे धर्म को ही कमजोर कर देते हैं क्योंकि धार्मिक कुप्रथाएं समाज को विखंडन की तरफ़ धकेल देती हैं।

11/08/2026

ब्राह्मणवाद क्या है?
ताक़तवर द्वारा कमजोर का शोषण ही ब्राह्मणवाद है। कोई भी शोषित वर्ग तभी तक व्यावहारिक और सामाजिक माना जाता है जब तक वह शोषण को सहन करता है।
सामाजिक स्तर पर बड़ी जाति के लोग छोटी जाति के लोगों का शोषण करते हैं। राजनैतिक स्तर पर बड़े नेता छोटे नेता का शोषण करते हैं। एक सांसद की नज़र में एक विधायक कम सम्मान पाता है तो एक मंत्री की नज़र में एक सदस्य।
एक अधिकारी की नज़र में उसका अधीनस्थ कर्मचारी की हैसियत नहीं होती है।
एक बड़े व्यापारी की नज़र में छोटा व्यापारी।
एक बड़े उद्योगपति की नज़र में छोटे उद्योगपति की कोई हैसियत नहीं होती है।
इसी प्रकार प्रत्येक क्षेत्र में ऐसा ही देखने को मिलता है। यही ब्राह्मणवाद है।

09/08/2026

सामाजिक प्रदूषण, धार्मिक प्रदूषण, राजनैतिक प्रदूषण, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, खाद्य पदार्थों में मिलावट इत्यादि आख़िर जाएं तो जाएं कहाँ?
इन सभी समस्याओं का निदान शिक्षा…
आओ मिलकर शिक्षा का अलख जगायें।

04/08/2026

कोई भी धार्मिक अनुष्ठान या कर्मकांड तथाकथित निजी जीवन के हित के उद्देश्य को प्रेरित करता है न कि लोक हित या समाज हित।
आश्चर्य की बात यह है कि धार्मिक कर्मकांड या धार्मिक अनुष्ठान व्यक्ति के निजी जीवन के आचरण को भी प्रभावित नहीं करते हैं और न ही उसके व्यवहार में कोई परिवर्तन आता है।
धर्म का उद्देश्य राष्ट्र रक्षा है और वह तभी संभव है कि जब कोई व्यक्ति धार्मिक आचरण के अनुकूल जीवन व्यतीत करे। कोई भी समाजपरक या लोकपरक कर्म राष्ट्र को समर्पित होता है। राष्ट्र धर्म ही दिव्य धर्म होता है। धर्म में राष्ट्रहित समाहित होता है। धर्म कोई दिखावा मात्र नहीं है, धर्म कोई पहनावा मात्र नहीं है बल्कि धर्म का उद्देश्य मानवीय मूल्यों को संरक्षित करना है जो समाज को संगठित कर एक उत्तम राष्ट्र का निर्माण करता है। धर्म जीवन का प्राचीन संविधान है। धर्म हमें व्यक्तिगत,पारिवारिक और सामाजिक जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने में सहायक होता है।
वर्तमान काल में और पूर्व काल में जिन लोगों ने धर्म को को हथियार बनाकर मानवीय मूल्यों को क्षति पहुंचाई या दिखावा आडंबर कर मनोरंजन किया और धर्म को बदनाम किया है ऐसे लोग हमेशा धर्म के नाम पर धर्म को ही कलंकित करते हैं और साथ साथ राष्ट्र निर्माण में भी रोड़ा बनते हैं।

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