05/05/2026
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भाजपा के असली चेहरे — बर्तन माँजने वाली कलिता, बेटी की चीख को वोट में बदलने वाली रत्ना और सन्देशखाली की आग को बुझाने वाली रेखा
बंगाल के 2026 के इस ऐतिहासिक चुनाव में तीन ऐसी महिलाएँ विधानसभा पहुँची हैं, जिनकी कहानी सिर्फ़ जीत की नहीं, बल्कि संघर्ष, आँसू, हौसले और आम औरत की आवाज़ की है।
कलिता मांझी (उम्र 37-38 वर्ष)
बंगाल की उस आम औरत की मिसाल हैं, जो सालों तक दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा, बर्तन मांजने और सफाई का काम करती रहीं। वे दो घरों में काम करती थीं और महीने में मात्र 4-5 हजार रुपये कमाती थीं। सुबह 5 बजे उठकर घरेलू कामों के बाद वे दूसरों के घर जातीं।
वे 10 साल से ज्यादा समय से राजनीति में सक्रिय हैं। 2021 में भी भाजपा ने उन्हें औसग्राम (एससी) सीट से टिकट दिया था, लेकिन वे हार गईं। 2026 में पार्टी ने फिर उन पर भरोसा जताया। कलिता ने एक महीने की छुट्टी लेकर पूरे जोर से प्रचार किया। उनका फोकस क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं — पीने के पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और आदिवासी-वन क्षेत्रों की उपेक्षा — पर रहा।
उनकी जीत उन लाखों गरीब, मेहनतकश महिलाओं के लिए प्रेरणा है, जिन्हें समाज अक्सर नजरअंदाज कर देता है। साधारण पृष्ठभूमि, कम संपत्ति (लगभग ५ लाख रुपये) और साधारण शिक्षा के बावजूद उन्होंने भारी मतों से जीत हासिल की।
रत्ना देबनाथ (पानिहाटी, उत्तर 24 परगना)
रत्ना देबनाथ 2024 के आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज बलात्कार-हत्या कांड की माँ हैं। उनकी बेटी (ट्रेनिंग डॉक्टर) अस्पताल में ही क्रूरता से बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने पूरे बंगाल को हिला दिया था और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़े आंदोलन हुए।
रत्ना ने बेटी की मौत के बाद न्याय की लड़ाई नहीं छोड़ी। उन्होंने चुप रहने की बजाय आवाज उठाई, प्रदर्शन किए और दोषियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। 2026 चुनाव में भाजपा ने उन्हें पानिहाटी सीट से टिकट दिया। उनकी उम्मीदवारी सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि उन माँओं की पीड़ा और गुस्से का प्रतीक बन गई, जिनकी बेटियाँ सुरक्षित महसूस नहीं करतीं।
वे भारी मतों से जीतीं। उनकी जीत सिर्फ एक सीट की जीत नहीं, बल्कि न्याय की माँग और बेटी की याद में दी गई लड़ाई का प्रतीक है।
रेखा पात्रा (हिंगलगंज-SC, उत्तर २४ परगना)
रेखा पात्रा संदेशखाली की वह बहादुर महिला हैं, जिन्होंने वहाँ की महिलाओं पर हुए यौन अत्याचार, जमीन हड़पने और ताकत के दुरुपयोग के खिलाफ सबसे पहले आवाज उठाई। sandeshkhali में महिलाओं के साथ जो जुल्म हुए, उसकी कहानी पूरे देश में चर्चित हुई। रेखा खुद पीड़ितों में से एक थीं या उनके परिवार/समुदाय की महिलाओं के साथ हुआ था।
वे बार-बार धमकियाँ झेलती रहीं, लेकिन डरी नहीं। 2024 लोकसभा चुनाव में बसिरहाट से लड़ीं, फिर 2026 में हिंगलगंज (एससी) सीट से भाजपा उम्मीदवार बनीं। उन्होंने महिलाओं की सुरक्षा, स्थानीय अत्याचार और sandeshkhali के मुद्दों को अपना मुख्य एजेंडा बनाया।
वे भी जीत गईं (लगभग 5000+ वोटों के अंतर से)। उनकी जीत उन सभी महिलाओं की जीत है, जो चुपके से सताई जाती हैं और अब बोलने की हिम्मत जुटा रही हैं।
तीनों की एक बात समान — ये महलों की राजनीति नहीं, बल्कि दर्द, मेहनत और हौसले की राजनीति हैं। कलिता की मेहनत, रत्ना की ममता और रेखा का साहस बंगाल के 2026 चुनाव में नई उम्मीद की किरण बनकर उभरा।
ये कहानियाँ साबित करती हैं कि सच्ची ताकत अक्सर सबसे निचले पायदान से उठती है।
रश्मि रति
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#नारीशक्ती