12/05/2026
संसद में EVM हटाने वाले Privet Member Bill पर विपक्षी पार्टियों के नेताओं की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है!!
(01) 9/12/2022 को बसपा सांसद Kunwar Danish Ali ने लोकसभा में EVM हटाकर पुनः बैलेट पेपर से चुनाव कराने को लेकर एक Private Member Bill पेश किया था। यह एक महत्वपूर्ण अवसर था, क्योंकि संसद के अंदर पहली बार किसी सांसद ने औपचारिक रूप से EVM प्रतिबंध का विधेयक रखा था।
लेकिन आश्चर्य की बात यह रही कि उस समय किसी भी (Rahul Gandhi, Arvind Kejriwal, Mamta banarji, Mayawati, Akhilesh Yadav, Tejasvi Yadav, etc) विपक्षी पार्टियों ने इस बिल को राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर लोकसभा में जोरदार तरीके से बैलट पेपर कानून के मांग को नहीं उठाया। यहां तक की मायावती ने भी अपने सांसद के प्राइवेट मेंबर बिल को मजबूती से आगे नहीं बढ़ाया उन्होंने बैलट पेपर कानून को नजरअंदाज किया।
(02) अगर विपक्षी पार्टियाँ वास्तव में EVM हटाना चाहतीं, तो वे इस बिल पर discussion एवं voting करवाने के लिए लोकसभा स्पीकर पर सामूहिक दबाव बना सकती थीं। संसद के इतिहास में कई बार देखा गया है कि जब विपक्ष किसी मुद्दे को लेकर लगातार हंगामा करता है, कार्यवाही रोकता है, नारेबाजी करता है और सदन नहीं चलने देता, तब सरकार और स्पीकर दोनों को चर्चा करवानी पड़ती है।
(03) अडानी मुद्दा, मणिपुर मुद्दा, किसानों का मुद्दा, Pegasus जासूसी मामला आदि विषयों पर विपक्षी दलों ने संसद में कई दिनों तक हंगामा किया और चर्चा की मांग को लेकर लगातार दबाव बनाया। जब विपक्ष इन विषयों पर स्पीकर को मजबूर कर सकता है, तो फिर EVM हटाने वाले बिल पर discussion एवं voting कराने के लिए ऐसा दबाव क्यों नहीं बनाया गया? यह एक बड़ा प्रश्न है इनके बेईमान होने का और America के दबाव में काम करने का।
(04) यदि सभी विपक्षी सांसद एकजुट होकर कहते कि “पहले EVM बिल पर चर्चा कराओ”, सदन की कार्यवाही रोकते, स्पीकर के सामने लगातार मांग रखते और मीडिया में इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाते, तो निश्चित रूप से इस विषय पर संसद के अंदर व्यापक बहस होती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे यह प्रतीत होता है कि अधिकांश विपक्षी दल सार्वजनिक मंचों पर EVM पर सवाल तो उठाते हैं, लेकिन संसद के अंदर EVM हटाने के लिए वैसी गंभीर लड़ाई नहीं लड़ते जैसी अन्य मुद्दों पर लड़ते हैं। इन सभी चीजों से साफ होता है कि विपक्ष के नेता विदेशियों के दबाव में EVM को चालू रखना चाहते हैं और देश को बर्बाद होने से इनका कोई भी लेना देना नहीं है।
(05) यहाँ तक कि उस समय बसपा के अन्य सांसदों ने भी दानिश अली के इस बिल को लेकर कोई बड़ा संसदीय अभियान नहीं चलाया। न ही उन्होंने लोकसभा स्पीकर से लगातार मांग की कि इस बिल पर voting कराई जाए। इसी प्रकार अन्य विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को प्राथमिकता नहीं दीया।
(06) समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष Akhilesh Yadav समय-समय पर EVM पर सवाल उठाते हैं, लेकिन उनकी पार्टी ने संसद में EVM प्रतिबंध के लिए कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं किया। न तो वे स्वयं EVM हटाने के लिए Private Member Bill लाते हैं और न ही किसी दूसरे सांसद द्वारा लाए गए बिल पर discussion एवं voting करवाने के लिए संसद में निर्णायक संघर्ष करते हैं।
(07) अखिलेश यादव यह कहते हैं कि “हम EVM से बीजेपी को हराकर EVM बंद करवाएंगे।” यह तर्क विरोधाभासी प्रतीत होता है, क्योंकि यदि EVM प्रणाली पर ही भरोसा नहीं है, तो उसी प्रणाली से जीतकर बाद में उसे बंद करने की बात लोगों को भ्रमित करने जैसी लगती है। इसी कारण कई लोग मानते हैं कि विपक्षी दल सार्वजनिक रूप से EVM का विरोध करते हैं, लेकिन व्यवहार में वे EVM व्यवस्था को जारी रहने देना चाहते हैं।
निष्कर्ष यह है कि भारत के नागरिकों को अब विपक्षी पार्टियों के भरोसे नहीं रहना चाहिए बल्कि भारत देश के सभी नागरिकों को हर महीने अपना नागरिक कर्तव्य निभाकर अपने-अपने मुख्यमंत्री को हर महीने पोस्टकार्ड और ट्वीट भेजकर उनपर दबाव बनाना चाहिए कि वह संविधान अनुच्छेद 328 कानून के तहत मतदाताओं को बैलट पेपर से वोट देने के विकल्प का कानून लागू करें।
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