16/02/2026
जब–जब बहुजन समाज सत्ता के करीब पहुँचा है, तब–तब ब्राह्मणवादी ताक़तों ने नए–नए हथकंडे अपनाकर उसे कमजोर करने की कोशिश की है।
इतिहास गवाह है कि सत्ता से बाहर रहने वाली वर्चस्ववादी शक्तियाँ कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर और कई बार महिलाओं को आगे करके बहुजन आंदोलन को बदनाम करने और तोड़ने का प्रयास करती रही हैं।
सदियों से यह देखा गया है कि जैसे ही दलित, पिछड़े और वंचित वर्ग अपने हक़ के लिए संगठित होते हैं, वैसे ही उनके खिलाफ़ नैरेटिव गढ़ा जाता है।
महिलाओं के मुद्दों को हथियार बनाकर, बहुजन आंदोलनों को “अराजक”, “हिंसक” या “असंवैधानिक” बताने की चाल चली जाती है, ताकि असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जा सके।
ब्राह्मणवाद यह भ्रम फैलाने की कोशिश करता है कि बहुजन आंदोलन महिलाओं के खिलाफ़ है, जबकि सच्चाई इसके ठीक उलट है।
बहुजन संघर्ष ने ही स्त्री–सम्मान, समानता और न्याय की बात सबसे पहले ज़मीन पर रखी।
सावित्रीबाई फुले से लेकर आज तक बहुजन आंदोलन ने महिलाओं को नेतृत्व में खड़ा किया है, न कि मोहरे की तरह इस्तेमाल किया है।
आज भी जब बहुजन राजनीति निर्णायक मोड़ पर है, वही पुरानी रणनीति दोहराई जा रही है।
कुछ चेहरों को आगे कर आंदोलन को बदनाम करना, सोशल मीडिया और मीडिया ट्रायल के ज़रिए भ्रम फैलाना,
और बहुजन एकता को तोड़ने का प्रयास करना। लेकिन अब बहुजन समाज पहले से कहीं अधिक जागरूक है।
इस बार ब्राह्मणवादी चालाकियाँ सफल नहीं होंगी। बहुजन समाज समझ चुका है कि ये षड्यंत्र सत्ता को बचाने के लिए रचे जाते हैं, न कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए। अब सवाल सिर्फ़ विरोध का नहीं, बल्कि राजनीतिक परिवर्तन का है।
आज बहुजन समाज संगठित है, सचेत है और निर्णायक भूमिका में है। आजाद समाज पार्टी के नेतृत्व में बहुजन राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर रही है—जहाँ सम्मान, न्याय और बराबरी केवल नारे नहीं, बल्कि सत्ता की नीतियाँ होंगी।
ब्राह्मणवाद की सदियों पुरानी साज़िशें अब धूमिल पड़ने वाली हैं। बहुजन समाज न तो गुमराह होगा, न ही बंटेगा। यह संघर्ष किसी के खिलाफ़ नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण समाज और सत्ता में भागीदारी के लिए है।
इस बार इतिहास बदलेगा।
और बहुजन समाज सत्ता की कुर्सी तक पहुँचेगा। जय भीम जय सविधान "