Congress Workers' Academy Nadia

Congress Workers' Academy Nadia Congress for Nationhood, Congress for India....
Jai Hind, Jai Bharat.

03/05/2026

মতামত সম্পূর্ণ ব্যক্তিগত:
তৃণমূলের রেজাল্ট খুব খারাপ হলেও 180 এর নীচে নামবে না।
বিজেপি খুব ভালো করলেও 80 পেরোবে না।
বাম কংগ্রেস মিলে অন্তত গোটা 20 আসন নিয়ে বেরিয়ে যাবে।
বামেরা 7-8% ভোট বাড়াবে যেটা সরাসরি রাম থেকে কাটবে।
কংগ্রেস Isf হুমায়ুন মিলে 2-3% ভোট তৃণমূল থেকে কাটবে।
মোটের উপর এই যে 4-5% ভোট (7/8-2/3) বিজেপির থেকে বেশী কাটবে সেটাই ডিসাইডিং ফ্যাক্টর হবে।
তৃণমূল ভোট পাবে 42-43%..
22-23% সংখ্যালঘু ভোট, 10% বেনিফিশিয়ারি ভাতা প্রাপক, 10% যাদের তৃণমূল করে পেট চলে।
বাম জোট মিলিয়ে 12+2+1= 15% মত পাবে।
কংগ্রেস পাবে 5-6% ভোট।
নোটা আদার্স মিলিয়ে 1%
বাদবাকি সব ভোট বিজেপিতে কনসোলিডেট হলেও বিজেপি অংকের হিসাবে (100-42tmc-15lefts -5inc -1otrs) = 37% এর বেশী ভোট কখনোই পাবে না।
এই 42-37 = 5% ভোট তৃণমূল কে বাঁচিয়ে দেবে।
এই ভোট টা বামেরা কেটেছে রামের ঘর থেকে।
বাকিটা 4 তারিখ দেখা যাবে।।
🙏🙏

© অনুজ বিশ্বাস

গড থেকে গডসে: চেতনার রিভার্স ওসমোসিস নাথুরমের জবানবন্দি "শুনুন ধর্মাবতার" আর গোপাল গডসের "গান্ধী হত্যা কেন?" বইদুটো প্রথ...
29/01/2026

গড থেকে গডসে: চেতনার রিভার্স ওসমোসিস

নাথুরমের জবানবন্দি "শুনুন ধর্মাবতার" আর গোপাল গডসের "গান্ধী হত্যা কেন?" বইদুটো প্রথম দেখি কৃষ্ণনগর রেলস্টেশনের বুকস্টলে। তখন 2001 সাল, ক্লাস টেনে পড়ি, বয়স মাত্র চৌদ্দ। সেই বয়সে নাথুরাম গডসে, জন উইকিলিস বুথ, হিটলার, এল চ্যাপোর মতন লোকেদের হিরো মনে হয়, আমারও হয়েছিল। সুতরাং বইদুটো আমার চাই। দুটো বইয়ের তৎকালীন দাম আশি টাকা মত। অনেক কষ্টে টাকা জোগাড় করে বই দুটো কিনলাম। পড়ে ফেলতে সময় লাগলো মাত্র দেড় দিন। হ্যাঁ, চৌদ্দ বছর বয়সে আমি নাথুরামের জবানবন্দি গোগ্রাসে গিলেছি। বয়ঃসন্ধির তাড়নায় প্রাথমিক ভাবে অভিভূত হয়েছি।
এরপর হঠাৎ মাথায় এলো একটা প্রশ্ন যা আমার Stream of Consciousness এর মধ্যে Reverse Osmosis তৈরী করলো: গান্ধীহত্যা তো আর পাঁচটা সাধারণ খুনের মামলার মতন ঘটনা। তিনটে গুলি চালিয়ে একজনকে খুন করে খুনী ধরা পড়ল। কিন্তু সেই খুনকে জাস্টিফাই করার জন্য এতো কথা খরচ করার দরকার কেন হল? এই একটা প্রশ্নেই চিন্তা জগতে আলোড়ন উঠলো। ততদিন অগ্নিযুগের অনেক সশস্ত্র বিপ্লবীর জবানবন্দি পড়ার সুযোগ পেয়েছি। প্রত্যেক ক্ষেত্রেই তাদের জবানবন্দি ছিল সংক্ষিপ্ত... অমুক ইংরেজকে মেরেছি বেশ করেছি টাইপের বক্তব্য। অন্যদিকে নাথুরাম একটা মার্ডার কে জাস্টিফাই করতে গিয়ে যে বিশাল লেকচার দিয়েছিল সেখানেই নাথুরাম ঐতিহাসিক ব্লাণ্ডার করে বসলো। জবানবন্দির প্রতিটা ছত্রে নাথুরাম প্রমাণ করে দিল কেন গান্ধী মহান, কেন রবি ঠাকুরের মহাত্মা আর নেতাজির দেওয়া জাতির জনক উপাধি যথার্থ ভাবেই এই মানুষটির উপর বর্তায়। ঠিক যেভাবে জুলিয়াস সিজারের হত্যাকাণ্ড জাস্টিফাই করতে গিয়ে ব্রুটাস প্রমাণ করেছিল সিজার সত্যিই মহান ছিল।
নাথুরামের মত একজন ক্রিমিনাল,খুনের আসামির প্রতি আমার কোনও সহানুভূতি নেই। তবে আমি নাথুরাম এর প্রতি কৃতজ্ঞ: ওনার জবানবন্দি না পড়লে আমি এত গভীরভাবে গান্ধীর প্রেমে পড়তাম না, অনুভব করতে পারতাম না মহাত্মার মহত্ব, রক্তমাংসের শরীর নিয়ে একজন Man থেকে কিভাবে Godman হয়ে উঠতে পারে।
আম্বালা জেলের কাঠগড়ায় দাঁড়িয়ে নাথুরাম মোট 150টা স্টেটমেন্ট দিয়েছিল আদালতের সামনে যার সবকিছুই On Record.. খুনের আসামী হিসাবে অভিযুক্ত হওয়ার পর সংঘ কিম্বা মহাসভা যখন নাথুরাম এর সাথে সমস্ত সম্পর্ক অস্বীকার করে তখন নাথুরাম এর মানসিক বৈকল্য সৃষ্টি হয়। 139 নম্বর স্টেটমেন্টে নাথুরাম স্বীকার করতে বাধ্য হয়,
"... স্বদেশের জন্য গান্ধীজী যা করেছেন তার জন্য আমি গান্ধীজীর পদতলে প্রণত হব; প্রণত হব, ব্যক্তি গান্ধীজীর জন্য -- তাঁর ওই দেশসেবার জন্যই। এবং তাঁর দিকে গুলি ছোঁড়ার আগেও তাঁর মঙ্গল কামনা করেছি, শ্রদ্ধায় নত হয়েছি।"
কখনও কখনও মনে হয়, নাথুরাম এর চেয়ে বড় গান্ধীভক্ত আর কেউ হয়না। এখানেই মহাত্মা অমর হয়েছেন।।
জয়তু জাতির জনক 🙏🙏

© অনুজ বিশ্বাস

13/11/2025

🌅 गांधीजी की नज़र में आज़ादी का सच्चा अर्थ 🌿

14 अगस्त 1947 की शाम, जब देश विभाजन के दर्द और स्वतंत्रता के उल्लास के बीच झूल रहा था, महात्मा गांधी कोलकाता के बेलियाघाटा में थे — वहाँ जहाँ अभी भी मानवता की सबसे कठिन परीक्षा चल रही थी।
पूर्वी बंगाल में हिंसा और भय के बीच उनकी प्रार्थना सभा में अप्रत्याशित भीड़ उमड़ पड़ी। भीड़ ने जब गांधीजी को सुना, तो लगा जैसे यह राष्ट्र खुद से संवाद कर रहा हो। गांधीजी ने कहा “मैं बेलियाघाटा में इसलिए हूँ कि कलकत्ता में शांति पुनः लौट आए। यदि यहाँ हृदय बदल गए, तो नोआखाली और पूरा भारत भी सुरक्षित हो जाएगा।”

15 अगस्त 1947 — भारत की स्वतंत्रता का वह प्रभात जब सारा देश जश्न मना रहा था, गांधीजी ने मौन उपवास शुरू किया। क्योंकि उनके लिए आज़ादी केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि हृदय परिवर्तन थी।

नवनियुक्त राज्यपाल सी. राजगोपालाचारी सुबह सुबह गांधीजी से मिलने आए और कहा कि “आपने चमत्कार कर दिखाया है,” तो गांधीजी ने उत्तर दिया —“मैं तब तक संतुष्ट नहीं हो सकता जब तक दोनों समुदाय एक-दूसरे की संगति में सुरक्षित महसूस न करें। यदि यह नहीं हुआ, तो यह उत्सव अधूरा है।”

और फिर एक अप्रत्याशित चमत्कार हुआ।
16 अगस्त 1946 के “डायरेक्ट एक्शन डे” से दोनों समुदाय के बीच जो दीवारें खड़ी हो गई थीं, वे अचानक ढहने लगीं। दोनों समुदाय के लोग अपनी पुरानी शत्रुता भुलाकर एक साथ सड़कों पर निकले, एक-दूसरे को गले लगाया, और मिठाइयां बांटी।

गांधीजी को यह दृश्य देखकर एरिक मारिया रिमार्क द्वारा लिखित एक अंग्रेजी पुस्तक “All Quiet on the Western Front” की याद आयी। इस पुस्तक में क्रिसमस के दिन युद्ध की विभीषिका में भी मानवता की झलक दिखाने वाला प्रसंग था — जब फ्रांसीसी और जर्मन सैनिक अपने-अपने मोर्चों से बाहर आए थे और कुछ क्षणों के लिए भूल गए थे कि वे एक-दूसरे के शत्रु हैं। दोनों देशों के शत्रु सैनिक आपस में बात करते हैं कि हम दुश्मन क्यों हैं?" यह क्षण उपन्यास का हृदय है – जो बताता है कि युद्ध इंसानियत को मारता है। सीमाएँ, वर्दी, प्रचार और युद्ध सब व्यर्थ। सच्चाई है सच्ची इंसानियत और मानवता।

निर्मल बोस, जो गांधीजी के भाषणों को लिपिबद्ध करते थे, ने उस सुबह गांधीजी से कहा “आपको दिल्ली जाना चाहिए, बापू! नेहरू और पटेल ने आपको बुलाया है। आजादी का पर्व आपके बिना अधूरा है। यह दिन आपके जीवन का सबसे महान क्षण है।”

निर्मल बोस ने 1941 में स्वर्ग सिधार चुके रवींद्रनाथ टैगोर के शब्द गांधीजी को उद्धृत किए —“किसी मनुष्य का मूल्यांकन उसके जीवन के सबसे महानतम (उदात्त) क्षण से किया जाना चाहिए, जब उसने अपना श्रेष्ठतम सृजन किया हो।”

बापू आपके लिए यह स्वतंत्रता दिवस सबसे बड़ा उद्दात क्षण है। इसके लिए आपने चार दशक तक संघर्ष किया है।

गांधीजी मुस्कुराए और बोले “ निर्मल बाबू , यह बात रविन्द्र बाबू जैसे कवि के लिए सही है, क्योंकि कवि को अपनी कल्पना में आसमान के तारों की रोशनी धरती पर लानी होती है। लेकिन मेरे जैसे आदमी को मापने के लिए आपको यह देखना होगा कि आज के दिन मैंने अपनी यात्रा में अपने पैरों पर कितनी धूल इकट्ठी की है।”

निर्मल कुमार बोस की आंखों से आंसू टपक पड़े। गांधीजी के इस उत्तर में उन्हें गांधी का सम्पूर्ण सृजन समा गया - गांधीजी का सृजन : धूल में चमकता महानायक। निर्मल बाबू ने अपनी आंखों से 77 वर्षीय गांधी को चरखा कातते हुए, सुबह से रात तक पैदल गाँवों में घूमते हुए, असहाय और गरीबों का इलाज करते हुए, बच्चों को दुलारते हुए, अपने हाथों से लालटेन का कांच साफ करते हुए और अपने हाथ से खुद अपना पाखाना साफ करते हुए देखा था।

निर्मल कुमार बोस लिखते हैं कि गांधीजी का “सबसे उदात्त सृजन” कोई एक क्षण नहीं था। उन्होंने अपने ‘धूल भरे पांवों’ से जो भारत बनाया, वह केवल राजनीतिक आज़ादी नहीं थी, बल्कि नैतिक जागृति का सृजन था।

यही धूल — यही पांवों के निशान — भारत की आत्मा के सबसे उजले प्रतीक हैं। 🇮🇳

Gandhi Darshan - गांधी दर्शन
12 नवंबर 2025

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