Yug arya

Yug arya राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, ललितपुर

12/02/2026

Nightmares are your subconscious mind screaming for attention. 🌑
​Whether it’s being chased, falling endlessly, or seeing dead people—every scary dream has a specific meaning in Vedic Astrology. It could be a signal of 'Rahu' (illusion) or a warning of upcoming danger.

​Don't suppress the fear. Understand it. Heal it. 🕉️
​DM me "HEAL" or click the link in bio to stop the nightmares.


11/02/2026
“ े_धर_उलटे_कटे_बखत_रा_कोर #सिर_कटे_धर_लडपडे_जद_छूटे_जालोर ”12 वीँ शताब्दी के अँतिम वर्षो मे जालोर दुर्ग पर चौहान राजा क...
22/10/2023

“ े_धर_उलटे_कटे_बखत_रा_कोर
#सिर_कटे_धर_लडपडे_जद_छूटे_जालोर ”

12 वीँ शताब्दी के अँतिम वर्षो मे जालोर दुर्ग पर चौहान राजा कान्हडदेव का शासन था इनका पुत्र कूँवर विरमदेव चौहान समस्त राजपूताना मे कुश्ती का प्रसिद्ध पहलवान था एवँ कूशल यौद्धा था छोटी आयू मे भी कई यूद्धो मे कुशल सैन्य सँचालन कर अपनी सैना को विजय दिलाई थी ।

बादशाह अलाउदीन खिलजी ने गुजरात पर चढाई की वहा की प्रजा को मारा और सोमनाथ मंदिर से सोमनाथ ज्योतिलिंग को उठा कर गीले चमड़े में बांध कर, राजपुताना को लूटने के इरादे से जालोर पहूचा, उसने जालोर से 09 कोस दूर सकराणे गाँव में अपना डेरा डाला, जालोर के शासक राव कान्हडदेव चौहान ने जब ये बात सुनी तो उसने अपने 04 अच्छे राजपूत बादशाह के पास अपना सन्देश ले कर भेजा और कहलवाया “तुमने इतने हिन्दुओ को मारा और कैद किया, सोमनाथ महादेव को भी बांध कर ले आये, ये तुमने अच्छा नहीं किया और फिर तुमने मेरे ही गढ़ के नीच आ कर डेरा डाला, क्या तुमने हमें क्या राजपूत नहीं समझा”, बादशाह को सन्देश पहूचा गया चारो राजपूतो को दरबार में बुलाया गया, राव कान्हडदेव का खास राजपूत कांधल आपने साथियों के साथ दरबार में हाज़िर हुए पर उन्होंने बादशाह के सामने सर नहीं झुकाया,

बादशाह गुस्से से लाल हो गये, वजीर ने समझाया ये अखड़ दिमाग के राजपूत है ये राव कान्हडदेव के सिवा किसी के सामने सर नहीं झुकाते , बादशाह ने कहा “ हमारा ये नियम है की मार्ग में कोई गढ़ आ जावे तो उसको जीते बिना आगे नहीं बढ़ते क्योकि राव राव कान्हडदेव मुझे आखे दिखा रहा है तो अब तो जालोर फ़तेह करे बिना आगे नहीं जायेगे “ इतना कह कर बादशाह से एक उडती हुई चील पर तुक्का चलाया, जिसकी चोट से चील गिरने लगी, बादशाह का हुकुम हुआ ये चील नीचे नहीं गिरनी चाइये, तीरंदाजो तीर चलने लगे, कांधल वही खड़ा देख रहा था वो समझ गया की ये सब मुझे दिखने के लिए करा गया है, उसकी वक़्त एक सैनिक एक बड़े से भैसे को ले कर वह से निकला,

कांधल ने फुर्ती से अपनी तलवार निकली और एक ही झटके में भैसे के दो टुकड़े कर दिया, तभी तीरंदाजो ने अपने कमान की मुठ कांधल की तरफ की, वजीर के बीच में पड़ कर बादशाह से कहा ‘मैंने तो आप को पहले ही कहा था की ये अखड़ राजपूत है’ बादशाह तीरंदाजो को रोक देता है, और कांधल और उसके साथीयो को जाने देता है, कांधल जालोर पहुच कर कान्हडदेव के सामने सारी बात रखता है, तो कान्हडदेव कहता है

“जल पिए बिना तो रहा नहीं सकते परन्तु अन्न तो अब जब ही खायेगे जब सोमनाथ महादेव को छुड़ा कर लायेगे” हम रात को उनके डेरे पर छापा मारेंगे, तीसरे दिन रात को कान्हडदेव की सेना अलाउदीन खिलजी के डेरे पर हमला कर देते है,बादशाह के बहुत से आदमी मरे जाते है और बादशाह को अपनी जान बचा कर भागना पड़ता है,

सोमनाथ ज्योतिलिंग को तुर्कों से छुड़ा कर कान्हडदेव उन्हें जालोर ले आते है और उनको अपने जागीरी के गाँव मकराना (सरना गांव) मे शास्त्रोक्त रीती से ही प्राण प्रतिष्ठित कर एक बड़ा मंदिर बनवाते है ।
मुंहता नैन्सी की ख्यात के अनुसार इस युद्ध में जालौर के राजकुमार विरमदेव की वीरता की कहानी सुन खिलजी ने उसे दिल्ली आमंत्रित किया |

उसके पिता कान्हड़ देव ने अपने सरदारों से विचार विमर्श करने के बाद राजकुमार विरमदेव को खिलजी के पास दिल्ली भेज दिया जहाँ खिलजी ने उसकी वीरता से प्रभावित हो अपनी पुत्री फिरोजा के विवाह का प्रस्ताव राजकुमार विरमदेव के सामने रखा जिसे विरमदेव एकाएक ठुकराने की स्थिति में नही थे अतः वे जालौर से बारात लाने का बहाना बना दिल्ली से निकल आए और जालौर पहुँच कर खिलजी का प्रस्ताव ठुकरा दिया |

मामो लाजे भाटिया, कुल लाजे चव्हान |
जो हूँ परणु तुरकड़ी तो उल्टो उगे भान ||

शाही सेना पर गुजरात से लौटते समय हमला और अब विरमदेव द्वारा शहजादी फिरोजा के साथ विवाह का प्रस्ताव ठुकराने के कारण खिलजी ने जालौर रोंदने का निश्चय कर एक बड़ी सेना जालौर रवाना की जिस सेना पर सिवाना के पास जालौर के कान्हड़ देव और सिवाना के शासक सातलदेव ने मिलकर एक साथ आक्रमण कर परास्त कर दिया | इस हार के बाद भी खिलजी ने सेना की कई टुकडियाँ जालौर पर हमले के लिए रवाना की और यह क्रम पॉँच वर्ष तक चलता रहा लेकिन खिलजी की सेना जालौर के राजपूत शासक को नही दबा पाई आख़िर जून १३१० में ख़ुद खिलजी एक बड़ी सेना के साथ जालौर के लिए रवाना हुआ और पहले उसने सिवाना पर हमला किया और एक विश्वासघाती के जरिये सिवाना दुर्ग के सुरक्षित जल भंडार में गौ-रक्त डलवा दिया जिससे वहां पीने के पानी की समस्या खड़ी हो गई अतः सिवाना के शासक सातलदेव ने अन्तिम युद्ध का ऐलान कर दिया जिसके तहत उसकी रानियों ने अन्य क्षत्रिय स्त्रियों के साथ जौहर किया व सातलदेव आदि वीरों ने शाका कर अन्तिम युद्ध में लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की |

इस युद्ध के बाद खिलजी अपनी सेना को जालौर दुर्ग रोंदने का हुक्म दे ख़ुद दिल्ली आ गया | उसकी सेना ने मारवाड़ में कई जगह लूटपाट व अत्याचार किए सांचोर के प्रसिद्ध जय मन्दिर के अलावा कई मंदिरों को खंडित किया | इस अत्याचार के बदले कान्हड़ देव ने कई जगह शाही सेना पर आक्रमण कर उसे शिकस्त दी और दोनों सेनाओ के मध्य कई दिनों तक मुटभेडे चलती रही आखिर खिलजी ने जालौर जीतने के लिए अपने बेहतरीन सेनानायक कमालुद्दीन को एक विशाल सेना के साथ जालौर भेजा जिसने जालौर दुर्ग के चारों और सुद्रढ़ घेरा डाल युद्ध किया लेकिन अथक प्रयासों के बाद भी कमालुद्दीन जालौर दुर्ग नही जीत सका और अपनी सेना ले वापस लौटने लगा तभी कान्हड़ देव का अपने एक सरदार विका से कुछ मतभेद हो गया और विका ने जालौर से लौटती खिलजी की सेना को जालौर दुर्ग के असुरक्षित और बिना किलेबंदी वाले हिस्से का गुप्त भेद दे दिया | विका के इस विश्वासघात का पता जब उसकी पत्नी को लगा तब उसने अपने पति को जहर देकर मार डाला | इस तरह जो काम खिलजी की सेना कई वर्षो तक नही कर सकी वह एक विश्वासघाती की वजह से चुटकियों में ही हो गया और जालौर पर खिलजी की सेना का कब्जा हो गया |

खिलजी की सेना को भारी पड़ते देख वि.स.१३६८ में कान्हड़ देव ने अपने पुत्र विरमदेव को गद्दी पर बैठा ख़ुद ने अन्तिम युद्ध करने का निश्चय किया | जालौर दुर्ग में उसकी रानियों के अलावा अन्य समाजों की औरतों ने १५८४ जगहों पर जौहर की ज्वाला प्रज्वलित कर जौहर किया तत्पश्चात कान्हड़ देव ने शाका कर अन्तिम दम तक युद्ध करते हुए वीर गति प्राप्त की |

कान्हड़ देव के वीर गति प्राप्त करने के बाद विरमदेव ने युद्ध की बागडोर संभाली | विरमदेव का शासक के रूप में साढ़े तीन का कार्यकाल युद्ध में ही बिता | आख़िर विरमदेव की रानियाँ भी जालौर दुर्ग को अन्तिम प्रणाम कर जौहर की ज्वाला में कूद पड़ी और विरमदेव ने भी शाका करने हेतु दुर्ग के दरवाजे खुलवा शत्रु सेना पर टूट पड़ा और भीषण युद्ध करते हुए वीर गति को प्राप्त हुआ | विरमदेव के वीरगति को प्राप्त होने के बाद शाहजादी फिरोजा की धाय सनावर जो इस युद्ध में सेना के साथ आई थी विरमदेव का मस्तक काट कर सुगन्धित पदार्थों में रख कर दिल्ली ले गई | कहते है विरमदेव का मस्तक जब स्वर्ण थाल में रखकर फिरोजा के सम्मुख लाया गया तो मस्तक उल्टा घूम गया तब फिरोजा ने अपने पूर्व जन्म की कथा सुनाई..

तज तुरकाणी चाल हिंदूआणी हुई हमें |
भो-भो रा भरतार , शीश न धूण सोनीगरा ||

फिरोजा ने उनके मस्तक का अग्नि संस्कार कर ख़ुद अपनी माँ से आज्ञा प्राप्त कर यमुना नदी के जल में प्रविष्ट हो गई..
जय राजपूताना🚩
Rajput of भारत

 #बुन्देलखंड_के_महानायक शाहगढ़ के राजा बखतबली ने 1857 के महासमर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मध्यप्रदेश में बुन्देलखंड के...
01/10/2023

#बुन्देलखंड_के_महानायक
शाहगढ़ के राजा बखतबली ने 1857 के महासमर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मध्यप्रदेश में बुन्देलखंड के सागर और दमोह जिलों से अंग्रेजों के पैर उखाड़ दिये और जनता का शासन स्थापित किया। 1857 के प्रखर योद्धा बानपुर के राजा मर्दनसिंह, तात्या टोपे और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई उनके साथी थे।

राजा बखतबली शाहगढ़ के राजा थे। उनकी रियासत में साढ़े सात सौ गाँव थे जिसमें गढ़ाकोटा, शाहगढ़, मालथौन क्षेत्र भी शामिल था। जिनकी आय चार लाख रुपये वार्षिक थी।

महाराजा बखतबली जी ने 1857 की क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । चरखारी पर आक्रमण के समय तात्या टोपे की सहायता की थी। बाद में नाना साहिब द्वारा ग्वालियर में स्थापित शासन में उन्हे भी सम्मिलित होने को आमंत्रित किया गया था महाराजा बखतबली का राज्य कितना विस्तृत था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसके कई भाग अब सागर, दमोह और झांसी जिलों में शामिल हैं।
बानपुर के शासक राजा मर्दन सिंह के सहयोग और सागर जिले के जागीरदारों, उबारीदारों के अंग्रेज विरोधी रूख के कारण शाहगढ़ के राजा बखतबली का साहस बढ़ा और उन्होंने चंदेरी के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन गार्डन को बुलाकर कहा कि ब्रिटिश शासन उनका पुराना गढ़ाकोटा का इलाका लौटा दें किन्तु ऐसा नहीं हुआ परिणामतः राजा बखतवली ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ झंडा बुलन्द कर दिया। 3 जुलाई 1857 की रात को बखतबली के सिपाहियों ने अंग्रेजों के पंचमनगर थाने पर हमला कर उसे जीत लिया इसके बाद खुरई के किले पर अधिकार कर लिया ।

जबकि वहाँ पर एक हजार सिपाही तथा दो तोपें तैनात थी । तदुपरान्त शाहगढ़ के राजा बखतबली की ओर से खुमान सिंह ने विनायका पर अधिकार जमाया। लै. हैमिल्टन तथा ब्रिग्रेडियर सेज ने कड़े संघर्ष के बाद विनायका थाना मुक्त कराया। इसके बाद अगले दिन क्षेत्र की जनता और अंग्रेजों के मध्य काफी संघर्ष हुआ । 14 जुलाई 1857 को बखतबली का राज्य कायम हो गया किन्तु उसे अंग्रेजी शासन ने मान्यता नहीं दी ।

बखतबली ने इसके बाद बोधन दौआ के नेत्त्व में रहली का किला फतह किया तथा उसे वहाँ किलेदार नियुक्त कर दिया । सौंरई गांव में सभी क्रांतिकारी एकत्र होकर रणनीति तैयार कर रहे थे कि इस बात की भनक अंग्रेजों को लग गई तो उन्होंने वहां सेना भेज दी जिससे वहाँ संघर्ष हुआ। इस बीच बखतबली का संपर्क देश के अनेक क्रांतिकारियों से हो चुका था जिनमें बाँदा के नबाब अली बहादुर, तात्याटोपे आदि प्रमुख थे

10 फरवरी 1858 गढ़ाकोटा पर अंग्रेजी सेना ने हमला बोल दिया तथा 7 मार्च को उसे जीतकर शाहगढ़ रियासत को जब्त कर लिया। इसके बाद राजा बखतबली अपने सैनिकों तथा विश्वस्त लोगों के साथ 13 मार्च को महोबा पहुंचकर तात्याटोपे से मिलते हैं और फिर मऊरानीपुर में डट जाते हैं उधर तात्याटोपे चरखारी को जीतकर 27 मार्च को मऊरानीपुर आते है ।
ये सब क्रांतिकारी मिलकर आगे बढ़ते हैं कि बरूवासागर के निकट बेतवा किनारे अंग्रेजी सेना से भीषण मुकाबला होता है । यहाँ क्रांतिकारियों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है | झांसी की रानी की मदद के लिए ग्वालियर जाते समय अंग्रेजों ने महाराजा बखबली को गिरफ्तार कर लिया और लाहौर जेल भेज दिया किन्तु अन्तिम समय में उनकी इच्छानुसार वृन्दावन लाया जाता है, ओर 29 सितम्बर 1873 को आजादी का अधूरा सपना मन में लिए वे वहीं अन्तिम साँस लेते हैं!

बुंदेलखंड के महानायक शाहगढ़ नरेश महाराजा बखतबली शाह जूदेव बुंदेला की पुण्यतिथि पर शत शत नमन

 #झांसी की रानी  #लक्ष्मीबाई द्वारा महाराजा  #मर्दन सिंह जुदेव को सैन्य सहायता के लिए लिखा गया हस्तलिखित दुर्लभ पत्र.. !...
01/08/2023

#झांसी की रानी #लक्ष्मीबाई द्वारा महाराजा #मर्दन सिंह जुदेव को सैन्य सहायता के लिए लिखा गया हस्तलिखित दुर्लभ पत्र.. !!

अंग्रेजो के दांत खट्टे करने वाली,झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य और पराक्रम की शौर्यगाथा इतिहास के स्वर्णिम पन्ने मे दर्ज है !!

बुन्देलो हर बोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ||

स्वतंत्रता सेनानी ,भारत देश की वीरांगना झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई व बुंदेला वीर महाराजा मर्दन सिंह जूदेव व बाबू वीर कुंवर सिंह जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानी भारत देश की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजो के विरूद्ध विगूल फूंक ,अंग्रेजो के नाक में दम कर रखा था !!

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई झांसी परास्त होते ही, वह दत्तकपुत्र के साथ बडी चतुरता से निकालकर १०७ मील दूर काल्पी पहुंची ।उनके अंदर अंग्रेजों से बदला प्रतिशोध लेने की अग्नि धधक रही थी और वह अंग्रेजो पर हमले करने की रणनीति बनाने लगी ! उधर कैप्टन ह्यूरोज रानी लक्ष्मीबाई को मारने की रणनीति से पीछे पड़ा हुआ था ! इन सबसे स्वयं को सुरक्षित न देखकर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने मध्यप्रदेश के बानपुर-चंदेरी रियासत के बुंदेल वंशी महाराजा मर्दन सिंह जूदेव जी को मदद के लिए पत्र लिखा !! और संदेशा भिजवाया कि एक नारी पर फिरंगियों द्वारा संकट आन पड़ा है ,मै आपसे मदद की गुहार करती हु आप अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करे और हमारी रक्षा करे व इस युध्द मे हमारी सहयोग करें !!

महाराजा मर्दन सिंह बुंदेला भोजन करने बैठे थे ,सामने भोजन की थाली थी तभी उनके दूत ने आकर यह समाचार राजा साहब को सुनाया !! मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए एक जुटता व एक नारी मदद की गुहार सुनते ही महाराजा मर्दन सिंह जूदेव भोजन की थाली छोड़कर उठ गये व शाहगढ नरेश राजा बखतवली जूदेव बुंदेला और अपने विश्वासपात्र, कुशल सेनापतियों को बुलाकर सैनिकों की टुकड़ी तैयार किया और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की मदद के लिए निकल पड़े ||

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ,महाराजा मर्दन सिंह जूदेव व राजा बखतवली जूदेव बुंदेला जी की संयुक्त सेनाओं व अंग्रेजो के बीच 18 जून सन् 1858 को ग्वालियर के पास कोटा की सराय में भीषण युध्द हुआ !!
जिस युध्द में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई व बखतवली जूदेव बुंदेला जी मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और महाराज मर्दन सिंह जूदेव जी को अंग्रेजो ने पकड़कर कारागार मे डाल दिया ||

कारागार में डालने के बाद अंग्रेजो ने उनके सामने शर्त रखा कि वह अंग्रेजो की अधिनता स्वीकार कर लें और अंग्रेजो से मित्रता कर ले और उनका साथ दे तो महाराजा मर्दन सिंह जूदेव जो छोड़ दिया जाएगा व उनका राज-पाट उन्हे वापस लौटा दिया जाएगा |

लेकिन क्षत्रिय रक्त,मातृभूमि रक्षक बुंदेला वीर मर्दन सिंह जूदेव जी ने अंग्रेजो की अधिनता ठुकरा दिया !!
और अंग्रेजो की अधिनता की राजपाठ को ठुकरा मातृभूमि की रक्षा मे वीरगति को चुना !! महाराजा मर्दन सिंह जूदेव के इस ढृढ संकल्प और राष्ट्रभक्ति को देखकर अंग्रेज गुस्सा हुए और 12 दिसंबर 1860 को महाराजा मर्दन सिंह जी का समस्त राजपाठ छीन लिया और लाहौर जेल मे बंद कर दिया ||

27 वर्ष तक अंग्रेज महाराजा मर्दन सिंह जूदेव को प्रताड़ना देते रहे और अंग्रेजो की अधिनता स्वीकार करने के लिए विवश करते रहे लेकिन महाराजा मर्दन सिंह जूदेव फिरंगियों की अधिनता स्वीकार नही किए ! इससे और अधिक नाराज होकर अंग्रेज महाराजा मर्दन सिंह जी को अधिनता स्वीकार करने व झुकने के लिए विवश करने लगे और उन्हे 27 वर्ष बाद 1874 मे लाहौर कारावास से निकालकर मथुरा कारावास मे नजरबंद कर अधिनता स्वीकार करने के लिए प्रताड़ित करने लगे ||

लेकिन अपने जीवन के अंतिम पल तक महाराजा मर्दन सिंह जूदेव अंग्रेजो की अधिनता स्वीकार नही किए,और अपने जीवन के अंतिम पल मे यही दुहराते रहे कि -

'हुकुमत पर कब्जा करके हिन्दुस्तानियन खां गुलाम नही बनाओं जा सकत ,
जीते जी मर जैहों पर गुलामी न स्वीकारहौं" !!

और यही कहते हुए 22 जुलाई 1879 को वीरगति को प्राप्त हो गये ||

महाराजा मर्दन सिंह जूदेव जी गहरवार वंश की शाखा बुंदेला वंशीय क्षत्रिय थे !! वह महान प्रतापी योध्दा,मुगलों के काल महाराजा छत्रसाल बुंदेला जी के वंशज थे ||

साभार....

हरि सिंह नलवा महाराजा रणजीत सिंह के सेना नायक को जयंती पर शत शत नमनहरि सिंह नलवा का जन्म 1791 में 28 अप्रैल को एक जाट सि...
02/05/2023

हरि सिंह नलवा
महाराजा रणजीत सिंह के सेना नायक को जयंती पर शत शत नमन

हरि सिंह नलवा का जन्म 1791 में 28 अप्रैल को एक जाट सिक्ख परिवार में गुजरांवाला पंजाब में हुआ था। इनके पिता का नाम गुरदयाल सिंह और माँ का नाम धर्मा कौर था। बचपन में उन्हें घर के लोग प्यार से "हरिया" कहते थे। सात वर्ष की आयु में इनके पिता का देहांत हो गया। 1805 ई. के वसंतोत्सव पर एक प्रतिभा खोज प्रतियोगिता में, जिसे महाराजा रणजीत सिंह ने आयोजित किया था,जाट हरि सिंह नलवा ने भाला चलाने, तीर चलाने तथा अन्य प्रतियोगिताओं में अपनी अद्भुत प्रतिभा का परिचय दिया। इससे प्रभावित होकर महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें 14 साल की उम्र में अपनी सेना में भर्ती कर लिया। शीघ्र ही वे महाराजा रणजीत सिंह के विश्वासपात्र सेनानायकों में से एक बन गये।

जंगल में बाघ से सामना :- नलवा उपाधि
रणजीत सिंह एक बार जंगल में शिकार खेलने गये. उनके साथ कुछ सैनिक और हरी सिंह उप्पल भी थे. उसी समय एक विशाल आकार के बाघ ने उन पर हमला कर दिया, और उनके घोड़े को भी मार दिया,जिस समय डर के मारे सभी दहशत में थे, हरी सिंह मुकाबले को सामने आए. इस खतरनाक मुठभेड़ में हरी सिंह ने बाघ के जबड़ों को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर उसके मुंह को बीच में से चीर डाला(बाघ मार उपाधि भी यही से मिली थी) उसकी इस बहादुरी को देख कर रणजीत सिंह ने कहा ‘तुम तो राजा नल जैसे वीर हो’. तभी से वो ‘नलवा’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये..!!

युद्ध
1807 में महाराजा रणजीत सिंह के साथ पहली लड़ाई इन्होंने कसूर के युद्ध में लड़ी और अपनी वीरता और ताकत से युद्ध जीत जीत लिया..!!

1808 में जनरल बनने के बाद सियालकोट की लड़ाई जीवन सिंह के खिलाफ लड़ी, दो दिन चले भीषण युद्ध में 17 साल के हरि सिंह नलवा ने विजय प्राप्त की...!!

1813 आटोक की लड़ाई में महाराजा रणजीत सिंह के साथ हरि सिंह नलवा ने सिंधु नदी के किनारे बना महल अफ़ग़ानों को हराकर जीत लिया,यह दुर्रानी और बराज़किया पर पहली विजय थी..!!

1815 में गंधगढ़ के शेरबाज खान ने हरी सिंह नलवा को चुनौती दी और मुँह की खाई और वो हार गया..!

1816 में हरि सिंह नलवा ने अपनी 7 पलटन के साथ महमुदकोट के लिए कूच की और खानगढ़ तथा मुज्जफरगढ़ के किले जीत लिए..!!

1818 मुल्तान का युद्ध, इस लड़ाई में हरि सिंह नलवा बुरी तरह जख्मी हो गए,किले की दीवार से तोप का गोला उनको आकर लगा और वो गंभीर रूप से जल गए,लेकिन हरि सिंह नलवा की अगुवाई में युद्ध जीत लिया गया..!!
1818 में ही पेशावर पर कब्ज़ा कर लिया गया और शाह कामरान को मार दिया फिर हरी सिंह नलवा को दबदबा बनाने के लिए वही रखा गया..!
1819 कश्मीर युद्ध, 5 जुलाई 1819 में हरी सिंह नलवा की अगुवाई में कश्मीर जीत लिया गया और इसी के साथ वहाँ 5 शताब्दी से चल रही मुस्लिम रियासत का अंत भी हुआ,इस खुशी में लाहौर और अमृतसर को 3 रातों तक रोशन किया गया..!!

1819 पाखली की लड़ाई,कश्मीर जीत का फायदा उठा अफगानों ने आटोक के किले पर आक्रमण कर दिया लेकिन हरि सिंह नलवा ने उन्हें वापस भगा दिया...!!

1821 मंगल की लड़ाई, हरि सिंह अपने 700 सैनिको के साथ किशनगंगा नदी पार कर के मुजफ्फराबाद जा रहे थे,तो मंगल उस समय जदौनों के पास था, हरि सिंह ने रास्ता माँगा उन्होंने रास्ता देने से इनकार कर दिया और उनके 25000 सैनिको ने हरी सिंह नलवा के सैनिकों को घेर लिया, 2000 सैनिक शहीद हुए लेकिन हरि सिंह नलवा जीत गए और ये जगह भी अपनी रियासत में ले ली...!

1822 मानकेरा की लड़ाई, सिंध सागर का दोआब,नवाब हाफिज अहमद खान के कब्ज़े में था,इसने अपने 12 किले आसपास बनवा लिए थे,हरि सिंह नलवा की अगुवाई में सेना में हमला बोल दिया और 11 किले जीत लिए उसके बाद 26 दिनों की घेराबंदी के बाद आखिरी मानकेरा का किला भी जीत लिया और नवाब को अपनी हार स्वीकारनी पड़ी..!!

1823 नौशेरा की लड़ाई में अज़ीम खान को हराया,अज़ीम के समर्थन में आए अहमद शाह अब्दाली के वंशजों ने भागना स्वीकार किया और युद्ध छोड़कर वापस काबुल अफ़ग़ानिस्तान भागने लगे,खयबर पास तक नलवा ने उनका पीछा किया...!!

1824 सिरकोट के युद्ध में अफ़ग़ानों को फिर हराया...!!

1827 में आटोक में अफगनों ने महाराजा रणजीत सिंह की रियासत के कबीलों के साथ विद्रोह कर दिया लेकिन हरि सिंह नलवा ने फिर अफ़ग़ानों को मारकर वापस भगाया,लाहौर में ढोल नगाड़े बजाए गए और पूरे शहर को रोशन कर दिया गया...!!

1835 में दोस्त मोहम्मद ने हरी सिंह नलवा को चुनोती दी और बीच लड़ाई में भाग गया..!!

1836 में जमरूद में हरी सिंह नलवा ने हमला किया और सबको गाजर मूली की तरह काट दिया,इस खबर ने काबुल हिला दिया..!!

1836 पंजतार :- हरि सिंह ने नलवा ने हमला कर दिया और अफगनों को बुरी तरह हिला दिया,फतेह खान ने लाहौर जाकर शरण माँगी और उसे एक रकम देने के बाद पंजतार वापस कर दिया गया..!!

1837 जमरूद की लड़ाई,दोस्त मोहम्मद अपने पांच पुत्र और अफ़ग़ान सेना के साथ वापस आ गया था,इस समय महाराजा रणजीत सिंह अपने पोते निहाल सिंह की शादी में व्यस्त थे,अफगनों ने जमरूद जीत लिया और पेशावर पर हमला कर दिया,पेशावर में हरी सिंह नलवा ने 600 सैनिकों के साथ उन्हें टक्कर दी और इसी बीच गम्भीर रूप से जख्मी होकर वो वीरगति को प्राप्त हो गए लेकिन अपने मरने से पहले उन्होंने कह दिया लड़ते रहो और मेरी मौत की खबर बाहर नहीं जानी चाहिए, 1 हफ्ते तक अफ़ग़ान किले के बाहर रहे जब उन्हें पता चला नलवा नहीं रहा फिर उन्होंने किले के अंदर हमला किया लेकिन जब तक लाहौर से सेना आ चुकी थी और अफ़ग़ानों को फिर वापस भागना पड़ा..!!

अमेरिकी जनरल आज भी तालिबान के खिलाफ अफगानिस्तान में अपनी सेना का प्रोत्साहन करने के लिए "नलवा" की कहानी बतातें है..!!

आज दशकों बाद भी अफ़ग़ानों और युसुफ़ज़ई में माँ जब बच्चा रोता है तो कहती है "चुप शा,हरि सिंह रागले" चुप हो जा नहीं तो हरि सिंह आ जाएगा..!!

इतने महान जनरल जिसने सारे युद्ध जीते को इतिहास में जगह नहीं दी गई और कभी ना जीतने वाले महान बना दिये गए..

 #भारत_का_एक_ऐसा_राजा_जिसने_अंग्रेजों_को_134_दिन_तक_दिल्ली_में_नहीं_घुसने_दिया_था-जी हां हम बात कर रहे हैं हरियाणा के उस...
13/04/2023

#भारत_का_एक_ऐसा_राजा_जिसने_अंग्रेजों_को_134_दिन_तक_दिल्ली_में_नहीं_घुसने_दिया_था-

जी हां हम बात कर रहे हैं हरियाणा के उस राजा की जिसने अंग्रेजों के खून से बल्लभगढ के तालाब का रंग लाल कर दिया था।

जिसने अंग्रेजों को हराकर अपने आस पास के क्षेत्र को आजाद कर लिया था।

वह राजा जिसने शिव मंदिर में अंग्रेजों को देश से बाहर करने की कसम खाई थी।

वह राजा कोई और नहीं बल्कि हरियाणा के बल्लभगढ जाट रियासत के राजा नाहर सिंह थे जिनके नाम पर कुछ दिन पहले ही बल्लभगढ में राजा नाहर सिंह मेट्रो स्टेशन का उद्घाटन किया गया था। इससे पहले उनके नाम पर एक इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम है शहर में एक द्वार है और बस स्टैंड का नाम भी उन्ही के नाम से हैं।
बल्लभगढ में उनका महल किला हवेलियां व अन्य चीजें आज भी शान से खड़ी उसकी वीरता की गवाही दे रही है।

राजा नाहर सिंह ने 1857 की क्रांति में सबसे महत्वपूर्ण योगदान दिया था उसी वीरता के बल पर आज उन्हें शेर ए हरियाणा, आयरन गेट ऑफ दिल्ली और 1857 के सिरमौर जैसे अलंकारों से सुसज्जित किया जाता है।

राजा नाहर सिंह ने 1857 की क्रांति को जगाने के लिए देश भर के राजाओ की मीटिंग में हिस्सा लिया बहुत से राजाओ को क्रांति में शामिल होने के लिए उकसाया।

जब 1857 कि क्रांति के लिए नेतृत्व की मांग की जाने लगी तो सबसे आगे उन्ही का नाम था परन्तु मुस्लिम क्रंक्तिकारियो को इस मुहिम में जोड़ने के लिए बहादुर शाह जफर का नाम आगे किया गया। हालांकि जफर और राजा नाहर सिंह में बहुत कम बनती थी उसके बावजूद भी उन्होंने देश के लिए अपने मतभेद भुलाकर क्रांतिकारियों के निर्णय का सम्मान किया।

वे देश के एकमात्र ऐसे राजा थे जिनकी रियासत सुरक्षित होने कर बावजूद में 1857 कई क्रांति में भाग लिया था।

मीटिंग में 1857 की क्रांति का दिनांक फिक्स कर दिया गया उन्हके दिल्ली का कार्यभार सौंपा गया।

परन्तु 10 मई को ही क्रांतिकारी सैनिक मंगल पांडे की फांसी के साथ ही क्रांति समय से पहले भड़क उठी।
उस समय उनकी बेटी का विवाह तय हो चुका था। लेकिन उन्होंने इसकी जरा भी परवाह न करते हुए इस भव्य कार्यक्रम को रद्द कर दिया और राजकुमार की तलवार से ही अपनी बेटी का विवाह करवाकर क्रांति में कूद पड़े।

उनकी रियासत क्रांतिकारियों के लिए सबसे बड़ी व सुरक्षित स्थली थी जहां उनके लिए दरवाजे खुले थे क्योंकि उन्होंने अपने राज्य में अंग्रेजो के बिना अनुमति प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था जो उस समय का बहुत ही साहसिक कदम था।
उन्होंने अपने राज्य में ऐलान कर दिया था कि कोई भी अंग्रेज विरोधी क्रांतिकारी राज्य में आये तो उसका खुले दिल से स्वागत किया जाए उसकी हर सम्भव सहायता की जाए उनको खाने का सामान व अन्य सामान बाजार से बिना पैसे दिया जाए उसका भुगतान राज्य के खजाने से कर दिया जाएगा।

मंगल पाँडें की रेजिमेंट के क्रांतिकारी भी उनके राज्य में घुस आए थे तो उन्होंने उन्हके शरण दी व उनमें से ज्यादातर ब्राह्मण थे इसलिए उन्हें उन्होंने हर गांव में में एक एक दो दो परिवार बसया दजिये ताकि अंग्रेज उन पर एक साथ हमला न कर सके और वे अपनी जीविका भी कमा सके। आज भी उन ब्राह्मणों के वंशज उन गांवों में बसे हुए हैं।

उन्होंने पलवल फरीदाबाद गुड़गांव के अंग्रेज अधिकृत क्षेत्रो पर हमला करके अंग्रेजो को मारकर भगया दिया।

उन्होंने क्रंक्तिकारियो के साथ मिलकर दिल्ली को आजाद करवा लिया व जफर को दिल्ली का कार्यभार सम्भालवा दिया।

राया मथुरा के क्रान्तिकारी देवी सिंह को उन्होंने राजा की पदवी दिलवाई।जगह जगह के क्रांतिकारियों को मदद दी।

राजा के समय दिल्ली पर अंग्रेजो ने हमले किये परन्तु उन्होंने उन्हें 134 दिन तक दिल्ली में नहीं घुसने दिया। अंग्रेज उन्हें आयरन वॉल ऑफ दिल्ली के नाम से पुकारने लगे थे और समझ गए थे के उनके होते दिल्ली पर कब्जा करना असम्भव है। अंत में जफर के एक साथी इलैहिबक्ष की गद्दारी से अंग्रेजो ने जफर को बंदी बना लिया बल्लभगढ पर आक्रमण कर दिया जिसके कारण राजा को बल्लभगढ पहुंचना पड़ा।

वहां उन्होंने वहां पहुंचकर अंग्रेजो से इतना भयंकर युद्ध किया के पास स्तिथ एक तालाब का रतग अंग्रेजो के खून से लाल हो गया था।अंग्रेजो को मारकर हरा दिया । मगर उनकी अनुपस्तिथि में अंग्रेजो ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया।

अंग्रेजो ने राजा को बंदी बनाने के लिए छल का सहारा लिया। उन्होंने जफर के खास इलाहिबख्श व अन्य को भेजकर कहलवाया कि जफर ने उन्हें बुलाया है और वे अंग्रेजो से सन्धि करना चाहते हैं। जाट राजा छल को समझ न पाये। वे अपने कुछ 500 सैनिको के साथ दिल्ली पहुंचे। वहां अंग्रेजो ने रात्रि के अंधेरे में रास्ते में उन पर अचानक आक्रमण कर दिया सभी सकनिक वीरता से लड़ते हुए शहीद हो गए। राजा को बंदी बना लिया गया।

उनके कुछ नजदीकी अंग्रेज अधिकारियो ने उन्हें समझाने की कोशिश की के वे अंग्रेजो के आगे झुक जाए व उनसे दोस्ती कर ले तो उन्हें उनका राज वापिस कर दिया जाएगा और उन्हें सजा नहीं होगी।

लेकिन राजा ने साफ मना कर दिया कि वे ठावे देश के दुश्मनों के आगे नहीं झुकेंगे। उन्हें राज व अपने जीवन की तनिक भी परवाह नहीं एक नाहर सिंह मरेगा तो माँ भारती को आजाद करवाने वाले लाखों नाहर सिंह पैदा हो जाएंगे।

अंत में 9 जनवरी 1858 को राजा व उनके सेनापतियों को दिल्ली के चांदनी चौक पर सरेआम फांसी दे दी गई। उनके जनता के लिए अंतिम शब्द थे कि क्रांति की ये चिंगारी बुझने मत देना।
शहीद राजा नाहर सिंह पर पूरे भारतवर्ष को हमेशा गर्व रहेगा।

महान सेनानी राणा सांगा / जन्म दिवस -12 अप्रैलराणा सांगा :- नाम ही काफी है !!राणा सांगा ने अपने जीबन में सैकड़ो युद्ध जीते...
13/04/2023

महान सेनानी राणा सांगा / जन्म दिवस -12 अप्रैल

राणा सांगा :- नाम ही काफी है !!

राणा सांगा ने अपने जीबन में सैकड़ो युद्ध जीते ,और उस समय की स्लामिक ताकतों को वर्षों तक घुटनो पर छुकाये रहे .

#राणा_सांगा ने , इब्राहिम लोधी, बाबर , महमूद खिलजी जैसे स्लामिक शासकों को कई बार युद्ध मे धूल चटाई थी ...

मेवाड़ योद्धाओं की भूमि है, यहाँ कई शूरवीरों ने जन्म लिया और अपने कर्तव्य का प्रवाह किया । उन्ही उत्कृष्ट मणियों में से एक थे राणा सांगा । पूरा नाम महाराणा संग्राम सिंह । वैसे तो मेवाड़ के हर राणा की तरह इनका पूरा जीवन भी युद्ध के इर्द-गिर्द ही बीता लेकिन इनकी कहानी थोड़ी अलग है । एक हाथ , एक आँख, और एक पैर के पूर्णतः क्षतिग्रस्त होने के बावजूद इन्होंने ज़िन्दगी से हार नही मानी और कई युद्ध लड़े ।

ज़रा सोचिए कैसा दृश्य रहा होगा जब वो शूरवीर अपने शरीर मे 80 घाव होने के बावजूद, एक आँख, एक हाथ और एक पैर पूर्णतः क्षतिग्रस्त होने के बावजूद जब वो लड़ने जाता था ।।

कोई योद्धा, कोई दुश्मन इन्हें मार न सका पर जब कुछ अपने ही विश्वासघात करे तो कोई क्या कर सकता है । आईये जानते है ऐसे अजयी मेवाड़ी योद्धा के बारे में, खानवा के युद्ध के बारे में एवं उनकी मृत्यु के पीछे के तथ्यों के बारे में।

#परिचय –
राणा रायमल के बाद सन् 1509 में राणा सांगा मेवाड़ के उत्तराधिकारी बने। इनका शासनकाल 1509- 1527 तक रहा । इन्होंने दिल्ली, गुजरात, व मालवा मुगल बादशाहों के आक्रमणों से अपने राज्य की बहादुरी से ऱक्षा की। उस समय के वह सबसे शक्तिशाली राजा थे । इनके शासनकाल में मेवाड़ अपनी समृद्धि की सर्वोच्च ऊँचाई पर था। एक आदर्श राजा की तरह इन्होंने अपने राज्य की रक्षा तथा उन्नति की।

राणा सांगा अदम्य साहसी थे । इन्होंने सुलतान मोहम्मद शासक माण्डु को युद्ध में हराने व बन्दी बनाने के बाद उन्हें उनका राज्य पुनः उदारता के साथ सौंप दिया, यह उनकी बहादुरी को दर्शाता है। बचपन से लगाकर मृत्यु तक इनका जीवन युद्धों में बीता। इतिहास में वर्णित है कि महाराणा संग्राम सिंह की तलवार का वजन 20 किलो था ।



#सांगा के युद्धों का रोचक इतिहास –
* महाराणा सांगा का राज्य दिल्ली, गुजरात, और मालवा के मुगल सुल्तानों के राज्यो से घिरा हुआ था। दिल्ली पर सिकंदर लोदी, गुजरात में महमूद शाह बेगड़ा और मालवा में नसीरुद्दीन खिलजी सुल्तान थे। तीनो सुल्तानों की सम्मिलित शक्ति से एक स्थान पर महाराणा ने युद्ध किया फिर भी जीत महाराणा की हुई। सुल्तान इब्राहिम लोदी से बूँदी की सीमा पर खातोली के मैदान में वि.स. 1574 (ई.स. 1517) में युद्ध हुआ। इस युद्ध में इब्राहिम लोदी पराजित हुआ और भाग गया। महाराणा की एक आँख तो युवाकाल में भाइयो की आपसी लड़ाई में चली गई थी और इस युद्ध में उनका बायां हाथ तलवार से कट गया तथा एक पाँव के घुटने में तीर लगने से सदा के लिये लँगड़े हो गये थे।

* महाराणा ने गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर को लड़ाई में ईडर, अहमदनगर एवं बिसलनगर में परास्त कर अपने अपमान का बदला लिया अपने पक्ष के सामन्त रायमल राठौड़ को ईडर की गद्दी पर पुनः बिठाया।

अहमदनगर के जागीरदार निजामुल्मुल्क ईडर से भागकर अहमदनगर के किले में जाकर रहने लगा और सुल्तान के आने की प्रतीक्षा करने लगा । महाराणा ने ईडर की गद्दी पर रायमल को बिठाकर अहमद नगर को जा घेरा। मुगलों ने किले के दरवाजे बंद कर लड़ाई शुरू कर दी। इस युद्ध में महाराणा का एक नामी सरदार डूंगरसिंह चौहान(वागड़) बुरी तरह घायल हुआ और उसके कई भाई बेटे मारे गये। डूंगरसिंह के पुत्र कान्हसिंह ने बड़ी वीरता दिखाई। किले के लोहे के किवाड़ पर लगे तीक्ष्ण भालों के कारण जब हाथी किवाड़ तोड़ने में नाकाम रहा , तब वीर कान्हसिंह ने भालों के आगे खड़े होकर महावत को कहा कि हाथी को मेरे बदन पर झोंक दे। कान्हसिंह पर हाथी ने मुहरा किया जिससे उसका शरीर भालो से छिन छिन हो गया और वह उसी क्षण मर गया, परन्तु किवाड़ भी टूट गए। इससे मेवाड़ी सेना में जोश बढा और वे नंगी तलवारे लेकर किले में घुस गये और मुगल सेना को काट डाला। निजामुल्मुल्क जिसको मुबारिजुल्मुल्क का ख़िताब मिला था वह भी बहुत घायल हुआ और सुल्तान की सारी सेना तितर-बितर होकर अहमदाबाद को भाग गयी।

* माण्डू के सुलतान महमूद के साथ वि.स्. 1576 में युद्ध हुआ जिसमें 50 हजार सेना के साथ महाराणा गागरोन के राजा की सहायता के लिए पहुँचे थे। इस युद्ध में सुलतान महमूद बुरी तरह घायल हुआ। उसे उठाकर महाराणा ने अपने तम्बू पहुँचवा कर उसके घावो का इलाज करवाया। फिर उसे तीन महीने तक चितौड़ में कैद रखा और बाद में फ़ौज खर्च लेकर एक हजार राजपूत के साथ माण्डू पहुँचा दिया। सुल्तान ने भी अधीनता के चिन्हस्वरूप महाराणा को रत्नजड़ित मुकुट तथा सोने की कमरपेटी भेंट स्वरूप दिए, जो सुल्तान हुशंग के समय से राज्यचिन्ह के रूप में वहाँ के सुल्तानों के काम आया करते थे। बाबर बादशाह से सामना करने से पहले भी राणा सांगा ने 18 बार बड़ी बड़ी लड़ाईयाँ दिल्ली व् मालवा के सुल्तानों के साथ लड़ी। एक बार वि.स्. 1576 में मालवे के सुल्तान महमूद द्वितीय को महाराणा सांगा ने युद्ध में पकड़ लिया, परन्तु बाद में बिना कुछ लिये उसे छोड़ दिया।

#मीरा बाई से सम्बंध –
महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र का नाम भोजराज था, जिनका विवाह मेड़ता के राव वीरमदेव के छोटे भाई रतनसिंह की पुत्री मीराबाई के साथ हुआ था। मीराबाई मेड़ता के राव दूदा के चतुर्थ पुत्र रतनसिंह की इकलौती पुत्री थी।

बाल्यावस्था में ही उसकी माँ का देहांत हो जाने से मीराबाई को राव दूदा ने अपने पास बुला लिया और वही उसका लालन-पालन हुआ।

मीराबाई का विवाह वि.स्. 1573 (ई.स्. 1516) में महाराणा सांगा के कुँवर भोजराज के साथ होने के कुछ वर्षों बाद कुँवर युवराज भोजराज का देहांत हो गया। मीराबाई बचपन से ही भगवान की भक्ति में रूचि रखती थी। उनका पिता रत्नसिंह राणा सांगा और बाबर की लड़ाई में मारा गया। महाराणा सांगा की मृत्यु के बाद छोटा पुत्र रतनसिंह उत्तराधिकारी बना और उसकी भी वि.स्. 1588(ई.स्. 1531) में मरने के बाद विक्रमादित्य मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। मीराबाई की अपूर्व भक्ति और भजनों की ख्याति दूर दूर तक फैल गयी थी जिससे दूर दूर से साधु संत उससे मिलने आया करते थे। इसी कारण महाराणा विक्रमादित्य उससे अप्रसन्न रहा करते और तरह तरह की तकलीफे दिया करता थे। यहाँ तक की उसने मीराबाई को मरवाने के लिए विष तक देने आदि प्रयोग भी किये, परन्तु वे निष्फल ही हुए। ऐसी स्थिति देख राव विरामदेव ने मीराबाई को मेड़ता बुला लिया। जब जोधपुर के राव मालदेव ने वीरमदेव से मेड़ता छीन लिया तब मीराबाई तीर्थयात्रा पर चली गई और द्वारकापुरी में जाकर रहने लगी। जहा वि.स्. 1603(ई.स्. 1546) में उनका देहांत हुआ।



#खानवा का युद्ध –
बाबर सम्पूर्ण भारत को रौंदना चाहता था जबकि राणा सांगा तुर्क-अफगान राज्य के खण्डहरों के अवशेष पर एक हिन्दू राज्य की स्थापना करना चाहता थे, परिणामस्वरूप दोनों सेनाओं के मध्य 17 मार्च, 1527 ई. को खानवा में युद्ध आरम्भ हुआ।

इस युद्ध में राणा सांगा का साथ महमूद लोदी दे रहे थे। युद्ध में राणा के संयुक्त मोर्चे की खबर से बाबर के सौनिकों का मनोबल गिरने लगा। बाबर अपने सैनिकों के उत्साह को बढ़ाने के लिए शराब पीने और बेचने पर प्रतिबन्ध की घोषणा कर शराब के सभी पात्रों को तुड़वा कर शराब न पीने की कसम ली, उसने मुसलमानों से ‘तमगा कर’ न लेने की घोषणा की। तमगा एक प्रकार का व्यापारिक कर था जिसे राज्य द्वारा लगाया जाता था। और युध्द में तोपो का प्रयोग किया।इस तरह खानवा के युद्ध में भी पानीपत युद्ध की रणनीति का उपयोग करते हुए बाबर ने सांगा के विरुद्ध सफलता प्राप्त की। युद्ध क्षेत्र में राणा सांगा घायल हुए, पर किसी तरह अपने सहयोगियों द्वारा बचा लिए गये। कालान्तर में अपने किसी सामन्त द्वारा विष दिये जाने के कारण राणा सांगा की मृत्यु हो गई। खानवा के युद्ध को जीतने के बाद बाबर ने ‘ग़ाजी’ की उपाधि धरण की।

अस्सी घाव लगे थे तन पे ।
फिर भी व्यथा नहीं थी मन में ।।

जय मेवाड़

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