State Museum, Lucknow

State Museum, Lucknow Established in 1863 by Col. Abbott
Archaeology section,
Numismatic section,
Art Section
Natural History

राज्य संग्रहालय, लखनऊ (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश) में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर गरिमामय समारोह का आयोजन किया गया। रा...
15/08/2026

राज्य संग्रहालय, लखनऊ (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश) में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर गरिमामय समारोह का आयोजन किया गया। राज्य संग्रहालय, लखनऊ के निदेशक डॉ. विनय कुमार सिंह द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। इस अवसर पर संग्रहालय के अधिकारियों, कर्मचारियों, पूर्व सैनिकों तथा उपस्थित अतिथियों ने राष्ट्रध्वज को सलामी देते हुए राष्ट्रगान एवं राष्ट्रगीत का सामूहिक गायन किया।
अपने संबोधन में डॉ. विनय कुमार सिंह ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के अद्वितीय त्याग, बलिदान एवं राष्ट्रनिर्माण में उनके योगदान को स्मरण करते हुए सभी को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता केवल एक ऐतिहासिक उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों और दायित्वों के निर्वहन का संकल्प भी है। उन्होंने युवाओं से देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा राष्ट्रीय मूल्यों के संवर्धन में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
समारोह के दौरान देशभक्ति गीतों के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम के वीर सेनानियों को श्रद्धापूर्वक नमन किया गया तथा भारत की गौरवशाली सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय विरासत को स्मरण किया गया।
कार्यक्रम में संग्रहालय परिवार के सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए राष्ट्र की एकता, अखंडता एवं प्रगति के लिए समर्पित रहने का संकल्प लिया।

आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
15/08/2026

आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

राज्य संग्रहालय, लखनऊ (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश) द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर चलाए जा रहे ‘हर घर तिरंगा’ अभियान...
14/08/2026

राज्य संग्रहालय, लखनऊ (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश) द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर चलाए जा रहे ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के अंतर्गत आज दिनांक 14 अगस्त, 2026 को चित्रकला एवं रंगोली प्रतियोगिता तथा मानव श्रृंखला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों में राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान तथा देश की स्वतंत्रता के मूल्यों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना रहा।
कार्यक्रम में लखनऊ के विभिन्न विद्यालयों के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक प्रतिभाग किया। प्रतियोगिताओं में लखनऊ पब्लिक कॉलेज, सेक्टर-ई, आम्रपाली योजना, लखनऊ, लखनऊ पब्लिक कॉलेज, ए-ब्लॉक, राजाजीपुरम, लखनऊ, लखनऊ पब्लिक वर्ल्ड स्कूल, गार्डन सिटी, लखनऊ, श्री बालाजी इंटरनेशनल स्कूल, लखनऊ, बाल निकुंज इंटर कॉलेज (गर्ल्स विंग), मड़ियांव, लखनऊ, लखनऊ पब्लिक स्कूल, जेल रोड, आनंदनगर, लखनऊ के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया.
चित्रकला प्रतियोगिता में कुल 102 प्रतिभागियों तथा रंगोली प्रतियोगिता में कुल 50 प्रतिभागियों ने प्रतिभाग किया। विद्यार्थियों ने अपनी चित्रकला एवं रंगोली के माध्यम से तिरंगे, राष्ट्रप्रेम, स्वतंत्रता संग्राम तथा राष्ट्रीय एकता की भावनाओं को अभिव्यक्त किया।
चित्रकला प्रतियोगिता के जूनियर वर्ग में आरिका सिंह, लखनऊ पब्लिक स्कूल, जेल रोड, आनंदनगर को प्रथम पुरस्कार, मरियम शुऐब, श्री बालाजी इंटरनेशनल स्कूल को द्वितीय पुरस्कार तथा आयत खान, बाल निकुंज इंटर कॉलेज (गर्ल्स विंग), लखनऊ को तृतीय पुरस्कार प्रदान किया गया।
प्रोत्साहन पुरस्कार दिव्यानी सिंह, लखनऊ पब्लिक वर्ल्ड स्कूल, गार्डन सिटी; अदिति सिंह, लखनऊ पब्लिक स्कूल, जेल रोड, आनंदनगर; प्रकुल पटेल, लखनऊ पब्लिक स्कूल, जेल रोड, आनंदनगर तथा तनुश्री, लखनऊ पब्लिक कॉलेज, ए-ब्लॉक, राजाजीपुरम को प्रदान किए गए।
चित्रकला प्रतियोगिता के सीनियर वर्ग में रिद्धिमा चौधरी, लखनऊ पब्लिक स्कूल, जेल रोड, आनंदनगर को प्रथम पुरस्कार, सौभाग्य श्रीवास्तव, लखनऊ पब्लिक कॉलेज, ए-ब्लॉक, राजाजीपुरम को द्वितीय पुरस्कार तथा अग्रिमा पटेल, लखनऊ पब्लिक स्कूल, जेल रोड, आनंदनगर को तृतीय पुरस्कार प्रदान किया गया। सिन्धु दुबे, लखनऊ पब्लिक स्कूल, जेल रोड, आनंदनगर को प्रोत्साहन पुरस्कार प्रदान किया गया।
विद्यालय स्तरीय रंगोली प्रतियोगिता में बाल निकुंज इंटर कॉलेज (गर्ल्स विंग), लखनऊ को प्रथम पुरस्कार, लखनऊ पब्लिक वर्ल्ड स्कूल, गार्डन सिटी, लखनऊ को द्वितीय पुरस्कार तथा लखनऊ पब्लिक स्कूल, जेल रोड, आनंदनगर, लखनऊ को तृतीय पुरस्कार प्रदान किया गया। लखनऊ पब्लिक कॉलेज, सेक्टर-ई, आम्रपाली योजना, लखनऊ तथा बाल निकुंज इंटर कॉलेज (गर्ल्स विंग), लखनऊ को प्रोत्साहन पुरस्कार प्रदान किए गए।
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों एवं प्रतिभागियों द्वारा मानव श्रृंखला का भी आयोजन किया गया, जिसमें राष्ट्रीय एकता, अखंडता और राष्ट्रप्रेम का संदेश दिया गया। इस अवसर पर विद्यार्थियों ने ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए अधिक से अधिक लोगों को राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान एवं राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों के लिए प्रेरित किया।
इसी क्रम में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के अवसर पर राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा आज दिनांक 14 अगस्त, 2026 को विभाजन विभीषिका पर आधारित विशेष प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया। प्रदर्शनी के माध्यम से भारत विभाजन के दौरान घटित घटनाओं, विस्थापन, पीड़ा एवं संघर्ष की ऐतिहासिक स्मृतियों को जनसामान्य के समक्ष प्रस्तुत किया गया। प्रदर्शनी का उद्देश्य नई पीढ़ी को विभाजन की त्रासदी से परिचित कराते हुए शांति, मानवता, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता के महत्व का संदेश देना रहा।
राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा आयोजित इन कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम, राष्ट्रीय प्रतीकों एवं सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने तथा उनमें राष्ट्रप्रेम एवं सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने का सार्थक प्रयास किया गया।

14/08/2026
शिव प्रतिमा13वीं-14वीं शती ई.विंध्यन बलुआ प्रस्तर, प्राप्ति स्थान-अज्ञातराज्य संग्रहालय, लखनऊ (संस्कृति विभाग, उत्तर प्र...
13/08/2026

शिव प्रतिमा
13वीं-14वीं शती ई.
विंध्यन बलुआ प्रस्तर, प्राप्ति स्थान-अज्ञात
राज्य संग्रहालय, लखनऊ (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश )
भगवान शिव ऊपरी दाहिने हाथ में त्रिशूल एवं निचले दाएं हाथ में अक्षमाला धारण किए खड़े हैं। शिव प्रतिमा के निचले बाएं हाथ में कमंडल तथा ऊपरी बाएं हाथ में संभवतया सर्प है। सिर पर सुसज्जित जटा-मुकुट है, जो उनके योगेश्वर रूप का प्रतीक है। गले में मुक्ताहार और भुजाओं में बाजूबंद एवं कानों में कुंडल धारण किए हैं। प्रतिमा का चेहरा घिसा हुआ है, तथापि ध्यान मुद्रा और शांत भाव अभी भी परिलक्षित हो रहे हैं। सुसज्जित जटा मुकुट तथा कमंडल भगवान शिव के योगेश्वर स्वरूप एवं गले का मुक्ताहार, मोतियों के बाजूबंद, मोतियों के कुंडल एवं लंबा पुष्पाहार उनके राजराजेश्वर स्वरूप को प्रतिबिंबित करते हैं। सही अर्थों में यह प्रतिमा भगवान शिव के योगेश्वर एवं राजराजेश्वर स्वरूप का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है। भगवान शिव एक अलंकृत तोरण के नीचे खड़े हैं। शीर्ष पर बारीक नक्काशी है और दोनों ओर लघु स्तंभ बने हुए हैं। स्तंभों के ऊपर छोटे मंदिर जैसे शिखर बने हैं, जो मध्यकालीन भारतीय मंदिर वास्तुकला की नागर शैली की विशेषता है। यह प्रतिमा किसी मंदिर की 'रथिका' का भाग प्रतीत होती है।





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राज्य संग्रहालय, लखनऊ में काकोरी ट्रेन एक्शन की पूर्व संध्या पर कैनवास पेंटिंग प्रतियोगिता एवं चित्र प्रदर्शनी का आयोजन​...
08/08/2026

राज्य संग्रहालय, लखनऊ में काकोरी ट्रेन एक्शन की पूर्व संध्या पर कैनवास पेंटिंग प्रतियोगिता एवं चित्र प्रदर्शनी का आयोजन
​लखनऊ, 08 अगस्त, 2026।
​राज्य संग्रहालय, लखनऊ (संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश) द्वारा काकोरी ट्रेन एक्शन की पूर्व संध्या पर स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानियों के त्याग, बलिदान एवं राष्ट्रभक्ति की स्मृति को समर्पित "काकोरी ट्रेन एक्शन" विषयक कैनवास पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्रतिभागियों द्वारा तैयार किए गए चित्रों की आकर्षक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई, जिसे उपस्थित अतिथियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं कला प्रेमियों ने सराहा।
​प्रतियोगिता में राज्य ललित कला अकादमी, कैसरबाग, लखनऊ, टेक्नो ग्रुप ऑफ हायर स्टडीज, फैजाबाद रोड, लखनऊ, फाइन आर्ट विभाग, गोयल इंस्टीट्यूट, लखनऊ तथा डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रतियोगिता में कुल 65 प्रतिभागियों ने अपनी कलात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए काकोरी ट्रेन एक्शन से संबंधित ऐतिहासिक घटनाओं, क्रांतिकारियों के साहस और स्वतंत्रता संग्राम की भावना को कैनवास पर सजीव रूप में प्रस्तुत किया।
​प्रतियोगिता के निर्णायकों द्वारा उत्कृष्ट कृतियों का चयन करते हुए विजेताओं की घोषणा की गई। प्रथम पुरस्कार फाइन आर्ट विभाग, गोयल इंस्टीट्यूट, लखनऊ की छात्रा रिया जायसवाल को प्रदान किया गया। द्वितीय पुरस्कार अनुराग गुप्ता (टेक्नो ग्रुप ऑफ हायर स्टडीज, लखनऊ) तथा तृतीय पुरस्कार यशस्वी सिंह (राज्य ललित कला अकादमी, लखनऊ) को प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त अंकित द्विवेदी एवं श्रेया सिंह (डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय, लखनऊ) तथा सोनाली कुमारी (टेक्नो ग्रुप ऑफ हायर स्टडीज, लखनऊ) को उनकी उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिए प्रोत्साहन पुरस्कार प्रदान किए गए।
​कार्यक्रम की मुख्य अतिथि डॉ. श्रद्धा शुक्ला, निदेशक, राज्य ललित कला अकादमी, उत्तर प्रदेश ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि कला केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि इतिहास और राष्ट्रीय चेतना को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सशक्त साधन भी है। उन्होंने विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत चित्रों की सराहना करते हुए कहा कि इन कृतियों में काकोरी के अमर क्रांतिकारियों के प्रति सम्मान और देशभक्ति की भावना स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।
​कार्यक्रम के अंत में डॉ. विनय कुमार सिंह, निदेशक, राज्य संग्रहालय, लखनऊ ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों, निर्णायकों एवं सहयोगी संस्थानों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि राज्य संग्रहालय समय-समय पर ऐसे आयोजनों के माध्यम से युवाओं को देश के गौरवशाली इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत से जोड़ने का कार्य करता रहा है।
​कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. अनिता चौरसिया, प्रदर्शक व्याख्याता, राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा किया गया। प्रतियोगिता एवं प्रदर्शनी ने उपस्थित दर्शकों को काकोरी ट्रेन एक्शन के ऐतिहासिक महत्व तथा स्वतंत्रता सेनानियों के अदम्य साहस का स्मरण कराया।

काकोरी ट्रेन एक्शन दिवस की पूर्व संध्या पर------------------------------------------------------काकोरी ट्रेन एक्शन पर आध...
07/08/2026

काकोरी ट्रेन एक्शन दिवस की पूर्व संध्या पर
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काकोरी ट्रेन एक्शन पर आधारित कैनवास पेंटिंग प्रतियोगिता, प्रदर्शनी एवं पुरस्कार वितरण कार्यक्रम
दिनांक 08 अगस्त, 2026
राज्य संग्रहालय लखनऊ

डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला का समापनपद्मश्री बी. आर. मणि ने “Searching for Mauryan Edifices in Kashi” व...
07/08/2026

डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला का समापन
पद्मश्री बी. आर. मणि ने “Searching for Mauryan Edifices in Kashi” विषय पर दिया व्याख्यान
लखनऊ, 07 अगस्त, 2026।
संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश के अंतर्गत राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा आयोजित “डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला” का आज समापन एवं प्रमाणपत्र वितरण समारोह के साथ सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। दिनांक 26 जुलाई से 07 अगस्त, 2026 तक आयोजित इस व्याख्यानमाला के अंतिम दिवस “Searching for Mauryan Edifices in Kashi” विषय पर एक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में इतिहास, पुरातत्व, कला, संस्कृति एवं संग्रहालय अध्ययन के क्षेत्र से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा संस्कृति प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता पद्मश्री बी. आर. मणि, सेवानिवृत्त महानिदेशक, राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली रहे। उन्होंने पावरप्वाइंट प्रस्तुति के माध्यम से काशी क्षेत्र में मौर्यकालीन स्थापत्य अवशेषों की खोज, पहचान और उनके ऐतिहासिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। अपने व्याख्यान में उन्होंने विशेष रूप से सारनाथ, राजघाट तथा वाराणसी के निकटवर्ती पुरास्थलों के पुरातात्त्विक साक्ष्यों का उल्लेख करते हुए मौर्यकालीन स्थापत्य परंपरा की व्यापकता और उसके ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया।
पद्मश्री बी. आर. मणि ने कहा कि काशी भारतीय सभ्यता के सबसे प्राचीन और सतत् जीवित नगरों में से एक है, जिसकी सांस्कृतिक परंपरा हजारों वर्षों से निरंतर विकसित होती रही है। मौर्यकाल, विशेषकर सम्राट अशोक के शासनकाल में, काशी और सारनाथ क्षेत्र को विशेष महत्व प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि सारनाथ में स्थापित अशोक स्तंभ, धर्मराजिका स्तूप तथा अन्य बौद्ध स्मारक मौर्यकालीन स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जो उस काल की राजनीतिक शक्ति, धार्मिक दृष्टिकोण और कलात्मक परिष्कार को अभिव्यक्त करते हैं।
अपने व्याख्यान में उन्होंने राजघाट क्षेत्र से प्राप्त पुरातात्त्विक साक्ष्यों का उल्लेख करते हुए बताया कि यह क्षेत्र प्राचीन वाराणसी के नगरीय विकास को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उत्खननों से प्राप्त संरचनात्मक अवशेष, मृद्भांड, मुद्राएँ तथा अन्य पुरावशेष इस क्षेत्र की प्राचीनता और सांस्कृतिक निरंतरता को प्रमाणित करते हैं। उन्होंने कहा कि काशी के मौर्यकालीन स्वरूप की खोज केवल स्थापत्य अवशेषों की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय शहरीकरण, धार्मिक विकास और सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन से भी गहराई से जुड़ी हुई है।
पद्मश्री मणि ने यह भी बताया कि आधुनिक पुरातात्त्विक तकनीकों, भू-भौतिकीय सर्वेक्षणों तथा साहित्यिक और अभिलेखीय स्रोतों के समन्वित अध्ययन से काशी क्षेत्र में मौर्यकालीन अवशेषों की पहचान के नए आयाम सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सारनाथ और वाराणसी क्षेत्र भारतीय इतिहास की उन महत्वपूर्ण कड़ियों को संरक्षित किए हुए हैं, जिनके अध्ययन से मौर्यकालीन भारत की राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संरचना को और अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. के. के. थपल्याल, पूर्व विभागाध्यक्ष, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ द्वारा की गई। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने भारतीय इतिहास, कला और संस्कृति के अध्ययन को नई दृष्टि प्रदान की। उन्होंने व्याख्यानमाला के दौरान आयोजित विविध विषयों पर हुए अकादमिक विमर्श की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होते हैं। इस अवसर पर डॉ. विनय कुमार सिंह, निदेशक राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा प्रो. वासुदेव शरण अग्रवाल से जुड़े संस्मरणों पर लिखित स्मारिका का भी विमोचन किया गया.
इस अवसर पर डॉ. विनय कुमार सिंह, निदेशक, राज्य संग्रहालय, लखनऊ ने मुख्य वक्ता, अध्यक्ष तथा उपस्थित सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल भारतीय सांस्कृतिक अध्ययन के ऐसे युगप्रवर्तक विद्वान थे, जिनकी दृष्टि कला, पुरातत्व, इतिहास और साहित्य के विविध आयामों को समाहित करती थी। उन्होंने कहा कि व्याख्यानमाला का उद्देश्य उनके विचारों और योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाना तथा भारतीय सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता को सुदृढ़ करना है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. मीनाक्षी खेमका, सहायक निदेशक (सज्जा कला), राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा किया गया।
व्याख्यान के उपरांत प्रमाणपत्र वितरण समारोह आयोजित किया गया, जिसमें व्याख्यानमाला में सहभागिता करने वाले शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र प्रदान किए गए। इस अवसर पर उपस्थित प्रतिभागियों ने व्याख्यानमाला को अत्यंत ज्ञानवर्धक, शोधपरक और प्रेरणादायी बताते हुए राज्य संग्रहालय, लखनऊ की इस अकादमिक पहल की सराहना की।
समापन समारोह के साथ “डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला” का सफलतापूर्वक समापन हुआ। विगत बारह दिनों में आयोजित व्याख्यानों ने भारतीय कला, संस्कृति, साहित्य, पुरातत्व, मुद्राशास्त्र एवं इतिहास के विविध आयामों पर गंभीर विमर्श को प्रोत्साहित किया तथा डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के बहुआयामी योगदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

“वल्लभी की मंदिर वास्तुकला” विषय पर व्याख्यान आयोजित, भारतीय मंदिर स्थापत्य की विशिष्ट परंपरा पर हुआ विस्तृत विमर्शलखनऊ,...
06/08/2026

“वल्लभी की मंदिर वास्तुकला” विषय पर व्याख्यान आयोजित, भारतीय मंदिर स्थापत्य की विशिष्ट परंपरा पर हुआ विस्तृत विमर्श
लखनऊ, 06 अगस्त, 2026।
संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश के अंतर्गत राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा आयोजित “डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला” (26 जुलाई से 07 अगस्त, 2026) के अंतर्गत आज दिनांक 06 अगस्त, 2026 को “वल्लभी की मंदिर वास्तुकला” विषय पर एक महत्वपूर्ण व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भारतीय कला, स्थापत्य, पुरातत्व, इतिहास एवं संस्कृति के क्षेत्र से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा संस्कृति प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. राकेश तिवारी, सेवानिवृत्त महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली रहे। उन्होंने पावरप्वाइंट प्रस्तुति के माध्यम से भारतीय मंदिर स्थापत्य की वल्लभी शैली तथा उसके ऐतिहासिक विकास, स्थापत्य विशेषताओं और सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
अपने व्याख्यान में डॉ. तिवारी ने बताया कि भारतीय मंदिर वास्तुकला का विकास एक दीर्घ एवं सतत प्रक्रिया का परिणाम है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रीय शैलियों और स्थापत्य परंपराओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वल्लभी शैली भारतीय मंदिर वास्तुकला की ऐसी विशिष्ट परंपरा है, जिसने उत्तर भारत के मंदिर निर्माण पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने बताया कि इस शैली का मूल स्वरूप आयताकार अथवा लंबवत योजना पर आधारित होता था, जिसके ऊपर बैरल-वॉल्ट (गजपृष्ठाकार अथवा ढोलाकार) छत का निर्माण किया जाता था।
उन्होंने कहा कि गुप्तोत्तर काल में वल्लभी शैली का विकास विशेष रूप से देखा जाता है और इसके अनेक उदाहरण मध्य भारत, राजस्थान तथा उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्त होते हैं। इस शैली में निर्मित मंदिरों की संरचना सरल होने के बावजूद अत्यंत प्रभावशाली होती थी। उन्होंने विभिन्न पुरातात्त्विक स्थलों एवं मंदिरों के चित्रों के माध्यम से वल्लभी शैली की विशेषताओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया तथा बताया कि किस प्रकार यह शैली बाद की विकसित नागर परंपरा के लिए आधारभूमि सिद्ध हुई।
डॉ. तिवारी ने यह भी कहा कि भारतीय मंदिर केवल धार्मिक अनुष्ठानों के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक, सांस्कृतिक और कलात्मक गतिविधियों के भी महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं। मंदिर स्थापत्य के अध्ययन से तत्कालीन समाज की तकनीकी दक्षता, धार्मिक मान्यताओं, कलात्मक अभिरुचियों और सांस्कृतिक चेतना का ज्ञान प्राप्त होता है। उन्होंने वासुदेव शरण अग्रवाल के कला एवं संस्कृति संबंधी अध्ययनों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय कला और स्थापत्य की व्याख्या में उनकी दृष्टि अत्यंत व्यापक और सांस्कृतिक संदर्भों से परिपूर्ण थी।
इस अवसर पर डॉ. विनय कुमार सिंह, निदेशक, राज्य संग्रहालय, लखनऊ ने मुख्य वक्ता एवं उपस्थित प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल भारतीय संस्कृति, कला एवं इतिहास के ऐसे युगद्रष्टा विद्वान थे, जिन्होंने भारतीय विरासत को समझने और व्याख्यायित करने की नई दिशा प्रदान की। उन्होंने कहा कि स्मृति व्याख्यानमाला का उद्देश्य उनके विचारों को नई पीढ़ी तक पहुँचाना तथा भारतीय सांस्कृतिक धरोहर के विविध आयामों पर गंभीर अकादमिक विमर्श को प्रोत्साहित करना है।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. मीनाक्षी खेमका, सहायक निदेशक (सज्जा कला), राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा किया गया। उन्होंने विषय की प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए मुख्य वक्ता का परिचय कराया तथा कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।
व्याख्यान के उपरांत आयोजित प्रश्नोत्तर सत्र में शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने वल्लभी शैली, नागर मंदिर वास्तुकला, गुप्तोत्तर कला तथा भारतीय स्थापत्य परंपराओं से संबंधित अनेक प्रश्न पूछे। मुख्य वक्ता ने उनके प्रश्नों के विस्तृत उत्तर देते हुए विषय के विभिन्न आयामों को स्पष्ट किया।

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226001

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