21/03/2026
आज की राजनीति और समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि जातिवाद को खत्म करने के नाम पर ही नया जातिवाद खड़ा किया जा रहा है।
अब स्थिति यह हो गई है कि — “तुम्हारा जातिवाद जातिवाद है, और मेरा जातिवाद सेक्युलरिज़्म।”
जब कोई अपनी जाति की बात करे तो उसे संकीर्ण, पिछड़ा और विभाजनकारी कहा जाता है,
लेकिन वही बात अगर “समानता” या “प्रतिनिधित्व” के नाम पर की जाए, तो उसे प्रगतिशील और न्यायसंगत बता दिया जाता है।
असल समस्या जाति नहीं, बल्कि जाति का राजनीतिक और स्वार्थी इस्तेमाल है।
जब तक जाति को वोट, सत्ता और पहचान की राजनीति का हथियार बनाया जाएगा, तब तक इसे खत्म करने के सारे प्रयास केवल दिखावा बनकर रह जाएंगे।
जातिवाद खत्म करने के लिए ज़रूरी है कि—
हम जाति को पहचान नहीं, बल्कि इतिहास के रूप में देखें
हर पक्ष अपने-अपने जातिवाद को सही ठहराने की बजाय, उसे ईमानदारी से स्वीकार करे
और सबसे महत्वपूर्ण, न्याय और अवसर को जाति से ऊपर रखा जाए
क्योंकि जब तक “मेरा जातिवाद सही, तुम्हारा गलत” की सोच रहेगी,
तब तक जातिवाद खत्म नहीं होगा—
बस उसका नाम और रूप बदलता रहेगा।