24/05/2026
ध्यान दीजिए आप वर्तमान दौर में वैमनस्यता को तेज़ी से बढ़ावा दें रहें हैं - विनेश ठाकुर कर्पूरी
जन संख्या अनुपात में हिस्सेदारी ही बन सकतीं हैं वरदान
जातिगत वैमनस्यता और 'हिस्सेदारी की अनदेखी': देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए क्या यह एक बड़ा खतरा है?
लखनऊ / विशेष रिपोर्ट: विनेश ठाकुर कर्पूरी
मथुरा के नरहौली में दलित समाज की बारात पर हुए पथराव और बढ़ते बवाल ने एक बार फिर देश की उस अंतर्निहित सामाजिक दरार को उजागर कर दिया है, जिसे राजनीति और सामाजिक संगठन अपने-अपने तरीके से भुनाने में लगे हैं। इस घटना को महज 'एक्शन का रिएक्शन' या 'सम्मान बनाम अपमान की जंग' कहकर नहीं टाला जा सकता। जानकारों और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार की हिंसक घटनाओं की जड़ें सीधे तौर पर प्रशासनिक निष्क्रियता, बेरोजगारी से उपजे आक्रोश और सत्ता-संसाधनों में जनसंख्या के अनुपात में हिस्सेदारी की अनदेखी से जुड़ी हैं।
चार स्तंभों में हिस्सेदारी की अनदेखी: विवाद की मुख्य जड़
देश को सुचारू रूप से चलाने वाले चारों स्तंभों (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया) में सभी जातियों और वर्गों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व न मिलना एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। हालांकि, हिस्सेदारी तय करने का अधिकार संवैधानिक रूप से सरकार के पास होता है, लेकिन धरातल पर सक्रिय विभिन्न सामाजिक संगठन समाज को 'ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर और शूद्र' के खांचों में बांटकर अपनी रोटियां सेक रहे हैं। यही कारण है कि आज जातियों के बीच आपसी वैमनस्यता कम होने के बजाय दिन-दूनी रात-चौगुनी तरक्की कर रही है।
सत्ता के गलियारों में 'रेवड़ी' संस्कृति: एक ही थैली के चट्टे-बट्टे
विगत और वर्तमान राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें, तो जातिगत और धार्मिक भेदभाव का आरोप किसी एक दल पर नहीं, बल्कि बारी-बारी से सभी सरकारों पर लगता रहा है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि:
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के शासनकाल में दलित वर्ग को विशेष प्राथमिकता मिली।
समाजवादी पार्टी (सपा) के दौर में यादव और मुस्लिम समीकरणों को तरजीह दी गई।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वर्तमान दौर में ब्राह्मण और ठाकुर वर्ग पर सत्ता की विशेष कृपा और कोलेजियम व्यवस्था की प्रगति को लेकर सवाल उठते रहे हैं। और सर्वाधिक संख्या में होने के बावजूद अलग अलग जातियों में बांटकर हांसिए में चला आ रहा अतिपिछड़ा प्रत्येक सरकार में खुद को ठगा महसूस करता रहा है वह अपनी हिस्सेदारी के लिए फुटबॉल बनकर रहने का आदि था लेकिन अब इन पार्टियों और सरकार पर हिस्सेदारी लूटने का आरोप सिद्ध करने में संकोच नहीं करता मजेदार बात यह है कि भाईचारा और जातिगत वैमनस्यता रोकने का काम करने वाली सरकार जब जातिगत जनगणना करा रही हैं तो सूची से ओबीसी का कॉलम ही गायब है जो भड़काने वाले ओबीसी नेताओं के लिए सबसे बड़ा प्रमाण पत्र है वो साफ साफ कहते घूम रहे हैं कि ओबीसी का कॉलम ग़ायब होना ओबीसी के अधिकारों पर डाका डालने के समान है इतना ही नहीं
चाहे जिला, तहसील और थानों में प्रशासनिक नियुक्तियों का मामला हो, कैबिनेट में महत्वपूर्ण विभागों का बंटवारा हो या फिर चुनावी टिकटों का वितरण—तमाम राजनीतिक दल अपने-अपने कोर वोट बैंक को 'रेवड़ी' बांटने में व्यस्त रहते हैं। इसी राजनीतिक दिखावे और स्वार्थ का नतीजा है कि समाज में ध्रुवीकरण की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है।
क्या है समाधान? निष्पक्षता और आनुपातिक प्रतिनिधित्व ही एकमात्र रास्ता
विशेषज्ञों और प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि यदि कोई भी सरकार बड़ा दिल दिखाकर सभी जातियों और धर्मों को उनकी जनसंख्या के उचित अनुपात में बरकरार हिस्सेदारी दे, तो न सिर्फ यह वैमनस्यता हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी, बल्कि राजनीति में 'कॉकरोच पार्टी' जैसे शिगूफे भी दिखाई देना बंद हो जाएंगे।
इसके ठोस उपाय के रूप में अब पारंपरिक और स्वार्थी दलों के विकल्प की तलाश पर जोर दिया जा रहा है। देश की सामाजिक व्यवस्था को बचाने का एकमात्र तरीका यह है कि शासन की बागडोर ऐसे निष्पक्ष हाथों में सौंपी जाए, जो:
सरकारी पोस्टिंग और प्रशासनिक नियुक्तियों में पूर्ण पारदर्शिता और निष्पक्षता बरतें।
मंत्रिमंडल के विभागों के आवंटन में हर वर्ग को आनुपातिक प्रतिनिधित्व दें।
विधानसभा और लोकसभा टिकट वितरण में सभी जातियों और धर्मों को जनसंख्या के अनुपात में मैदान में उतारें।
समय रहते चेतना होगा, वरना...
यदि वर्तमान नेतृत्व और राजनीतिक पार्टियां केवल सत्ता हथियाने के लिए देश की प्रतिष्ठा, सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक भाईचारे को दांव पर लगाती रहीं, तो वह दिन दूर नहीं जब राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर नागरिक सुरक्षा तक, हर क्षेत्र में केवल राजनीतिक खोखलापन ही नजर आएगा। वर्तमान नेताओं को यह सोचना होगा कि यदि समय रहते इस सामाजिक जहर को नहीं रोका गया, तो भविष्य में समाज के हर तबके को सिर्फ और सिर्फ पछतावा ही हाथ लगेगा। वरना भाजपा सपा बसपा कांग्रेस आजाद राजभर निषाद नदवंशी मुस्लिम सभी अपने अपने समुदाय को हिस्सेदारी और अपमान सम्मान की वास्तविकता बताकर वैमनस्यता बढ़ाते रहेंगे एक दिन ऐसी स्थिति आएगा जातिगत और धार्मिक वैमनस्यता हर जगह अपने पैर पसारने में कामयाब हो जाएगी