21/12/2025
जंगल सभ्यताओं से पहले आते हैं और रेगिस्तान उनके बाद आते हैं" , फ्रांस्वा-रेने का ये कथन इन दिनों मेरे मन के अंधेर कोने और शायद मनुष्यता के कोनों में उसी प्रकार गूंज रहा जैसे कोई जोगी सर्द रातों में घूम घूम कर गाता है ,*चेत सको तो चेत मुसाफिर, आखिर जाना दूर है,*
*इस दुनिया के रंग-तमाशे, सब माटी का चूर है।*"
"*काहे को तू सोच करे रे, काहे को पछताय,*
*जैसा बोवे वैसा काटे, न्याय प्रभु का पाय।"*
और गाते गाते फिर कहीं गुम हो जाता है और फिर हम सो जाते दूसरे दिन जगत में जगने के लिए, भोगने के लिए ,,, इसका कारण है अरबों वर्ष पुराने योद्धा के अस्तित्व पर आए खतरे से है, कल्पना कीजिए, 3.5 अरब साल पहले, जब पृथ्वी अभी-अभी जवान हो रही थी, तब अरावली ने जन्म लिया। दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक! राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली यह श्रृंखला, जैसे कोई महाकाव्य का नायक। मुगलों ने इसे देखा, ब्रिटिशों ने लूटा, और आजादी के बाद हमने इसे "विकास" के नाम पर नोचा। इतिहास गवाह है कि अरावली ने राजपूत योद्धाओं को छिपाया, जंगलों में शरण दी, और दिल्ली की हवा को साफ रखा। लेकिन आज? आज यह योद्धा खुद घायल है, अवैध खनन की तलवारों से। और हम इतिहास की किताबों में महाराणा प्रताप को याद करते हैं, लेकिन इस "जमीन से जुड़े योद्धा" को भूल जाते हैं। लेकिन याद रखे कल को स्कूल की किताबों में लिखा जाएगा: "अरावली था एक योद्धा, जो कंक्रीट के जंगलों में हार गया।" हम उसे पढ़ेंगे, मामला है "उसके काटने का आदेश से जुड़ा हुआ । 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, "बस, अरावली में खनन बंद हो" उन दिनों लगा जैसे कोई जज योद्धा को बचाने आया। लेकिन क्या हुआ? अवैध खनन जारी, जैसे कोर्ट का आदेश कोई मजाक हो। 2025 आते-आते, सुप्रीम कोर्ट ने नई परिभाषा दी: "अरावली वही जो 100 मीटर ऊँची हो।" मतलब? 90% क्षेत्र अब "अरावली" नहीं माना जाएगा! ये ठीक waise जैसे कोई डॉक्टर कहे, "तुम बीमार तभी हो जब बुखार 100 डिग्री हो, 99 पर पार्टी करो!" नई माइनिंग लीज़ पर बैन है, लेकिन sustainable plan तक। sustainable? हँसी आती है! खनन कंपनियाँ तो पहले से ही "सस्टेन" कर रही हैं – अपनी जेबें। चार राज्यों में बैन, लेकिन अवैध तरीके से कटाई जारी। मार्मिक बात यह कि यह योद्धा चुपचाप कट रहा है, और हम सोचते हैं, "अरे, पत्थर तो हैं,।🙏🙏