12/01/2026
ऐसी दीवारें माँ-बाप के जाने के बाद बनती हैं।
ये दीवारें ईंटों की नहीं होतीं,
ये खामोशी की होती हैं।
ये उस रिश्ते की होती हैं
जो ज़िंदगी में सबको जोड़े रखता था।
जब माँ-बाप होते हैं,
तो घर में मतभेद भी हों
तो दीवार नहीं बनती।
बात बिगड़ भी जाए
तो कोई रास्ता निकल ही आता है,
क्योंकि बीच में मोहब्बत खड़ी होती है।
लेकिन जब वह साया उठ जाता है,
तो वही भाई-बहन,
वही घर
और वही आँगन
धीरे-धीरे ईंटों में बदलने लगता है।
ये दीवारें विरासत से नहीं बनतीं,
ये दीवारें एहसास के मरने से बनती हैं।
माँ-बाप की क़दर
उनकी ज़िंदगी में ही करें,
क्योंकि उनके बाद
घर तो रह जाता है,
लेकिन घर में माँ-बाप नहीं रहते। 💔