23/08/2025
अंतःकरण के विषय में अंश अगर अंधेरा खत्म करना है तो प्रकाश के साथ जूझना पड़ेगा,
क्योंकि अंधेरे के साथ कुछ भी नहीं किया जा सकता है क्योंकि अंतः करण कभी अशुद्ध होता ही नहीं है, अगर अंतःकरण अशुद्ध हो गया तो अत: करण को शुद्ध करेगा कौन, अगर सही समझे तो अंतःकरण ही शुद्ध है, क्योंकि अंतःकरण के विषय में हमें पता ही नहीं होता है, जब कोई चोरी करने जाता है भीतर से कोई कहता है चोरी मत करो, और आप कहते हो की अत:करण बोल रहा है, यह सब समाज के द्वारा डाली गई धारणा है,अंतःकरण नहीं, चोरों का है तो ऐसा नहीं होगा जिसको हिंसा अहिंसा का सामाजिक बोध कहते हैं, उसे डालने का बचपन में प्रयास नहीं किया गया, एक हिंदू से कहे कि चचेरी बहन से शादी कर लो तो उसका अंत:करण इंकार कर देगा, अगर मुसलमान से कहो की चचेरी बहन से शादी कर लो तो इनकार नहीं करेगा, कारण यह नहीं कि उसके पास अंतःकरण नहीं है, केवल चचेरी बहन से शादी करने से धारणा का भेद है, यह समाज देता है वह अंतःकरण नहीं है, समाज ने एक इंतजाम किया है, उसी को हम अंतःकरण समझ बैठते हैं, अंत:करण का मतलब आत्मा नहीं, क्योंकि आत्मा तो वह है जो बाहर और भीतर दोनों में नहीं है दोनों से बाहर है, अंतःकरण तो वह है जो आत्मा के जो निकट उपकरण है, जिसके द्वारा हम बाहर से जुड़ते हैं, समझ ले आत्मा के पास एक दर्पण जिसमें आत्मा प्रति फलित होती है, वह अंता करण है, निकटतम आत्मा तक पहुंचने के लिए अंत:करण आखरी सीढ़ी है, और अंत:करण आत्मा के इतने निकट है वह कभी अशुद्ध नहीं हो सकता है, आत्मा की निकटता ही उसकी शुद्धि है,
यह नहीं है जो हमारे भीतर जब हम सड़क पर चलते हैं, बाय न चल के दाएं चल रहे हैं तो कोई भीतर से कोई कहता है की दाएं चलना ठीक नहीं है, बाय चलना ठीक है, यह अंत: करण की आवाज नहीं है, यह केवल सामाजिक आंतरिक व्यवस्था है, अमेरिका में चलते हैं तो बात चलने की जरूरत नहीं है वहां दाएं चलते हैं, वहां का नियम दाएं चलने का है, बाएं चलने का नहीं है, अंतःकरण नैतिक धारणा नहीं है अंतःकरण एक ही तरह का होता है, नैतिकता हजार हैं, अंतःकरण एक है अंतःकरण शुद्ध ही है, आत्मा के निकट रहकर कोई चीज अशुद्ध नहीं हो सकती है
अध्यात्म की कलम से🙏🙏