12/07/2020
*राजनीति बहुत गंदी चीज है*
हां यह बात सच है कि राजनीति बहुत गंदी चीज है, पर क्या सिर्फ यह मान लेना हमारे लिए काफी है या राजनीति को साफ करने और स्वच्छ बनाने की भी जरूरत है, किसी भी चीज पर गंदगी लग जाए तो उसको फेंका नहीं जाता न ही ऊसको बेकार छोड़ दिया जाता है, बल्कि उसको संवारने और खूबसूरत बनाने की कोशिश की जाती है, भारत की स्वतंत्रता के बाद से हमने राजनीति और सियासत को जानबूझकर ऐसे लोगों के हाथों में छोड़े रखा जिन्होंने इसे अपनी गंदी करतूतों की स्याही से बिल्कुल काला कर दिया, और यहां तक उसको गंदा करने की कोशिश की गई के अच्छे लोग इस रास्ते पर चलने से घबराने और कतराने लगे,उन्हें इस बात की फिक्र होने लगी कि कहीं उनके दामन पर दाग धब्बे न लग जाए, समाज में उनका कद छोटा ना हो जाए,लोग उनकी तरफ ऐसी नजरों से ना देखने लगे जैसे चोर ऊचक्को को देखा जाता है, लेकिन आश्चर्यजनक बात यह भी थी कि यह लोग जिंदगी भर इस बात का रोना रोते रहे कि हमारे नेता हमारे साथ विश्वासघात करते हैं,हमारे द्वारा सौंपी गई सत्ता का दुरुपयोग करते हैं और हम फकीर और बेकार बन कर जीवन भर पड़े रहते हैं, लेकिन मैं उन लोगों में से नहीं जो जीवन भर बैठ कर बस रोते रहते हैं, इसलिए के अल्लाह ने मेरे अंदर ऐसी सहनशक्ति नहीं रखी कि मैं जिंदगी भर यह देखता रहूं कि कोई हमारे पैसे को लूट पीट कर खा रहा है और मैं सिर्फ इसलिए खामोश बैठा रहूं कि मुझे दुनिया के कुछ लोग इज्जत देंगे, आलिम वाला मर्तबा देंगे, ऐसा सम्मान और ऐसी इज्जत मेरे किस काम की जो मुझे अपने अधिकार न दिला सके, जो सम्मान के साथ मुझे दो रोटी मुहैया ना करा सके, हमने मौलवियों को मस्जिदों तक सीमित कर दिया है, उनको मंदिर के पंडित और साधु की तरह बना दिया है, जिनका काम सिर्फ नमाज पढ़ाना और मरीजों को दम करना और उनके पानी में झाड़-फूंक करना है, सोचने की बात यह है कि क्या हमारे नबी और उनके साथियों ने ऐसी ही जिंदगी गुजारी थी? क्या ऐसा नहीं था कि सहाबा में जो आदमी दिन का घुड़सवार होता था वहीं रात का इबादतगुजार भी होता था? क्या ऐसा नहीं था कि जो सहाबा एक तरफ धार्मिक मामलों के बड़े जानकार थे वही सियासत के मैदान के शहसवार भी थे? क्या ऐसा नहीं था के जो सहाबा मस्जिदों में बैठकर तस्बीह पढ़ा करते थे, वही दिन में लोगों के मामले भी देखा करते थे? यह सब हमारे लिए जिंदगी गुजारने का नमूना है, फिर कैसे हमने मौलवियों को सियासत से अलग कर दिया, हम ये क्यों कहने लगे कि आपकी इज्जत खत्म हो जाएगी, जबकि इन्होंने मिलकर मुझे कभी इज्जत भी नहीं दी, न ही इस इज्जत के साथ कभी दो समय की रोटी दी, मुझे तो छोड़िए अगर यह अपने गांव के इमाम की इज्जत कर ले तो बहुत बड़ी बात है, लेकिन अब जब के एक मौलवी जिंदगी के सही रुख को अपना रहा है उन्हें इज्जत और जिल्लत का डर दिखाकर सहाबा की जिंदगी पर चलने से रोकना और उन्हें मस्जिद तक सीमित किये रखना वास्तव में दिन के एक बड़े काम में रुकावट बनने के बराबर है, और उससे बड़ा जालिम कौन होगा जो दिन के काम में रुकावट बने, मैंने अपने गांव में रहकर बहुत सारे कार्य किये हैं, मुझे मालूम है कि लोग हर अच्छे और बड़े कदम पर बुरा भला कहते हैं बेइज्जत करते हैं लेकिन असली इज्जत देने वाला अल्लाह है, अगर मैंने इज्जत की प्रवाह की होती तो मेरा मदरसा कभी ना बनता, चलिए राजनीति गंदी चीज है, मदरसा तो अच्छा काम है उसके बनने पर लोग क्यों विरोध करने लगे, लोगों की आदत बन चुकी है कि ना वह कोई अच्छा काम करते हैं और न करने देते हैं, जलसा करने पर क्यों लोग बेइज्जत करने लगे यह तो अच्छा काम है, इन दोनों कार्यों के समय भी मुझे इज्जत और जिल्लत का डर दिखाया गया था, लेकिन मैंने किसी की परवाह नहीं की, आज भी मैं इस रास्ते पर चल रहा हूं मेरा अल्लाह मेरे साथ है, और मुझे इस बात की कोई परवाह नहीं के कौन मेरी इज्जत करता है और कौन बेइज्जत, मैं बस कयामत के दिन गर्व से सर उठाकर अल्लाह के सामने कह सकूंगा क ऐ अल्लाह मैं चुप नहीं था मैंने दुनिया की इज्जत की परवाह नहीं की, मैं गलत बोलने वालों के खिलाफ,लोगों के माल लूटने वालों के खिलाफ खड़ा हुआ, और तेरे बंदों के साथ जो लोग नाइंसाफी करते हैं उनका मैंने समर्थन नहीं किया, बेशक मेरा रब सब कुछ जानने वाला और हर चीज पर कादीर है,
अब्दुस सलाम नदवी
भावी मुखिया प्रत्याशी ग्राम पंचायत राज ठिकहा