14/09/2026
सत्य का पक्ष लीजिए, अपनी विचारधारा का नहीं
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भारतवंशियों के लिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि सत्य हमारे पक्ष में है या नहीं, बल्कि यह है कि जब सत्य हमारे विरुद्ध हो, तब क्या हम उसे स्वीकार करने का साहस रखते हैं?
यहीं उपनिषदों की दृष्टि आज भी प्रासंगिक हो जाती है। उपनिषद किसी व्यक्ति से यह नहीं कहते कि जो कहा गया है, उसे इसलिए मान लो क्योंकि वह पुराना है। उनकी परंपरा प्रश्न करती है, संवाद करती है और जिज्ञासा को ज्ञान का द्वार मानती है। अर्थात् सत्य किसी परंपरा का बंधक नहीं और असहमति अज्ञान का प्रमाण नहीं।
भारतवंशियों, विशेषकर उस समाज के लिए जिसकी पहचान शौर्य और नेतृत्व से जुड़ी रही है, यह बात समझना आवश्यक है कि विचारों की रक्षा तलवार से नहीं, तर्क से होती है। यदि हमारा कोई विश्वास प्रश्नों से डरता है, तो समस्या प्रश्न में नहीं, उस विश्वास की कमजोरी में है।
अपने इतिहास पर गर्व कीजिए, लेकिन इतिहास को तर्क से परखने का साहस भी रखिए। अपने पूर्वजों का सम्मान कीजिए, लेकिन उनके नाम पर अपनी बुद्धि को बंधक मत बनाइए। अपनी विचारधारा से प्रेम हो सकता है, परंतु उसे सत्य का पर्याय बना देना बौद्धिक अहंकार है।
याद रखिए—जो व्यक्ति केवल अपने पक्ष की बात सुनता है, वह समर्थक हो सकता है, सत्य का साधक नहीं।
हमारी सभ्यता की शक्ति इस बात में नहीं कि हमने कितने प्रश्नों को दबाया, बल्कि इस बात में है कि हमने कितने प्रश्नों को जन्म दिया।
इसलिए आज आवश्यकता किसी नए अंधविश्वास की नहीं, निर्भीक विवेक की है।
सत्य मिले तो उसे स्वीकार कीजिए—चाहे वह अपने पक्ष में हो या विपक्ष में।
क्योंकि विचारधारा आपकी पहचान हो सकती है, लेकिन सत्य आपकी परीक्षा है।
(एक विचारात्मक लेख)