शैलेन्द्र

शैलेन्द्र Political conversation

17/09/2026

सृजन, श्रम और संकल्प को नमन।
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भगवान विश्वकर्मा पूजा के पावन अवसर पर समस्त शिल्पकारों, कर्मयोगियों एवं देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ।

इसी शुभ दिन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के जन्मदिवस पर दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और राष्ट्रसेवा के लिए मंगलकामनाएँ। सृजन की शक्ति और कर्म की ऊर्जा से भारत निरंतर नई ऊँचाइयाँ छुए। PMO India

15/09/2026

वामपंथियों को भारत समझने का भ्रम
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आजकल कुछ वामपंथी चेहरे और दूर-दराज़ से #गोरखपुर की राजनीति में अपनी जमीन तलाशने आते दिखाई दे रहे हैं। यह लोकतंत्र है—हर किसी को राजनीति करने का अधिकार है। लेकिन राजनीति में उतरने से पहले इतिहास और समाज को पढ़ना भी उतना ही जरूरी है।

वामपंथ की सबसे बड़ी कमजोरी तब सामने आती है, जब वह भारत को केवल वर्ग-संघर्ष के चश्मे से देखने लगता है। भारत को समझना है तो केवल मार्क्स, लेनिन और क्रांति के घोषणापत्र पढ़ना पर्याप्त नहीं; उपनिषद, बुद्ध, चार्वाक, कौटिल्य, भक्ति परंपरा और भारतीय सामाजिक चिंतन की विविध धाराओं को भी समझना होगा।

सनातन कोई एक पुस्तक, एक पंथ या एक राजनीतिक दल नहीं है। यह हजारों वर्षों से बहस, असहमति, प्रश्न और आत्ममंथन से विकसित हुई सभ्यतागत चेतना है। जिसने नास्तिक चार्वाक को भी जगह दी और बुद्ध जैसे प्रखर प्रश्नकर्ता को भी।

इसलिए सवाल वामपंथ के अस्तित्व का नहीं, उसके बौद्धिक दृष्टिकोण का है। यदि वह भारत बदलने निकला है, तो पहले भारत को समझे। गोरखपुर की मिट्टी में राजनीति करने से पहले उसे यह जानना होगा कि यहां की चेतना किसी आयातित विचारधारा की मोहताज नहीं है।

विचार का उत्तर विचार से दीजिए—और भारत को समझने के लिए भारत को पढ़िए।

(एक विचारात्मक लेख)

15/09/2026

जिंदगी: मुट्ठी में बंद एक भ्रम
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जिंदगी के दो किनारे हैं—जन्म और मृत्यु। अजीब बात है कि दोनों हमारी अनुमति के बिना आते हैं और चले जाते हैं। न हमने जन्म का स्थान चुना, न मृत्यु का समय तय कर सकते हैं। फिर भी इन दोनों अनिश्चितताओं के बीच हम पूरी जिंदगी निश्चितताओं की तलाश में भटकते रहते हैं।

हम घर बनाते हैं, संपत्ति जोड़ते हैं, नाम कमाते हैं, रिश्तों पर अधिकार जताते हैं और भविष्य की ऐसी योजनाएँ बनाते हैं, जैसे कल हमारे आदेश की प्रतीक्षा कर रहा हो। लेकिन जीवन हर बार हमें याद दिलाता है कि मनुष्य मालिक कम, यात्री अधिक है।

शायद हमारी सबसे बड़ी भूल यही है कि हम जीवन को जीने के बजाय उसे नियंत्रित करने लगते हैं। जो हमारे हाथ में नहीं, उसके लिए चिंतित रहते हैं; और जो हमारे हाथ में है—अपने विचार, कर्म, व्यवहार और वर्तमान—उसे अक्सर क्रोध, अहंकार और प्रतिस्पर्धा में गंवा देते हैं।

तो फिर करना क्या चाहिए?

जीवन को पकड़ना नहीं, समझना चाहिए। महत्वाकांक्षा रखिए, लेकिन उसके गुलाम मत बनिए। धन कमाइए, लेकिन धन को अपना मूल्य मत बनने दीजिए। संबंध बनाइए, लेकिन स्वामित्व मत समझिए। विरोध कीजिए, लेकिन मन में विष मत पालिए। और सबसे जरूरी—कल के लिए इतना मत जिएँ कि आज ही हाथ से निकल जाए।

मृत्यु जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है, लेकिन वही सच्चाई जीवन को सबसे अधिक मूल्यवान भी बनाती है।

अंत हमारे हाथ में नहीं है; मगर अंत तक कैसी जिंदगी जीनी है, यह चुनाव आज भी हमारे हाथ में है।

14/09/2026

क्या श्रीराम और श्रीकृष्ण के आगे की यात्रा है? — तथागत गौतम बुद्ध ------------------------------!
राम ने मर्यादा सिखाई, कृष्ण ने कर्म का साहस दिया। लेकिन मनुष्य की यात्रा केवल मर्यादा और कर्म तक रुक क्यों जाए? जब प्रश्न मनुष्य के भीतर बैठे अहंकार, लोभ, द्वेष और श्रेष्ठताबोध का हो, तब तथागत गौतम बुद्ध सामने आते हैं—एक ऐसे विचारक के रूप में, जिसने मनुष्य से कहा कि सत्य को अपनी जाति, वंश या परंपरा की जागीर मत समझो।

आज हम किस दिशा में जा रहे हैं?

हर जाति अपने गौरव का झंडा लेकर खड़ी है। हर समूह अपने पूर्वजों को महान और दूसरों को कमतर साबित करने में व्यस्त है। सोशल मीडिया ने इस बीमारी को और खुला मंच दे दिया है। इतिहास अब सीखने का विषय कम और जातीय अहंकार का हथियार अधिक बनता जा रहा है।

लेकिन जरा ठहरकर सोचिए—यदि आपकी श्रेष्ठता का प्रमाण किसी दूसरे की कथित हीनता है, तो वास्तव में श्रेष्ठ कौन हुआ?

श्रेष्ठता जन्म से मिलती तो बुद्ध को ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता ही क्यों पड़ती?

#बुद्ध का मध्यम मार्ग केवल आध्यात्मिक साधना नहीं था; वह मानसिक अतियों से मुक्ति का आह्वान था। न अंध-आस्था, न अंध-अहंकार; न अपने गौरव का नशा, न दूसरे के प्रति घृणा।

भविष्य का समाज इस बात से तय होगा कि हम अपनी जातियों को कितना ऊँचा घोषित करते हैं, इससे नहीं; बल्कि इससे कि हम जातीय पहचान से ऊपर मनुष्य को कितना महत्व देते हैं।

इतिहास याद रखिए, पर इतिहास के नाम पर अहंकार मत पालिए। अपने पूर्वजों का सम्मान कीजिए, पर उनके नाम पर दूसरों का अपमान मत कीजिए।

क्योंकि आने वाले समय का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होगा कि “तुम किस जाति के हो?”

प्रश्न होगा—

“तुम कितने मनुष्य हो?”

और शायद यही वह बिंदु है जहाँ राम की मर्यादा और कृष्ण का कर्म, बुद्ध की प्रज्ञा में एक नई सामाजिक यात्रा का रास्ता खोजते हैं।
(एक विचारात्मक लेख)

14/09/2026

#नमो बुधाय—हिन्दी दिवस की शुभकामनाएँ।
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हिन्दी केवल संवाद की भाषा नहीं, हमारी संवेदना, चिंतन और आत्मअभिव्यक्ति की भाषा है। बुद्ध की तरह भाषा भी तभी सार्थक है, जब वह अज्ञान नहीं, जागृति पैदा करे; विवाद नहीं, संवाद बनाए। आइए, हिन्दी को केवल बोलें नहीं—विचार, विवेक और संस्कार की भाषा बनाएँ।

14/09/2026

सत्य का पक्ष लीजिए, अपनी विचारधारा का नहीं
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भारतवंशियों के लिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि सत्य हमारे पक्ष में है या नहीं, बल्कि यह है कि जब सत्य हमारे विरुद्ध हो, तब क्या हम उसे स्वीकार करने का साहस रखते हैं?

यहीं उपनिषदों की दृष्टि आज भी प्रासंगिक हो जाती है। उपनिषद किसी व्यक्ति से यह नहीं कहते कि जो कहा गया है, उसे इसलिए मान लो क्योंकि वह पुराना है। उनकी परंपरा प्रश्न करती है, संवाद करती है और जिज्ञासा को ज्ञान का द्वार मानती है। अर्थात् सत्य किसी परंपरा का बंधक नहीं और असहमति अज्ञान का प्रमाण नहीं।

भारतवंशियों, विशेषकर उस समाज के लिए जिसकी पहचान शौर्य और नेतृत्व से जुड़ी रही है, यह बात समझना आवश्यक है कि विचारों की रक्षा तलवार से नहीं, तर्क से होती है। यदि हमारा कोई विश्वास प्रश्नों से डरता है, तो समस्या प्रश्न में नहीं, उस विश्वास की कमजोरी में है।

अपने इतिहास पर गर्व कीजिए, लेकिन इतिहास को तर्क से परखने का साहस भी रखिए। अपने पूर्वजों का सम्मान कीजिए, लेकिन उनके नाम पर अपनी बुद्धि को बंधक मत बनाइए। अपनी विचारधारा से प्रेम हो सकता है, परंतु उसे सत्य का पर्याय बना देना बौद्धिक अहंकार है।

याद रखिए—जो व्यक्ति केवल अपने पक्ष की बात सुनता है, वह समर्थक हो सकता है, सत्य का साधक नहीं।

हमारी सभ्यता की शक्ति इस बात में नहीं कि हमने कितने प्रश्नों को दबाया, बल्कि इस बात में है कि हमने कितने प्रश्नों को जन्म दिया।

इसलिए आज आवश्यकता किसी नए अंधविश्वास की नहीं, निर्भीक विवेक की है।

सत्य मिले तो उसे स्वीकार कीजिए—चाहे वह अपने पक्ष में हो या विपक्ष में।

क्योंकि विचारधारा आपकी पहचान हो सकती है, लेकिन सत्य आपकी परीक्षा है।
(एक विचारात्मक लेख)

13/09/2026

इस जीवन को जियो—यही चार्वाक दर्शन है
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मनुष्य सदियों से मृत्यु के बाद के जीवन की कल्पना करता रहा है, लेकिन चार्वाक दर्शन ने एक असहज प्रश्न सामने रखा—जिस जीवन का अस्तित्व प्रत्यक्ष है, उसे छोड़कर उस जीवन की चिंता क्यों, जिसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं?

चार्वाक का संदेश केवल भोगवाद नहीं, बल्कि इस जीवन की वास्तविकता को स्वीकार करने का साहस है। जीवन मिला है तो उसे भय, अंधविश्वास, अनावश्यक कर्मकांड और काल्पनिक आशंकाओं में क्यों गंवाया जाए? सुख को अपराध मानना और दुःख को नियति कह देना मनुष्य की स्वतंत्र चेतना के साथ अन्याय है।

लेकिन “इस जीवन को जियो” का अर्थ यह भी नहीं कि विवेक को छोड़कर केवल इंद्रियों के पीछे भागा जाए। असली प्रश्न है—क्या हम अपने वर्तमान जीवन को सचमुच जी रहे हैं? क्या हमारी खुशियाँ हमारी अपनी हैं या समाज द्वारा निर्धारित अपेक्षाओं की गुलाम?

चार्वाक हमें वर्तमान की ओर लौटाता है। वह कहता है कि जीवन को टालो मत, उसे महसूस करो; प्रश्न करो, प्रमाण मांगो और अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करो।

शायद चार्वाक की सबसे बड़ी चुनौती आज भी यही है—मृत्यु के बाद स्वर्ग खोजने से पहले उस धरती को बेहतर बनाओ, जिस पर तुम अभी जीवित हो।

जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए उसका मूल्य कम नहीं, बल्कि और अधिक है।
जो समय हाथ में है, वही वास्तविक संपत्ति है—उसे भय में नहीं, चेतना और आनंद में जियो।

12/09/2026

मैं किसी वाद मे नहीं हू
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एक दिन एक सज्जन, अपने मार्क्सवादी होने के आत्मविश्वास में मुझसे पूछ बैठे—“आप कौन से वादी हैं?” मैंने कहा—“उपनिषादी ।”

वे हँसे। ऐसी हँसी, जैसे मैंने कोई पुरातन और अप्रासंगिक शब्द बोल दिया हो। मैंने भी सोचा—जिसे मार्क्स पढ़ने पर गर्व है, उसे उपनिषद पढ़ने की आवश्यकता शायद इसलिए महसूस नहीं हुई, क्योंकि वहाँ उसे तैयार उत्तर नहीं, असुविधाजनक प्रश्न मिलते।

उपनिषद की खूबी ही यही है।

वहाँ गुरु कहता है, शिष्य पूछता है; शिष्य फिर पूछता है और कभी-कभी गुरु भी मौन हो जाता है। नचिकेता मृत्यु के सामने खड़ा होकर प्रश्न करता है। गार्गी याज्ञवल्क्य से ब्रह्म के प्रश्न पर शास्त्रार्थ करती हैं। मैत्रेयी धन से अधिक उस ज्ञान को महत्व देती हैं जो अमरत्व का अर्थ समझाए। यह परंपरा किसी विचार को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करती कि वह प्राचीन है।

उपनिषद का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है—सत्य किसी विचारधारा की जागीर नहीं।
मार्क्सवाद हो, पूंजीवाद हो, राष्ट्रवाद हो या कोई अन्य ‘वाद’—हर वाद मनुष्य को दुनिया समझाने का अपना चश्मा देता है। उपनिषद चश्मा उतारकर पूछता है—देखने वाला स्वयं कौन है?

यही कारण है कि मैं स्वयं को किसी बंद विचारधारा में कैद नहीं करना चाहता।

मैं उस परंपरा का उत्तराधिकारी हूँ जहाँ प्रश्न अपराध नहीं, ज्ञान की शुरुआत है; जहाँ असहमति विद्रोह नहीं, संवाद है; जहाँ तर्क श्रद्धा का शत्रु नहीं, बल्कि सत्य तक पहुँचने का साधन है।

इसलिए पूछो मत कि मैं कौन-सा वादी हूँ—यह पूछो कि मेरी खोज किस सत्य की ओर है।
(एक प्रतिउत्तर लेख)

12/09/2026

#क्षत्रिय: इतिहास के पन्नों से वर्तमान की राजनीति तक
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क्षत्रियों के सामने आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि उनका इतिहास कितना गौरवशाली था, बल्कि यह है कि क्या उन्हें केवल इतिहास में कैद कर देने की कोशिश हो रही है?

जिस समाज ने सदियों तक सीमाओं की रक्षा की, युद्धभूमि में जीवन दांव पर लगाया और स्वतंत्रता के बाद अपनी अनेक रियासतों को भारतीय संघ में विलय कर देश की एकता को स्वीकार किया, उसके इतिहास को केवल सामंती अत्याचारों की कुछ घटनाओं तक सीमित कर देना इतिहास के साथ न्याय नहीं है। आलोचना होनी चाहिए—लेकिन चयनात्मक स्मृति के साथ नहीं।

स्वतंत्र भारत के निर्माण में सैकड़ों रियासतों के विलय की प्रक्रिया हुई। अनेक राजघरानों ने अपनी राजनीतिक संप्रभुता भारतीय संघ को सौंप दी। यह सत्ता बचाने का नहीं, बदलते भारत की वास्तविकता को स्वीकार करने का ऐतिहासिक निर्णय था। बाद में की व्यवस्था भी 1971 के 26वें संविधान संशोधन से समाप्त कर दी गई। इतिहास के इन अध्यायों पर तथ्यात्मक बहस क्यों नहीं होती?

आज समस्या और गंभीर है। यदि किसी पूरे समुदाय की पहचान को उसके अतीत की केवल नकारात्मक घटनाओं से परिभाषित किया जाएगा और उसके त्याग, सैन्य परंपरा तथा राष्ट्र-निर्माण के योगदान को लगातार नजरअंदाज किया जाएगा, तो यह सामाजिक न्याय नहीं, चयनात्मक राजनीतिक विमर्श बन जाएगा।

लेकिन क्षत्रिय समाज को भी एक बात स्पष्ट समझनी होगी—सिर्फ अतीत के गौरव का स्मरण वर्तमान की राजनीतिक शक्ति नहीं बनाता। इतिहास सम्मान देता है, मगर वर्तमान संगठन, शिक्षा, आर्थिक मजबूती और लोकतांत्रिक भागीदारी से बनता है।

राजनीतिक हाशिये पर जाने का जवाब किसी दूसरे समाज के विरुद्ध खड़ा होना नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के लिए संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से संगठित होना है।

किसी भी समाज के इतिहास को मिटाना और उसे राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक समझना दोनों ही खतरनाक भूल हैं। भारत की शक्ति उसकी विविध सामाजिक स्मृतियों को मिटाने में नहीं, उन्हें सम्मानपूर्वक स्वीकार करने में है।

क्षत्रियों को केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि “हमारे साथ क्या हुआ?”
उन्हें यह भी तय करना होगा—“अब हम क्या करेंगे?”

क्योंकि इतिहास विरासत हो सकता है, लेकिन भविष्य कभी विरासत में नहीं मिलता—उसे वर्तमान की चेतना और कर्म से गढ़ना पड़ता है।
(एक विचारात्मक लेख)

10/09/2026

श्मशान का सत्य और जीवन की विडंबना
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श्मशान केवल मृत शरीरों के अंतिम संस्कार का स्थान नहीं है, यह मनुष्य के अहंकार, मोह और भ्रम का अंतिम पड़ाव भी है। यहाँ आकर धन की चमक फीकी पड़ जाती है, पद का गर्व समाप्त हो जाता है और रिश्तों की सीमाएँ भी स्पष्ट दिखाई देने लगती हैं। अंत में बचता है तो केवल एक सत्य—मनुष्य खाली हाथ आया था और खाली हाथ ही चला जाएगा।

राजा हरिश्चंद्र का प्रसंग इसी अंतिम सत्य को जीवन की सबसे कठिन परीक्षा में सामने रखता है। पुत्र की मृत्यु के बाद भी उन्होंने सत्य और कर्तव्य का साथ नहीं छोड़ा। पत्नी के सामने कर माँगने का वह क्षण केवल एक राजा की परीक्षा नहीं था, बल्कि यह प्रमाण था कि - सत्य वही है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपना स्वरूप नहीं बदलता।

आज विडंबना यह है कि हम सत्य को मानते कम और अपने हित के अनुसार इस्तेमाल अधिक करते हैं। सुविधा हो तो सिद्धांत, लाभ हो तो नैतिकता और संकट आए तो समझौता—यही आधुनिक जीवन का विरोधाभास बनता जा रहा है।

श्मशान हर व्यक्ति को एक दिन यह समझा देता है कि जिस दौलत के लिए जीवन भर दौड़े, वह यहीं छूट गई; जिस प्रतिष्ठा के लिए रिश्ते तक खो दिए, उसका कोई अर्थ नहीं रहा।

इसलिए श्मशान मृत्यु का अंत नहीं, "जीवन का सबसे कठोर आईना है" । सवाल यह नहीं कि अंत में हमारे साथ क्या जाएगा; सवाल यह है कि अंत आने से पहले हमने ऐसा क्या जिया, जिसे पीछे छोड़ते हुए भी हमारा जीवन सार्थक कहलाए।
(एक विचारात्मक लेख)

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