18/05/2026
आज में मिलिए रमेश कुमार गुप्ता (नाम बदला हुआ) से। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के 46 वर्षीय रमेश कुमार गुप्ता कभी एक स्थिर और सम्मानजनक जीवन जीते थे। उन्होंने लगभग 25 वर्षों तक इंजन फैक्ट्री और होटलों में काम किया और खाना बनाने व हॉस्पिटैलिटी का अच्छा अनुभव हासिल किया।
माता-पिता के निधन और परिवार के बंटवारे के बाद उन्होंने अपनी जमीन बेचकर एक छोटा होटल शुरू किया। लेकिन वैवाहिक विवाद और तलाक ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। इसके बाद रोज़गार की तलाश उन्हें शहर ले आई।
उन्होंने कई बार जीवन को दोबारा खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन एक गंभीर सड़क दुर्घटना में पैर टूट गया और लंबे इलाज में उनकी सारी जमा पूंजी खत्म हो गई। फिर कोविड-19 महामारी ने उनका छोटा व्यवसाय भी बंद करवा दिया।
धीरे-धीरे स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ती गईं—डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट की बीमारी और पैर का लगातार दर्द। परिवार का सहारा न होने के कारण मजबूरी में उन्हें मंदिरों के बाहर बैठकर भीख मांगनी पड़ी।
इसी कठिन दौर में उनका संपर्क बदलाव से हुआ और वे पुनर्वास केंद्र पहुँचे। काउंसलिंग के दौरान उन्होंने अपने दर्द, डर और असफलताओं को साझा किया। धीरे-धीरे उनके भीतर फिर से उम्मीद जागने लगी।
उन्होंने साझेदारी में फूड कार्ट शुरू करने की कोशिश की, लेकिन एक और दुर्घटना में उनका पैर फिर टूट गया। यह उनके लिए बहुत बड़ा झटका था। लेकिन इस बार उन्होंने हार नहीं मानी।काउंसलिंग और सहयोग ने उन्हें यह समझाया कि रुकावटें असफलता नहीं होतीं। स्वास्थ्य में सुधार के बाद उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार एक शाकाहारी फूड कार्ट शुरू किया।
आज रमेश कुमार गुप्ता नियमित रूप से अपना वेज फूड कार्ट चला रहे हैं, आत्मनिर्भर हैं और सम्मान के साथ जीवन जी रहे हैं।
उनकी कहानी हमें यह सिखाती है— “पैर भले ही टूट जाए, लेकिन अगर हिम्मत कायम रहे, तो ज़िंदगी फिर से खड़ी की जा सकती है।”
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