16/03/2025
कन्हैया कुमार: संघर्ष के नाम पर अवसरवादिता का खेल
छात्र आंदोलन की आड़ में निजी राजनीति
बिहार के छात्रों ने BPSC 70वीं पीटी परीक्षा में हुई धांधली के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन खड़ा किया। 31 जनवरी 2025 को पटना कॉलेज में आयोजित छात्र संसद में छात्र युवा संघर्ष मोर्चा ने इस अन्याय के खिलाफ 5 मार्च को विधानसभा मार्च निकालने का निर्णय लिया। लेकिन जल्द ही इस आंदोलन को राजनीतिक स्वार्थों की भेंट चढ़ा दिया गया।
आंदोलन की तारीख बदली, पर असली वजह छुपाई गई
27 फरवरी को अचानक एक ज़ूम मीटिंग बुलाई गई, जिसमें विधानसभा मार्च की तारीख 5 मार्च से बदलकर 10 मार्च कर दी गई। इस बदलाव के पीछे छात्र हित नहीं, बल्कि कन्हैया कुमार का पटना आगमन था। NSUI पहले से ही कन्हैया कुमार के आगमन की योजना बना चुकी थी, लेकिन यह बात आंदोलनकारी छात्रों से छुपाई गई। 10 मार्च की तारीख इसलिए तय की गई ताकि कन्हैया कुमार के लिए माहौल तैयार किया जा सके।
आंदोलन को हाईजैक करने की कोशिश
10 मार्च को कांग्रेस से जुड़े छात्र संगठनों ने ऐसा माहौल बनाया कि छात्र आंदोलन का नेतृत्व कन्हैया कुमार कर रहे हैं।
1. छात्र संसद के सामूहिक निर्णय को दरकिनार कर दिया गया।
2. संघर्ष कर रहे संगठनों का योगदान भुला दिया गया।
3. कन्हैया कुमार की ब्रांडिंग के लिए आंदोलन का इस्तेमाल किया गया।
विधानसभा मार्च और कन्हैया कुमार की गैरमौजूदगी
10 मार्च को कारगिल चौक, गांधी मैदान से विधानसभा मार्च निकलना था। छात्रों को आश्वासन दिया गया कि कन्हैया कुमार खुद मार्च में शामिल होंगे। लेकिन छात्र घंटों इंतजार करते रहे और अंततः दोपहर 2 बजे बिना कन्हैया के मार्च निकला।
मार्च जब रामगुलाम चौक पहुंचा, तो NSUI और युवा कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ता जेपी गोलंबर पर लगे बैरिकेड तोड़ने लगे। इसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज किया और AISF से जुड़े पांच छात्र गिरफ्तार कर लिए गए।
गिरफ्तार हुए छात्रों में AISF की एक छात्रा भी शामिल थी, जिनकी रिहाई शाम 8 बजे हुई।
गिरफ्तार छात्रों के लिए कोई संवेदना नहीं!
जिस आंदोलन को कन्हैया कुमार के नेतृत्व में बताया जा रहा था, उसकी गिरफ्तारी झेलने वाले छात्रों की कोई सुध तक नहीं ली गई।
1. कन्हैया कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की, लेकिन एक शब्द भी गिरफ्तार छात्रों के पक्ष में नहीं बोला।
2. NSUI के नेताओं ने थाने तक जाना जरूरी नहीं समझा
3. जो संगठन उनके लिए पहले लड़ते थे, वे आज ठगे हुए महसूस कर रहे हैं।
छात्र आंदोलन के नाम पर सियासी ड्रामा
अगर यह वास्तविक आंदोलन होता, तो सभी संगठनों की बराबर भागीदारी होती। लेकिन यहाँ आंदोलन को कन्हैया कुमार की छवि चमकाने का साधन बना दिया गया।
1. गिरफ्तारी हुई तो सिर्फ AISF के छात्र कार्यकर्ताओं की, NSUI के एक भी कार्यकर्ता को कुछ नहीं हुआ।
2. गिरफ्तार छात्रों के लिए कांग्रेस-NSUI ने कोई विरोध तक नहीं किया।
3. अगर आंदोलन सत्ता के खिलाफ था, तो कन्हैया कुमार ने सत्ता पर सवाल क्यों नहीं उठाए?
क्या यही पलायन रोकने का प्रयास है?
आज कन्हैया कुमार ‘पलायन रुको, रोजगार दो’ यात्रा निकाल रहे हैं, लेकिन जब छात्रों का हक छिना जा रहा था, तब वे कहां थे?
1. क्या कन्हैया कुमार का संघर्ष सिर्फ व्यक्तिगत राजनीति तक सीमित है?
2. जो अपने साथ खड़े लोगों की अनदेखी कर दे, वह बिहार के छात्रों का हित कैसे करेगा?
3. छात्रों को ऐसे अवसरवादी नेताओं से सतर्क रहना होगा
बिहार में छात्र आंदोलन न्याय के लिए होता है, न कि किसी की राजनीति चमकाने के लिए। जो नेता संघर्ष के नाम पर निजी फायदे की राजनीति कर रहे हैं, उन्हें पहचानना जरूरी है। छात्रों को ऐसे स्वार्थी नेताओं से बचना होगा, जो आंदोलन की पीठ पर चढ़कर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ना चाहते हैं।
बिहार के छात्र संघर्षशील हैं, वे किसी अवसरवादी खेल का हिस्सा नहीं बनेंगे!
#पलायन_रोको_नौकरी_दो_यात्रा