25/08/2026
इस समय मेरे सहित अधिकांश हिंदुओं ने, न तो ‘मनुस्मृति’ को देखा है और न ही उसे पढ़ा है तो उसके अनुसार चलने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता। देश के 99 प्रतिशत हिंदुओं के घरों में भी आपको भगवद्गीता, रामायण समेत अनेक ग्रंथ मिलेंगे लेकिन मनुस्मृति नहीं मिलेगी।
देश की व्यवस्था #संविधान के अनुसार चल रही है। सामाजिक जीवन में बहुत सारी समस्याएं हैं जिनमें महिलाओं की समस्याएं भी हैं। आजादी के बाद से देश अलग-अलग प्रकार से इन समस्याओं से जूझा है। बहुत सारी समस्याओं के हल निकले हैं, समय के साथ ओर का भी हल निकलेगा। #महिलाओं के प्रति भी समाज की सोच बदल रही है और महिलाओं की स्थिति में सुधार भी हो रहा है।
ऐसे में कौन है जो बार-बार #मनुस्मृति’ का उल्लेख करता है, उसे फाड़ता है या जलाता है या उसे पढ़ने के लिए कहता है? अभी तक यह काम #कम्युनिस्ट करते रहे हैं और अब #राहुल_गांधी कर रहा हैं जब देश इतना आगे निकल चुका हो और तुम एक ही पुराना राग अलापते रहें तो आम #हिंदू के मन में यही बात आती है कि आप केवल उसे चिढ़ाने के लिए ही यह बात कर रहे हैं। आज का हिंदू स्वयं को #प्रगतिशील मानता है और उसके लिए प्रयास करता भी दिखता है। ऐसे में कोई नेता यदि यह संदेश देता दिखता है कि यह समाज तो मनुस्मृति के अनुसार चलता है तो इसका उस समाज पर क्या असर होगा, इसे समझाने की आवश्यकता नहीं है।
आप कहते हैं कि मनुस्मृति में महिलाओं के लिए फलां-फलां अपमानजनक बात लिखी है जो महिलाओं की दुर्गति के लिए जिम्मेदार है लेकिन फिर आपको अपने कार्यक्रम में उपस्थित #मुस्लिम छात्राओं को भी तो यह बताना होगा कि उनके यहां तो मनुस्मृति नहीं है फिर मुस्लिम महिलाओं की दुर्गति के लिए कौन जिम्मेदार है। फिर लोग यह भी याद दिलाएंगे कि #शाहबानो या #तीन_तलाक के मामलों में महिलाओं के अधिकारों को रोकने का काम किस दल या नेता ने किया था। यह कोई हिंदू सम्मेलन तो था नहीं। हर समाज की छात्राएं इसमें थीं तो बात भी सभी के अधिकार की होगी न। सलेक्टिव बात थोड़े ही होनी चाहिए।