26/08/2026
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष में युवा संवाद !
संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्री सुनील आम्बेकर जी ने युवाओं से सीधा संवाद!!
अपने सम्बोधन में श्री सुनील आम्बेकर जी ने कहा कि, जब ब्रिटिश शिक्षा नीति भारत में आयी तो उसने आदेश निकालकर हमारी पारम्परिक शिक्षा और सोच को बाधित कर दिया। इसके बावजूद, पास होने के बाद युवाओं के मन में देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा पैदा हुआ। युवा अनुशीलन समिति से जुड़े और नागपुर में नेशनल कांग्रेस में सक्रिय हुए। उनके मन में यह स्पष्ट विचार आया कि, भारत दुनिया के अन्य देशों से अलग है, जो प्रायः भाषा के आधार पर बने हैं।
उन्होंने कहा कि, देश की स्वाधीनता के लिए आन्दोलन निरन्तर चलता रहे, इसी उद्देश्य से संघ का निर्माण किया गया। संघ का मूल विचार यह रहा है कि समाज की सक्रियता और समझ सबसे ज्यादा आवश्यक है। हमें ऐसे युवाओं की जरूरत है जो स्वयं आगे बढ़कर जिम्मेदारी सम्भाल सकें। किसी भी राष्ट्र या विचार के निर्माण के लिए अत्यधिक साधना और समर्पण की आवश्यकता होती है।
आम्बेकर जी ने कहा कि, एक अच्छे व्यक्ति की पहचान यही है कि वह केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि समाज के कल्याण के लिए कार्य करे। संघ के पास जितनी भी शक्ति और साधन थे, उन्होंने उसे पूरी तरह समाज के कल्याण में लगा दिया। यद्यपि राजनीतिक कारणों से प्रतिबंध जैसी बाधाएं भी आईं, लेकिन राष्ट्र-सेवा का मार्ग नहीं रुका। विद्यार्थी आन्दोलनों के दौरान युवाओं ने स्पष्ट सन्देश दिया कि इस तरह की राजनीति नहीं चलेगी। आपातकाल और संकट के समय भारत में उन्नीस महीनों के भीतर लोकतंत्र की पुनर्स्थापना हुई, जिसमें संघ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। "हम कौन हैं? हम वे हैं-- जो पूरी दुनिया की संस्कृति और कल्याण के बारे में सोचते हैं। हमें अपने भारत और पूर्वजों पर गर्व है कि उन्होंने कभी कोई ऐसा कार्य नहीं किया कि हमें दूसरे देशों में जाकर माफी माँगनी पड़े।"
प्रचार प्रमुख जी ने कहा कि, धर्म का अर्थ किसी संकीर्ण दायरे से परे 'यूनिवर्सल रूल' (सार्वभौमिक नियम) को स्वीकारना और 'स्वयं से सेवा' करना है। संघ में प्रतिदिन मनोव्यायाम और आत्म-प्रबन्धन का अभ्यास कराया जाता है। यदि व्यक्ति का स्वयं पर नियंत्रण और प्रबंधन अच्छा है, तो वह जीवन में कुछ भी हासिल कर सकता है। देश के सुचारू शासन और भविष्य के निर्माण के लिए हमें समर्पित अध्यापक, डॉक्टर और हर क्षेत्र के कुशल नागरिक चाहिए। यदि आप विद्यार्थी हैं, तो आपकी साधना शिक्षा से ही शुरू होती है। आप जो भी काम कर रहे हैं, उसे पूरी निष्ठा और गुणवत्ता के साथ करना होगा।
आम्बेकर जी ने आह्वान किया कि, युवाओं को बाहर निकलकर गाँवों और जमीनी स्तर पर कार्य करना चाहिए ताकि व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हो सके। इससे राष्ट्रीय शासन और नेतृत्व के प्रति एक गहरी समझ विकसित होती है। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र के शिविरों में विभिन्न कमरों के नाम अलूरी सीताराम राजू और राम जी के नाम पर रखे गए, जहाँ अलग-अलग भाषाओं के लोग एक साथ मिलकर गीत गाते थे। जह हमारी एक संकीर्ण दृष्टि होती है जो व्यक्ति को सीमित रखती है, जबकि व्यापक दृष्टि हमें अपने दायरे से बाहर निकलकर पूरे देश को देखने की प्रेरणा देती है। संघ के माध्यम से यही व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि मिलती है।
उन्होंने कहा कि, आज का युवा डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बहुत सक्रिय है, लेकिन उसकी सक्रियता केवल स्क्रीन तक सीमित नहीं है। युवाओं को अच्छे विषयों में रुचि लेनी चाहिए और समाज में सकारात्मक कार्य कर रहे लोगों से जुड़ना चाहिए। संघ के 2 दिन, 3 दिन या 2 घंटे के कार्यक्रमों में शामिल होकर अपनी सीमाओं के पिंजरे से बाहर निकलना आवश्यक है।
सुनील जी ने युवाओं से आहावान करते हुए कहा कि, हमें रोज अपने दिन में कुछ अच्छी चीजें देखने और सकारात्मक सोचने का संकल्प लेना चाहिए। स्वभाव बदलना कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं। 'ब्रेन ड्रेन' की समस्या पर ध्यान देते हुए, यदि हमें दुनिया को भारतीय दृष्टि देनी है, तो अपनी जड़ों से जुड़े रहना होगा। आज का युवा भारत पर विश्वास करता है और उसके लिए 'भारत माता की जय' कहना गर्व की बात (cool) है। युवा वर्ग सकारात्मक है, कंस्ट्रक्टिव (रचनात्मक) तरीके से काम करना चाहता है और भारत के संविधान में आस्था रखता है।
अपने उद्बोधन के अन्त में अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख जी ने कहा कि, जहाँ एक तरफ पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव बढ़ रहा है, वहीं चुनौती यह है कि हम अपनी संस्कृत भाषा, राष्ट्रभाषा और सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ कैसे जोड़ें। हम 18 वर्ष से ऊपर के युवाओं की नई ऊर्जा के साथ एक नया भारत और अर्थव्यवस्था का एक नया मॉडल बनाएंगे। आरक्षण और सामाजिक समरसता पर विचार बिल्कुल साफ और स्पष्ट हैं कि हर वर्ग का कल्याण और विकास ही राष्ट्र का मुख्य ध्येय होना चाहिए।
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