22/10/2021
आप गए नही हो #अयोध्या इसलिए आपको पता नही, टीवी पर देखा है इसलिए वो एहसास नही है, अयोध्या जी में केवल राम मंदिर को ही न जानिए बहुत सी चीजे है वहा देखने को
#सरयू जी को साधारण नदी मत समझिए जो अयोध्या जी के उत्तर दिशा में बहती है, जो इतनी बड़ी है की क्या बताए हम आपको, देखेंगे तो पूरी आंख में न समा पाएंगी, कितना भी आप थके हो इनके किनारे पहुंचते ही ठंडक का एहसास होता है और जैसे ही इनकी जल में जा के एक डुबकी लगाई तो सारा दर्द दूर हो जाता है नई फुर्ती और ताजगी का एहसास करा देती है इनका जल, हो भी क्यों ना साधारण नदी तो ये है नही, इस पृथ्वी पर मानव निर्मित प्रथम राज्य की राजधानी अयोध्या है जिसको सूर्यवंशी राजाओं ने बसाया, उसी अयोध्या नगर के उत्तरी किनारे पर स्थित है सरयू नदी, यानी अति प्राचीन से भी प्राचीन समय से बहती आ रही है ये नदी।
दूर दूर तक कई किलोमीटर में खत्म न होने वाले पक्के घाट इसकी आभा को और सुंदर कर देते है। अयोध्या की दीपावली के बाद कार्तिक माह में होने वाले पांच कोस या चौदह कोस की परिक्रम का अंत इसी सरयू के किनारे चलते चलते इन्हे निहारते, देखते रामघाट पे इनमे स्नान कर के ही खत्म होता है, लाखो की संख्या में पूरे उत्तर प्रदेश के और पासवर्ती राज्य के लोग हर साल उपस्थित होते है। इन लाखो की भीड़ को सरयू के किनारे कब स्नान कर लेती है इसका पता भी नही चलता इतना विस्तृत है इनका किनारा।
इसी सरयू नदी के ही तट पर सम्राट विक्रमादित्य द्वारा निर्माण कराया "बाबा नागेश्वर नाथ" जी का पौराणिक मंदिर भी है जो ज्योतिर्लिग से कम महत्व नहीं रखता। जहा जाकर असीम शांति मिलती है। जिसे भगवान राम के बड़े पुत्र ने बनवाया था। कहा जाता है की कुश ही की पत्नी नाग कन्या थी और वो शिव जी की अनन्य भक्त थी, तो उन्ही के लिए नागेश्वर नाथ मंदिर का निर्माण कराया गया था। जो की त्रेता कालीन शिवलिंग विराजमान है, और वर्तमान मंदिर विक्रमादित्य जी का बनवाया हुआ है।
यही सरयू जी के तट पर गुप्तार घाट है जहा भगवान राम अपने अनुचर और सहचारो के साथ सरयू के जल में ही परधाम गए, और यहा पर जो कोई जीव उस समय डुबकी मारा वह मुक्ति को प्राप्त हुआ, ऐसी महिमा है इन सरयू जी की।
सरयू के ही जल से बनी राम की पौड़ी अत्यंत मनोहर लगती है, जिसके किनारे बाबा नागेश्वर नाथ का मंदिर है।
इसी सरयू के दक्षिणी तट से पूरब की तरफ यात्रा करते हुए श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ ले ऋषि विश्वामित्र के साथ हो सरयू गंगा के संगम तक पैदल जाते है, और संगम को पार कर तड़का आदि राक्षसों का वध और मुनि के यज्ञ की रक्षा करते है।
इसी सरयू के उत्तरी तट से राम की बरात महाराज दशरथ के द्वारा ले जाई गई, जिस रास्ते बारात गई वह सरयू के किनारे किनारे आज भी विद्यमान है और श्रीराम जानकी मार्ग के नाम से जाना जाता है जो अयोध्या से मिथिला नेपाल तक सीधी जाती है।
यही हाल चैत्र रामनवमी के समय भी रहता है जब लाखो की संख्या में नर-नारी, बच्चे - बूढ़े, जवान सभी लाखो की संख्या में आते है और इस महा नदी में स्नान कर अपने को कृतार्थ करते है। लाखो की संख्या की भीड़ जिसने सरसो का अगर ऊपर से गिरा दिया जाए तो जमीन पर ना गिरे ऐसी भीड़ को भी सरयू और अयोध्या अपने में हर साल ऐसे समेट लेती है जैसे मां अपने बच्चे को।
आप आइए एक बार अयोध्या में कभी भी, या फिर चैत राम नवमी में या कार्तिक माह में दिवाली के बाद परिक्रमा में, आपको महसूस होगा की जैसे राम जी लंका पे चढ़ाई के लिए समुद्र पर जब सेतु बाध कर वानरों, रीछो की सेना जैसे उस पुल रूपी सड़क से गई होगी जिसमे केवल वानर, भालुओ के सर ही दिखाई दिए होंगे वही स्थिति पंच कोसी या चौदह कोसी परिक्रमा में आपको महसूस होगी जब अब भीड़ के बीच होंगे और सरयू नदी से लेकर चौदह कोस(14*3=42 किलोमीटर) के दायरे में आपको एक इंच भी जगह दो लेन की सड़क पर खाली नहीं मिलेगी, तिल गिरने भर की जगह नही रहेगी, हर तरफ जय श्रीराम का जयघोष, जहा तक आपकी आंखे देख सके (दिन हो तो कोई बात नही रात को भी प्रशासन द्वारा सुव्यवस्थित कर दिन जैसा ही उजाला किया जाता है, सुरक्षा पूरी चाक चौबंद रहती है) वहा केवल राम के दीवाने स्त्री पुरुष बच्चे जवान बूढ़े आदि सभी के सिर हर तरफ दिखाई देते है। तब चाहते या न चाहते हुए भी आपका ध्यान उस ओर जरूर जाएगा की अगर इतना उत्साह और प्रेम आज है तो भगवान के समय उनके साथ वानरी सेना में कितना रहा होगा, ऐसे ही समुद्र सेतु को वानरी सेना ने पार किया होगा जिस तरह से आज इस परिक्रमा में लोग चल रहे है।
लगभग बारह घंटे लगातार सरयू जी शुरू हुई परिक्रमा चलती ही जाति है आप अंदाजा लगा सकते है कितने लोग आते होंगे। कहा जाता है कि एक बार जो प्रयाग में माघ मास में अमावस्या स्नान हेतु आता है, गंगा जी के रेती में रह लेता है उसको उस रेती से मोह हो जाता है, वह दो दिन के उस गंगा जी के किनारे उनकी रेती के निवास में इतना आनंद प्राप्त करता है की हर साल फिर खींचा चला आता है, वह लाख कोशिश कर के जरूर आने की इच्छा रखता है, वैसे ही जो एक बार अयोध्याजी में रामनवमी, या कार्तिक परिक्रमा करने आ जाता है उसको उस परिक्रमा से मोह हो जाता है, भले ही बारह घंटे में पचास किलोमीटर चलने के कारण अपार दर्द उसे होता है पर अगली बार आने की इच्छा उसे जरूर होती है।
जिस तरह तुलसीदास जी ने मानस में कहा है की भगवान के जन्म के समय से एक महीने तक सूर्य डूबे ही नही रात आई ही नहीं या चंद्रमा का दर्शन ही नही हो सका इतना उजाला किया गया था, वैसे ही अयोध्या के परिक्रमा या किसी भी मेले में यही व्यवस्था प्रशासन द्वारा की जाति है चाहे किसी की भी सरकार हो।
गंगा जी तो इनके कई हजारों वर्षों बाद इस धरा पर आई है, सूर्यवंशी न जाने कितने ही राजाओं के राज भोग के बाद महाराज सागर के साथ हजार पुत्रों को मुक्त करने हेतु महाराज भागीरथ के अथक प्रयास और तपस्या के कारण गंगाजी धरती पर आई पर उनसे कई हजारों वर्ष पूर्व से ही बह रही है।
सरयू जी को भी आप कोई साधारण नदी न समझे जिन नारायण के वामन अवतार होने के समय जब बावन रूपी भगवान विष्णु विराट रूप धरकर सम्पूर्ण ब्राम्हण को अपने पग से नाप रहे थे तो उनके चरण के नख को अपने कमंडल के जल से ब्रम्हजी ने धोया और उस जल को अपने कमंडल में रख लिया, वो ही माता गंगा हुई, तो जिस नारायण के नख के स्पर्श से ही ऐसी पतित पावनी माता जगदंबा गंगा जी हुई तो जिन विष्णु भगवान रूपी श्रीरामचंद्र नित सरयू जी में विहार किए उसमे नहाए वो कितनी पवित्र और महान होंगी।
शिवजी के निवास स्थान कैलाश पर्वत के निकट के सरोवर है जिसे ब्रम्हा जी ने अपने मानसिक संकल्प से प्रगट किया है जिसका नाम है मानसरोवर उसी में से एक नदी निकली है, ब्रम्हासर से निकलने के कारण उसका नाम सरयू हुआ। अब बताओ सरयू जी कितनी महान है।
आगे कुछ और अयोध्या जी के बारे में लिखेंगे, आप सब के प्रोत्साहन के बाद.........
जय श्री राम
Princee Rawat Shubham Rathi Gagan Kamboj MYogiAdityanath Narendra Modi श्री राम जन्मभूमि तीर्थ अयोध्या रामायण