12/01/2026
एक वैचारिक क्रांति का आगाज़
शीर्षक: "दिखावे का काँच या इंसानियत का हीरा—चुनाव आपका है!"
साथियों,
आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ इंसान का 'दिखावा' उसके 'वजूद' से बड़ा हो गया है। हम मोबाइल की काँच वाली स्क्रीन (Heart of Glass) में तो दिन भर डूबे रहते हैं, पर अपने पड़ोस की तकलीफ और अपने भीतर की इंसानियत से बेखबर हो चुके हैं। हम एक ऐसी गुमराहियत और दोहरी मानसिकता के शिकार हैं जहाँ हम बाहर से तो संस्कारी और धार्मिक दिखना चाहते हैं, पर हमारे आचरण में न शरियात की पाकीज़गी है और न ही हमारी महान संस्कृति की मर्यादा।
इसीलिए, मैं मोहम्मद आसिम, आने वाली 26 जनवरी से एक ऐतिहासिक 40 दिवसीय संकल्पीय सफर की शुरुआत कर रहा हूँ।
यह सफर क्यों?
26 जनवरी 1950 को हमारे देश में कानून (संविधान) लागू हुआ था ताकि समाज में व्यवस्था बनी रहे। लेकिन मेरा मानना है कि जब तक इंसान के दिल में "इंसानी मर्यादा का कानून" लागू नहीं होगा, तब तक कोई भी विकास अधूरा है।
इन 40 दिनों में हमारा संकल्प क्या है?
दोगली मानसिकता का अंत: जो हम भीतर हैं, वही बाहर दिखें। दिखावे और पाखंड का पूरी तरह त्याग।
शरियात और संस्कृति को जीना: मजहब और परंपरा केवल किताबों में न रहे, बल्कि हमारे अखलाक (चरित्र) और व्यवहार में नजर आए।
गुमराहियत से वापसी: नियत, फिजूलखर्ची और वक्त की बर्बादी जैसे काँच के टुकड़ों को छोड़कर इंसानियत के असली हीरे को तराशना।
यह 40 दिन का समय खुद को बदलने का समय है। मैं सिहाली खद्दर (मुरादाबाद) की सरजमीं से यह आह्वान करता हूँ कि आइए, हम अपनी जड़ों की ओर लौटें। हम "अनारी" नहीं, बल्कि एक "जिम्मेदार और संस्कारी" इंसान बनकर उभरें।
मेरा यह प्रयास किसी संस्था या पद के लिए नहीं, बल्कि समाज के उस खोए हुए गौरव को वापस पाने के लिए है।
"काँच टूटेगा तो चुभेगा, पर इंसानियत जागेगी तो पूरा समाज रोशन होगा।"
दुआओं और साथ की दरख्वास्त के साथ,
आपका भाई,
मोहम्मद आसिम
(ग्राम: सिहाली खद्दर, मुरादाबाद)