03/02/2024
तुरङ:-भगवान परमेश्वरस अमरकाया अठारह मुखी देवता औरमिग शु जी के अठारह वाद्ययन्त्रों मे सबसे महत्वपूर्ण यंत्र है तुरङ..
शश नामक लकडी पर श्वेत नर लंगूर के खाल व सोना चंदी मडे हुए पतला व लम्बा छोटा ढोल तुरङ कहलाता है....
तुरङ की थाप के बाद ही अन्य वाद्य यन्त्र बजते हैं...
तुरङ की थाप की धव्नि से सौराऐ चिनङ की शुरूवात होती है..
देवता के रथ को तैयार करते समय तुरङ बजाया जाता है...
तुरङ हर कभी नही बजाया जाता है...
तुरङ सभी परबों मे नही बजाया जाता है...
देवते का बेला बजने से पहले तुरङ द्वारा चार राघ बजाया जाता है...
मुरंग गांव के शिलिङ जिन्तास द्वारा देवता को सबसे पहले तुरङ दान देने का शनाकत है व दान देने के बाद जिन्तास को शिलिङ माथस की उपाधी तथा खनदान की संग्या दी गई ...
तुरङ बजाने वाला व्यक्ति तुरङसा कहलाता है...
तुरङ हर कोई नही बजा सकते,इसे बजाने वाले व्यक्ति को देव गूर व पुजारी के समान पोशाक के साथ साथ सूतक पातक बरतकर शुद्ध रहना पडता है ....
तुरङसा दशहरा परब मे जंगल से शुर का सोलफी लाता है जिस से 18 लिंग गिनती होती है व शुर देवता व सम्पूर्ण गांव अपने मस्तक पर धारण करते हैं....
सबसे बडे परब औरमिग मे तुरङ 18 स्थानों पर गालशीम के समय बजता है...
तुरङसा से मरङ गूफा मे सतलज मे डूबकी लगाने के बाद माङमो पूछा जाता है.....
तुरङ कार साल मे दो बार औरमिग व ऊख्यङ परबों मे होता हैंं...
औरमिग परब मे देवता कुलदेओ सुंग के शु पीतङ त्वङ से लेकर शु खूबशीम तक देवतों के साथ तुरङ चलता है व शु पीतङ त्वङ तथा ऊख्याङ ऊचाम के दिन नारैणस देवता का माली प्रसन्न हो आवेश मे आकर नृत्य करते हुए देव शक्ति से तुरङ के उपर जारी ले नृत्य करता है जिसे तुरङ कार कहा जाता है ...
ऊख्याङ के प्रत्येक संध्या व ब्रह्ममुह्रत मे तुरङ की थाप पर तुरङ कायाङ होता है जिसमे केवल पुरूष ही शामिल होते है व पुजारी जाङु तालङ सहित दूरे लगाता है...
तुरङ बाण:-
औरमिग देवता के पांच बाणो मे सबसे ज्येष्ठ व विशेष तुरङ बाण जो अष्ठधातु से निर्मित है..
जहां जहां तुरङ बजता है वहां तुरङ बाण साथ बजता है..
इसे भी केवल विशेष खानदानी ही बजाते हैं...
तुरङ व तुरङ बाण बजाते समय वादक दोनो को पैरों का भी विशेष ताल बैठाना होता है...
तुरङ बाण कनिष्ठ कुलदेओ के डाङोर के समान पवित्र माना जाता है व परब मे दो बार कुलदेओ सुङ के साथ विराजित भी होता है...
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