18/08/2025
मार्च 2023....
सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र के इतिहास में एक अहम नोट लिखा। आदेश था;
“चुनाव आयोग के अधिकारियों की नियुक्तियाँ सिर्फ़ सरकार की मर्जी पर नहीं होंगी। मुख्य न्यायाधीश (CJI) को भी चयन समिति में शामिल किया जाए।”
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यह आदेश किसी फॉर्मेलिटी का हिस्सा नहीं था। यह लोकतंत्र की नींव को मज़बूत रखने का कदम था, ताकि चुनाव आयोग के निर्णय निष्पक्ष और पारदर्शी बने रहें।
लेकिन लोकतंत्र का खेल हमेशा सीधा नहीं चलता।
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दिसंबर 2023 ...
संसद ने एक कानून पास कर दिया “Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023”।
इस नए कानून ने CJI को चयन समिति से पूरी तरह बाहर कर दिया। जिससे मार्च का आदेश मिट्टी में मिल गया। लोकतंत्र की चाशनी में अचानक कड़वाहट घुल गई।
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फिर नागरिक समाज और विपक्षी दल खड़े हो गए। ADR, लोक प्रहरी, PUCL और महुआ मोइत्रा ने तत्काल सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ दायर कीं। आरोप साफ़ था, नए कानून ने लोकतंत्र की स्वतंत्रता और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को कमजोर किया।
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यहां पर एंट्री होती है न्यायमूर्ति सूर्यकांत की। वही सूर्यकांत जिन्हें राहुल गांधी के प्रेस कांफ्रेंस की कोई जानकारी ही नहीं मिली। जिन्होंने हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सैनी का नमक खाया है।
तो विपक्षी दलों द्वारा दायर किए गए याचिका की सुनवाई का समय आया, लेकिन सूर्यकांत ने इसे बार-बार टालते रखा। हर बार तर्क यही था:
“मामला महत्वपूर्ण है, इसे प्राथमिकता के आधार पर देखा जाएगा।” लेकिन कब देखा जाएगा अब तक नहीं बताया। लोकतंत्र और निष्पक्षता की चर्चा होती रही, लेकिन निर्णय स्थगित रहा।
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यानी, वही इंसान जो लोकतंत्र की नींव मजबूत करने का आदेश सुनने वाला था, अब स्थगन और विलंब की मशाल थामे खड़ा था।
लोकतंत्र सिर्फ़ कागज़ों में नहीं, इंसान के व्यक्तिगत समीकरण, सामाजिक संपर्क और राजनीतिक दबाव में भी झलकता है। यह लंबी, तिकड़म भरी दास्तान बताती है कि कानून और संविधान महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनका पालन करने वाले व्यक्तियों का चरित्र भी उतना ही अहम है।
लोकतंत्र का व्यंजन तब तक मीठा लगता है जब तक उसमें ईमानदारी और निष्पक्षता की पर्याप्त मात्रा हो।
और अगर उसमें ‘नमक’ की मात्रा ज्यादा बढ़ जाए, तो उसकी कड़वाहट सबको चुभती है।
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मार्च 2023 का आदेश, दिसंबर 2023 का कानून, और सूर्यकांत की स्थगित होती सुनवाई, ये सारे मामलात मिलकर लोकतंत्र और न्यायपालिका की दिलचस्प और मजेदार कहानी बुनते हैं जो एक फिल्म की तरह नजर आता है।
वैसे आप चाहें तो उस फिल्म के हीरो का नाम टिप्पणी में सजेस्ट कर सकते है। फिलहाल तस्वीर सूर्यकांत की लगी है।
(हर्षितेश्वर मणि तिवारी)
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