06/12/2025
जब बाबरी मस्जिद का नाम आता है तो उसके साथ इस आदमी का नाम भी आता है जिसने उस पर पहला वार किया था।
बलवीर सिंह हरियाणा/पंजाब के किसी गाँव का रहने वाला एक साधारण युवा था
उसका परिवार धार्मिक माहौल में रहता था।
उसके करीबी लोग राम मंदिर आंदोलन से प्रभावित थे।
उसी माहौल में वह भी कर सेवा (धार्मिक सेवा) करने लगा।
कहा जाता है कि उसके अंदर धार्मिक जोश बहुत था, लेकिन समझ कम थी
6 दिसंबर 1992 का दिन — अयोध्या यात्रा का दिन आया।
बलवीर कई युवकों के साथ कर सेवा करने अयोध्या पहुँचा।
वहां ज़ोर-ज़ोर से नारे लग रहे थे, भीड़ जोश में थी।
ढाँचे पर चढ़ने की होड़ थी।
बलवीर भी भीड़ के साथ बह गया।
बता जाता है के वह सबसे आगे चढ़ गया और उसने पहला वार किया।
उसी वार के साथ कच्ची मिट्टी-चूने की परत झड़ने लगी।
भीड़ उग्र हुई और कुछ ही घंटों में ढांचा गिर गया।
लोग जश्न मनाते रहे फिर अपने अपने घर बाबरी मस्जिद की ईंटें ले कर चलें गए,
कहा जाता है के अयोध्या से लौटने के बाद,
बलवीर रातों को सो नहीं पाता था।
उसे लगता था कि उसने कोई बहुत बड़ा पाप कर दिया है।
उसके सपनों में ढांचे के गिरने, लोगों की चीखें और धार्मिक नाराजगी आने लगी।
धीरे-धीरे वह अंदर से टूटने लगा।
उसके करीबी लोग कहते थे कि वह “बदल गया है”.
फिर उसने अपने घर वालों को एक दिन कहां...
“मैंने जो किया, वह धर्म के नाम पर हिंसा थी… भगवान भी मुझे माफ़ नहीं करेंगे।”
वह महीनों तक किसी से सही तरह बात नहीं करता था।
उसका व्यवहार एकदम शांत, उदास और अलग-थलग हो गय।
फिर एक दिन किसी यात्रा के दौरान
उसकी मुलाकात एक बुज़ुर्ग मुस्लिम व्यक्ति से हुई।
उस बुजुर्ग ने उससे नफरत नहीं, बल्कि प्यार और इंसानियत की बातें कीं।
बलवीर ने पहली बार महसूस किया कि वह “अन्याय और नफरत” की राह पर चला गया था।
यह मुलाकात उसके जीवन की टर्निंग पॉइंट बताई जाती है
इसी अपराध-बोध और मानवीय स्पर्श के बाद,
बलवीर ने अपने परिवार से अलग होकर
इस्लाम स्वीकार किया
और अपना नया नाम “मुहम्मद आमिर” रखा.
यहीं नही आमिर के साथ पानीपत के ही रहने वाले उनके कारसेवक दोस्त योगेंद्र पाल भी प्रायश्चित के लिए इस्लाम कबूल कर मोहम्मद उमर बन गए
इन दोनों ने तय किया कि जब तक ये 100 मस्जिदें नहीं बनवा लेंगे ये खुद को माफ नहीं कर पाएंगे।
वो दिन की राह पर निकल गया
अब तक उसने 80–90 मस्जिदें बनवाने औरमरम्मत कराने में योगदान दिया
वह खुद ईंटें ढोता था।
मुसलमानों को बिना बताए चुपचाप काम करता था।
किसी को यह नहीं बताता था कि वह कौन है।
यह उसका प्रायश्चित का तरीका था।
बलवीर (आमिर) ने शादी नहीं की।
जीवन का अधिकांश हिस्सा सफ़र और इस्लाम की सेवा में बिताया।
वह गुमनाम रहना चाहता था
उसने एक बयान में कहा के
“मैंने जो तोड़ा था, उसे जोड़ने की कोशिश की है
हमारे देश में मैं ऐसे लोग है जो इस्लाम से और मस्जिदों से नफरत करते है उनकी तोड़ने की बातें करते है, इस पोस्ट को शेयर करो ताकि वो लोग वक्त रहते संभाल जाए और जिन्होंने ऐसा किया है उनकी हिदायत मिले🙏