18/07/2025
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फौज का सपना टूटा, हौसला नहीं
मैदान में बना फिटनेस का सिंघम
शांत पहाड़ों की गोद में पला-बढ़ा एक साधारण लड़का…लेकिन सपना साधारण नहीं था। आंखों में भारतीय सेना की वर्दी पहनने का सपना था और दिल में था कुछ बड़ा कर दिखाने का जुनून। शुरुआती पढ़ाई पहाड़ी कस्बे के सरकारी स्कूल से शुरू हुई, लेकिन जैसे-जैसे कक्षाएं बदलीं, मंज़िल की ओर कदम भी तेज़ हो गए। जमा दो की पढ़ाई पूरी होते-होते वो समझ चुका था कि सपनों को पंख मेहनत से ही मिलते हैं।
तीन बार भारतीय सेना की शारीरिक परीक्षा को उत्तीर्ण किया, लेकिन नसीब ने साथ नहीं दिया। पर उसने हार नहीं मानी। जब सेना के रास्ते बंद हुए, तो खेल के मैदान ने उसे बुलाया और वहीं से शुरू हुई कबड्डी की असली यात्रा। वर्ष 2017 में कबड्डी की दुनिया में पहला कदम पड़ा। हरियाणा के एक गाँव में स्थित प्रतिष्ठित कबड्डी अकादमी में प्रशिक्षण शुरू हुआ, जहां देश के नामी कोच के मार्गदर्शन में उसने खुद को ढाला। दिन-रात की तपस्या, मैदान में बहाया गया पसीना और अनुशासन ने कबड्डी को उसका जीवन बना दिया।
2020 में पहली बार सीनियर नेशनल चैंपियनशिप में भाग लिया, यही वो क्षण था जिसने उसकी मेहनत को पहचान दी। 2017 से लेकर अब तक एक दिन भी ऐसा नहीं गया जब उसने मैदान से दूरी बनाई हो। वह न केवल खुद को तराशता रहा, बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करता रहा। युवाओं के लिए वह सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं, एक "फिटनेस गुरु" बन चुका है। उसका जीवन उन हजारों युवाओं को नशे से दूर रहने और स्वस्थ जीवन अपनाने की प्रेरणा देता है।
वर्ष 2024 ने उसकी उपलब्धियों को नया आयाम दिया। जब राज्य के एक प्रमुख खेल संस्थान ने उसे कोच के रूप में नियुक्त किया, यह नियुक्ति किसी साधारण व्यक्ति ने नहीं, बल्कि देश के एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी, पूर्व भारतीय कप्तान और पद्मश्री, अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित दिग्गज अजय ठाकुर ने दी थी। इसी वर्ष उसने देश की नंबर एक खेल विश्वविद्यालय से स्पोर्ट्स कोचिंग में स्नातकोत्तर डिप्लोमा भी पूरा कर लिया है। अब वह एक प्रशिक्षित कोच के रूप में बच्चों को न केवल कबड्डी की तकनीक सिखा रहा है, बल्कि खेल की मर्यादा, अनुशासन और स्वस्थ जीवन शैली का महत्व भी बता रहा है। मैदान में आने वाले हर युवा को वह यही सिखाता है कि "नशा नहीं, पसीना बहाओ; हार मत मानो, खुद को पहचानो।"
कबड्डी की प्रेरणा परिवार से मिली है। बड़ी बहन ललिता राज्य महिला टीम की कप्तान रह चुकी हैं, जिन्होंने भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर गौरव दिलाया। शिक्षा से जुड़े पिता और भाई के संस्कारों ने उसे मेहनती, अनुशासित और जुझारू बनाया।
यह कहानी, 02 जनवरी 1996 को गिरिपार में जन्मे विपिन चौहान की है। कबड्डी के एनआईएस कोच है। कबड्डी को अपना जीवन बना लिया। कोहिनूर स्पोर्ट्स कबड्डी अकादमी, दभोटा (जिला सोलन) में बतौर प्रोफेशनल कोच कार्यरत है। शिलाई स्कूल में 9वीं कक्षा तक शिक्षा प्राप्त की, फिर शमशेर स्कूल, नाहन से 10वीं और आदर्श विद्या निकेतन स्कूल, नाहन से 11वीं व 12वीं की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद डॉ. वाई.एस. परमार विश्वविद्यालय से बीएससी (ऑनर्स) की डिग्री प्राप्त की। कठिन परिश्रम और खेल के प्रति समर्पण ने उसे जिला सिरमौर का पहला प्रशिक्षित कबड्डी कोच बनाया। वह युवाओं को न केवल कबड्डी के गुर सिखा रहा है, बल्कि नशे से दूर रहकर फिटनेस और अनुशासन के रास्ते पर चलने की प्रेरणा भी दे रहा है।
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