02/09/2026
बड़ी बड़ी आयु की लड़कियाँ घर में कुंवारी बैठी हैं, यदि अभी भी माँ-बाप नहीं जागे तो स्थितियाँ और भी विस्फो'टक हो सकती हैं...!
समाज में आज 27-28-32 आयु तक की बहुत सी कुँवारी लडकियाँ घर बैठी हैं क्योंकि इनके सपने हैसियत से भी बहुत अधिक हैं ! अपने चारों ओर दृष्टि डालिए इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं।
सबसे बडा मानव सुख, सुखी वैवाहिक जीवन होता है। पैसा भी आवश्यक है, लेकिन कुछ सीमा तक ! पैसे की वजह से अच्छे रिश्ते ठुकराना गलत है। पहली प्राथमिकता सुखी संसार व अच्छा घर-परिवार होना चाहिये! अधिक धन संपदा के चक्कर में अच्छे रिश्तों को नजर-अंदाज करना गलत है। ध्यान रखें "धन कमाया जा सकता है, संपत्ति खरीदी जा सकती है लेकिन गुण नहीं।"
मेरा मानना है कि घर-परिवार और लडका अच्छा देखें, लेकिन अधिकतम के चक्कर में अच्छे रिश्ते हाथ से न जाने दें।
सुखी वैवाहिक जीवन जियें। 30 की आयु के बाद विवाह विवाह नहीं होता... समझौता होता है और इसके बाद स्वास्थ्य परिस्थितियों की दृष्टि से भी देखा जाए तो बहुत सी समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं।
समाज में आज उससे भी बुरी स्थिति कुंडली मिलान के कारण हो गई है। आप सोचिए जिनके साथ कुंडली मिलती है लेकिन घर और लड़का अच्छा नहीं और जहाँ लड़के में सभी गुण हैं वहां कुण्डली नहीं मिलती और हम सब कुछ अच्छा मिलने की आस में मात्र कुण्डली की वजह से रिश्ता छोड़ देते हैं।
आप सोच के देखें कि जिन लोगों के 36 में से 20 या फिर 36/36 गुण भी मिल गए फिर भी उनके जीवन में समस्याएं हो रही हैं, क्योंकि हमने लडके के गुण नहीं देखे...! कुण्डली मिलान की इस परंपरा ने सभ्य, संस्कारी, शिक्षित और कथित आधुनिक समाज तक को एक सदी और पीछे धकेल दिया ! इस कुंडली मिलान के चक्कर में अच्छे रिश्ते नहीं हो पा रहे हैं।
आजकल समाज में लोग बेटी के रिश्ते के लिए (लड़के में) चौबीस टंच का सोना खरीदने जाते हैं, देखते-देखते चार पांच वर्ष यूं ही व्यतीत हो जाते हैं। उच्च "शिक्षा" , "जॉब" या "लाईफ सेटल" होने पर विवाह करने के नाम पर भी लोग विवाह योग्य समय को व्यतीत कर देते हैं। लड़के देखने का अंदाज भी समय व्यतीत होने का अनोखा उदाहरण हो गया है?
स्वयं का मकान है कि नहीं ?
अगर है तो फर्नीचर कैसा है ?
घर में कमरे कितने हैं ?
गाडी है कि नहीं ?
है तो कौन सी है ?
खेती की जमीन है कि नहीं..?
है तो कितनी है..?
लड़का शहर में रहेगा या गांव में..?
रहन-सहन, खान-पान कैसा है ?
कितने भाई-बहन हैं ?
बंटवारे में माँ-बाप किनके गले पड़ने हैं या पड़े हैं ?
बहन कितनी हैं, उनकी शादी हुई है कि नहीं ?
माँ-बाप का स्वभाव कैसा है ?
घर वाले, नाते-रिश्तेदार आधुनिक ख्यालात के हैं कि नहीं ?
बच्चे का कद क्या है ?
रंग-रूप कैसा है ?
शिक्षा, कमाई, बैंक बैलेंस कितना है ? लड़का-लड़की सोशल मीडिया पर एक्टिव है कि नहीं ?
उसके कितने दोस्त हैं ?
सब बातों पर पूछताछ पूरी होने के बाद भी कुछ प्रश्न पूछने में और सोशल मीडिया पर वार्तालाप करने में और समय व्यतीत हो जाता है..!
इन्हीं जांच परख और देख भाल के हालातों से गुजरते हुए माँ-बाप की नींद ही खुलती है बच्चों की आयु 30 पार होने के बाद...!
चार-पाँच वर्ष की यह दौड़-धूप बच्चों की जवानी को बर्बाद करने के लिए काफी है। इस वजह से अच्छे रिश्ते हाथ से निकल जाते हैं और माँ-बाप अपने ही बच्चों के सपनों को चूर चूर-चूर कर देते हैं ।
एक समय था जब केवल घर खानदान देख कर रिश्ते होते थे। वो लम्बे भी निभते थे। समधी-समधन में मान मनुहार थी। सुख-दु:ख में साथ था। रिश्ते-नाते की अहमियत का अहसास था।
चाहे धन-माया कम थी पर खुशियाँ घर-आँगन में झलकती थीं। कभी कोई ऊँची-नीची बात हो जाती थी तो आपस में घर परिवार के बड़े-बुजुर्ग संभाल लेते थे। तलाक शब्द रिश्तों में था ही नहीं !
दाम्पत्य जीवन खट्टे-मीठे अनुभव में बीत जाया करता था। दोनों एक-दूसरे के बुढ़ापे की लाठी बनते थे और पोते-पोतियों में संस्कारों के बीज भरते थे।
अब कहां हैं वो संस्कार ?
आँख की शर्म तो इतिहास हो गई। नौबत आ जाती है रिश्तों में समझौता करने की।
लड़का-लड़की अपने समाज के नही होंगे तो भी चलेगा, ऐसी बातें भी सामने आ रही हैं।
आज समाज की लडकियाँ और लड़के खुले आम विजातीय संबंधों की ओर जा रहे हैं और दलील दे रहे हैं कि अपने समाज में अच्छे लड़के या लड़कियाँ मेरे लायक नहीं हैं। कारण है कि पश्चिमी अंधानुकरण में लडकियाँ आधुनिकता की पराकाष्ठा पार कर गई हैं।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब ये लड़के-लड़कियाँ अपने मन से अर्थात् विजातीय मैरिज करते हैं तब ये कुंडली मिलान का क्या होता है ? अधेड़ कुमारियों को पतिरूप में कलेक्टर, SP या करोड़पति चाहिए वो भी गुलाम टाइप! वो मिलते नहीं है।
इसी बकलोली के चक्कर में पूरे West का फर्टिलिटी रेट 1% तक गिर गया है, अब नहीं जागे तो अगला नंबर हमारा